तृणं न खादन्नपि जीवमानः तद् भागधेयं परमं पशूनाम् ॥
- साहित्य – Literature / ज्ञानपूर्ण रचनाएँ
- संगीत – Music / संगीत कला
- कला – Art / सृजनात्मक कौशल
- विहीनः – Without / रहित
- साक्षात् – Directly / वास्तव में
- पशुः – Animal / पशु
- पुच्छ – Tail / पूँछ
- विषाण – Horn / सींग
- हीनः – Devoid of / रहित
- तृणम् – Grass / घास
- न खादन् – Not eating / न खाने वाला
- अपि – Even / भी
- जीवमानः – Living / जीवित रहने वाला
- तत् – That / वह
- भागधेयम् – Fortune / भाग्य
- परमम् – Great / श्रेष्ठ
- पशूनाम् – Of animals / पशुओं का
जिस मनुष्य के जीवन में साहित्य, संगीत और कला का अभाव है, वह वास्तव में सींग और पूँछ रहित पशु के समान है। वह घास नहीं खाता, फिर भी उसका जीवन पशु के समान ही है। यह पशुओं का सौभाग्य है कि ऐसा मनुष्य उनकी तरह घास नहीं खाता।
A person who lacks literature, music and art is essentially like an animal without horns and tail. Even though he does not eat grass like animals, his life still resembles that of an animal. It is the fortune of animals that such a human does not eat grass.
यह श्लोक बताता है कि मानव जीवन की श्रेष्ठता केवल शरीर से नहीं होती, बल्कि संस्कृति, ज्ञान और कला से होती है। साहित्य मनुष्य को विचारशील बनाता है, संगीत हृदय को कोमल बनाता है, और कला जीवन को सौन्दर्य और संवेदना प्रदान करती है। इनके बिना मनुष्य का जीवन पशु के समान माना गया है।
ज्ञानं न शीलं न गुणो न धर्मः ।
ते मर्त्यलोके भुविभारभूताः
मनुष्यरूपेण मृगाश्चरन्ति ॥
- येषाम् – जिन लोगों के
- न – नहीं
- विद्या – शिक्षा / ज्ञान
- तपः – तपस्या / आत्मसंयम
- दानम् – दान / उदारता
- ज्ञानम् – सच्चा ज्ञान
- शीलम् – अच्छा चरित्र
- गुणः – सद्गुण
- धर्मः – धर्म / सदाचार
- ते – वे
- मर्त्यलोके – इस संसार में
- भुवि – पृथ्वी पर
- भारभूताः – बोझ के समान
- मनुष्यरूपेण – मनुष्य के रूप में
- मृगाः – पशु
- चरन्ति – घूमते रहते हैं
जिन लोगों में न विद्या है, न तप है, न दान है, न ज्ञान है, न शील है, न गुण है और न धर्म है, वे इस पृथ्वी पर बोझ के समान हैं। ऐसे लोग मनुष्य के रूप में पशुओं की तरह इस संसार में घूमते रहते हैं।
Those who possess neither knowledge, austerity, charity, wisdom, character, virtue nor righteousness are a burden upon the earth. Though they appear in human form, they wander in the world like animals.
यह श्लोक हमें बताता है कि मनुष्य की श्रेष्ठता केवल उसके शरीर से नहीं होती, बल्कि उसके ज्ञान, चरित्र और धर्म से होती है। यदि ये गुण किसी व्यक्ति में नहीं हैं, तो वह मनुष्य होकर भी पशु के समान जीवन जीता है।
विद्या वात्सल्य निधयः शिक्षका मम दैवतम् ॥
- अधिगत्य – प्राप्त करके / gaining
- गुरोः – गुरु से / from the teacher
- ज्ञानम् – ज्ञान / knowledge
- छात्रेभ्यः – विद्यार्थियों को / to students
- वितरन्ति – वितरित करते हैं / distribute
- ये – जो / those who
- विद्या – ज्ञान / wisdom
- वात्सल्य – स्नेह / affection
- निधयः – भंडार / treasure
- शिक्षकाः – शिक्षक / teachers
- मम – मेरे / my
- दैवतम् – देवता / deity
जो शिक्षक गुरु से ज्ञान प्राप्त करके उसे विद्यार्थियों में वितरित करते हैं, वे विद्या और स्नेह के भंडार होते हैं। ऐसे शिक्षक मेरे लिए देवता के समान पूजनीय हैं।
Those teachers who receive knowledge from their Guru and distribute it among students are treasures of wisdom and affection. Such teachers are divine to me and worthy of reverence.
भारतीय संस्कृति में गुरु और शिक्षक का स्थान अत्यंत उच्च माना गया है। शिक्षक केवल ज्ञान ही नहीं देते, बल्कि अपने प्रेम, अनुभव और मार्गदर्शन से विद्यार्थियों के जीवन को प्रकाशित करते हैं। इसलिए गुरु को देवता के समान सम्मान दिया जाता है।
चातुर्यं भूषणं नार्या उद्योगो नरभूषणम् ॥
- अश्वस्य – घोड़े का / of a horse
- भूषणम् – आभूषण / ornament
- वेगः – गति / speed
- मत्तम् – मद या बल से युक्त / majestic strength
- स्यात् – होता है / is
- गज – हाथी / elephant
- चातुर्यम् – चतुरता / intelligence, cleverness
- नार्या – स्त्री का / of a woman
- उद्योगः – परिश्रम / diligence, effort
- नर – मनुष्य / man
घोड़े का आभूषण उसकी तीव्र गति होती है, हाथी का आभूषण उसका बल और मद होता है। स्त्री का आभूषण उसकी चतुरता है और मनुष्य का आभूषण उसका परिश्रम और उद्योग है।
The ornament of a horse is its speed, and the ornament of an elephant is its majestic strength. The ornament of a woman is her intelligence, and the ornament of a man is his diligence and hard work.
यह श्लोक बताता है कि प्रत्येक वस्तु या व्यक्ति का सच्चा आभूषण उसके गुण और स्वभाव में होता है। मनुष्य के लिए सबसे बड़ा आभूषण उसका परिश्रम, उद्योग और कर्मशीलता है।
प्रयच्छ विमलां बुद्धीं प्रसन्ना भव सर्वदा ॥
- अहम् – मैं / I
- नमामि – नमस्कार करता हूँ / bow down
- वरदाम् – वर देने वाली / giver of boons
- ज्ञानदाम् – ज्ञान देने वाली / giver of knowledge
- त्वाम् – आपको / you
- सरस्वतीम् – देवी सरस्वती / Goddess Saraswati
- प्रयच्छ – प्रदान करो / grant
- विमलाम् – निर्मल / pure
- बुद्धिम् – बुद्धि / intellect
- प्रसन्ना – प्रसन्न / pleased
- भव – हो / be
- सर्वदा – सदैव / always
मैं वर देने वाली और ज्ञान देने वाली देवी सरस्वती को नमस्कार करता हूँ। हे देवी! मुझे निर्मल और शुद्ध बुद्धि प्रदान करें और सदैव मुझ पर प्रसन्न रहें।
I bow to Goddess Saraswati, the giver of knowledge and bestower of boons. O Goddess, please grant me pure intellect and always remain pleased with me.
यह श्लोक ज्ञान की देवी सरस्वती की प्रार्थना है। विद्या प्राप्त करने के लिए केवल अध्ययन ही नहीं, बल्कि शुद्ध बुद्धि और दिव्य प्रेरणा की भी आवश्यकता होती है। इसलिए विद्यार्थी और विद्वान देवी सरस्वती से निर्मल बुद्धि और ज्ञान की प्रार्थना करते हैं।
यथास्मै रोचते विश्वं तथा वै परिवर्तते ॥
- अपारे – असीम / limitless
- काव्य – काव्य / poetry
- संसारे – संसार में / in the world
- कविः – कवि / poet
- एकः – एक / the one
- प्रजापतिः – सृष्टिकर्ता / creator
- यथा – जैसे / as
- अस्मै – उसे / to him
- रोचते – अच्छा लगता है / pleases
- विश्वम् – संसार / world
- तथा – वैसे / accordingly
- वै – ही / indeed
- परिवर्तते – बदल जाता है / transforms
इस असीम काव्य संसार में कवि ही एक प्रकार से सृष्टिकर्ता के समान होता है। उसे संसार जैसा अच्छा लगता है, वह अपनी कल्पना और काव्य के माध्यम से उसे उसी प्रकार रूपांतरित कर देता है।
In the limitless world of poetry, the poet is like a creator. As the world pleases him, he transforms and presents it according to his imagination.
यह श्लोक कवि की रचनात्मक शक्ति को दर्शाता है। कवि अपनी कल्पना और संवेदना के माध्यम से संसार को नए रूप में प्रस्तुत करता है। काव्य में कवि सृष्टिकर्ता के समान होता है, क्योंकि वह शब्दों के माध्यम से एक नई सृष्टि का निर्माण करता है।
सुरतरुवरशाखा लेखनी पत्रमुर्वी ।
लिखति यदि गृहीत्वा शारदा सर्वकालं ।
तदपि तव गुणानां ईश पारं न याति ॥
- असित – काला / dark
- गिरि – पर्वत / mountain
- समम् – समान / equal
- स्यात् – हो जाए / becomes
- कज्जलम् – काजल / ink
- सिन्धु – समुद्र / ocean
- पात्रम् – दवात / inkpot
- सुरतरु – कल्पवृक्ष / divine tree
- वरशाखा – श्रेष्ठ शाखा / best branch
- लेखनी – कलम / pen
- पत्रम् – कागज / writing sheet
- उर्वी – पृथ्वी / earth
- लिखति – लिखती है / writes
- यदि – यदि / if
- गृहीत्वा – लेकर / taking
- शारदा – देवी सरस्वती / Goddess Saraswati
- सर्वकालम् – सदा / forever
- तदपि – तब भी / even then
- तव – तुम्हारे / your
- गुणानाम् – गुणों का / virtues
- ईश – हे ईश्वर / O Lord
- पारम् – अंत / limit
- न – नहीं / not
- याति – पहुँच सकती / reach
यदि काले पर्वत के समान काजल बन जाए, समुद्र दवात बन जाए, कल्पवृक्ष की श्रेष्ठ शाखा कलम बन जाए और पूरी पृथ्वी कागज बन जाए, और देवी सरस्वती स्वयं अनन्त काल तक लिखती रहें, फिर भी हे ईश्वर! आपके गुणों का अंत नहीं पाया जा सकता।
If the dark mountain were turned into ink, the ocean became the inkpot, the branch of the celestial tree became the pen, and the whole earth became paper, and Goddess Saraswati herself kept writing forever, even then, O Lord, the end of Your divine qualities could never be reached.
यह श्लोक ईश्वर की अनंत महिमा को व्यक्त करता है। ईश्वर के गुण इतने अनंत और असीम हैं कि उन्हें शब्दों में पूर्ण रूप से व्यक्त करना असंभव है। मानव ज्ञान और भाषा सीमित हैं, जबकि ईश्वर की महिमा अनंत है।
भुङ्क्ते भोजयते चैव षड्विधं प्रीतिलक्षणम् ॥
- ददाति – देता है / gives
- प्रतिगृह्णाति – स्वीकार करता है / receives
- गुह्यम् – गुप्त बात / secret
- आख्याति – बताता है / reveals
- पृच्छति – पूछता है / asks
- भुङ्क्ते – साथ भोजन करता है / eats together
- भोजयते – भोजन कराता है / offers food
- च एव – और भी / and also
- षड्विधम् – छह प्रकार / six types
- प्रीति – प्रेम / affection
- लक्षणम् – लक्षण / signs
देना, लेना, अपने गुप्त विचार बताना, दूसरे के गुप्त विचार पूछना, साथ में भोजन करना और भोजन कराना — ये छह बातें सच्चे प्रेम और मित्रता के लक्षण हैं।
Giving and receiving, sharing one’s secrets and asking about another’s secrets, eating together and offering food to others — these six actions are the signs of true affection and friendship.
यह श्लोक सच्ची मित्रता के छह लक्षण बताता है। जहाँ परस्पर विश्वास, उदारता और प्रेम होता है, वहीं सच्चा संबंध बनता है। मित्रता केवल शब्दों से नहीं, बल्कि व्यवहार और सहभागिता से प्रकट होती है।
धनक्षये वर्धति जाठराग्निः ।
आपत्सु वैराणि समुद्भवन्ति ।
छिद्रेषु अनर्थाः बहुलीभवन्ति ॥
- क्षते – घाव पर / on a wound
- प्रहाराः – आघात / blows
- निपतन्ति – गिरते हैं / fall
- अभीक्ष्णम् – बार-बार / repeatedly
- धनक्षये – धन के नष्ट होने पर / when wealth is lost
- वर्धति – बढ़ती है / increases
- जाठराग्निः – भूख / digestive fire
- आपत्सु – विपत्ति में / in calamity
- वैराणि – शत्रुताएँ / enmities
- समुद्भवन्ति – उत्पन्न होती हैं / arise
- छिद्रेषु – कमजोरी या दोष में / in weaknesses
- अनर्थाः – विपत्तियाँ / troubles
- बहुलीभवन्ति – बढ़ जाती हैं / multiply
घाव पर बार-बार चोट पड़ती है, धन नष्ट होने पर भूख बढ़ जाती है। विपत्ति के समय शत्रुताएँ प्रकट हो जाती हैं और जहाँ कमजोरी होती है वहाँ अनर्थ और समस्याएँ बढ़ जाती हैं।
Blows fall repeatedly on a wound. When wealth is lost, hunger increases. In times of calamity, enmities arise, and where there are weaknesses, misfortunes multiply.
यह श्लोक जीवन की कठोर सच्चाई को बताता है। जब मनुष्य कठिन परिस्थिति में होता है, तब समस्याएँ और शत्रु अधिक दिखाई देते हैं। इसलिए मनुष्य को जीवन में धैर्य, विवेक और आत्मबल बनाए रखना चाहिए।
रुदन्ति कौरवाः सर्वे हा केशव हा केशव गतः ॥
- केशवम् – केशव (श्रीकृष्ण) / Krishna
- पतितम् – गिरा हुआ / fallen
- दृष्ट्वा – देखकर / seeing
- पाण्डवाः – पाण्डव / Pandavas
- हर्षनिर्भराः – अत्यन्त प्रसन्न / filled with joy
- रुदन्ति – रोते हैं / cry
- कौरवाः – कौरव / Kauravas
- सर्वे – सभी / all
- हा – हाय / alas
- गतः – चला गया / gone
इस श्लोक में **श्लेष अलंकार** है। “केशव” शब्द का दो अर्थों में प्रयोग हुआ है। जब पाण्डवों ने देखा कि **केशी नामक दैत्य (केशव) गिर पड़ा है**, तो वे अत्यन्त प्रसन्न हुए। किन्तु कौरव यह समझ बैठे कि **भगवान केशव (श्रीकृष्ण) गिर पड़े हैं**, इसलिए वे विलाप करते हुए बोले — “हाय केशव! हाय केशव! केशव चले गए।”
This verse demonstrates the poetic figure called **Śleṣa (double meaning)**. The word **Keśava** is used with two meanings. When the Pandavas saw that **the demon Keśī had fallen**, they were filled with joy. But the Kauravas thought that **Lord Krishna (Keśava) had fallen**, so they cried in grief saying, “Alas Keśava! Alas Keśava! Keśava is gone.”
इस श्लोक में **श्लेष अलंकार** है। एक ही शब्द से दो अलग-अलग अर्थ निकलते हैं — यह संस्कृत काव्य की अत्यन्त सुंदर विशेषता है।
यमस्तु हरति प्राणान् वैद्यो प्राणान् धनानि च ॥
- वैद्यराज – वैद्यों के राजा / great physician
- नमस्तुभ्यम् – आपको नमस्कार / salutations to you
- यमराज – मृत्यु के देवता / god of death
- सहोदर – भाई / brother
- यमः – यमराज / Yama
- तु – तो / indeed
- हरति – ले जाता है / takes away
- प्राणान् – प्राण / life
- वैद्यः – वैद्य / physician
- प्राणान् – प्राण / life
- धनानि – धन / wealth
- च – भी / also
हे वैद्यराज! आपको नमस्कार है, आप तो मानो यमराज के भाई ही हैं। क्योंकि यमराज तो केवल प्राण ले जाते हैं, परन्तु वैद्य प्राणों के साथ-साथ धन भी ले लेते हैं।
O king of physicians, salutations to you! You seem like the brother of Yama, the god of death. For Yama only takes away life, but a physician takes away both life and wealth.
यह श्लोक व्यंग्य और हास्य के माध्यम से मानव समाज की एक प्रवृत्ति को दर्शाता है। कभी-कभी रोग के समय उपचार में धन का बहुत व्यय हो जाता है। इस श्लोक में उसी स्थिति को हल्के व्यंग्य के रूप में प्रस्तुत किया गया है।
अजापुत्रं बलिं दद्यात् देवो दुर्बलघातकः ॥
- अश्वम् – घोड़ा / horse
- नैव – नहीं ही / not at all
- गजम् – हाथी / elephant
- व्याघ्रम् – बाघ / tiger
- नैव च – और भी नहीं / nor
- अजापुत्रम् – बकरी का बच्चा / kid of a goat
- बलिम् – बलि / sacrifice
- दद्यात् – दी जाती है / is offered
- देवः – देवता / deity
- दुर्बल – कमजोर / weak
- घातकः – मारने वाला / slayer
न तो घोड़े की बलि दी जाती है, न हाथी की, न ही बाघ की। देवता के लिए तो केवल बकरी के बच्चे की बलि दी जाती है। इससे यह शिक्षा मिलती है कि संसार में अक्सर कमजोर ही आघात का शिकार होता है।
Neither a horse nor an elephant nor even a tiger is sacrificed. Only the kid of a goat is offered in sacrifice. Thus it shows that in the world the weak often become the victims.
यह नीति श्लोक हमें सिखाता है कि दुनिया में अक्सर दुर्बल ही आक्रमण का शिकार बनते हैं। इसलिए मनुष्य को अपने जीवन में शारीरिक, मानसिक और नैतिक शक्ति को बढ़ाना चाहिए।
न कूपखननं युक्तं प्रदीप्ते वह्निना गृहे ॥
- चिन्तनीया – विचार करनी चाहिए / should be considered
- हि – निश्चय ही / indeed
- विपदाम् – विपत्तियों का / of dangers
- अदावेव – पहले ही / beforehand
- प्रतिक्रिया – उपाय / remedy
- न – नहीं / not
- कूपखननम् – कुआँ खोदना / digging a well
- युक्तम् – उचित / proper
- प्रदीप्ते – जलने पर / when burning
- वह्निना – आग से / by fire
- गृहे – घर में / in the house
विपत्ति आने से पहले ही उसके उपाय के बारे में सोच लेना चाहिए। जब घर में आग लग जाए, तब कुआँ खोदना उचित नहीं होता।
The remedy for dangers should be considered beforehand. It is not wise to start digging a well when the house is already on fire.
यह नीति श्लोक हमें दूरदर्शिता और पूर्व तैयारी का महत्व सिखाता है। बुद्धिमान व्यक्ति संकट आने से पहले ही उसका समाधान सोच लेता है। समस्या आने के बाद उपाय करना अक्सर बहुत देर हो जाती है।
नीयते स वृथा येन प्रमादः सुमहानहो ॥
- आयुषः – जीवन का / of life
- क्षणः – एक क्षण / moment
- एकः अपि – एक भी / even one
- सर्वरत्नैः – सभी रत्नों से / by all jewels
- न – नहीं / not
- लभ्यते – प्राप्त किया जा सकता / can be obtained
- नीयते – बिताया जाता है / is spent
- सः – वह / that
- वृथा – व्यर्थ / uselessly
- येन – जिसके द्वारा / by whom
- प्रमादः – आलस्य / negligence
- सुमहान् – बहुत बड़ा / very great
- अहो – हाय / alas
जीवन का एक क्षण भी सभी रत्नों को देकर भी वापस नहीं पाया जा सकता। जो मनुष्य उसे व्यर्थ में नष्ट कर देता है, वह बहुत बड़ी भूल करता है।
Even a single moment of life cannot be bought back with all the jewels in the world. Therefore, the person who wastes it carelessly commits a very great mistake.
यह श्लोक समय के महत्व को दर्शाता है। जीवन का प्रत्येक क्षण अत्यन्त मूल्यवान है। जो व्यक्ति समय को व्यर्थ गंवाता है, वह अपने जीवन के सबसे कीमती धन को खो देता है। इसलिए मनुष्य को समय का सदुपयोग करना चाहिए।
स्वामिनो देहलीदीपसमं अन्योपकारकम् ॥
- आत्मनः – अपने / one's own
- परितोषाय – संतोष के लिए / for satisfaction
- कवेः – कवि का / of the poet
- काव्यम् – काव्य / poetry
- तथापि – फिर भी / nevertheless
- तत् – वह / that
- स्वामिनः – स्वामी या मालिक का / of the master
- देहली – घर की चौखट / threshold
- दीप – दीपक / lamp
- समम् – समान / like
- अन्य – अन्य / others
- उपकारकम् – उपकार करने वाला / beneficial
कवि अपना काव्य अपने आत्मिक संतोष के लिए रचता है। लेकिन वह काव्य घर की चौखट पर रखे दीपक की तरह होता है, जो केवल घर के अंदर ही नहीं बल्कि बाहर आने-जाने वालों को भी प्रकाश देता है।
A poet composes poetry for his own inner satisfaction. Yet that poetry becomes like a lamp placed at the doorway of a house, which illuminates not only the inside but also gives light to those outside.
यह श्लोक बताता है कि सच्चा साहित्य केवल कवि की व्यक्तिगत भावना नहीं होता। वह समाज के लिए भी ज्ञान और प्रेरणा का स्रोत बनता है। जैसे देहली पर रखा दीपक भीतर और बाहर दोनों ओर प्रकाश देता है, वैसे ही श्रेष्ठ काव्य पूरे समाज को प्रकाश देता है।
अक्षिणि द्वे मनुष्याणां जिह्वा त्वैकेव निर्मिता ॥
- ईक्षणम् – देखना / observing
- द्विगुणम् – दुगुना / double
- प्रोक्तम् – कहा गया / said
- भाषणस्य – बोलने की अपेक्षा / than speaking
- इति – इस प्रकार / thus
- वेधसा – सृष्टिकर्ता (ब्रह्मा) द्वारा / by the creator
- अक्षिणि – आँखें / eyes
- द्वे – दो / two
- मनुष्याणाम् – मनुष्यों के / of humans
- जिह्वा – जीभ / tongue
- तु – परंतु / but
- एकैव – केवल एक / only one
- निर्मिता – बनाई गई / created
सृष्टिकर्ता ब्रह्मा ने ऐसा बताया है कि देखना और सुनना बोलने से दुगुना होना चाहिए। इसी कारण मनुष्य को दो आँखें दी गई हैं, परंतु बोलने के लिए केवल एक ही जीभ बनाई गई है।
The Creator has indicated that observing and listening should be twice as much as speaking. Therefore humans are given two eyes, but only one tongue for speaking.
यह श्लोक हमें संयम और विवेक का संदेश देता है। बुद्धिमान व्यक्ति अधिक सुनता और देखता है, परंतु कम बोलता है। अत्यधिक बोलना अक्सर भूलों का कारण बनता है, जबकि सुनना और समझना ज्ञान को बढ़ाता है।
न हि सुप्तस्य सिंहस्य प्रविशन्ति मुखं मृगाः ॥
- उद्यमेन – परिश्रम से / by effort
- हि – निश्चय ही / indeed
- सिध्यन्ति – सिद्ध होते हैं / are accomplished
- कार्याणि – कार्य / tasks
- न – नहीं / not
- मनोरथैः – केवल इच्छाओं से / by mere wishes
- न हि – क्योंकि नहीं / because not
- सुप्तस्य – सोए हुए / of the sleeping
- सिंहस्य – सिंह के / of a lion
- प्रविशन्ति – प्रवेश करते / enter
- मुखम् – मुख में / into the mouth
- मृगाः – हिरण / deer
कार्य केवल परिश्रम से ही सफल होते हैं, केवल इच्छाएँ करने से नहीं। जैसे सोए हुए सिंह के मुख में हिरण स्वयं प्रवेश नहीं करते।
Work is accomplished only through effort, not merely by wishes or imagination. Just as deer do not walk into the mouth of a sleeping lion.
यह श्लोक हमें परिश्रम और कर्म का महत्व सिखाता है। केवल इच्छा करना या सपने देखना पर्याप्त नहीं है। सफलता प्राप्त करने के लिए कठिन परिश्रम और निरंतर प्रयास आवश्यक है।
प्रभाते रोदिति कुक्कुटः च वै तु हि च वै तु हि ॥
- उत्तिष्ठ – उठो / arise
- उत्तिष्ठ – उठो / get up
- राजेन्द्र – हे राजाओं में श्रेष्ठ / O king
- मुखम् – मुख / face
- प्रक्षालयस्व – धो लो / wash
- भोः – हे / O
- प्रभाते – प्रातःकाल में / in the morning
- रोदिति – बोलता है / cries
- कुक्कुटः – मुर्गा / rooster
- च – और / and
- वै – निश्चय ही / indeed
- तु हि – वास्तव में / certainly
हे राजाओं में श्रेष्ठ! उठो, उठो और अपना मुख धो लो। प्रातःकाल हो गया है, मुर्गा भी बांग दे रहा है।
Arise, arise O great king! Wash your face and wake up. It is already morning, and the rooster is crowing.
यह श्लोक हमें समय पर जागने और दिन की शुरुआत उत्साह से करने की प्रेरणा देता है। प्रातःकाल जागना स्वास्थ्य, अनुशासन और सफलता के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण माना गया है।
न काञ्चने ध्वनिस्तादृक् यादृक् कांस्ये प्रजायते ॥
- उत्तमः – श्रेष्ठ व्यक्ति / noble person
- न – नहीं / not
- अतिवक्ता – अधिक बोलने वाला / excessive speaker
- स्यात् – होता है / becomes
- अधमः – निम्न या तुच्छ व्यक्ति / inferior person
- बहुभाषते – बहुत बोलता है / speaks a lot
- न – नहीं / not
- काञ्चने – सोने में / in gold
- ध्वनिः – ध्वनि / sound
- तादृक् – वैसी / such
- यादृक् – जैसी / like
- कांस्ये – कांसे में / in bronze
- प्रजायते – उत्पन्न होती है / is produced
श्रेष्ठ व्यक्ति अधिक नहीं बोलता, जबकि तुच्छ व्यक्ति बहुत बोलता है। जैसे सोने में उतनी आवाज़ नहीं होती, जितनी कांसे के बर्तन में होती है।
A noble person does not speak excessively, while an inferior person talks a lot. Just as gold does not produce as much sound as a bronze vessel does.
यह श्लोक सिखाता है कि सच्चे ज्ञानी और महान व्यक्ति अत्यधिक बोलने के बजाय संयम और विवेक से बोलते हैं। जिनके पास वास्तविक ज्ञान होता है, वे शांत और गंभीर रहते हैं, जबकि अल्पज्ञ व्यक्ति अधिक शोर करते हैं।
चिता दहति निर्जीवं चिन्ता दहति जीवितम् ॥
- चिन्तायाः – चिंता से / worry
- तु – परंतु / but
- चितायाः – चिता से / funeral pyre
- बिन्दुमात्रम् – केवल एक बिंदु का / only a small difference
- विशेषतः – अंतर / difference
- चिता – मृत शरीर को जलाने वाली अग्नि / funeral pyre
- दहति – जलाती है / burns
- निर्जीवम् – निर्जीव शरीर / lifeless body
- चिन्ता – चिंता / worry
- दहति – जलाती है / burns
- जीवितम् – जीवित व्यक्ति / living person
चिंता और चिता में केवल एक बिंदु का अंतर है। चिता तो केवल निर्जीव शरीर को जलाती है, परंतु चिंता जीवित मनुष्य को ही जलाती रहती है।
There is only a small difference between worry (chintā) and the funeral pyre (chitā). The funeral pyre burns only the lifeless body, but worry burns the living person.
यह श्लोक जीवन में चिंता के दुष्प्रभाव को दर्शाता है। अत्यधिक चिंता मनुष्य की शांति, स्वास्थ्य और सुख को नष्ट कर देती है। इसलिए मनुष्य को चिंता छोड़कर समाधान और सकारात्मक सोच की ओर बढ़ना चाहिए।
सजीवं दहते चिन्ता निर्जीवं दहते चिता ॥
- चिता – मृत शरीर को जलाने वाली अग्नि / funeral pyre
- चिन्ता – चिंता / worry
- समाप्रोक्ता – समान बताई गई है / said to be similar
- बिन्दुमात्रम् – केवल एक बिंदु / a tiny difference
- विशेषता – अंतर / distinction
- सजीवम् – जीवित व्यक्ति / living person
- दहते – जलाती है / burns
- चिन्ता – चिंता / worry
- निर्जीवम् – निर्जीव शरीर / lifeless body
- दहते – जलाती है / burns
- चिता – चिता / funeral pyre
चिता और चिंता लगभग समान बताई गई हैं, दोनों में केवल एक बिंदु का अंतर है। चिंता जीवित मनुष्य को जलाती है, जबकि चिता केवल मृत शरीर को जलाती है।
The funeral pyre (chitā) and worry (chintā) are said to be almost the same, with only a small difference. Worry burns a living person, while the funeral pyre burns only the lifeless body.
यह श्लोक बताता है कि चिंता मनुष्य के जीवन को अंदर ही अंदर नष्ट करती रहती है। जहाँ चिता मृत्यु के बाद शरीर को जलाती है, वहीं चिंता जीवित रहते हुए ही मन और शरीर को कष्ट देती है। इसलिए जीवन में संतुलन, धैर्य और सकारात्मक सोच आवश्यक है।
पयःपानं भुजंगानां केवलं विषवर्धनम् ॥
- उपकारः – भलाई / kindness
- हि – निश्चय ही / indeed
- नीचानाम् – नीच लोगों के लिए / of wicked people
- अपकारः – हानि / harm
- जायते – बन जाता है / becomes
- पयः – दूध / milk
- पानम् – पीना / drinking
- भुजंगानाम् – सर्पों का / of snakes
- केवलम् – केवल / only
- विष – विष / poison
- वर्धनम् – बढ़ाने वाला / increasing
नीच लोगों के साथ किया गया उपकार अक्सर अपकार में बदल जाता है। जैसे सर्प को दूध पिलाने से उसका विष ही बढ़ता है।
Kindness shown to wicked people often turns into harm. Just as feeding milk to a snake only increases its poison.
यह नीति श्लोक सिखाता है कि उपकार करते समय विवेक आवश्यक है। दुष्ट या कृतघ्न व्यक्ति भलाई का मूल्य नहीं समझते, बल्कि उससे और अधिक हानि पहुँचा सकते हैं।
स्वल्पमप्यनुगन्तव्यं मार्गस्थो न अवसीदति ॥
- अनुगन्तुम् – अनुसरण करना / to follow
- सताम् – सज्जनों का / of the noble
- वर्त्म – मार्ग / path
- कुत्सितम् – बुरा या तुच्छ / ignoble
- यदि – यदि / if
- न – नहीं / not
- शक्यते – संभव है / possible
- स्वल्पम् – थोड़ा / little
- अपि – भी / even
- अनुगन्तव्यम् – अनुसरण करना चाहिए / should be followed
- मार्गस्थः – मार्ग पर रहने वाला / one who stays on the path
- न – नहीं / not
- अवसीदति – पतित होता / falls
यदि सज्जनों के पूरे मार्ग का अनुसरण करना किसी कारण से संभव न हो, तो भी उसका थोड़ा सा भाग अवश्य अपनाना चाहिए। जो व्यक्ति सही मार्ग पर चलता है, वह कभी पतित नहीं होता।
If it is not possible to follow the entire path of the noble people, one should at least follow a part of it. A person who stays on the right path never falls into ruin.
यह श्लोक बताता है कि सज्जनों का मार्ग जीवन में उन्नति का मार्ग है। यदि पूर्ण रूप से उसका पालन करना कठिन हो, तो भी जितना संभव हो उतना अपनाना चाहिए। सही मार्ग पर चलने वाला व्यक्ति अंततः सफलता और सम्मान प्राप्त करता है।
अकुलीनोऽपि विद्यावान् देवैरपि सुपूज्यते ॥
- सुन्दरः – सुंदर / handsome
- अपि – भी / even
- सुशीलः – अच्छे स्वभाव वाला / virtuous
- कुलीनः – उच्च कुल में जन्मा / noble-born
- महाधनः – बहुत धनी / very wealthy
- अकुलीनः – निम्न कुल में जन्मा / low-born
- विद्यावान् – विद्या वाला / learned person
- देवैः – देवताओं द्वारा / by the gods
- अपि – भी / even
- सुपूज्यते – आदर किया जाता है / is highly respected
कोई व्यक्ति सुंदर हो, सुशील हो, उच्च कुल में जन्मा हो या अत्यंत धनी हो — फिर भी यदि उसमें विद्या नहीं है तो उसका महत्व सीमित है। परंतु जो व्यक्ति विद्वान है, भले ही वह साधारण कुल में जन्मा हो, वह देवताओं द्वारा भी सम्मानित होता है।
A person may be handsome, well-behaved, born in a noble family, or extremely wealthy. Yet if he lacks knowledge, his greatness is limited. But a learned person, even if born in a humble family, is respected even by the gods.
यह श्लोक विद्या के सर्वोच्च महत्व को बताता है। सौंदर्य, कुल और धन अस्थायी हैं, लेकिन ज्ञान मनुष्य को वास्तविक सम्मान और प्रतिष्ठा देता है। इसी कारण भारतीय परंपरा में विद्या को सबसे बड़ा धन माना गया है।
अधमा मातुलात् ख्याताः श्वशुरात् अधमाधमाः ॥
- उत्तमाः – श्रेष्ठ लोग / noble persons
- आत्मना – अपने कर्मों से / by their own actions
- ख्याताः – प्रसिद्ध होते हैं / become famous
- पितुः – पिता के द्वारा / by father
- ख्याताः – प्रसिद्ध / known
- मध्यमाः – मध्यम स्तर के लोग / mediocre persons
- अधमाः – निम्न स्तर के लोग / inferior persons
- मातुलात् – मामा के कारण / through maternal uncle
- ख्याताः – प्रसिद्ध / known
- श्वशुरात् – ससुर के कारण / through father-in-law
- अधमाधमाः – अत्यंत निम्न / most inferior
श्रेष्ठ व्यक्ति अपने ही गुणों और कर्मों से प्रसिद्ध होते हैं। मध्यम लोग अपने पिता के कारण प्रसिद्ध होते हैं। निम्न लोग अपने मामा के कारण जाने जाते हैं, और जो ससुर के कारण प्रसिद्ध हों वे अत्यंत निम्न माने जाते हैं।
The best people become famous by their own merit. Average people are known because of their father. Inferior people gain recognition through their maternal uncle, and the most inferior are those who become known through their father-in-law.
यह श्लोक बताता है कि मनुष्य की वास्तविक प्रतिष्ठा उसके अपने गुणों और कर्मों से बनती है। दूसरों के सहारे मिलने वाली प्रसिद्धि स्थायी नहीं होती। इसलिए व्यक्ति को अपने परिश्रम, चरित्र और ज्ञान से सम्मान प्राप्त करना चाहिए।
षडेते यत्र वर्तन्ते तत्र देवः सहायकृत् ॥
- उद्यमः – परिश्रम / effort
- साहसम् – साहस / courage
- धैर्यम् – धैर्य / patience
- बुद्धिः – बुद्धि / intelligence
- शक्तिः – शक्ति / strength
- पराक्रमः – वीरता / valor
- षट् – छह / six
- एते – ये / these
- यत्र – जहाँ / where
- वर्तन्ते – उपस्थित होते हैं / exist
- तत्र – वहाँ / there
- देवः – भगवान / God
- सहायकृत् – सहायता करते हैं / gives support
जहाँ परिश्रम, साहस, धैर्य, बुद्धि, शक्ति और पराक्रम ये छह गुण होते हैं, वहाँ भगवान भी सहायता करते हैं।
Where effort, courage, patience, intelligence, strength, and valor are present, there God Himself becomes a helper.
यह श्लोक सिखाता है कि सफलता केवल भाग्य से नहीं मिलती। जब मनुष्य में परिश्रम, साहस, धैर्य और बुद्धि जैसे गुण होते हैं, तब ईश्वर भी उसकी सहायता करते हैं। अर्थात कर्म और गुण ही सफलता का वास्तविक आधार हैं।

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