अथर्ववेदः/काण्डं १/सूक्तम् ३५

यदाबध्नन् दाक्षायणा - श्लोक 1

यदाबध्नन् दाक्षायणा हिरण्यं शतानीकाय सुमनस्यमानाः - श्लोक 1

यदाबध्नन् दाक्षायणा हिरण्यं शतानीकाय सुमनस्यमानाः ।
तत्ते बध्नाम्यायुषे वर्चसे बलाय दीर्घायुत्वाय शतशारदाय ॥१॥

Hindi:
हे देव! जब दाक्षायण (संतान) हिरण्य (सोने) की बड़ी संख्या से बँधते हैं, तब मैं उन्हें जीवन, शक्ति, वैभव, दीर्घायु और सौभाग्य प्रदान करता हूँ।

English:
O gods! When the Daksha’s descendants bind gold in hundreds, I grant them life, power, prosperity, long life, and good fortune.

Word by Word:
यदाबध्नन् = जब बांधा गया | दाक्षायणा = दाक्षायण (संतान) | हिरण्यं शतानीकाय = सोने की सैकड़ों संख्या | सुमनस्यमानाः = शुभ-संकल्पित / प्रसन्न | तत्ते = तब | बध्नामि = मैं बांधता / प्रदान करता हूँ | आयुषे = जीवन | वर्चसे = वैभव | बलाय = शक्ति | दीर्घायुत्वाय = दीर्घायु | शतशारदाय = सौभाग्य
नैनं रक्षांसि न पिशाचाः सहन्ते देवानामोजः प्रथमजं ह्येतत् ।
यो बिभर्ति दाक्षायणं हिरण्यं स जीवेषु कृणुते दीर्घमायुः ॥२॥

Hindi:
यह पहला (हिरण्य) है जिसे देवता सहन नहीं कर सकते, और यह दाक्षायण को जीवित रखते हुए दीर्घायु प्रदान करता है।

English:
This is the first gold that even gods cannot endure, and it grants long life to Daksha’s descendants.

Word by Word:
नैनं = इसे | रक्षांसि = राक्षस / बाधा | न पिशाचाः = न राक्षस / भूत | सहन्ते = सह सकते | देवानामोजः = देवताओं का आनंद / शक्ति | प्रथमजं ह्येतत् = यह पहला जन्म | यो बिभर्ति = जो रखता है | दाक्षायणं हिरण्यं = दाक्षायण का सोना | स जीवेषु = जीवित रखने के लिए | कृणुते दीर्घमायुः = दीर्घायु देता है
अपां तेजो ज्योतिरोजो बलं च वनस्पतीनामुत वीर्याणि ।
इन्द्र इवेन्द्रियाण्यधि धारयामो अस्मिन् तद्दक्षमाणो बिभरद्धिरण्यम् ॥३॥

Hindi:
हम इस हिरण्य के द्वारा जल, शक्ति, प्रकाश, ओज, बल और वनस्पतियों की वीर्यशीलता को धारण करते हैं, जैसे इंद्र इन्द्रियों को नियंत्रित करता है।

English:
Through this gold, we sustain water, strength, light, vitality, power, and the vigor of plants, as Indra governs the senses.

Word by Word:
अपां = जल | तेजो = शक्ति | ज्योतिरोजो = प्रकाश और ओज | बलं च = बल | वनस्पतीनामुत = वनस्पतियों का | वीर्याणि = वीर्य / ऊर्जा | इन्द्र = इन्द्र | इवेन्द्रियाणि = इन्द्रियों के समान | अधि धारयामो = नियंत्रित करते हैं | अस्मिन् = इसमें | तद्दक्षमाणो = दक्ष | बिभरद्धिरण्यम् = इसे धारण करते हैं
समानां मासामृतुभिष्ट्वा वयं संवत्सरस्य पयसा पिपर्मि ।
इन्द्राग्नी विश्वे देवास्तेऽनु मन्यन्तामहृणीयमानाः ॥४॥

Hindi:
हम सभी मासिक अमृत को ग्रहण करके पूरे वर्ष का पेय ग्रहण करते हैं। इसको देवता इंद्र और अग्नि सहित मानते हैं।

English:
By consuming the monthly nectar, we partake in the annual drink, which all gods, including Indra and Agni, recognize.

Word by Word:
समानां = सभी | मासामृतुभिष्ट्वा = मासिक अमृत को ग्रहण करके | वयं = हम | संवत्सरस्य = वर्ष का | पयसा पिपर्मि = पेय ग्रहण करते हैं | इन्द्राग्नी = इंद्र और अग्नि | विश्वे देवाः = सभी देवता | तेऽनु मन्यन्ताम = उन्हें मानें | हृणीयमानाः = सम्मानित

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