The Vaidik nectar of almighty ईश्वरीय अमृत के प्रकाशक वेद

 


वेदखण्ड वेदमाता

स्तुता मया वरदा वेदमाता प्रचोदयन्तां पावमानी द्विजानाम् । आयुः प्राणं प्रजां पशु कोति द्रविणं ब्रह्मवर्चसम् । मह्यं दत्त्वा व्रजत ब्रह्मलोकम् ॥ (अथर्व० १६ । ७१ । १)

शब्दार्थ-परमात्मा उपदेश देते हैं- हे मनुष्यों! (वरदा) वरदान देनेवाली (वेदमाता) वेदमाता (मया स्तुता) मेरे द्वारा उपदेश कर दी गई। यह वेदवाणी (प्रचोदयन्तामद्विजानाम्) चेष्टाशील द्विजों कोमनुष्यों को (पावमानी) पवित्र करनेवाली है। यह वेदमाता (आयुः) दीर्घायु (प्राणम्) जीवनशक्ति (प्रजाम्) सुसन्तान (पशुम्) पशुधन (कीर्तिम्) यश (द्रविणम्) धन-धान्य और (ब्रह्मवर्चसम्) ब्रह्मतेज प्रदान करनेवाली है। वेद के स्वाध्याय से प्राप्त इन पदार्थों को (मह्यम्दत्त्वा) मेरे अर्पण करके (ब्रह्मलोकम्) मोक्ष को (व्रजत) प्राप्त करो

भावार्थ- प्रभु उपदेश देते हैं-हे मनुष्यों! मैंने तुम्हारे कल्याण के लिए वेदमाता का उपदेश कर दिया है। यह वेदवाणी कर्मशील "मनुष्यों को पवित्र करनेवाली है। जो वेद का अध्ययन कर तदनुसार आचरण करेगा उसका जीवन पवित्रनिर्दोष और निष्पाप तो बनेगा हीसाथ ही उसे- १. दीर्घायु की प्राप्ति होगी। २. जीवनशक्ति मिलेगी। ३. सुसन्तान की प्राप्ति होगी। ४. पशुओं की कमी नहीं रहेगी। ५. चहुँ दिशाओं में उसकी कीर्ति-चन्द्रिका छिटकेगी। ६. धन-धान्यऐश्वर्य और वैभव की उसे न्यूनता नहीं रहेगी। ७. ब्रह्मतेजज्ञान-बल निरन्तर बढ़ता रहेगा। वेदाध्ययन द्वारा प्राप्त इन सभी वस्तुओं का अपने स्वार्थ के लिए भोग मत करो। इन सभी वस्तुओं को प्रभु-अर्पण कर दोप्रजा-हित में लगा दोमानव-कल्याण मे लगा दो तो तुम्हें जीवन के चरम लक्ष्य मोक्ष की प्राप्ति हो जाएगी।

वेदोत्पत्ति ज्ञान विज्ञान ब्रह्मज्ञान 

बृहस्पते प्रथमं वाचो अग्नं यत्प्रेरत नामधेयं दधानाः ।  यदेषां श्रेष्ठं यदरिप्रमासीत्प्रेणा तदेषां निहितं गुहाविः ॥

(ऋ० १० । ७१। १)

शब्दार्थ- (बृहस्पते) हे वेदाधिपते ! परमात्मन् ! (प्रथमम्) सबसे पूर्वसष्टि के प्रारम्भ में (नामधेयम्) विभिन्न पदार्थों के नामकरण की इच्छा (दधानः) रखते हुए आदि ऋषियों ने (यत्) जो (वाच:) वचन (प्रैरत) उच्चारण किये वह वाणी का (अग्रम) प्रथम प्रकाश था। (यत्) जो (एषाम्) सर्गारम्भ के ऋषियों में (श्रेष्ठम्) श्रेष्ठ होता है और (यत्) जो (अरिप्रम्) निर्दोषपापरहित (प्रासीत्) होता है (एषाम्) इनके गुहा हृदय-गुहा में (निहितम्) रखा हुआ (तत्) वह भाग (प्रेणा) तेरी ही प्रेरणा और प्रेम के कारण (आवि:) प्रकट होता है।

भावार्थ- सृष्टि का निर्माण हो गया। मनुष्यों की उत्पत्ति भी हो गई । सृष्टि के पदार्थों के नामकरण की इच्छा जाग्रत होने पर ईश्वर ने ऋषियों को वेद का ज्ञान दियावेद की भाषा सिखाई। यह वाणी का प्रथम प्रकाश था। वह वाणी चार ऋषियों को मिली। इन चार को ही क्यों मिली क्योंकि वे चार ही सबसे अधिक श्रेष्ठ और निष्पाप थे। ईश्वर सर्वव्यापक है। उसने अपनी प्रेरणा और प्राणियों की हित कामना सेप्राणियों के साथ प्रेम के कारण वेद-ज्ञान दिया। 'तदेषां निहितं गुहाविःइनके हृदय में रक्खा हुआ वही ज्ञान आदि ऋषियों द्वारा अन्यों के लिए प्रकट हुआ अर्थात् ऋषि लोग उस ज्ञान को दूसरों को सिखाते हैं। 'यदेषां श्रेष्ठं यदरिप्रमासीत्का एक अर्थ यह भी होता है कि जो ज्ञान सबसे श्रेष्ठ और निर्दोष थाभ्रम आदि से रहित था वह ज्ञान इन ऋषियों को दिया गया।

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वेद प्राप्त करनेवाले चार ऋषि

यस्मिन्नश्वास ऋषभास उक्षणो वशा मेषा अवसष्टास पाहुताः । कीलालपे सोमपृष्ठाय वेधसे हुदा मति जनये चारुमग्नये ॥

(ऋ० १० । ६१ । १४)

शब्दार्थ-(यस्मिन्) जिस सृष्टि में परमात्मा ने (अश्वासः) अश्व (ऋषभास:) साँड (उक्षणः) बैल (वशाः) गौएँ (मेषाः) भेड़-बकरी (अवसृष्टास:) उत्पन्न किये और (आहुताः) मनुष्यों को प्रदान कर दिये वही ईश्वर (अग्नये) अग्नि के लिए (कीलालपे') वायु के लिए (वेधसे) आदित्य के लिए (सोमपृष्ठाय') अङ्गिरा के लिए (हृदा) उनके हृदय द्वारा (चारुम्) सुन्दर (मतिम्) वेदज्ञान (जनये) प्रकट करता है।

भावार्थ- सृष्टि के आदि में परमात्मा ने घोड़ेबैलसाँडगौएँ और भेड़-बकरी आदि नाना पशुओं को उत्पन्न किया और इन सबको मनुष्यों के उपयोग के लिए-गौ आदि का दूध पीने के लिएघोड़े पर सवारी करने के लिएबैल से भूमि जोतने और भार उठाने के लिएमनुष्य को प्रदान कर दिया। ईश्वर ने मनुष्य के ज्ञान के लिए आदि सृष्टि से ही चार ऋषियों द्वारा वेदज्ञान भी मनुष्यों को दिया अग्नि के द्वारा ऋग्वेद का ज्ञान दिया। वायु द्वारा यजुर्वेद का ज्ञान दिया। आदित्य के द्वारा सामवेद को प्रकट किया। अग्ड़िरा के द्वारा अथर्ववेद को प्रकट किया। १. कीलालं जलं पिबतीति कोलालपः । जल को पीने वाला कीलालप वायु । २. सोमपृष्ठः चन्द्रमा। गोपथ पू० ५।२५ के अनुसार अथर्ववेद का देवता चन्द्रमा और विद्युत् है । अतः चन्द्रमा ही अङ्गिरस है।

मनुष्यमात्र के लिए वेदाध्ययन का अधिकार

यथेमां वाचं कल्याणीमावदानि जनेभ्यः। ब्रह्मराजन्याभ्या शुद्राय चार्याय च स्वाय चारणाय च । प्रियो देवानां दक्षिणायै दातु रिह भूयासमयं मे कामः समृध्यतामुप मादो नमतु ॥ (यजु० २६ । २)

शब्दार्थ-परमेश्वर मनुष्यों को आदेश देते हैं (यथा) जिस प्रकार मैं (इमामकल्याणीम्वाचम्) इस कल्याणकारिणी वेदवाणी को (जनेभ्यः) मनुष्यमात्र के लिए (आवदानि) उपदेश करूँकरता हूँ वैसे ही तुम भी इसका उपदेश किया करो। किस-किसके लिए उपदेश करो 'ब्रह्मराजन्याभ्याम्) ब्राह्मणों तथा क्षत्रियों के लिए (शूद्राय) शूद्रों के लिए (चअर्याय) और वैश्यों के लिए (स्वाय च) अपनों के लिएअपने प्रिय लगनेवालों के लिएदेशवासियों के लिए (अरणाय च) शत्रुओं के लिएविदेशियों के लिए सभी के लिए उपदेश करो। वेदोपदेश करते हुए मैं (इह) इस संसार में (देवानाम्) विद्वानों का (प्रियः भूयासम्) प्रेमपात्र बन जाऊँ (दक्षिणायै दातुः) दक्षिणा देनेवालों का भी प्यारा होऊँ। (मे) मेरी (अयम्) यह (कामः) कामना पूर्ण हो (अदः) मेरी वह पूर्व-कामना (मा उप नमतु) मुझे प्राप्त हो।

भावार्थ-वेद किसी व्यक्ति-विशेष की सम्पत्ति नहीं है। वेद तो सार्वभौम और मानवमात्र के लिए है। प्रभु उपदेश देते हैं कि इस वेदरूपी कोश को संकुचित मत करोअपितु जैसे मैं मनुष्यमात्र के लिए इसका उपदेश देता हूँ इसी प्रकार तुम भी मनुष्यमात्र के लिए इसका उपदेश करो। ब्राह्मण और क्षत्रियवैश्य और शूद्रमित्र और शत्रुअपना और परायाकोई भी वेद-ज्ञान से वञ्चित नहीं रहना चाहिए। जो मनुष्य वेद का प्रचार करते हैं वे विद्वानों के प्रिय बनते हैंदानशील मनुष्यों के प्रिय बनते हैं और उनकी सभी कामनाएँ पूर्ण होती हैं।

वैदिक शिक्षाओं के अनुसार आचरण

नकिवा मिनीमसि नकिरा योपयामसि मन्त्रश्रुत्यं चरामसि । पक्षेभिरपिकक्षेभिरत्राभि सं रभामहे ॥ (ऋ० १०। १३४ । ७)

शब्दार्थ-(देवाः) हे दिव्यगुणयुक्त विद्वानो! हम लोग (नकि:) न तो (मिनीमसि) हिंसा करते हैं (नकि:) और न ही (आयोपया मसि) फूट डालते हैअथवा किसीको प्रलोभन देते हैं। हम तो (मन्त्र श्रुत्यम्) वेद-मन्त्रों के श्रवणानुसार (चरामसि) आचरण करते हैं (अत्र) इस लोक में (कक्षेभिः) तिनके के समान तुच्छ (पक्षेभिः) साथियों के साथ (अपि) भी (अभिसंरभामहे) प्रेम से मिलकर उद्योग करेंकरते हैं।

भावार्थ-वेद की शिक्षाएँ अत्यन्त गहनगम्भीर और उदात्त हैं। वेदाध्ययन करनेवाले का जीवन वेद के अनुसार होना चाहिए। कैसा हो वह जीवन ?

१. वेदाध्ययन करनेवाले किसीकी हिंसा नहीं करते । मनवचन और कर्म से किसी भी प्राणी के प्रति वैर की भावना नही रखते।

२. वैदिकधर्मी फूट नही डालते और न ही किसी व्यक्ति को मोहित करके प्रलोभनों में फँसाते हैं।

३. वेदभक्त मन्त्रों के अनुसारवैदिक शिक्षाओं के अनुसार अपने जीवन का निर्माण करते हैं। वे वेद के विधि और निषेधों का पूर्णरूपेण पालन करते हैं।

४. वेदभक्त तुच्छ सहायकों के साथ भी प्रेम और समता का व्यवहार करते हैं।

५. वैदिकधर्मी आलसी नहीं होता अपितुवह सदा-सर्वदा उद्योग करता रहता है

हमारे पुत्र वेद सुनें 

उप नः सूनवो गिरः शण्वन्त्वमतस्य ये। सुमूळोका भवन्तु नः॥

(ऋ० ६ । ५२ । ६ यजु० ३३ । ७७ सा० १५६५)

 शब्दार्थ-(ये) जो (न:) हमारे (सूनवः) पुत्र हैं वे (अमृतस्य) अमरअखण्डअविनाशी प्रभु को (गिरः) वेदवाणियों को (शृण्वन्तु) सुनें और उसे सुनकर (नः) हमारे लिए (सुमृळीकाः) उत्तम सुखकारी (भवन्तु) हों।

भावार्थ-प्रत्येक घर में प्रतिदिन वेद-पाठ होना चाहिए। जब हमारे घरों में यज्ञ और हवन होंगेस्वाहा और स्वधाकार की ध्वनि उठेगीवेदों का उद्घोष होगा तभी हमारे पुत्र वेद-ज्ञान को सुन सकेंगे। वेद सभी ज्ञान और विज्ञान का मूल है और अखिल शिक्षामों का भण्डार है। जब हमारे पुत्र वेद के इस प्रकार के मन्त्रों को सुनेंगे

अनुवतः पितुः पुत्रो मात्रा भवतु सम्मनाः । (अथर्व० ३ । ३० । २) 'पुत्र पिता के अनुकूल चलनेवाला हो और माता के साथ समान मनवाला हो।'

तो ये शिक्षाएँ उनके जीवन में आएँगी। इन वैदिक शिक्षाओं पर आचरण करते हुए वे अपने माता-पिता के लिएपरिवारसमाज और गष्ट्र के लिए सुखशान्तिमङ्गल और कल्याण का कारण बनेंगे।

वेदाध्ययन का फल

पावमानीर्यो अध्येत्यषिभिः संभूतं रसम् ।

तस्मै सरस्वती दुहे क्षीरं सपिमधूदकम् ॥ (ऋ० ६ । ६७ । ३२ सा० ११६६)

शब्दार्थ-यः) जो व्यक्तिउपासक (ऋषिभिः) ऋषियों द्वारा (सम्भतम्) धारण की गई (पावमानी:) अन्तःकरण को पवित्र करने वाली (रसम्) वेद की ज्ञानमयी ऋचाओं का (अध्येति) अध्ययन करता है (सरस्वती) वेदवाणी (तस्मै) उस मनुष्य के लिए (क्षीरम्) दूध, (सपिः) घी (मधु उदकम्) मधुर जलशरबत आदि (दुहे) प्रदान करती है 

भावार्थ-वेदाध्ययन से क्या मिलता है मन्त्र में वेदाध्ययन से मिलनेवाले फलों का सुन्दर वर्णन है । वेद के अध्ययन और उसके अनुसार आचरण करने से मनुष्य के जीवन-निर्वाह के लिए सभी उपयोगी वस्तुओं की प्राप्ति होती है। जो व्यक्ति वेद का स्वाध्याय करते हैं उन्हें दूध और घी आदि शरीर के पोषक तत्त्वों की कमी नहीं रहती। वैदिक विद्वान् जहाँ जाते हैं वहीं घीदुग्ध और शर्बत आदि से उनका स्वागत और सत्कार होता है। जीवन की आवश्यकताओं की प्राप्ति के लिए प्रत्येक व्यक्ति को वेद का अध्ययन करना चाहिए।

वेद-मन्त्रों से मुँह भर ले

मिमीहि श्लोकमास्ये पर्जन्य इव ततनः।

गाय गायत्रमुक्थ्यम् ॥ (ऋ० १।३८ । १४)

शब्दार्थ-हे विद्वन् ! तू (श्लोकम्) वेदवाणी को (प्रास्ये) अपने मुख मे (मिमीहि) भर लेफिर उस वेदवाणी को (पर्जन्यः इव ततन:) मेघ= बादल के समान गर्जता हुआ दूर-दूर तक गम्भीर स्वर से फैलाउसका सर्वत्र उपदेश कर । (गायत्रम्) प्राणों की रक्षा करने वाले (उक्थ्यम्) वेद-मन्त्रों को (गाय) स्वयं गान करस्वयं पढ़ और दूसरों को पढ़ा। ___भावार्थ-प्रस्तुत मन्त्र में मनुष्यमात्र के लिए कई सुन्दर शिक्षाओं का समावेश है।

१. प्रत्येक मनुष्य को वेद-मन्त्रों से अपना मुख भर लेना चाहिए। मन्त्रों को पढ़-पढकर उन्हें कण्ठस्थ कर लेना चाहिए।

२. वेद पढकर जो ज्ञानामृत प्राप्त हो उसे अपने तक ही सीमित नही रखना चाहिएअपितु जिस प्रकार बादल समुद्र से जल लेकर उसे गम्भीर गर्जन के साथ सर्वत्र बरसा देता है उसी प्रकार मनुष्यों को भी वेदरूपी समुद्र से रत्नों और मोतियों का सञ्चय कर उनका लेखन और वाणी से प्रचार करना चाहिए।

३. वेद में आयुवृद्धि केस्वास्थ्यरक्षा के और प्राणशक्ति को बलिष्ठ बनाने के सहस्रों मन्त्र भरे पड़े हैं। शरीर-रक्षा के लिए इस प्रकार के मन्त्रों को स्वयं पढ़ना चाहिए और दूसरों को पढाना चाहिए।

महर्षि दयानन्द ने इसी मन्त्र के आधार पर आर्यसमाज के तृतीय नियम का निर्माण इस प्रकार किया है--"वेद सब सत्य विद्याओं का पुस्तक हैवेद का पढ़ना-पढ़ाना और सुनना-सुनाना सब आर्यों का परम धर्म है।"

चार वेद

तस्माद्यज्ञात्सर्वहत ऋचः सामान जज्ञिरे ।

छन्दासि जज्ञिरे तस्माद्यजुस्तस्मादजायत । (यजु० ३१ । ७)

शब्दार्थ-(तस्मात्) उस (सर्वहुतः) सर्वदाता (यज्ञात्) पूजनीयसर्वोपास्य परमेश्वर से (ऋचः) ऋचाएँऋग्वेद (सामानि) सामवेद (जज्ञिरे) उत्पन्न हुए। (तस्मात्) उस परमेश्वर से ही (छन्दांसि) छन्दअथर्ववेद (जज्ञिरे) उत्पन्न हुप्रा। (तस्मात्) उसी जगदीश्वर से (यजु:) यजुर्वेद (अजायत) प्रकट हुआ।

भावार्थ-यह मन्त्र पुरुष-सूक्त का है। इस अध्याय में यज्ञ शब्द पुरुष का पर्यायवाची है । पुरुष का अर्थ है पूर्ण परमेश्वर। यज्ञ का अर्थ हुआ पूजनीय परमेश्वर।  जब सृष्टि-रूपी यज्ञ प्रारम्भ हुना तब परमेश्वर ने मनुष्यमात्र के कल्याण के लिए चारों वेदों का ज्ञान दिया। उस यज्ञपुरुष से ऋग्वेदयजुर्वेदसामवेद और अथर्ववेद-ये चार वेद प्रकट हुए। पाश्चात्य विद्वान् कहते हैं कि अथर्ववेद पीछे से बनाया गया परन्तु उक्त मन्त्र से इस निराधार कल्पना का खण्डन हो जाता है। प्रभु ने सर्गारम्भ में ही चार ऋषियों को चार वेदों का ज्ञान दिया था।

वेदों में अन्यत्र भी अनेक स्थानों पर चारों वेदों का वर्णन मिलता है। अत: 'छन्दांसिका अर्थ अथर्ववेद ही ठीक है। यहाँ 'छन्दांसिविशेषण नहीं है।

वेद प्रक्षेप आदि से रहित है

प्रन्ति सन्तं न जहात्यन्ति सन्सं न पश्यति ।

देवस्य पश्य काव्यं न ममार न जोर्यति ॥ (अथर्व० १० । ८ । ३२)

शब्दार्थ- (अन्ति) समीप (सन्तम्) होते हुए परमेश्वर को मनुष्य (न) नहीं (पश्यति) देख पाता और (अन्ति) समीप (सन्तम्) होते हुए को (न) नहीं (जहाति) छोड़ सकता है (देवस्य) दिव्य गुण-सम्पन्न परमात्मा के (काव्यम्) वेदरूपी काव्य को (पश्य) देखो। वह काव्य (न ममार) न कभी मरता है और (न) न ही (जीर्यते) कभी पुराना होता है।

भावार्थ-परमात्मा मनुष्य के अत्यन्त समीप है परन्तु वह उसे देख नहीं पाता। मनुष्य प्रभु को देख नहीं पाता परन्तु फिर भी वह उसे छोड़ नहीं सकता क्योंकि वह तो उसके अन्तर में रम रहा है।  जब परमात्मा को हम छोड़ नहीं सकते और उसे ढूंढने के लिए कही दूर जाने की आवश्यकता भी नहीं तब उस हृदय-मन्दिर में विराजमान प्रभु को जानने काउसे प्राप्त करने का प्रयत्न करना चाहिए। उसे प्राप्त करने के लिए उसके निर्मित सर्वोत्कृष्ट काव्य वेद का पठनश्रवणमनन और चिन्तन करना चाहिये। वेद संसार के पुस्तकालय में सबसे प्राचीन और अद्भुत एवं अनूठा काव्य है। इसके उपदेश कभी भी पुराने नहीं होते। वे सदा नये बने रहते हैं।

वेद का कभी नाश नहीं होता। उसमें परिवर्तन और परिवर्धन नहीं हो सकता क्योंकि उसका एक-एक स्वरअक्षरबिन्दु और मात्रा गिनी हुई है।

वेद क्यों पढ़ें '

येन देवा न वियन्ति नो च विद्विषते मिथः ।

तत्कृण्मो ब्रह्म वो गहे संज्ञानं पुरुषेभ्यः ।। (अथर्व० ३ । ३० । ४

शब्दार्थ-(येन) जिस वेदज्ञान को प्राप्त करके (देवाः) देवगण लाग (न वियन्ति) एक-दूसरे का विरोध नहीं करतेएक-दूसरे लग होकर नहीं चलते (नो च) और न ही (मिथः) परस्पर पोत) द्वेष करते हैं (तत) उस (ब्रह्म) वेदज्ञान को (संज्ञानम) जो कि सम्यक ज्ञान देनेवाला है (व:) तुम्हारे (गहे) घरों में (पुरुषभ्यः) सभी पुरुषों के लिए (कृण्मः) करते हैंदेते हैं।

व्यथा-प्रयोजन के बिना मूर्ख भी किसी कार्य को नहीं करता। वेद क्यों पढ़ें वेद पढने से हमें क्या लाभ होगामन्त्र में इसी प्रश्न और जिज्ञासा का सुन्दर उत्तर है।

१. वेद के पढ़नेवाले एक-दूसरे का विरोध नहीं करतेवे एक दूसर से अलग होकर नहीं बलते। वेद सबको केन्द्रित करके एक बना देता है।

२. वेद पढ़नेवालों में एक-दूसरे के प्रति ईर्ष्याद्वेष और घृणा की. भावना नहीं होती। यदि एक व्यक्ति उन्नति कर रहा है तो दूसरा उसे देखकर जलता नहीं।

३. वेद सम्यक् एवं यथार्थ ज्ञान देनेवाला है । वेद के ज्ञान में कोई कमी अथवा त्रुटि नहीं होती।

४. ऐसा सम्यक् ज्ञान देनेवाला वेद प्रत्येक परिवार मेंप्रत्येक घर में होना चाहिए।

आज हमारे घरों में उपन्यास और किस्से-कहानियों की पुस्तकें मिल सकती हैं वेदों के दर्शन होना कठिन है। यदि आपके घर में वेद नहीं हैं तो आज ही वेद लाकर अपने घर में रखिए।

वेद-प्रमाण

अव्यसश्च व्यचसश्च बिलं विष्यामि मायया।

ताभ्यामुत्य वेदमथ कर्माणी कृण्महे ॥ (अथर्व० १६ । ६८ । १)

शब्दार्थ-(अव्यसः) अव्यापकएकदेशी (च च) और (व्यचसः) व्यापकअनन्त के (बिलम्) भेदमर्मरहस्य को मैं (मायया) बुद्धि द्वारा (विष्यामि) खोल देता हूँ। (ताभ्याम्) उन दोनों-व्यापक और एकदेशी पदार्थों का ज्ञान प्राप्त करने के लिए हम (वेदम्) वेद को (उद्धत्य) उठाकरप्रमाण मानकर (अथ) तदनन्तर (कर्माणि) विविध प्रकार के कार्यों को (कृण्महे) सम्पादन करते हैं।

भावार्थ-यदि हम संसार के पदार्थों पर दृष्टि डालें तो हमें दो प्रकार के पदार्थ दिखाई देंगे-व्यापक और अव्यापकअनन्त और सान्तअपरिमित और परिमितमहान् और सूक्ष्म । संसार के सभी पदार्थों को इन दो भागों में विभक्त किया जा सकता है। __ वेद के स्वाध्याय सेवेद के पठन-पाठनश्रवणमनन और निदिध्यासन से इन पदार्थों का ज्ञान भली प्रकार हो जाता है। इन दो प्रकार के पदार्थों का ज्ञान प्राप्त कर हम अपने लौकिक और पारलौकिक कार्यों को भली-भाँति कर सकते हैं। हमें वेद को प्रमाण मानकर वेदविहित कार्यों का ही अनुष्ठान करना चाहिए वेद-विरुद्ध कार्यों को त्याग देना चाहिए।

वेद को अपनाओ

अपकामन् पौरुषेयाद् वृणानो दैव्यं वचः।

प्रणीतिरभ्यावर्तस्व विश्वेभिः सखिभिः सह ॥ (अथर्व० ७ । १०५ । १

शब्दार्थ-हे जीवात्मन् ! तू (पौरुषेयाद्) मनुष्य-सम्बन्धी वचनों या कल्पनामों से (अपक्रामन्) दूर रहते हुए (दैव्यं वचः) परमेश्वर की पवित्र वेदवाणी को (वृणानः) स्वीकार करते हुए अपने (विश्वेभिः) समस्त (सखिभिः सह) मित्रों के साथ (प्रणीतिः) वेद-प्रतिपादितन्यायानुकुलधर्मपथ परवेद के आदेशउपदेश और शिक्षाओं पर (अभि आवर्तस्व) आचरण कर।

भावार्थ-१. मनुष्यों को चाहिए कि वे साधारण लोगों की धर्म सम्बन्धी तथा अन्य कल्पनाओं से दूर रहें।

२. मनुष्य-सम्बन्धी कल्पनाओं से दूर रहकर प्रभुप्रदत्त वेदवाणी को ही स्वीकार करना चाहिए।

३. अपने सभी मित्रोंबन्धु-बान्धवों के साथ वेद-मार्ग पर ही चलना चाहिएवेद-प्रतिपादितन्यायानुकूल कार्यों को ही करना चाहिए।

महर्षि मनु ने मानो इसी मन्त्र का अनुवाद करते हुए कहा है

एकोऽपि वेदविद्धर्म यं व्यवस्येद विजोत्तमः।

स विज्ञेयः परो धर्मो नाज्ञानामुदितोऽयुतैः॥

(मनु० १२ । ११३) वेद को जाननेवाला अकेला भी संन्यासी जिस धर्म की व्यवस्था करे वही श्रेष्ठ धर्म है और अज्ञानी मूर्खजन सहस्रों मिलकर भी जो व्यवस्था करें उसे कभी नहीं मानना चाहिये ।

वेद को त्यागनेवाले का जीवन व्यर्थ

यस्तित्याज सचिविदं सखायं न तस्य वाच्यपि भागो अस्ति । यदों शृणोत्यलकं शृणोति नहि प्रवेद सुकृतस्य पन्थाम् ।।  

(ऋ० १० । ७१ । ६

शब्दार्थ-(यः) जो मनुष्य (सचिविदम्) सब प्रकार का ज्ञान कराने वाले (सखायम्) वेदरूपी मित्र को (तित्याज) छोड़ देता हैत्याग देता है (तस्य) उसकी (वाचि अपि) वाणी में भी (भागः) कोई सारतत्त्व (नअस्ति) नहीं रहता (ईम्) वह व्यक्ति (यत्) वेद के अतिरिक्त जो कुछ (शृणोति) सुनता है (अलकम्) व्यर्थ ही सुनता है। ऐसा मनुष्य (सुकृतस्य) सुकृत केपुण्य धर्म केसुन्दर कर्मानुष्ठान के (पन्थाम्) मार्ग को (न प्रवेद) नहीं जाता।

भावार्थ-वेद हमारा जीवन धन हैवेद हमारा सर्वस्व है। अतः प्रत्येक व्यक्ति को प्रतिदिन वेद का स्वाध्याय करना चाहिएक्योंकि १. वेद सब प्रकार का ज्ञान प्राप्त कराता है। २. जो मनुष्य वेद को छोड़ देता हैवेद का स्वाध्याय नहीं करता उसकी वाणी में कोई सार और तत्त्व नहीं रहता। ३. ऐसा व्यक्ति जो कुछ सुनता है वह सब-कुछ व्यर्थ ही होता हैउससे जीवन का निर्माण और उत्थान नहीं होता। ४. ऐसे व्यक्ति को अपने कर्तव्य-कर्मों का बोध नहीं होता।

वेद को उसके कोश में रख दो

यस्मात कोशादुदभराम वेदं तस्मिन्नन्तरव दध्म एनम् । कृतमिष्टं ब्रह्मणो वीर्येण तेन मा देवास्तपसावतेह ॥  (अथर्व० १६ । ७२ । १)

शब्दार्थ-(यस्मात्) जिस (कोशात्) कोश सेअलमारी सेबस्ते से (वेदम्) वेद को (उदभराम) हम बाहर निकालते हैं (तस्मिन्) उसीके (अन्तः) भीतर (एनम्) इसको (अव दध्मः) रख देते हैं। (ब्रह्मण:) परमात्मा के (वीर्येण) कृतित्व सेकृति से (इष्टम् कृतम्) मैंने अपना इष्टकार्य सम्पादन कर लिया है (तेन तपसा) वेदाध्ययन-रूपी तप से प्राप्त (देवाः) दिव्यगुण (इह) इस संसार में (मा अवत) मेरी रक्षा करें।

भावार्थ--मन्त्र में कई सुन्दर बातों का निर्देश है

१. वेद हमारे पवित्र ग्रन्थ हैं। हमें वेद को बढ़िया कोशअलमारी या बस्ते आदि में रखना चाहिए।

२. वेद का अध्ययन समाप्त करने के पश्चात् हमने वेद को जिस स्थान से निकाला था उसी स्थान पर रख देना चाहिए।

३. वेद परमात्मा का कृतित्व हैपरमात्मा प्रदत्त निधि हैइसमें प्रगत उपायों और साधनों से ही अपने इष्ट कार्यों की सिद्धि करनी

चाहिए।

४. वेदाध्ययन एक तप है।

वेद के स्वाध्याय से दिव्यगुण हमारे जीवन में आते हैं और वे गुण हमारी रक्षा का कारण बनते हैं।

वह है।

यं स्मा पृच्छन्ति कुह सेति घोरमुतेमाहुनॆषो अस्तीत्येनम् । सो प्रर्यः पुष्टीविज इवा मिनाति श्रवस्मै धत्त स जनास इन्द्रः॥ (ऋ० २। १२ ।

शब्दार्थ-(यं) जिस ईश्वर के विषय में (कुह सः इति) वह कहाँ है इस प्रकार (पृच्छन्ति स्म) पूछते हैं (उत) और कुछ लोग (ईम्) इसको (घोरम्) घोरकर्मादण्डदाता (आहुः) कहते हैंकुछ लोग (एनम्) इसके विषय में (एषः) यह (न अस्ति) नहीं है (इति) ऐसा कहते हैं। (सः) वह (अर्यः) संसार का स्वामी (पुष्टी:) ऐश्वर्यों और समद्धियों को (विज इव) कैंपाकर (प्रा मिनाति) नष्ट कर देता है। (जनासः) हे मनुष्यो ! (अस्मै) उसके लिए (श्रत् धत्त) श्रद्धा करो (सः इन्द्रः) वह ऐश्वर्यशाली परमात्मा है।

भावार्थ-संसार में ईश्वर के विषय में लोगों की भिन्न-भिन्न धारणाएँ हैं। कुछ लोग कहते हैं ईश्वर यदि है तो दीखता क्यों नहीं ?

कुछ लोगों का विचार है कि ईश्वर घोरकर्मा हैवह दण्डदाता हैवह प्राणियों को रुलाता है। कुछ लोग घोषणापूर्वक यह कह दिया करते हैं कि इस संसार का निर्माता कोई नहीं है। इसका नियन्ता और पालक कोई नहीं है। इस मन्त्र में ईश्वर-सिद्धि के लिए दो युक्तियाँ दी हैं। प्रथम है स्वाभाविक इच्छा। प्रत्येक व्यक्ति ईश्वर के विषय में जानना चाहता हैअत: ईश्वर है। दूसरी है संसार में होनेवाली आकस्मिक घटनाएँ जो मनुष्यों के जीवन में प्रायः घटती रहती हैं । बाह्य दृष्टि से उनका कोई कारण दिखाई नहीं देता परन्तु कोई कारण तो होना ही चाहिए। वह कारण परमेश्वर ही हो सकता है। सांसारिक ऐश्वर्यों को क्षणभर में मिट्टी में मिला देनेवाली कोई सत्ता है । मनुष्यो ! उसमें श्रद्धा धारण करो।

ईश्वर-प्राप्ति के विघ्न

न तं विदाथ य इमा जजानान्यधुष्माकमन्तरं बभूव । नोहारेण प्रावृता जल्प्या चासुतप उक्थशासश्चरन्ति ।  

(ऋ० १०। ८२ । ७ यजु० १७ । ३१)

शब्दार्थ हे मनुष्यो ! (नतम्विदाथ) तुम उसे नहीं जानते (यःइमाजजान) जिसने इन लोकों को उत्पन्न किया है (युष्माकम्अन्यत्) वह तुमसे भिन्न है परन्तु (अन्तरम् बभूव) वह तुम्हारे अन्दरतुम्हारी प्रात्मा में विद्यमान है। तुम उसे नहीं जानते क्योंकि (नीहा रेण प्रावृताः) तुम अज्ञान एवं अन्धकार के कुहरे से ढके हुए हो (जल्प्याः ) जल्पी होव्यर्थ की बातें करते रहते हो (च) और (प्रसुतपः) केवल प्राण-पोषण में लगे रहते हो (उक्थशास:) वेद-मन्त्रों का उच्चारण मात्र करनेवालेआचरणहीन होकर (चरन्ति) विचरते हो।

भावार्थ-ईश्वर इस सृष्टि का स्रष्टा है। इस सृष्टि की प्रत्येक वस्तु अपने स्रष्टा का पता दे रही है।।

इस सृष्टि का रचयिता तुमसे भिन्न है और तुम्हारे अन्दरतुम्हारी आत्मा में ही बैठा है फिर भी तुम उसे नहीं जानते।

तुम उसे इसलिए नहीं जानते क्योंकि १. तुम अविद्या और अज्ञान में फंसे हुए हो। ईश्वर तुमसे दूर नहीं है परन्तु अपने अज्ञान के कारण तुम उसे जान नहीं पाते।

२. तुम जल्पी हो। व्यर्थ की गपशप मेंव्यर्थ की बकवास में अपना समय नष्ट करते हो।

३. तुम प्राणों के पोषण में लगे रहते हो । खाना-पीना और मौज उड़ाना तुमने अपने जीवन का लक्ष्य बना रक्खा है।

४. तुम स्तुति-प्रार्थना-उपासना भी करते हो तो हृदय से नहींदम्भ से करते हो। इन चार बाधाओं को हटा दो। आपको ईश्वर के दर्शन होंगे।

गुहा में दर्शन

वेनस्तव पश्यन्निहितं गुहा सघत्र विश्वं भवत्येकनीडम् । तस्मिन्निव संच वि चैति सर्वस प्रोतश्च प्रोतश्च विभः प्रजासु ॥ (यजु० ३२।८)

शब्दार्थ--(यत्र) जिस ईश्वर में (विश्वम्) समस्त संसार (एकनीडम् भवति) एक घोंसले के समान तुच्छरूप में है (च) और (तस्मिन् इदम्सर्व) उसी में यह समस्त संसार (सम् एति) चला जाता हैप्रलयकाल में उसी में विलीन हो जाता है (वि च) और सर्गारम्भ में उसी से प्रकट होता है (स:) वह परमेश्वर (विभूःप्रजासु) उत्पन्न होनेवाली सभी सृष्टियों और प्राणियों में (प्रोत:प्रोतः) ओत-प्रोत हैताने और बाने की भाँति व्याप्त है। (वेनः) योगाभ्यासीसाधनाशील व्यक्ति (तत् सत्) उस सत्यस्वरूप नित्यब्रह्म को (गुहा निहितम्) हृदय-गुहा में स्थित हुआ (पश्यत्) देखता है।

भावार्थ १. हमारे लिए यह संसार बहुत महान् हैअत्यन्त विस्तृत है। यदि मनुष्य बड़े-से-बड़े विमान में बैठकर अनेक जन्मों तक भ्रमण करता रहे तो भी इसका वार-पार नहीं पा सकता। इतना अपार संसार उस अनन्त प्रभु में एक तुच्छ घोंसले की भाँति समाया हुमा है।

२. यह अखिल ब्रह्माण्ड उसीसे उत्पन्न होता है और उसीमें विलीन हो जाता है।

३. वह परमात्मा उत्पन्न होनेवाली सभी सृष्टियों में तथा सभी प्राणियों में समाया हुआ है । वह इन सभी में इस प्रकार प्रोत-प्रोत है जैसे सूत ताने और बाने में प्रोत-प्रोत होता है।

४. ऐसे अनन्त परमात्मा को योगीउपासकजन अपने हृदय मन्दिर में देखते हैं। ईश्वर के दर्शन यदि कहीं हो सकते हैं तो हृदय में। अतः मूर्तियों में टक्कर न मारकर उसे हृदय में ही खोजना चाहिये।

मैं तुझे चाहता हूँ

त्वं ह्यहि चेरवे विदा भगं वसुत्तये।

उद्वावृषस्व मघवन् गविष्टय उदिन्द्राश्वमिष्टये। (ऋ० ८।६१ । ७)

शब्दार्थ-(मघवन) हे उत्तम धनों के स्वामिन् ! (भगम्) ऐश्वर्यधनसम्पत्ति (वसुत्तये) धन चाहनेवालों को (विदाः) दे दे। (गोइष्टये) गौएँगौ की कामनायाचना करनेवालों के लिए (उत् वाव षस्व) लुटा देदे डाल। (अश्वम् इष्टये) घोड़ेघोड़े माँगनेवालों के लिए दे डाल । (इन्द्र) परमात्मन् ! (चेरवे) अपने उपासक के प्रति (त्वं हि) तू ही (एहि) चलाता है।

भावार्थ-भक्त भगवान् से क्या चाहता हैइसका मन्त्र में सुन्दर चित्रण है।

१. प्रभु अपने उपासक को धन देने लगते हैं तो उपासक कहता है-प्रभो ! मैं धनकामी नहीं हूँमुझे इन सम्पदाओं की आवश्यकता नहीं है। ये तो इन्द्रियों के तेज को समाप्त करनेवाली हैं। मुझे नहीं चाहिए आपका धन । यह धन तो आप धनकामियों को दे दें।

२. प्रभो! मुझे पशुओं की भी आवश्यकता नहीं है। मैं पशुपति भी नहीं बनना चाहता। न मुझे गौत्रों की मावश्यकता है और न ही घोड़ों की । ये गौ और घोड़े तू पशुकामियों को दे दे।

३. प्रभो ! मुझ उपासक के प्रति तो बस आप ही आ जाओ। मैं तो आपको ही चाहता हूँ। आपके मिल जाने पर मैं कृतकृत्य हो जाऊँगा। अखिल सम्पदाएँसभी वैभव और ऐश्वर्य मुझे स्वयमेव प्राप्त हो जाएँगेअतः मैं तो केवल प्रापको ही चाहता हूँ।

प्रभो ! हृदय में बस जाओ

अग्ने त्वं नो अन्तम उत त्राता शिवो भवा वरूथ्यः। वसुरग्निर्वसुश्रवा अच्छ नक्षि धुमत्तम रयि दाः ।। (यजु० ३ । २५)

शब्दार्थ-(अग्ने) हे सर्वोन्नति-साधक प्रभो! (त्वं नः अन्तम:) तू हमारे अत्यन्त निकट है (उत) इसलिए तू हमारा (त्राता) रक्षक बन । हमारे लिए (शिवः) कल्याणकारी और (वरूथ्यः) वरण करने योग्य (भव) बन। प्रभो! आप (वसुः) समस्त लोकों को बसाने वाले (अग्निः) सर्वत्रव्यापक और (वसुश्रवाः) चराचर के आश्रय हो। (अच्छ नक्षि) हममें प्रविष्ट हो जाओहमें प्राप्त हो जाओ और हमें (धुमत्तमम्) अतिशय प्रकाशयुक्त (रयिम्) ज्ञान और सदाचार-रूपी धन (दा:) प्रदान करो।

भावार्थ-ईश्वर हमारे अत्यन्त निकट है। वह हमारी हृदय-गुहा में विराजमान है। जो जितना निकट होगावह उतना ही अधिक हमारी सहायता कर सकेगा। ईश्वर सदा-सर्वदा हमारे प्रसङ्ग हैअतः वह हमारा रक्षक है। वह हमारा कल्याणकर्ता है। वही हमारे लिए वरणीय है।

वह प्रभु सबको बसानेवाला हैसबको वस्=चमकानेवाला है। वह सर्वत्र व्यापक है । सारा संसार उसीके आश्रित है।

भक्त प्रभु के इस दिव्यरूप को समझकर प्रार्थना करता है-प्रभो! आप मेरे

हृदय-मन्दिर में दर्शन दें। आप मुझे ज्ञान और सदाचार-रूप धन देकर मेरे जीवन को द्योतित करेंमेरे जीवन को चमका दें।

उसे कौन पाता है ?

उद्धेदभिश्रुतामघं वृषभं नर्यापसम् ।

प्रस्तारमेषि सूर्य ॥ (ऋ० ८ । ६३ । १ सा० १२५)

शब्दार्थ-(सूर्य) हे सकल संसार को देदीप्यमान करनेवाले परमेश्वर ! तू (इत् ह) निश्चय से (उद् एषि) उस मनुष्य के हृदय में प्रकाशित होता है जो (श्रुतामघम्) धन होने पर उसे दीन-दुःखियों में वितरित करता है (वृषभम्) जो ज्ञान और भक्तिरस की धाराओं की वृष्टि करता है (नर्यापसम्) जो मनुष्य हितकारीपरोपकार आदि कार्य करता है और (अस्तारम्) जो कामक्रोध आदि शत्रुओं को परे भगा देता है।

भावार्थ-संसार में प्रत्येक व्यक्ति की अभिलाषा है कि उसे ईश्वर के दर्शन हों। ईश्वर-दर्शन के लिए कुछ साधना करनी पड़ती है। उपासक को अपने जीवन को निर्मल और पवित्र करना पड़ता हैकुछ विशेष गुणों को अपने जीवन में धारण करना पड़ता है। प्रस्तुत मन्त्र में ईश्वर को प्राप्त करनेवाले व्यक्ति के कुछ लक्षण बताये गये हैं।

१. ईश्वर को वह प्राप्त कर सकता है जो दानशील हैनिरन्तर देता रहता है। जो अपने धन को दीनदु:खीपीड़ित और दुर्बलों में बाँटता रहता है।

२. ईश्वर-दर्शन का अधिकारी वह है जो लोगों पर ज्ञान और भक्तिरस की प्रानन्द-धाराओं की वर्षा करता है।

३. ईश्वर ऐसे व्यक्ति के हृदय में प्रकाशित होते हैं जो परोपकार परायण हैजो दूसरों का हितसाधन करता है।

४. ईश्वर उसके हृदय-मन्दिर में विराजते हैं जिसने कामक्रोधलोभमोह आदि शत्रुओं को दूर भगाकर अपने हृदय को शुद्ध और पवित्र बना लिया है।

परमात्मा को प्राप्त कर

अभि नो वाजसातमं रयिमर्ष शतस्पहम् ।

इन्दो सहस्रभर्णसं तुविद्युम्न विभासहम् ॥ (ऋ० ६ । ६८।१सा० ५४६)

शब्दार्थ-(इन्दो) हे जीवात्मन् ! तू परमेश्वर को (अभि अर्ष) प्राप्त कर जो (नः) हमें (वाजसातमम्) अन्नज्ञान और बल का प्रदाता है (शतस्पहम्) जिसकी सभी भव्यात्मा स्पृहा करते हैंजिसे सभी व्यक्ति चाहते हैं (रयिम्) जो मोक्ष-धन का प्रदाता है। (सहस्रभर्णसम्) जो सबका भरण-पोषण और रक्षण करनेवाला है। (तुविद्युम्नम्) जिसका ऐश्वर्य और कीर्ति अपार है (विभासहम्) जो बड़ों-बड़ों का भी पराभव करनेवाला है।

भावार्थ-संसार के प्रत्येक मनुष्य को ईश्वर को प्राप्त करने का प्रयत्न करना चाहिए। ईश्वर के स्थान पर हम मनुष्यपूजा अथवा मूर्तिपूजा आदि में न लग जाएँअत: वेद ने कुछ विशेषण दे दिये कि कैसे ईश्वर को प्राप्त करना चाहिए। हम ऐसे ईश्वर को प्राप्त करेंऐसे ईश्वर के उपासक बनें

१. जो हमें अन्नज्ञान और बल प्रदान करता है।

२. हम ऐसे ईश्वर की स्पृहा करें जिसकी भव्यात्मा योगीजन उपासना करते हैं।

२. हम ऐसे ईश्वर की उपासना करें जो हमें मोक्षधन प्रदान कर सकता हो।

४. जो सबका भरणपोषण और रक्षण करनेवाला है। ५. जिसका ऐश्वर्य अपार है और कीर्ति महान् है।

६. जो छोटे-मोटों की तो बात ही क्याबड़ों-बड़ों का भी पराभव करनेवाला है।

तपरहित व्यक्ति उसे नहीं पा सकता

पवित्रं ते विततं ब्रह्मणस्पते प्रभुर्गात्राणि पषि विश्वतः। अतप्ततनून तदामो प्रश्नुते शृतास इद्वहन्तस्तत् समाशत ॥

(ऋ० ६ । ८३ । १सा० ५६५)

शब्दार्थ-(ब्रह्मणस्पते) हे ज्ञान के स्वामिन् परमेश्वर ! (ते-पवित्र) तेरा पवित्र-प्रकाशज्ञान-ज्योति (विततम्) सर्वत्र व्याप्त है (प्रभुः) उस प्रकाश से समर्थ श्राप (विश्वतः गात्राणि परि एषि) सभी शरीरों में व्याप्त हैंप्रोत-प्रोत हैं। यद्यपि आप सर्वत्र व्यापक हैंसभी शरीरों में निवास करते हैं परन्तु (अतप्ततनः) यम-नियम आदि तप-शून्य (आमः) संसार के भोगों में लिप्तकच्चा मनुष्य (तत्) तेरे उस पवित्र ज्ञानमयप्रकाशमय स्वरूप को (नअश्नुते) प्राप्त नहीं करता। (शृतासः) ब्रह्मचर्य और योगाभ्यास की अग्नि में परिपक्व विद्वान् (इत्) ही (तत् वहन्तः) उस प्रानन्द को धारण करते हुए (सम्प्राशत) भली प्रकार प्राप्त करते हैं।

भावार्थ-१. ईश्वर सर्वत्र व्यापक है। उसका प्रकाश चहुँ ओर फैल रहा है। उसकी ज्योति से ही सूर्य-चन्द्र आदि द्योतित हो रहे हैं।

२. अपनी महान् सामर्थ्य से प्रभु प्रत्येक शरीर में व्याप्त है।

३. ईश्वर प्रत्येक शरीर में हैउसका प्रकाश सर्वत्र फैला हुना है तो वह मिलता क्यों नहीं वेद कहता है जो तपस्यारहित हैंजो ईश्वर-प्राप्ति के लिए साधना नहीं करतेजो यम-नियम आदि की भट्टी में से नहीं गुजरतेजो सांसारिक विषय-भोगों में लिप्त रहते हैंऐसे व्यक्ति ईश्वर को नहीं पा सकते।

४. जो लोग योगाभ्यास में रत रहते हैंब्रह्मचर्यादि का पालन करते हैंवे ही उस आनन्दस्वरूप परमेश्वर को अपने हृदय में विराजमान देखते हैं।

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