ओ३म् सह नाववतु ।
सह नौ भुनक्तु ।
सह वीर्यं करवावहै ।
तेजस्वि नावधीतमस्तु मा विद्विषावहै ।
ओ३म् शान्तिः शान्तिः शान्तिः ॥
Om Saha Nau-Avatu
Saha Nau Bhunaktu
Saha Veeryam Karavaavahai
Tejasvi Nau-Adhiitam-Astu Maa Vidvishavahai
Om Shantih Shantih Shantih
Om, May the Divine Protect us both (Teacher and Student).
May the Divine Nourish us both.
May we work together with great energy and strength.
May our study be illuminating and not give rise to hostility.
Om Peace, Peace, Peace.
यह मंत्र केवल एक प्रार्थना नहीं, बल्कि वैदिक शिक्षा प्रणाली का आधार है।
“शान्ति” तीन बार बोली जाती है —
यह वैदिक शिक्षा की आत्मा है — ज्ञान जो जोड़ता है, तोड़ता नहीं।
ओ३म् शं नो मित्रः शं वरुणः ।
शं नो भवत्वर्यमा ।
शं नो इन्द्रो बृहस्पतिः ।
शं नो विष्णुरुरुक्रमः ॥
Om Sham No Mitrah Sham Varunah
Sham No Bhavatv Aryamaa
Sham No Indro Brihaspatih
Sham No Vishnur Urukramah
May Mitra be auspicious to us.
May Varuna bless us.
May Aryama bless us.
May Indra and Brihaspati bless us.
May Vishnu with vast strides bless us.
ओ३म् मित्र हमारे अनुकूल हो अर्थात मित्र यहाँ पर विद्युत् कि तरंगो को कहा जा रहा है, विद्युत् कि दो प्रमुख तरंगे होती हैं एक फ्रेश दूसरा अर्थ इसको ही यहाँ मंत्रो में मित्र और अरुण कह रहे हैं, अरुण भी हमारे अनुकूल हो मित्र का मतलब अग्नि भी कर सकते हैं और वरुण मतलब जल से हैं इस तरह से विद्युत् दो प्रकार के होती है एक ए सी दूसरी डी सी अर्थात एक सुखी विद्युत् जो प्रायः बैटरी में सुरक्षित होती दूसरी गीली जो टरबाईन से उत्पन्न कि जाती हैं, इस प्रकार से हम समझ सकते हैं कि सूर्य से हमे दो प्रकार कि शक्ति प्राप्त होती जिसे मित्र और वरुण कहते हैं वैदिक भाषा में जो प्रकाश हमे सूर्य से हमे दिन में मिलता है उसको मित्र कहते है, और जो प्रकाश रात्रि के समय में चन्द्रमा से मिलता हैं उसको वरुण कह सकते है |
यह मंत्र सिखाता है कि मनुष्य प्रकृति, ऊर्जा और नैतिकता के साथ संतुलन में जीए।
नमो ब्रह्मणे ।
नमस्ते वायो ।
त्वमेव प्रत्यक्षं ब्रह्मासि ।
त्वामेव प्रत्यक्षं ब्रह्म वदिष्यामि ।
ऋतं वदिष्यामि ।
सत्यं वदिष्यामि ॥
Salutations to Brahman.
Salutations to Vayu.
You indeed are the visible Brahman.
I proclaim You as visible Brahman.
I shall speak Rta (Cosmic Order).
I shall speak Satya (Truth).
यहाँ साधक वचन देता है कि वह ब्रह्मांडीय नियम और सत्य के अनुसार जीवन जियेगा।
सहस्रशीर्षा पुरुषः सहस्राक्षः सहस्रपात् ।
स भूमिं विश्वतो वृत्वात्यतिष्ठद्दशाङुलम् ॥
The Cosmic Being has countless heads, eyes and feet.
He pervades the entire universe and yet transcends it.
अर्थ – पुरुष का तात्पर्य यहाँ पर ब्रह्मांडीय चेतना से है अर्थात परमेश्वर से वह परमेस्वर कैसा है? इसके लिए मंत्र कहता हैं कि हजारों सर, हजारों पैर, हजारों आँखों वाला है, और वह सम्पूर्ण भूमि में व्याप्त ब्रह्मांडीय शरीर वाला है | अर्थात वह सभी जीव जंतु प्राणी के शरीर अंगो को एक अपना बना कर उपयोग करता हैं और इन सब से परे सब के हृदय में जो दस अंगुल के परिणाम का हैं उसमे विराजमान रहता हैं|
पुरुष एवेदं सर्वं यद्भूतं यच्च भव्यम् ।
उतामृतत्वस्येशानो यदन्नेनातिरोहति ॥
The Purusha is all that was and all that will be.
He is the Lord of immortality.
अर्थ- अगला मन्त्र पुरुष सूक्त का कहता है कि वह पुरुष वेद के समान वेद ही है जो सब कुछ जानता है वेद का मतलब जानना भी होता अर्थात परमेस्वर सब कुछ अंदर बाहर के सभी विषय को भली प्रकार से जानता है | वह सब का सार मूल है मूल का कोई कारण नही होता वह अकारण और निराकार है वही हम सब का भूत है, वही भविष्य है और वही हम सब का वर्तमान है, सब कुछ जो दृश्य अदृश्य जगत हैं वह सब मकणे कि जाल एक में ही बुना जा रहा हैं | एक घोसले से अधिक नहीं है वही भोजन है और वही खाने वाला है वही जन्म देता है और वही मारता है वही नश्वर और वही श्वर के रूप में बोलता है अर्थात अक्षर हैं जिसका कभी नाश नही होता है उसको ही जान कर हम सब अपने सभी पापो दुखो बीमारियों अग्यांताओं से मुक्त हो सकते हैं|
यह अद्वैत की घोषणा है — सब उसी में स्थित है।
एतावानस्य महिमातो ज्यायाँश्च पूरुषः ।
पादोऽस्य विश्वा भूतानि त्रिपादस्यामृतं दिवि ॥
All beings are but one quarter of Him;
Three quarters remain immortal in the divine realm.
अर्थ – यह मंत्र कहता है कि परमात्मा रूपी पुरुष अर्थात पुरुष विशेष ईश्वरः जो इस शरीर से विशेष है वही ईश्वर है जो सारी महानतावो से भी महान है जिसको शब्दों में अभिव्यक्त नही किया जा सकता है उसका एक पैर दृश्यमय नश्वर जगत हैं और दूसरा पैर कारण हैं इस ब्रह्मांड का और तीसरा पैर अदृश्य हैं यह तिन पैर वाला है जिसको भुत, भविष्य, वर्तमान के समान हैं, इस लिए सभी माताओं से कहा जा रह हैं कि महँ पुरुषो को जन्म दे क्योंकि पुरुष पूर्णता को प्राप्त करने में समर्थ है|
इन मंत्रों का सार यह है:
100 Questions based on Rigveda Samhita
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