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दुःखजन्मप्रवृत्तिदोषमिथ्याज्ञानानामुत्तरोत्तरापाये तदनन्तरापायादपवर्गः II1/1/2 न्यायदर्शन अर्थ : तत्वज्ञान से मिथ्या ज्ञान का नाश हो जाता है और मिथ्या ज्ञान के नाश से राग द्वेषादि दोषों का नाश हो जाता है, दोषों के नाश से प्रवृत्ति का नाश हो जाता है। प्रवृत्ति के नाश होने से कर्म बन्द हो जाते हैं। कर्म के न होने से प्रारम्भ का बनना बन्द हो जाता है, प्रारम्भ के न होने से जन्म-मरण नहीं होते और जन्म मरण ही न हुए तो दुःख-सुख किस प्रकार हो सकता है। क्योंकि दुःख तब ही तक रह सकता है जब तक मन है। और मन में जब तक राग-द्वेष रहते हैं तब तक ही सम्पूर्ण काम चलते रहते हैं। क्योंकि जिन अवस्थाओं में मन हीन विद्यमान हो उनमें दुःख सुख हो ही नहीं सकते । क्योंकि दुःख के रहने का स्थान मन है। मन जिस वस्तु को आत्मा के अनुकूल समझता है उसके प्राप्त करने की इच्छा करता है। इसी का नाम राग है। यदि वह जिस वस्तु से प्यार करता है यदि मिल जाती है तो वह सुख मानता है। यदि नहीं मिलती तो दुःख मानता है। जिस वस्तु की मन इच्छा करता है उसके प्राप्त करने के लिए दो प्रकार के कर्म होते हैं। या तो हिंसा व चोरी करता है या दूसरों का उपकार व दान आदि सुकर्म करता है। सुकर्म का फल सुख और दुष्कर्मों का फल दुःख होता है परन्तु जब तक दुःख सुख दोनों का भोग न हो तब तक मनुष्य शरीर नहीं मिल सकता !

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आत्मवत् सर्वभूतेषु



🌿 आत्मवत् सर्वभूतेषु

समदर्शन की दिव्य चेतना और मानवता का भविष्य

आत्मवत् सर्वभूतेषु अर्थ
गीता 6/32 व्याख्या
समदर्शन योग
Atmavat Sarvabhuteshu meaning
Bhagavad Gita 6/32 Hindi
अद्वैत वेदान्त समभाव
आत्मौपम्येन सर्वत्र
वसुधैव कुटुम्बकम्
ईश्वर सर्वत्र दर्शन
ब्राह्मी स्थिति
आत्मवत् सर्वभूतेषु का दार्शनिक विश्लेषण
गीता अध्याय 6 समदर्शन योग विस्तार से
सबको अपने समान देखने का आध्यात्मिक अर्थ
Atmavat Sarvabhuteshu detailed explanation in Hindi

प्रस्तावना

भारतीय दर्शन की संपूर्ण धारा में यदि किसी एक सूत्र को सर्वाधिक केंद्रीय, सार्वभौमिक और युगानुकूल कहा जाए, तो वह है – “आत्मवत् सर्वभूतेषु”

यह वाक्य केवल नैतिक उपदेश नहीं है, यह आध्यात्मिक क्रांति का आधार है। यह मनुष्य को सीमित अहं से उठाकर ब्रह्मांडीय चेतना तक ले जाने वाला सेतु है। यह द्वेष से प्रेम, भेद से एकत्व और हिंसा से करुणा की ओर यात्रा का मार्ग है।

आज का विश्व विभाजन, संघर्ष, पर्यावरण संकट और मानसिक तनाव से जूझ रहा है। ऐसे समय में “आत्मवत् सर्वभूतेषु” केवल आध्यात्मिक आदर्श नहीं, बल्कि मानव सभ्यता के अस्तित्व का आधार बन सकता है।


1️⃣ शास्त्रीय आधार – गीता और उपनिषद की दृष्टि

भगवद्गीता (6/32) में भगवान श्रीकृष्ण कहते हैं:

आत्मौपम्येन सर्वत्र समं पश्यति योऽर्जुन।
सुखं वा यदि वा दुःखं स योगी परमो मतः॥

भावार्थ:

हे अर्जुन! जो साधक अपनी ही भाँति सब प्राणियों में सुख-दुःख को समान रूप से देखता है, वही परमश्रेष्ठ योगी है।

यहाँ “आत्मौपम्येन” शब्द अत्यंत महत्वपूर्ण है। इसका अर्थ है – स्वयं को आधार बनाकर दूसरों को समझना। अर्थात्:

  • जो मुझे पीड़ा देता है, वही दूसरों को भी पीड़ा देता है।
  • जो मुझे सम्मान चाहिए, वही दूसरों को भी चाहिए।
  • जो मुझे सुख देता है, वही दूसरों को भी सुख देता है।

यह भाव ही करुणा, सेवा और समभाव का जन्मदाता है।


1.1 उपनिषदों में समदर्शन

ईशावास्य उपनिषद कहता है:

ईशावास्यमिदं सर्वं यत्किञ्च जगत्यां जगत्।

अर्थात इस समस्त जगत में जो कुछ भी है, वह ईश्वर से व्याप्त है।

जब सबमें वही परमात्मा है, तब भेदभाव का आधार क्या रह जाता है?


1.2 महाभारत का सिद्धांत

महाभारत में स्पष्ट कहा गया है:

आत्मनः प्रतिकूलानि परेषां न समाचरेत्।

जो व्यवहार तुम्हें स्वयं के लिए प्रतिकूल लगे, वह दूसरों के साथ मत करो।

यह “Golden Rule” का प्राचीन भारतीय स्वरूप है।


2️⃣ दार्शनिक विवेचना – अद्वैत का हृदय

“आत्मवत् सर्वभूतेषु” अद्वैत वेदान्त का जीवंत स्वरूप है।

2.1 आत्मा की एकता

वेदांत कहता है:

  • आत्मा एक है
  • चेतना एक है
  • भेद केवल शरीर और मन के स्तर पर है

जब साधक यह जान लेता है कि सभी प्राणियों में वही चेतना है, तो उसका व्यवहार स्वतः बदल जाता है।


2.2 समदर्शन की अवस्था

गीता 6/30 में कहा गया:

यो मां पश्यति सर्वत्र सर्वं च मयि पश्यति।

जो मुझे सर्वत्र देखता है और सबको मुझमें देखता है।

यह केवल बौद्धिक समझ नहीं, यह अनुभूति है।


3️⃣ मनोवैज्ञानिक आयाम

आधुनिक मनोविज्ञान में “Empathy” (सहानुभूति) को भावनात्मक परिपक्वता का शिखर माना जाता है।

“आत्मवत् सर्वभूतेषु” उसका आध्यात्मिक रूप है।

3.1 अहं का विघटन

अहंकार का मूल है – “मैं अलग हूँ”।

समदर्शन कहता है – “मैं अलग नहीं हूँ”।

जब यह बोध गहराता है:

  • ईर्ष्या घटती है
  • द्वेष मिटता है
  • प्रतिस्पर्धा सहयोग में बदलती है

4️⃣ सामाजिक क्रांति का आधार

यदि समाज “आत्मवत् सर्वभूतेषु” को अपनाए:

4.1 जातीय भेद समाप्त

जब सबमें एक ही आत्मा है, तब ऊँच-नीच का आधार नहीं रहता।

4.2 आर्थिक शोषण समाप्त

यदि हम मजदूर को अपने समान समझें, तो शोषण संभव नहीं।

4.3 पर्यावरण संरक्षण

पेड़ काटते समय यदि हम उसे अपने जीवन का अंग समझें, तो विनाश नहीं करेंगे।


5️⃣ संत परंपरा में समदर्शन

5.1 कबीर

“सब घट मेरा साईं बसे”

5.2 रैदास

समता और सामाजिक न्याय का संदेश

5.3 रामकृष्ण परमहंस

हर धर्म में एक ही सत्य का अनुभव

इन संतों ने आत्मवत् सर्वभूतेषु को केवल कहा नहीं, जिया।


6️⃣ आत्मवत् सर्वभूतेषु और योग

योग का अंतिम लक्ष्य है – चित्तवृत्ति निरोध।

जब मन शांत होता है, तब भेद मिटते हैं।

6.1 ब्राह्मी स्थिति

गीता 2 अध्याय में वर्णित ब्राह्मी स्थिति वही है जिसमें समभाव स्थापित हो जाता है।


7️⃣ आध्यात्मिक साधना का व्यावहारिक मार्ग

7.1 ध्यान

प्रतिदिन बैठकर यह चिंतन करें –
“जो चेतना मुझमें है, वही सबमें है।”

7.2 सेवा

निःस्वार्थ सेवा समदर्शन का सबसे सरल अभ्यास है।

7.3 क्षमा

क्षमा समदर्शन की परीक्षा है।


8️⃣ वैश्विक संदर्भ में आत्मवत् सर्वभूतेषु

आज विश्व में:

  • युद्ध
  • धार्मिक संघर्ष
  • नस्लीय भेद
  • मानसिक अवसाद

इनका मूल कारण है – विभाजन की मानसिकता।

यदि मानवता यह समझ ले कि:

“मैं अकेला नहीं हूँ, मैं संपूर्ण मानवता का भाग हूँ।”

तो शांति संभव है।


9️⃣ विज्ञान और आध्यात्मिकता का संगम

आधुनिक भौतिकी कहती है:

  • सब कुछ ऊर्जा है
  • सब कुछ परस्पर जुड़ा है

वेदांत हजारों वर्ष पहले कह चुका है –
“सर्वं खल्विदं ब्रह्म।”


🔟 निष्कर्ष – भविष्य का धर्म

“आत्मवत् सर्वभूतेषु” भविष्य का धर्म है।

यह किसी संप्रदाय का सिद्धांत नहीं, यह सार्वभौमिक सत्य है।

जब मनुष्य:

  • स्वयं को सीमित शरीर नहीं, चेतना माने
  • दूसरों को अपने समान समझे
  • सेवा और करुणा को जीवन बनाए

तब पृथ्वी स्वर्ग बन सकती है।


अंतिम संदेश

समदर्शन केवल पढ़ने की वस्तु नहीं, जीने की प्रक्रिया है।

आज से हम संकल्प लें:

✔ मैं किसी को कष्ट नहीं दूँगा
✔ मैं सबको अपने समान समझूँगा
✔ मैं हर प्राणी में ईश्वर का दर्शन करूँगा

यही योग है।
यही धर्म है।
यही मानवता का भविष्य है।



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