भारतीय दर्शन की संपूर्ण धारा में यदि किसी एक सूत्र को सर्वाधिक केंद्रीय, सार्वभौमिक और युगानुकूल कहा जाए, तो वह है – “आत्मवत् सर्वभूतेषु”।
यह वाक्य केवल नैतिक उपदेश नहीं है, यह आध्यात्मिक क्रांति का आधार है। यह मनुष्य को सीमित अहं से उठाकर ब्रह्मांडीय चेतना तक ले जाने वाला सेतु है। यह द्वेष से प्रेम, भेद से एकत्व और हिंसा से करुणा की ओर यात्रा का मार्ग है।
आज का विश्व विभाजन, संघर्ष, पर्यावरण संकट और मानसिक तनाव से जूझ रहा है। ऐसे समय में “आत्मवत् सर्वभूतेषु” केवल आध्यात्मिक आदर्श नहीं, बल्कि मानव सभ्यता के अस्तित्व का आधार बन सकता है।
भगवद्गीता (6/32) में भगवान श्रीकृष्ण कहते हैं:
आत्मौपम्येन सर्वत्र समं पश्यति योऽर्जुन।
सुखं वा यदि वा दुःखं स योगी परमो मतः॥
हे अर्जुन! जो साधक अपनी ही भाँति सब प्राणियों में सुख-दुःख को समान रूप से देखता है, वही परमश्रेष्ठ योगी है।
यहाँ “आत्मौपम्येन” शब्द अत्यंत महत्वपूर्ण है। इसका अर्थ है – स्वयं को आधार बनाकर दूसरों को समझना। अर्थात्:
यह भाव ही करुणा, सेवा और समभाव का जन्मदाता है।
ईशावास्य उपनिषद कहता है:
ईशावास्यमिदं सर्वं यत्किञ्च जगत्यां जगत्।
अर्थात इस समस्त जगत में जो कुछ भी है, वह ईश्वर से व्याप्त है।
जब सबमें वही परमात्मा है, तब भेदभाव का आधार क्या रह जाता है?
महाभारत में स्पष्ट कहा गया है:
आत्मनः प्रतिकूलानि परेषां न समाचरेत्।
जो व्यवहार तुम्हें स्वयं के लिए प्रतिकूल लगे, वह दूसरों के साथ मत करो।
यह “Golden Rule” का प्राचीन भारतीय स्वरूप है।
“आत्मवत् सर्वभूतेषु” अद्वैत वेदान्त का जीवंत स्वरूप है।
वेदांत कहता है:
जब साधक यह जान लेता है कि सभी प्राणियों में वही चेतना है, तो उसका व्यवहार स्वतः बदल जाता है।
गीता 6/30 में कहा गया:
यो मां पश्यति सर्वत्र सर्वं च मयि पश्यति।
जो मुझे सर्वत्र देखता है और सबको मुझमें देखता है।
यह केवल बौद्धिक समझ नहीं, यह अनुभूति है।
आधुनिक मनोविज्ञान में “Empathy” (सहानुभूति) को भावनात्मक परिपक्वता का शिखर माना जाता है।
“आत्मवत् सर्वभूतेषु” उसका आध्यात्मिक रूप है।
अहंकार का मूल है – “मैं अलग हूँ”।
समदर्शन कहता है – “मैं अलग नहीं हूँ”।
जब यह बोध गहराता है:
यदि समाज “आत्मवत् सर्वभूतेषु” को अपनाए:
जब सबमें एक ही आत्मा है, तब ऊँच-नीच का आधार नहीं रहता।
यदि हम मजदूर को अपने समान समझें, तो शोषण संभव नहीं।
पेड़ काटते समय यदि हम उसे अपने जीवन का अंग समझें, तो विनाश नहीं करेंगे।
“सब घट मेरा साईं बसे”
समता और सामाजिक न्याय का संदेश
हर धर्म में एक ही सत्य का अनुभव
इन संतों ने आत्मवत् सर्वभूतेषु को केवल कहा नहीं, जिया।
योग का अंतिम लक्ष्य है – चित्तवृत्ति निरोध।
जब मन शांत होता है, तब भेद मिटते हैं।
गीता 2 अध्याय में वर्णित ब्राह्मी स्थिति वही है जिसमें समभाव स्थापित हो जाता है।
प्रतिदिन बैठकर यह चिंतन करें –
“जो चेतना मुझमें है, वही सबमें है।”
निःस्वार्थ सेवा समदर्शन का सबसे सरल अभ्यास है।
क्षमा समदर्शन की परीक्षा है।
आज विश्व में:
इनका मूल कारण है – विभाजन की मानसिकता।
यदि मानवता यह समझ ले कि:
“मैं अकेला नहीं हूँ, मैं संपूर्ण मानवता का भाग हूँ।”
तो शांति संभव है।
आधुनिक भौतिकी कहती है:
वेदांत हजारों वर्ष पहले कह चुका है –
“सर्वं खल्विदं ब्रह्म।”
“आत्मवत् सर्वभूतेषु” भविष्य का धर्म है।
यह किसी संप्रदाय का सिद्धांत नहीं, यह सार्वभौमिक सत्य है।
जब मनुष्य:
तब पृथ्वी स्वर्ग बन सकती है।
समदर्शन केवल पढ़ने की वस्तु नहीं, जीने की प्रक्रिया है।
आज से हम संकल्प लें:
✔ मैं किसी को कष्ट नहीं दूँगा
✔ मैं सबको अपने समान समझूँगा
✔ मैं हर प्राणी में ईश्वर का दर्शन करूँगा
यही योग है।
यही धर्म है।
यही मानवता का भविष्य है।
100 Questions based on Rigveda Samhita
0 टिप्पणियाँ