स्वास्थ्य खण्ड
व्यायाम और ब्रह्मचर्य
देवैर्दत्तेन मणिना जङ्गिडेन मयोभुवा।
विष्कन्धं सर्वा रक्षांति व्यायामे सहामहे ॥
(अथर्व० २ । ४ । ४)
शब्दार्थ-(देवः दत्तेन) माता, पिता आचार्य आदि तथा दिव्य पुरुषों, सन्त, महात्मा, योगियों द्वारा प्रदत्त, उपदिष्ट (मयोभुवा) आनन्ददायक, कल्याणकारी (जङ्गिडेन) अतिश्रेष्ठ ब्रह्मचर्यरूपी (मणिना) उत्तम धन द्वारा और (व्यायामे) व्यायाम में, व्यायाम द्वारा (विष्कन्धम्) रस और रक्त के शोषक रोगों को तथा (सर्वा रक्षांसि) समस्त रोग-कीटाणुओं को, राक्षसी भावों को, विकारों को, काम, क्रोधादि शत्रुओं को (सहामहे) पराभूत करते हैं, दूर भगाते हैं, दबाते हैं।
भावार्थ-मन्त्र में व्यायाम और ब्रह्मचर्य के महत्त्व पर प्रकाश डाला गया है। मन्त्र का सन्देश है
१. विद्वानों द्वारा उपदिष्ट आनन्ददायक ब्रह्मचर्य का पालन करना चाहिए।
२. प्रतिदिन नियमित रूप से व्यायाम करना चाहिए।
३. व्यायाम और ब्रह्मचर्य की शक्ति से मनुष्य शरीर के रस और रक्त का शोषण करनेवाले सभी रोगों को मार भगाता है।
४. व्यायाम और ब्रह्मचर्य से मनुष्य शरीर पर आक्रमण करने वाले रोग के कीटाणुओं को पराभूत कर देता है।
५. ब्रह्मचर्य-पालन से और व्यायाम के अभ्यास से मनुष्य-शरीर ऐसा दृढ़ बन जाता है कि आन्तरिक और बाह्य कोई भी शत्रु उसके सामने ठहर नहीं सकता।
ब्रह्मचर्य द्वारा मृत्यु पर विजय
ब्रह्मचर्येण तपसा देवा मत्युमपाध्नत ।
इन्द्रो ह ब्रह्मचर्येण देवेभ्यः स्वरा भरत् ॥
(अथर्व० ११ । ५ । १६)
शब्दार्थ-(ब्रह्मचर्येण तपसा) ब्रह्मचर्य के तप से अथवा ब्रह्मचर्य और तप के द्वारा (देवाः) विद्वान् लोग (मत्युम्) मौत को (अप, अघ्नत) मार भगाते हैं (इन्द्रः) जीवात्मा (ह) भी (ब्रह्मचर्येण) ब्रह्मचर्य के द्वारा (देवेभ्यः) इन्द्रियों से (स्वः) सुख (प्रा भरत्) प्राप्त करता है।
भावार्थ-संसार में मृत्यु बहुत भयंकर है । मृत्यु का नाम सुनकर बड़े-बड़े विद्वान्, सुधारक और ज्ञानी भी कॉप जाते हैं परन्तु ब्रह्मचारी मृत्यु को भी दो ठोकर लगाता है। वह मृत्यु को मारकर मृत्युञ्जय बन जाता है। भीष्म पितामह और आदित्य ब्रह्मचारी महर्षि दयानन्द मृत्यु को ठोकर लगानेवाले नर-केसरियों में हैं।
जिनकी इन्द्रियाँ विषयों की ओर दौड़ती हैं, जिनकी आँख रूप की ओर, कान शब्द की ओर भागते हैं ऐसे भाग्यहीन मनुष्य को सुख कहाँ ? इन्द्रियाँ आत्मा को भोग के साधन उपलब्ध करती हैं परन्तु भोग तो रोग का कारण है। भोगों में सुख कहाँ ? वहाँ तो सुखाभास है। सच्चा सुख, आनन्द और शान्ति सयम में है। ब्रह्मचारी अपनी इन्द्रियों को सयम में रखता है, उन्हें विषयों में भटकने नहीं देता। इन्द्रियों के संयम से उसे सुख की प्राप्ति होती है। सभी इन्द्रियों को अपने वश में रखने का ही दूसरा नाम ब्रह्मचर्य है।।
जो व्यक्ति सुख और शान्ति चाहते हैं, जो व्यक्ति मृत्यु को परे भगाकर मृत्युजय बनना चाहते हैं उन्हें ब्रह्मचर्य-व्रत का पालन करना चाहिए।
शरीर-महिमा
अयं लोकः प्रियतमो देवानामपराजितः।
यस्मै त्वमिह मृत्यवे दिष्टः पुरुष जशिषे ।
स च त्वानुहयामसि मा पुरा जरसो मृथाः॥
(अथर्व० ५। ३० । १७)
शब्दार्थ-(अयम्) यह (अपराजितः) अपराजित, किसीसे न हराया जानेवाला (लोक:) शरीर (देवानाम्) विद्वानों का (प्रियतम:) अत्यन्त प्यारा है। (पुरुष) हे जीवात्मन् ! (यस्मै) क्योंकि (त्वम) तु (मत्यवे) मत्यु के लिए (दिष्ट:) नियत हुआ (इह जज्ञिषे) इस संसार में उत्पन्न होता है (सः च त्वा) ऐसे मृत्यु के भाग में पड़े तुझको (अनु हृयामसि) हम चेतावनी देते है (मा पुरा जरसः मथाः) तू वृद्धावस्था से पूर्व, बुढ़ापे से पूर्व मत मर।
भावार्थ-वेद में मानव-शरीर की बड़ी महिमा है। यह अयोध्या नगरी है। इसीको ब्रह्मपुरी कहते हैं। इसे दिव्य-रथ भी कहा गया है। यह संसार-सागर से पार करनेवाली नौका है। इसी मानव-देह में मनुष्य अपने जीवन के परम-उद्देश्य मोक्ष को प्राप्त कर सकता है। अतः यह शरीर विद्वानों को अत्यन्त प्रिय है। ___ संयोग का परिणाम वियोग है । जन्म के साथ मृत्यु अवश्यम्भावी है। जन्म से ही मृत्यु मनुष्य के साथ लगी हुई है। कोई कितना ही महान् हो, राजा हो या योगी, तपस्वी हो या संन्यासी, मत्यु के मुख से बच नहीं सकता। __यद्यपि मृत्यु निश्चित है परन्तु बुढ़ापे से पूर्व नहीं मरना चाहिए। प्रत्येक व्यक्ति को अपना आहार-विहार, आचार और विचार इस प्रकार के बनाने चाहिएँ जिससे वृद्धावस्था से पूर्व वह मृत्यु के मुख में न जाए।
अयोध्या
अष्टचक्रा नवद्वारा देवानां पूरयोध्या।
तस्यां हिरण्ययः कोशः स्वर्गो ज्योतिषावृतः॥
(अथर्व० १०।२ । ३१)
शब्दार्थ-यह मानव-शरीर (अष्टचक्रा:) आठ चक्र और (नवद्वारा) नौ द्वारों से युक्त (देवानाम्) देवों की (अयोध्या) कभी पराजित न होनेवाली (पूः) नगरी है (तस्याम्) इसी पुरी में (ज्योतिषा) ज्योति से (आवृतः) ढका हुआ, परिपूर्ण (हिरण्ययः) हिरण्यमय, स्वर्णमय (कोशः) कोश है यह (स्वर्गः) स्वर्ग है, आत्मिक आनन्द का भण्डार परमात्मा इसीमें निहित है।
भावार्थ-मन्त्र में मानव-देह का बहुत ही सुन्दर चित्रण हुआ है। हमारा शरीर पाठ चक्रों से युक्त है। वे अष्टचक्र हैं
१. मूलाधार चक्र-यह गुदामूल में है। २. स्वधिष्ठान चक्र-मूलाधार से कुछ ऊपर है। ३. मणिपूरक चक्र-इसका स्थान नाभि है । ४. अनाहत चक्र-हृदय स्थान में है। ५. विशुद्धि चक्र-इसका स्थान कण्ठमूल है। ६. ललना चक्र-जिह्वामूल में है। ७. प्राज्ञा चक्र—यह दोनों ध्रुवों के मध्य में है। ८. सहस्रार चक्र-मस्तिष्क में है। नौ द्वार ये हैं-दो आँख, दो नासिका-छिद्र, दो कान, एक मुख, दो मल और मूत्र के द्वार।।
इस नगरी में जो हिरण्यमयकोष हृदय है वहाँ ज्योति से परिपूर्ण आत्मिक आनन्द का भण्डार परमात्मा विराजमान है। योगी लोग योग-साधना के द्वारा इन चक्रों का भेदन करते हुए उस ज्योतिस्वरूप परमात्मा का दर्शन करते हैं।
अंगों का विकास
मनस्त पाप्यायतां वाक् त प्राप्यायतां प्राणस्त प्राप्यायतां चक्षुस्त प्राप्यायता श्रोत्रं त पाप्यायताम् । यत्ते करं यदास्थितं तत्त प्राप्यायतां निष्ट्यायतां तत्ते शुध्यतु शमहोभ्यः। प्रोषधे त्रायस्व स्वधीते मैन' हि सीः॥ (यजु० ६ । १५)
शब्दार्थ एवं भावार्थ-१. हे शिष्य ! (ते मनः आप्यायताम्) तेरा मन, संकल्प-विकल्प करने की शक्ति विकसित हो, वृद्धि को प्राप्त हो।
२. (ते वाक् प्राप्यायताम्) तेरी वाणी की शक्ति विकसित हो। ३. (ते चक्षुः आप्यायताम्) तेरी दर्शन-शक्ति वृद्धि को प्राप्त हो । ४. (ते श्रोत्रम् आप्यायताम्) तेरी श्रवण-शक्ति उत्तम बनी रहे।
५. (यत् ते क्रूरम्) तेरे अन्दर जो क्रूरता है, दुष्ट स्वभाव या दुश्चरित्र है (तत् निष्ट्यायताम्) तेरी वह क्रूरता दूर हो जाए।
६. (यत् प्रास्थितम्) जो तेरा-उत्तम निश्चय या स्थिर स्वभाव है (ते तत् आप्यायताम् ) वह वृद्धि एवं विकास को प्राप्त हो ।
७. (ते शुध्यतु) तेरा सब-कुछ शुद्ध-पवित्र हो जाए।
८. (अहोभ्यः शम्) सब दिनों के लिए तुझे सुख-शान्ति एवं मंगल की प्राप्ति हो। तेरे सभी दिन मंगलयुक्त हों।
ह. (औषधे) हे ज्ञानी गुरो! (एनं त्रायस्व) इस शिष्य की सदा रक्षा कर।
१०. (स्वधिते) अध्यापिके ! इस शिष्या की (मा हिंसी:) हिंसा मत कर। कुशिक्षा अथवा अनुचित लालन आदि से इसका जीवन बर्बाद मत कर।
त्रुटि की पूर्णता
तनपा अग्नेऽसि तन्वं मे पायायुर्दा अग्नेऽस्यायुर्मे देहि वर्चोदा अग्नेऽसि वों मे देहि। अग्ने यन्मे तन्वा ऊनं तन्म प्रापण ॥ (यजु० ३। १७)
शब्दार्थ-हे (अग्ने) परमेश्वर ! तु (तनपाः असि) हमारे शरीरों का रक्षक है अतः तू (मे तन्वम्) मेरे शरीर की (पाहि) रक्षा कर । (अग्ने) हे परमात्मन् ! तू (आयुर्दाः असि) दीर्घायु, दीर्घ-जीवन का प्रदाता है (मे प्रायुः देहि) मुझे भी सुदीर्घ जीवन प्रदान कर। (अग्ने) हे प्रभो! तू (व!दा: असि) तेज और कान्ति देनेवाला है (मे वर्चः देहि मुझे भी तेज और कान्ति प्रदान कर। (अग्ने) हे ईश्वर ! (मे तन्वः) मेरे शरीर में (यत् ऊनम्) जो न्यूनता, कमी, त्रुटि है (मे तत्) मेरी उस न्यूनता को (आ पृण) पूर्ण कर दे।
भावार्थ-१. प्रभो! आप प्राणिमात्र के शरीरों की रक्षा करने वाले हो, अतः मेरे शरीर की भी रक्षा करो।
२. आप दीर्घ-जीवन के प्रदाता हैं, मुझे भी दीर्घ जीवन से युक्त कीजिए।
३. आप तेज, प्रोज, शक्ति और कान्ति प्रदान करनेवाले हैं, मुझे भी तेज, भोज, शक्ति और कान्ति प्रदान कीजिए।
४. प्रभो ! अपनी न्यूनताओं को कहाँ तक गिनाऊँ और क्या क्या माँगे ! ठीक बात तो यह है कि मुझे अपनी न्यूनताओं का भी ज्ञान नहीं है। मेरे जीवन में किस वस्तु की कमी है, मुझे किस वस्तु की आवश्यकता है, इसे तो आप ही अच्छी प्रकार जानते हैं, अतः मैं तो यही प्रार्थना करूँगा भगवन् ! मेरे जीवन में जो न्यूनता, कमी और त्रुटि है आप उसे पूर्ण कर दें।
नीरोग शरीर और मन
सं वर्चसा पयसा तनूभिरगन्महि मनसा स" शिवेन । त्वष्टा सुदत्रो विदधातु रायोऽनु माष्टुं तन्वो यद्विलिष्टम् ।।
(यजु० २ । २४)
शब्दार्थ-हम लोग (वर्चसा) ब्रह्मतेज से (पयसा) अन्न और जल से (तनूभिः) दृढ़ और नीरोग शरीरों से (शिवेन मनसा) शिवसंकल्प युक्त मन में (सम् अगन्महि) भली प्रकार संयुक्त रहें। (सु-दत्र:) उत्तम-उत्तम पदार्थों का दाता (त्वष्टा) सर्वोत्पादक परमात्मा हम सबको (रायः) धन-विद्या और सदाचाररूपी धन (विदधातु) प्रदान करे और (तन्वः) हमारे शरीरों में (यत्) जो कुछ (विलिष्टम्) प्राण घातक पदार्थ हों उनको (अनुमाष्टुं) शुद्ध करे।
भावार्थ-१. हम लोग ब्रह्मतेज से युक्त रहें।
२. अन्न और जल-शरीर-सञ्चालनार्थ आवश्यक भोग्य सामग्री हमें प्राप्त होती रहे।
३. हमारे शरीर पत्थर के समान दृढ़ और नीरोग हों जिससे आन्तरिक और बाह्य शत्रु हमारे ऊपर आक्रमण न कर सकें।
४. मानसिक स्वास्थ्य के अभाव में शारीरिक स्वास्थ्य भी समाप्त हो जाता है, अतः हमारा मन भी स्वस्थ और शिवसंकल्पवाला हो ।
५. सृष्टिकर्ता परमात्मा हमारे लिए विद्याधन, ज्ञानधन, विज्ञान धन, सदाचार-धन आदि नाना प्रकार के धन प्राप्त कराए।
६. हमारे शरीरों में जो हानि पहुँचानेवाले तत्त्व हैं उन्हें शुद्ध करके हमारे शरीरों में जो न्यूनता है उसे पूर्ण कर दे।
जीवन-क्रम
यथाहान्यनुपूर्व भवन्ति यथ ऋतव ऋतुभिर्यन्ति साधु । यथा न पूर्वमपरो जहात्येवा धातरायषि कल्पयैषाम् ॥
(ऋ० १०। १८ । ५)
शब्दार्थ-(यथा) जिस प्रकार (अहानि) दिन (अनु पूर्वम्) एक दूसरे के पीछे अनुक्रम से (भवन्ति) होते हैं (यथा) जिस प्रकार (ऋतवः ऋतुभिः साधु यन्ति) ऋतुएँ ऋतुओं के साथ एक-दूसरे के पीछे चलती हैं (यथा) जैसे (अपर:) पिछला, पीछे उत्पन्न होनेवाला (पूर्वम्) पहले को, पूर्व विद्यमान पिता आदि को (न जहाति) न छोड़े, न त्याग करे (एवा) इस प्रकार (धातः) सबको धारण-पोषण करनेवाले प्रभो ! (एषाम्) इन हमारी (प्रायूषि) आयुओं को (कल्पय) बनाइए।
भावार्थ-दिन और रात्रि अनुक्रम से एक-दूसरे के पीछे आती हैं। उनका क्रम भंग नहीं होता। ऋतुएँ भी एक क्रम-विशेष के अनुसार ही आती हैं। गर्मी के पश्चात् बरसात और फिर सर्दी। इस क्रम में व्यक्तिक्रम नहीं होता। इसी प्रकार प्रायुमर्यादा भी ऐसी हों कि पिछला पहले को न छोड़े अर्थात् जो पहले उत्पन्न हुआ है वह पहले मरे, जो पीछे उत्पन्न हुआ है वह पीछे मरे। भाव यह है कि पुत्र पिता के पीछे आता है तो उसकी मृत्यु भी पीछे ही होनी चाहिए। पिता के समक्ष पुत्र की मृत्यु नहीं होनी चाहिए।
आज दूषित खान-पान, रहन-सहन, आचार-विचार और व्यवहार के कारण हमारे जीवन मे विकार पा रहे हैं। आज पिता के समक्ष पुत्रों की और दादा के सामने पौत्रों की मृत्यु हो रही है। हमें अपने आहार-विहार आदि में परिवर्तन कर ऐसा प्रयत्न करना चाहिए जिससे पिता को पुत्र-शोक न हो।
हर्षयुक्त सौ वर्ष की आयु
वैश्वदेवीं वर्चस प्रा रभध्वं शुद्धा भवन्तः शुचयः पावकाः । प्रतिक्रामन्तो दुरिता पदानि शतं हिमाः सर्ववीरा मदेम ।।
(अथर्व० १२ । २।२८)
शब्दार्थ- (वर्चसे) ब्रह्मतेज की प्राप्ति के लिए (वैश्वदेवीम) सब का कल्याण करनेवाली, प्रभु-प्रदत्त वेदवाणी का (पा रभध्वम्) प्रारम्भ करो। उसके स्वाध्याय से (शुद्धाः) शुद्ध, मलरहित, (शुचयः) मनसा, वाचा, कर्मणा पवित्र और (पावकः) अग्नि के समान पवित्र कारक (भवन्तः) होते हुए (दुरितानि पदानि) बुरे चाल-चलनों को, बुरे आचार और व्यवहारों को (अतिक्रामन्तः) पार करते हुए, छोड़ते हुए (सर्ववीराः) सामर्थ्यवान् प्राणों से सम्पन्न होकर, सब-के-सब वीर्यवान् होकर हम (शतम् हिमाः) सौ वर्ष तक (मदेम) हर्ष और प्रानन्द से जीवन व्यतीत करें।
भावार्थ-१. प्रत्येक मनुष्य को बल, वीर्य और प्राणशक्ति से युक्त होकर कम-से-कम सौ वर्ष तक हर्ष और आनन्द से युक्त जीवन व्यतीत करना चाहिए।
२. इसके लिए बुरे चाल-चलनों को, दुष्टाचार और दुष्ट व्यवहार को सर्वथा छोड़ देना चाहिए । 'दुरित' पद में आयु को कम करनेवाले सभी दुर्गुणों यथा अधिक या न्यून भोजन, व्यायाम न करना, शरीर को स्वच्छ न रखना, मैले वस्त्र धारण करना आदि का समावेश हो जाता है।
३. बुरे चाल-चलनों को छोड़ने के लिए स्वयं मन, वाणी और कर्म से शुद्ध पवित्र और निर्मल बनो। अपने सम्पर्क में आनेवालों को भी शुद्ध और पवित्र बनाओ।
४. शुद्ध-पवित्र बनने के लिए प्रभु-प्रदत्त वेद का स्वाध्याय करो। वेद के स्वाध्याय से आपको शुद्ध, पवित्र रहने और दीर्घायु प्राप्त करने का ठीक ज्ञान प्राप्त होगा।
अकाल मृत्यु
त्वं च सोम नो वशो जीवात न मरामहे ।
प्रियस्तोत्रो वनस्पतिः। (ऋ० १।६१ । ६)
शब्दार्थ-(सोम) हे श्रेष्ठ कर्मों की प्रेरणा देनेवाले परमेश्वर ! (त्वं च) आप (नः) हम लोगों के (जीवातुम) जीवन को (वश:) वश में रखनेवाले, स्थिर रखनेवाले और प्रकाशित करनेवाले हो। आप (प्रिय स्तोत्रः) प्रियस्तोत्र हैं, आपके स्तुति-वचन सुनकर हृदय में प्रेम उत्पन्न होता है। (वनस्पतिः) आप सेवनीय पदार्थो के रक्षक हैं अतः आपकी कृपा से (न मरामहे) हम अकाल मृत्यु और अनायास मृत्यु न पाएँ।
भावार्थ-१. परमात्मा मनुष्यों के जीवन को वश में रखनेवाला और प्रकाशित करनेवाला है।
२. परमेश्वर प्रियस्तोत्र है क्योंकि उसके स्तुति-वचन सुनकर हृदय में आनन्द उत्पन्न होता है ।
३. परमेश्वर अपनी महान् शक्ति से मनुष्यों द्वारा सेवनीय पदार्थों की रक्षा करता है।
४. प्रभु की कृपा से हम अकाल मृत्यु के वश में न जाएँ।
'न मरामहे' का अर्थ करते हए हमने महर्षि दयानन्द के शब्दों को ही रख दिया है । इस मन्त्र और इसके महर्षि-भाष्य से यह सिद्ध होता है कि स्वामी जी अकाल मृत्यु को मानते थे।
अकाल मृत्यु को पुरुषार्थ से दबा दो
इमं जीवेभ्यः परिधि दधामि मैषां नूगादपरो अर्थमेतम् । शतं जीवन्तु शरदः पुरूचीरन्तमत्यु दधतां पर्वतेन ॥
(ऋ०१०।१८ । ४)
शब्दार्थ-परमात्मा उपदेश देते हैं-मैं (जीवेभ्यः) मनुष्यों के लिए (इमम् परिधिम्) इस सौ वर्ष की आयु-मर्यादा को (दधामि) निश्चित करता हूँ (एषाम्) इनमें (अपरः) कोई भी (एतं अर्थम्) इस अवधि को, इस जीवनरूप धन को (मा, गात, नु) न तोड़े, उल्लंघन न करे । सभी मनुष्य (शतम् शरदः) सौ वर्ष (पुरूची:) और उससे भी अधिक (जीवन्तु) जिएँ और (अन्त: मृत्युम्) अकाल मृत्यू को (पर्वतेन) पुरुषार्थ से (दधताम्) दूर कर दे, दबा दे।
भावार्थ-१. परमात्मा ने मनुष्य के लिए सौ वर्ष की जीवनमर्यादा निश्चित की है।
२. किसी भी मनुष्य को इस मर्यादा का उल्लंघन नहीं करना चाहिए अर्थात् सौ वर्ष की अवधि से पूर्व नहीं मरना चाहिए।
३. प्रत्येक मनुष्य को सौ वर्ष तक तो जीना ही चाहिए। उसे अपना खान-पान, आहार-विहार और समस्त दिनचर्या इस प्रकार की बनानी चाहिए कि वह अदीन रहते हुए सौ वर्ष से भी अधिक जीवन धारण कर सके।
४. मनुष्य को पुरुषार्थी होना चाहिए। यदि अकाल मत्यु बीच में ही पा जाए तो उसे अपने पुरुषार्थ से परास्त कर देना चाहिए। मनुष्य को सतत् कर्मशील होना चाहिए। जब मृत्यु भी द्वार पर आए तो यह देखकर लौट जाए कि अभी तो इसे अवकाश ही नहीं है।
शक्तिशाली बनकर शत्रुओं को परास्त करें
उपक्षेतारस्तव सुप्रणीतेऽग्ने विश्वानि धन्या दधानाः । सुरेतसा श्रवसा तुञ्जमाना अभिष्याम पृतनायूंरदेवान् ॥
(ऋ०३।१।१६)
शब्दार्थ-(सुप्रणीते अग्ने) हे उत्तम मार्ग पर ले जानेवाले ज्ञानस्वरूप परमात्मन् ! (तव उपक्षेतारः) तेरे समीप रहनेवाले, तेरे उपासक हम (विश्वानि) सम्पूर्ण (धन्या) धन्यता प्रदान करनेवाले शुभ गुणों को (दधानाः) धारण करते हुए (सुरेतसा) उत्तम वीर्य से और (श्रवसा) अन्न, ज्ञान और यश से (तुजमानाः) दीप्त होते हुए, जगमगाते हुए (पृतनायून् अदेवान) सेना लेकर आक्रमण करनेवाले राक्षसों और राक्षसी भावनाओं को (अभि स्याम) नीचा दिखा दें, उन्हें दबा दें।
भावार्थ-१. ईश्वर समस्त संसार का नेता है, वह हमें आगे ले जानेवाला है, वह हमारा उन्नति-साधक और सुमार्ग-दर्शक है।
२. उपासकों को ऐसे सुपथ-दर्शक परमात्मा के समीप बैठकर धन्यता प्रदान करनेवाले, यश प्रदान करनेवाले उत्तमोत्तम गुणों को धारण करना चाहिए।
३. हमें बलशाली बनना चाहिए।
४. हमें यशस्वी बनकर अपनी दीप्ति से संसार में जगमगाना चाहिए।
५. हमारे ऊपर सेना लेकर आक्रमण करनेवाले बाहरी शत्रुओं को अथवा अन्दर के काम, क्रोध, लोभ, मोह, अदानशीलता आदि आन्तरिक शत्रुओं को मारकर परे भगा देना चाहिए, उन्हें दबाकर उनपर विजय प्राप्त करनी चाहिए।