दुःखजन्मप्रवृत्तिदोषमिथ्याज्ञानानामुत्तरोत्तरापाये तदनन्तरापायादपवर्गः II1/1/2 न्यायदर्शन
अर्थ : तत्वज्ञान से मिथ्या ज्ञान का नाश हो जाता है और मिथ्या ज्ञान के नाश से राग द्वेषादि दोषों का नाश हो जाता है, दोषों के नाश से प्रवृत्ति का नाश हो जाता है। प्रवृत्ति के नाश होने से कर्म बन्द हो जाते हैं। कर्म के न होने से प्रारम्भ का बनना बन्द हो जाता है, प्रारम्भ के न होने से जन्म-मरण नहीं होते और जन्म मरण ही न हुए तो दुःख-सुख किस प्रकार हो सकता है। क्योंकि दुःख तब ही तक रह सकता है जब तक मन है। और मन में जब तक राग-द्वेष रहते हैं तब तक ही सम्पूर्ण काम चलते रहते हैं।
क्योंकि जिन अवस्थाओं में मन हीन विद्यमान हो उनमें दुःख सुख हो ही नहीं सकते । क्योंकि दुःख के रहने का स्थान मन है। मन जिस वस्तु को आत्मा के अनुकूल समझता है उसके प्राप्त करने की इच्छा करता है। इसी का नाम राग है। यदि वह जिस वस्तु से प्यार करता है यदि मिल जाती है तो वह सुख मानता है। यदि नहीं मिलती तो दुःख मानता है। जिस वस्तु की मन इच्छा करता है उसके प्राप्त करने के लिए दो प्रकार के कर्म होते हैं। या तो हिंसा व चोरी करता है या दूसरों का उपकार व दान आदि सुकर्म करता है। सुकर्म का फल सुख और दुष्कर्मों का फल दुःख होता है परन्तु जब तक दुःख सुख दोनों का भोग न हो तब तक मनुष्य शरीर नहीं मिल सकता !
🔴 यदि आपको सुखी रहना है तो किसी से अपनी तुलना नहीं करो। ‘आप’ आप ही हो। आप के समान कोई नहीं। फिर क्यों दूसरों से अपनी तुलना करना, ईर्ष्या करना? आइये इस बात को एक कहानी के माध्यम से समझते हैं –
एक कौआ जंगल में रहता था और अपने जीवनसे संतुष्ट था। एक दिन उसने एक हंस को देखा, “यह हंस कितना सफ़ेद है, कितना सुन्दर लगता है।”, उसने मन ही मन सोचा।
🔵 उसे लगा कि यह सुन्दर हंस दुनिया में सबसे सुखी पक्षी होगा, जबकि मैं तो कितना काला हूँ! यह सब सोचकर वह काफी परेशान हो गया और उससे रहा नहीं गया, उसने अपने मनोभाव हंस को बताये।
🔴 हंस ने कहा – “वास्तिकता ऐसी है कि पहले मैं खुदको आसपास के सभी पक्षिओ में सुखी समझता था। लेकिन जब मैने तोते को देखा तो पाया कि उसके दो रंग है तथा वह बहुत ही मीठा बोलता है। तब से मुझे लगा कि सभी पक्षिओ में तोता ही सुन्दर तथा सुखी है।”
🔵 अब कौआ तोते के पास गया।
🔴 तोते ने कहा – “मै सुखी जिंदगी जी रहा था, लेकिन जब मैंने मोर को देखा तब मुझे लगा कि मुझमे तो दो रंग ही, परन्तु मोर तो विविधरंगी है। मुझे तो वह ही सुखी लगता है।”
🔵 फिर कौआ उड़कर प्राणी संग्रहालय गया। जहाँ कई लोग मोर देखने एकत्र हुए थे।
🔴 जब सब लोग चले गए तो कौआ उसके पास जाकर बोला –“मित्र, तुम तो अति सुन्दर हो। कितने सारे लोग तुम्हे देखने के लिए इकट्ठे होते है! प्रतिदिन तुम्हे देखने के लिए हजारो लोग आते है! जब कि मुझे देखते ही लोग मुझे उड़ा देते है। मुझे लगता है कि अपने इस ग्रह पर तो तुम ही सभी पक्षिओ में सबसे सुखी हो।”
🔵 मोर ने गहरी सांस लेते हुए कहाँ – “मैं हमेशा सोचता था कि ‘मैं इस पृथ्वी पर अतिसुन्दर हूँ, मैं ही अतिसुखी हूँ।’ परन्तु मेरे सौन्दर्य के कारण ही मैं यहाँ पिंजरे में बंद हूँ। मैंने सारे प्राणी में गौर से देखे तो मैं समझा कि ‘कौआ ही ऐसा पक्षी है जिसे पिंजरे में बंद नहीं किया जाता।’ मुझे तो लगता है कि काश मैं भी तुम्हारी तरह एक कौआ होता तो स्वतंत्रता से सभी जगह घूमता-उड़ता, सुखी रहता !”
🔴 मित्रों, यही तो है हमारी समस्या। हम अनावश्यक ही दूसरों से अपनी तुलना किया करते है और दुखी-उदास बनते है। हम कभी हमें जो मिला होता है उसकी कद्र नहीं करते इसीके कारण दुःख के विषचक्र में फंसे रहेते है।
🔵 प्रत्येक दिन को भगवान की भेट समझ कर आनंद से जीना चाहिए। सुखी होना तो सब चाहते है लेकिन सुखी रहेने के लिए सुख की चाबी हाथ करनी होगी तथा दूसरों से तुलना करना छोड़ना होगा। क्योंकि तुलना करना दुःख को न्योता देने के सामान है।
🔴 एक गाँव में एक गरीब किसान अपने खेत में काम करता था। वह हमेशा सोचता रहता कि उसके पास जो कुछ है वह कम है और उसके पड़ोसी के पास अधिक है।
🔵 वह लगातार अपने जीवन से असंतुष्ट था और दुःखी रहता था।
🔴 एक दिन गाँव में एक ज्ञानी आया। उसने किसान को देखा और पूछा – “तुम हमेशा दुखी क्यों रहते हो?”
🔵 किसान बोला – “मेरे पास कम है और मेरे पड़ोसी के पास बहुत कुछ है।”
🔴 ज्ञानी ने कहा – “जैसी दृष्टि वैसी सृष्टि। यदि तुम जो है उसमें खुश रहना सीख जाओगे, तो तुम्हारा जीवन धन-धान्य से भर जाएगा। लेकिन यदि तुम्हारी नजर हमेशा दूसरों पर रहेगी, तो तुम्हारा मन कभी संतुष्ट नहीं होगा।”
🔵 किसान ने ज्ञानी की बात समझी और अपनी नजर बदल दी। उसने जो कुछ है उसकी कद्र करना शुरू किया। धीरे-धीरे वह खुश रहने लगा और उसके जीवन में शांति आ गई।
🔴 यही शिक्षा है – जीवन में संतोष और आभार का भाव रखो, और हमेशा दूसरों की तुलना में अपना मूल्य मत घटाओ।
🔴 प्राचीन काल में एक समृद्ध राज्य का सम्राट अपने वैभव और शक्ति के लिए प्रसिद्ध था। महल सोने-चाँदी से सजा था, सेवक सैकड़ों थे, पर उसके चेहरे पर शांति नहीं थी।
🔵 उसी राज्य में एक साधु रहते थे। न घर, न धन, न संग्रह। वे नदी किनारे एक वृक्ष के नीचे रहते और जो मिल जाता उसी में संतुष्ट रहते। आश्चर्य यह कि उनके चेहरे पर सदैव प्रसन्नता रहती।
🔴 सम्राट ने साधु को दरबार में बुलाया और पूछा — “मेरे पास सब कुछ है फिर भी मैं अशांत हूँ, और आपके पास कुछ भी नहीं फिर भी आप प्रसन्न कैसे?”
🔵 साधु मुस्कुराए और बोले — “राजन, आपके पास सब है पर संतोष नहीं। मेरे पास कुछ नहीं पर संतोष है।”
🔴 सम्राट ने कहा — “तो आओ एक प्रयोग करते हैं। एक महीने के लिए हम दोनों अपना स्थान बदल लेते हैं।”
🔵 साधु सहमत हो गए। अगले दिन से सम्राट साधारण वस्त्र पहनकर नगर में रहने लगे। उन्हें स्वयं भोजन जुटाना पड़ता, धूप-बारिश सहनी पड़ती। पहली बार उन्हें जीवन का वास्तविक संघर्ष दिखाई दिया।
🔴 उधर साधु महल में थे। रेशमी वस्त्र, स्वादिष्ट भोजन, आलीशान कक्ष — पर उनके चेहरे की शांति वैसी ही रही। न उन्हें रत्नों का आकर्षण था, न सत्ता का अभिमान।
🔵 तीसरे सप्ताह तक सम्राट बदल चुके थे। उन्होंने देखा कि गरीब लोग भी हँसते हैं। कम साधनों में भी प्रेम और संतोष पाया जा सकता है। रात को खुले आकाश के नीचे सोते समय उन्होंने पहली बार तारों की सुंदरता को महसूस किया।
🔴 एक महीना पूर्ण हुआ। दोनों पुनः आमने-सामने आए। सम्राट साधु के चरणों में झुक गए और बोले — “आज मैंने जाना कि धन समस्या नहीं, धन का अहंकार समस्या है।”
🔵 साधु बोले — “दरिद्रता भी समाधान नहीं यदि उसमें शिकायत हो। जीवन का सत्य संतुलन में है। जो संतुलन पा लेता है वही सच्चा धनी है।”
🔴 शिक्षा: अत्यधिक धन और अत्यधिक दरिद्रता दोनों ही अशांति दे सकते हैं। संतोष, संतुलन और विनम्रता ही जीवन का वास्तविक धन है।
🔴 एक नगर में एक अत्यंत धनी व्यापारी रहता था। उसके पास धन की कोई कमी नहीं थी, पर वह हमेशा कहता — “मेरे पास समय नहीं है।”
🔵 उसका पुत्र अक्सर कहता — “पिताजी, थोड़ा समय हमारे साथ भी बिताइए।” लेकिन व्यापारी हर बार यही उत्तर देता — “अभी काम ज़रूरी है, बाद में।”
🔴 एक दिन नगर में एक ज्ञानी संत आए। व्यापारी ने उनसे पूछा — “मैं और अधिक सफल कैसे बनूँ?”
🔵 संत मुस्कुराए और बोले — “पहले यह बताओ, तुम्हारे जीवन की सबसे मूल्यवान वस्तु क्या है?”
🔴 व्यापारी ने तुरंत कहा — “मेरा धन!”
🔵 संत ने शांत स्वर में कहा — “यदि मैं तुम्हें एक करोड़ स्वर्ण मुद्राएँ दूँ, क्या तुम अपना एक वर्ष मुझे दे दोगे?”
🔴 व्यापारी चौंक गया — “नहीं! एक वर्ष तो बहुत मूल्यवान है।”
🔵 संत बोले — “तो समझो, धन नहीं — समय सबसे बड़ा धन है। जो समय को खो देता है, वह सब कुछ खो देता है।”
🔴 उसी दिन व्यापारी घर लौटा। उसने अपने पुत्र को पास बुलाया, परिवार के साथ बैठा और वर्षों बाद हँसते हुए भोजन किया।
🔵 धीरे-धीरे उसने सीखा कि धन कमाना आवश्यक है, पर समय का संतुलन बनाए रखना उससे भी अधिक आवश्यक है।
🔴 शिक्षा: समय ही जीवन है। जो समय का सम्मान करता है वही सच्चा सफल और सुखी होता है।
🔴 एक नगर में एक अत्यंत विद्वान पंडित रहता था। उसे अपने ज्ञान पर बहुत अभिमान था। वह जहाँ भी जाता, लोगों को नीचा दिखाता और स्वयं को श्रेष्ठ सिद्ध करता।
🔵 एक दिन उसे समाचार मिला कि पास के गाँव में एक साधारण किसान है जो बड़े-बड़े विद्वानों को मौन कर देता है। पंडित का अहंकार जाग उठा। उसने निश्चय किया कि वह किसान को परास्त करेगा।
🔴 अगले दिन पंडित गाँव पहुँचा। किसान खेत में हल चला रहा था। पंडित ने कहा — “सुना है तुम बड़े ज्ञानी हो, आओ शास्त्रार्थ करें।”
🔵 किसान मुस्कुराया और बोला — “मैं तो साधारण किसान हूँ। पर यदि आप प्रश्न पूछना चाहें तो पूछिए।”
🔴 पंडित ने जटिल प्रश्न पूछे, कठिन शास्त्रीय भाषा में। किसान शांत भाव से सुनता रहा। फिर उसने केवल एक प्रश्न किया — “पंडित जी, यदि ज्ञान से आपका मन शांत नहीं हुआ, तो वह ज्ञान किस काम का?”
🔵 यह सुनते ही पंडित मौन हो गया। उसने अपने भीतर झाँका। सचमुच, उसके ज्ञान ने उसे विनम्र नहीं बनाया था, बल्कि अहंकारी बना दिया था।
🔴 पंडित की आँखों से आँसू आ गए। उसने किसान के चरण स्पर्श किए और कहा — “आज आपने मुझे सच्चा ज्ञान दिया है।”
🔵 किसान बोला — “सच्चा ज्ञान वही है जो विनम्रता और शांति दे। जो अहंकार बढ़ाए, वह अज्ञान है।”
🔴 शिक्षा: अहंकार पतन का कारण है। ज्ञान का वास्तविक फल विनम्रता है, न कि अभिमान।
🔴 एक गाँव में दो मित्र रहते थे। एक ईमानदार और परिश्रमी था, जबकि दूसरा चालाक और स्वार्थी। दोनों साथ में व्यापार करते थे।
🔵 स्वार्थी मित्र अक्सर लाभ छुपा लेता और झूठ बोलकर अपने साथी को धोखा देता। ईमानदार मित्र सब जानता था, पर विवाद से बचने के लिए चुप रहता।
🔴 एक दिन दोनों दूर नगर व्यापार करने गए। रास्ते में उन्हें सोने की एक थैली मिली। स्वार्थी मित्र बोला — “यह मेरी है, क्योंकि मैंने पहले देखी।”
🔵 ईमानदार मित्र ने शांत स्वर में कहा — “हम साथ हैं, तो जो भी मिला वह दोनों का है।”
🔴 बात बढ़ ही रही थी कि तभी सैनिक आ पहुँचे। वे उस थैली के मालिक को ढूँढ रहे थे। स्वार्थी मित्र डर गया और बोला — “हम तो मुसीबत में फँस गए!”
🔵 ईमानदार मित्र बोला — “तुम तो कह रहे थे कि थैली तुम्हारी है, तो अब ‘हम’ क्यों कह रहे हो?”
🔴 सैनिकों ने सच्चाई जानी। थैली असली मालिक को लौटा दी गई। स्वार्थी मित्र को उसके झूठ के लिए दंड मिला, जबकि ईमानदार मित्र की प्रशंसा हुई।
🔵 उस दिन स्वार्थी मित्र को अपनी भूल का एहसास हुआ। उसने समझा कि छल से पाया गया लाभ क्षणिक होता है, पर सत्य और कर्म का फल स्थायी होता है।
🔴 शिक्षा: जैसा कर्म करेंगे, वैसा ही फल मिलेगा। ईमानदारी अंततः सम्मान और शांति देती है।
🔴 एक गाँव में एक कुम्हार रहता था। वह बहुत मेहनती था, परंतु उसकी एक समस्या थी — वह बहुत अधीर था। यदि घड़ा तुरंत सही आकार न ले तो वह गुस्सा हो जाता।
🔵 एक दिन उसका छोटा बेटा उसके पास बैठा काम देख रहा था। उसने पूछा — “पिताजी, आप बार-बार घड़ा क्यों तोड़ देते हैं?”
🔴 कुम्हार बोला — “क्योंकि यह तुरंत सुंदर नहीं बनता!”
🔵 उसी समय गाँव में एक वृद्ध संत आए। उन्होंने कुम्हार को समझाया — “मिट्टी को आकार लेने में समय लगता है। यदि तुम धैर्य रखोगे, तो वही मिट्टी सुंदर घड़ा बनेगी।”
🔴 संत ने एक बीज हाथ में लेकर कहा — “यदि बीज बोते ही फल की अपेक्षा करोगे, तो निराशा ही मिलेगी। समय और धैर्य से ही वृक्ष फल देता है।”
🔵 कुम्हार ने संत की बात गांठ बाँध ली। उसने धीरे-धीरे, सावधानी और धैर्य से घड़ा बनाना शुरू किया। कुछ ही दिनों में उसके बनाए घड़े पूरे नगर में प्रसिद्ध हो गए।
🔴 अब वह समझ चुका था — अधीरता विनाश करती है, धैर्य निर्माण करता है।
🔵 शिक्षा: जीवन में सफलता पाने के लिए धैर्य अनिवार्य है। जो धैर्य रखता है, वही अंततः श्रेष्ठ परिणाम पाता है।
🔴 एक गाँव में दो घनिष्ठ मित्र रहते थे। दोनों बचपन से साथ थे और हर काम मिलकर करते थे।
🔵 एक दिन उन्होंने जंगल की ओर घूमने जाने का निश्चय किया। चलते-चलते वे जंगल के भीतर काफी दूर निकल गए।
🔴 अचानक सामने से एक भालू आ गया। दोनों घबरा गए। एक मित्र तुरंत पास के पेड़ पर चढ़ गया, पर दूसरे को पेड़ पर चढ़ना नहीं आता था।
🔵 उसने तुरंत जमीन पर लेटकर साँस रोक ली, क्योंकि उसने सुन रखा था कि भालू मरे हुए व्यक्ति को नहीं छूता।
🔴 भालू उसके पास आया, उसे सूँघा और यह समझकर कि वह मृत है, चला गया।
🔵 जब खतरा टल गया तो पेड़ पर चढ़ा मित्र नीचे आया और मज़ाक में बोला — “भालू तुम्हारे कान में क्या कह रहा था?”
🔴 दूसरे मित्र ने गंभीर होकर उत्तर दिया — “वह कह रहा था कि ऐसे मित्रों से सावधान रहो, जो संकट में तुम्हें अकेला छोड़ दें।”
🔵 यह सुनकर पहले मित्र को अपनी गलती का एहसास हुआ। उसने क्षमा माँगी और भविष्य में सच्ची मित्रता निभाने का वचन दिया।
🔴 शिक्षा: सच्चा मित्र वही है जो सुख-दुख दोनों में साथ दे। संकट में साथ छोड़ने वाला मित्र नहीं, केवल परिचित होता है।
🔴 एक गाँव में एक गरीब लकड़हारा रहता था। वह प्रतिदिन जंगल से लकड़ी काटकर बेचता और ईमानदारी से अपना जीवन यापन करता था।
🔵 एक दिन नदी किनारे लकड़ी काटते समय उसकी कुल्हाड़ी पानी में गिर गई। वह दुखी होकर बैठ गया और रोने लगा।
🔴 तभी नदी से एक देवता प्रकट हुए। उन्होंने पूछा — “तुम क्यों रो रहे हो?”
🔵 लकड़हारे ने सच-सच सारी बात बता दी। देवता ने पानी में डुबकी लगाई और सोने की कुल्हाड़ी निकालकर पूछा — “क्या यह तुम्हारी है?”
🔴 लकड़हारे ने कहा — “नहीं, मेरी कुल्हाड़ी लोहे की थी।”
🔵 फिर देवता चाँदी की कुल्हाड़ी लाए। लकड़हारे ने फिर मना कर दिया। अंत में देवता उसकी असली लोहे की कुल्हाड़ी लाए।
🔴 लकड़हारे की ईमानदारी से प्रसन्न होकर देवता ने तीनों कुल्हाड़ियाँ उसे दे दीं।
🔵 यह समाचार सुनकर उसका पड़ोसी लालच में आ गया। उसने जानबूझकर अपनी कुल्हाड़ी नदी में फेंक दी और रोने लगा।
🔴 देवता आए और सोने की कुल्हाड़ी दिखाते ही वह बोला — “हाँ, यही मेरी है!”
🔵 देवता ने क्रोधित होकर कहा — “तुम लालची और झूठे हो।” और उसकी असली कुल्हाड़ी भी वापस नहीं दी।
🔴 शिक्षा: ईमानदारी का फल सदैव मीठा होता है, जबकि लालच अंततः नुकसान ही देता है।
🔴 एक गाँव में एक व्यक्ति रहता था जिसे बहुत जल्दी क्रोध आ जाता था। छोटी-सी बात पर भी वह गुस्से में अपशब्द कह देता था।
🔵 उसके पिता ने उसकी आदत सुधारने के लिए उसे एक थैली कीलें दीं और कहा — “जब भी तुम्हें क्रोध आए, दीवार में एक कील ठोंक देना।”
🔴 पहले ही दिन उसने 15 कीलें ठोंक दीं। धीरे-धीरे उसने स्वयं को नियंत्रित करना शुरू किया और कीलों की संख्या कम होने लगी।
🔵 कुछ महीनों बाद ऐसा दिन आया जब उसने एक भी कील नहीं ठोंकी। वह प्रसन्न होकर पिता के पास गया।
🔴 पिता ने कहा — “अब जितने दिन तुम क्रोध पर नियंत्रण रखो, हर दिन एक कील निकाल देना।”
🔵 समय बीतता गया और अंततः सभी कीलें निकाल दी गईं।
🔴 पिता उसे दीवार के पास ले गए और बोले — “देखो, दीवार में छेद अब भी हैं। क्रोध में कहे गए शब्द भी ऐसे ही घाव छोड़ जाते हैं।”
🔵 उस दिन युवक ने समझा कि क्रोध क्षणिक होता है, पर उसका दुष्परिणाम लंबे समय तक रहता है।
🔴 शिक्षा: क्रोध पर नियंत्रण ही सच्ची शक्ति है। सोच-समझकर बोले गए शब्द ही संबंधों को मजबूत बनाते हैं।
🔴 एक नगर में एक अत्यंत धनी व्यक्ति रहता था। उसके पास विशाल महल, नौकर-चाकर और अपार संपत्ति थी, फिर भी वह हमेशा चिंतित रहता था।
🔵 उसी नगर के बाहर एक गरीब मजदूर रहता था। छोटी-सी झोपड़ी, साधारण भोजन, पर उसके चेहरे पर हमेशा मुस्कान रहती थी।
🔴 एक दिन धनी व्यक्ति ने मजदूर से पूछा — “तुम्हारे पास कुछ भी नहीं, फिर भी तुम इतने प्रसन्न कैसे रहते हो?”
🔵 मजदूर बोला — “मेरे पास जो है, वही पर्याप्त है। मैं भगवान का धन्यवाद करता हूँ और संतोष में जीता हूँ।”
🔴 धनी व्यक्ति को यह बात समझ नहीं आई। उसने सोचा — “यदि यह थोड़ा धन पा जाए तो और खुश होगा।” उसने मजदूर के घर चुपके से 99 स्वर्ण मुद्राएँ रख दीं।
🔵 सुबह मजदूर ने स्वर्ण मुद्राएँ देखीं। वह गिनने लगा — 99! वह सोचने लगा — “बस एक और मिल जाए तो 100 पूरे हो जाएँ।”
🔴 अब वह दिन-रात उसी एक मुद्रा के पीछे भागने लगा। उसकी मुस्कान गायब हो गई, शांति खत्म हो गई।
🔵 धनी व्यक्ति यह सब देख रहा था। उसे समझ आया कि संतोष ही सच्चा धन है, और लालच से सुख नष्ट हो जाता है।
🔴 शिक्षा: जिसके पास संतोष है वही सच्चा धनी है। अधिक पाने की अंधी दौड़ शांति छीन लेती है।
🔴 एक छोटे से गाँव में एक बालक रहता था। वह पढ़ाई में सामान्य था और अक्सर स्वयं को कमजोर समझता था।
🔵 उसके गुरुजी ने एक दिन उसे एक छोटा सा पत्थर दिया और कहा — “इसे बाज़ार में ले जाओ, पर बेचना मत। केवल इसकी कीमत पूछकर आना।”
🔴 बालक पत्थर लेकर सब्ज़ी वाले के पास गया। उसने कहा — “यह पत्थर 10 रुपये का है।”
🔵 फिर वह सुनार के पास गया। सुनार ने ध्यान से देखकर कहा — “यह तो कीमती रत्न है, मैं इसके 10,000 रुपये दूँगा।”
🔴 अंत में वह रत्न विशेषज्ञ के पास पहुँचा। विशेषज्ञ ने आश्चर्य से कहा — “यह अत्यंत दुर्लभ रत्न है, इसकी कीमत लाखों में है!”
🔵 बालक आश्चर्यचकित होकर गुरुजी के पास लौटा और सब बताया।
🔴 गुरुजी बोले — “पत्थर वही था, पर उसकी पहचान करने वाले बदलते गए। इसी प्रकार तुम्हारी कीमत भी वही है, फर्क केवल पहचान और विश्वास का है।”
🔵 उस दिन बालक ने सीखा कि यदि स्वयं पर विश्वास हो, तो दुनिया भी आपकी वास्तविक कीमत पहचानती है।
🔴 शिक्षा: स्वयं पर विश्वास ही सफलता की पहली सीढ़ी है। अपनी क्षमता को कभी कम मत समझो।
🔴 एक गाँव में दो भाई रहते थे। बड़ा भाई मेहनती था, जबकि छोटा भाई भाग्य के भरोसे बैठा रहता था।
🔵 खेत दोनों के थे, पर बड़ा भाई रोज सुबह उठकर मेहनत करता, बीज बोता, पानी देता और खेत की देखभाल करता।
🔴 छोटा भाई सोचता — “जब समय आएगा, फसल अपने आप उग जाएगी।” वह अधिकतर समय आराम करता रहा।
🔵 कुछ महीनों बाद फसल काटने का समय आया। बड़े भाई के खेत में लहलहाती फसल थी, जबकि छोटे भाई के खेत में सूखी घास ही थी।
🔴 छोटा भाई निराश होकर बोला — “मेरे साथ ही ऐसा क्यों हुआ?”
🔵 बड़ा भाई मुस्कुराया और बोला — “क्योंकि खेत भी वही देता है जो हम उसमें बोते हैं। मेहनत बोओगे तो सफलता काटोगे।”
🔴 उस दिन छोटे भाई को अपनी गलती समझ आई। उसने निश्चय किया कि अब वह भाग्य नहीं, परिश्रम पर विश्वास करेगा।
🔵 अगले वर्ष उसने भी मेहनत की, और उसकी फसल भी लहलहा उठी।
🔴 शिक्षा: परिश्रम ही सफलता की कुंजी है। भाग्य भी उन्हीं का साथ देता है जो कर्म करते हैं।
🔴 एक नगर में एक युवक रहता था जिसे हर काम टालने की आदत थी। वह सोचता — “अभी बहुत समय है, बाद में कर लूँगा।”
🔵 उसके पिता बार-बार समझाते — “समय सबसे मूल्यवान धन है, इसे व्यर्थ मत गंवाओ।” पर युवक ध्यान नहीं देता था।
🔴 परीक्षा का समय आया। युवक ने सोचा — “कल से पढ़ाई शुरू करूँगा।” देखते-देखते परीक्षा का दिन आ गया।
🔵 परिणाम घोषित हुआ। वह असफल हो गया, जबकि उसके मित्र सफल हो गए।
🔴 दुखी होकर वह एक संत के पास गया और बोला — “मुझे सफलता क्यों नहीं मिली?”
🔵 संत ने उसे एक मुट्ठी रेत दी और कहा — “इसे कसकर पकड़ो।” युवक ने पकड़ लिया, पर रेत धीरे-धीरे हाथ से फिसलती गई।
🔴 संत बोले — “समय भी ऐसा ही है। यदि इसे संभालकर नहीं रखोगे, तो यह हाथ से निकल जाएगा।”
🔵 युवक ने उस दिन से समय का सदुपयोग करना शुरू किया और अगले वर्ष परीक्षा में सफल हुआ।
🔴 शिक्षा: समय अमूल्य है। जो समय का सम्मान करता है, वही जीवन में आगे बढ़ता है।
🔴 एक जंगल में एक विशाल आम का पेड़ था। वह ऊँचा, घना और फलों से लदा रहता था। पास ही एक सीधा खड़ा, ऊँचा पर सूखा पेड़ भी था, जिसे अपने कद पर बहुत घमंड था।
🔵 सूखा पेड़ अक्सर आम के पेड़ से कहता — “तुम क्यों झुके रहते हो? सीधे खड़े रहो जैसे मैं खड़ा हूँ!”
🔴 आम का पेड़ मुस्कुराकर कहता — “मैं फलों से भरा हूँ, इसलिए झुकता हूँ।”
🔵 एक दिन तेज आँधी आई। सूखा पेड़ अपने घमंड में सीधा खड़ा रहा और तेज हवा के कारण जड़ से उखड़ गया।
🔴 आम का पेड़ हवा के साथ झुकता रहा, इसलिए सुरक्षित बच गया।
🔵 आँधी के बाद जंगल के पशु-पक्षी आम के पेड़ की छाया में इकट्ठा हुए। सबने उसकी विनम्रता और धैर्य की प्रशंसा की।
🔴 उस दिन जंगल ने सीखा — जो झुकना जानता है, वही बचना जानता है।
🔵 शिक्षा: विनम्रता मनुष्य को महान बनाती है। घमंड अंततः विनाश का कारण बनता है।
🔴 एक गाँव में एक किसान रहता था। वह हमेशा दूसरों की बुराई करता और किसी की मदद नहीं करता था।
🔵 एक वर्ष उसके खेत में फसल अच्छी नहीं हुई। उसने सोचा कि शायद पड़ोसी ने कोई जादू-टोना कर दिया है।
🔴 क्रोध में आकर उसने पड़ोसी के खेत में गंदा पानी बहा दिया, ताकि उसकी फसल खराब हो जाए।
🔵 परंतु कुछ दिनों बाद बारिश हुई और वही गंदा पानी उसके अपने खेत में वापस आ गया। उसकी बची-खुची फसल भी नष्ट हो गई।
🔴 वह दुखी होकर गाँव के बुजुर्ग के पास गया और सारी बात बताई।
🔵 बुजुर्ग बोले — “जैसा बीज बोओगे, वैसा ही फल पाओगे। कर्म का नियम अटल है।”
🔴 किसान को अपनी गलती का एहसास हुआ। उसने पड़ोसी से क्षमा माँगी और आगे से अच्छे कर्म करने का संकल्प लिया।
🔵 अगले वर्ष उसने सबकी मदद की, और उसकी फसल भी भरपूर हुई।
🔴 शिक्षा: कर्म का नियम सदा कार्य करता है। अच्छा करोगे तो अच्छा मिलेगा, बुरा करोगे तो बुरा लौटेगा।
🔴 एक नगर में एक छोटा बालक रहता था जो हमेशा सत्य बोलता था। लोग उसे उसकी ईमानदारी के लिए जानते थे।
🔵 एक दिन रास्ते में उसे सोने से भरा एक बटुआ मिला। वह उसे घर ले आया और अपने माता-पिता को बताया।
🔴 उसके पिता ने कहा — “इसे नगर के मुखिया के पास ले चलो, ताकि असली मालिक को लौटाया जा सके।”
🔵 उसी समय नगर में एक व्यापारी अपने खोए हुए बटुए की घोषणा करवा रहा था।
🔴 जब व्यापारी ने बटुआ देखा तो उसने लालच में कहा — “मेरे बटुए में इससे अधिक धन था!” ताकि वह बालक को इनाम न देना पड़े।
🔵 मामला मुखिया के सामने पहुँचा। मुखिया बुद्धिमान था। उसने कहा — “यदि इसमें कम धन है, तो यह तुम्हारा बटुआ नहीं हो सकता। यह बालक को मिल गया था, इसलिए यह उसी का है।”
🔴 व्यापारी अपनी चाल में स्वयं फँस गया। उसे अपनी गलती का एहसास हुआ।
🔵 बालक की सच्चाई की जीत हुई, और नगर में उसकी प्रशंसा होने लगी।
🔴 शिक्षा: सत्य की राह कठिन हो सकती है, पर अंत में विजय हमेशा सच्चाई की ही होती है।
🔴 एक बार एक किसान ने अपने खेत में बाँस के बीज बोए। वह रोज़ पानी देता, खाद डालता और पूरी लगन से देखभाल करता।
🔵 एक वर्ष बीत गया, पर ज़मीन के ऊपर कुछ भी दिखाई नहीं दिया। गाँव वाले उसका मज़ाक उड़ाने लगे।
🔴 किसान फिर भी निराश नहीं हुआ। उसने धैर्य रखा और निरंतर मेहनत करता रहा।
🔵 पाँचवें वर्ष अचानक जमीन से एक छोटा अंकुर निकला। कुछ ही हफ्तों में वह बाँस का पौधा तेजी से ऊँचा बढ़ने लगा।
🔴 कुछ महीनों में वह 80–90 फीट तक ऊँचा हो गया। गाँव वाले आश्चर्यचकित रह गए।
🔵 किसान मुस्कुराया और बोला — “यह पाँच साल से जमीन के अंदर अपनी जड़ें मजबूत कर रहा था।”
🔴 उसने समझाया कि सफलता भी ऐसी ही होती है — पहले मजबूत नींव बनती है, फिर ऊँचाई मिलती है।
🔵 शिक्षा: धैर्य और निरंतर प्रयास से ही बड़ी सफलता मिलती है। जल्दबाज़ी छोड़कर विश्वास बनाए रखें।
🔴 एक गाँव में एक वृद्ध किसान अपने चार पुत्रों के साथ रहता था। चारों भाई आपस में हमेशा झगड़ते रहते थे।
🔵 किसान ने उन्हें समझाने के लिए एक दिन चारों को बुलाया और एक-एक लकड़ी दी। उसने कहा — “इसे तोड़ो।” सबने आसानी से लकड़ी तोड़ दी।
🔴 फिर उसने लकड़ियों का एक गट्ठर बाँधकर दिया और कहा — “अब इसे तोड़ो।”
🔵 चारों ने पूरी ताकत लगा दी, पर गट्ठर नहीं टूटा।
🔴 किसान बोला — “जब तुम अलग-अलग हो, तो आसानी से टूट सकते हो। पर जब एकता में बंधे हो, तो कोई तुम्हें नहीं तोड़ सकता।”
🔵 भाइयों को अपनी गलती का एहसास हुआ। उन्होंने मिल-जुलकर रहने का वचन दिया।
🔴 कुछ समय बाद उनके खेत, व्यापार और परिवार सब उन्नति करने लगे।
🔵 शिक्षा: एकता में ही शक्ति है। मिलकर रहने से बड़ी से बड़ी कठिनाई भी छोटी हो जाती है।
🔴 एक छोटे से गाँव में एक बालक रहता था जिसे ऊँचाई से बहुत डर लगता था। वह पेड़ पर चढ़ने या ऊँची जगह जाने से घबराता था।
🔵 एक दिन उसके गुरु उसे पहाड़ी पर ले गए और बोले — “डर को जीतना है तो उसका सामना करो।”
🔴 बालक काँपते हुए धीरे-धीरे ऊपर चढ़ने लगा। हर कदम पर उसे लगा कि वह गिर जाएगा।
🔵 गुरु नीचे से कहते रहे — “तुम कर सकते हो, बस स्वयं पर विश्वास रखो।”
🔴 आखिरकार वह पहाड़ी की चोटी पर पहुँच गया। वहाँ से दृश्य देखकर उसका डर गायब हो गया।
🔵 उसने महसूस किया कि डर उसके मन में था, वास्तविकता में नहीं।
🔴 उस दिन के बाद उसने हर चुनौती का सामना साहस और आत्मविश्वास से किया।
🔵 शिक्षा: डर को जीतने का एक ही उपाय है — उसका सामना करना। आत्मविश्वास ही सफलता की सच्ची उड़ान है।
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