बृहदारण्यकोपनिषत् hindi english Explanation



 बृहदारण्यकोपनिषत् 

काण्व पाठः ।

A   मधु काण्ड[उपदेश काण्ड]

अध्याय I  ब्राह्मण i-vi  मन्त्राः ८० 1-...

अध्याय II  ब्राह्मण i-vi  मन्त्राः ६६ 1-...

मुनि [yAj~navalkya] काण्ड [उपपत्ति काण्ड]

अध्याय III  ब्राह्मण i-ix  मन्त्राः ९२ 1-...

अध्याय IV  ब्राह्मण i-vi मन्त्राः ९२ 1-...

C खिल काण्ड[उपासना काण्ड]

अध्याय V  ब्राह्मण i-xv मन्त्राः ३३ 1-...

अध्याय VI  ब्राह्मण i-v  मन्त्राः ७५ 1-...

ॐ पूर्णमदः पूर्णमिदं पूर्णात्पूर्णमदुच्यते ।

पूर्णस्य पूर्णमादाय पूर्णमेवावशिष्यते ॥

ॐ शान्तिः  शान्तिः  शान्तिः ॥

अथ प्रथमोऽध्यायः ।

अथ प्रथमं ब्राह्मणम् ।


संस्कृत श्लोक:

उषा वा अश्वस्य मेध्यस्य शिरः । सूर्यश्चक्षुर्वातः प्राणो
व्यात्तमग्निर्वैश्वानरः संवत्सर आत्माऽश्वस्य मेध्यस्य । 
द्यौः पृष्ठमन्तरिक्षमुदरं पृथिवी पाजस्यं दिशः पार्श्वे
अवान्तरदिशः पर्शव ऋतवोऽङ्गानि मासाश्चार्धमासाश्च
पर्वाण्यहोरात्राणि प्रतिष्ठा नक्षत्राण्यस्थीनि नभो
माꣳसान्यूवध्यꣳ सिकताः सिन्धवो गुदा यकृच्च क्लोमानश्च
पर्वता ओषधयश्च वनस्पतयश्च लोमान्युद्यन्पूर्वार्धो
निम्लोचञ्जघनार्धो यद्विजृम्भते तद्विद्योतते यद्विधूनुते
तत्स्तनयति यन्मेहति तद्वर्षति वागेवास्य वाक् ॥ १॥

हिंदी में अर्थ (Explanation in Hindi)

यह श्लोक प्रकृति और उसके विविध घटकों का मेटाफ़ोरिकल (रूपक) रूप से वर्णन करता है। इसे इस प्रकार समझ सकते हैं:

  1. उषा और सूर्य – यहाँ “उषा” अश्व के मेध्य (सींग) के समान वर्णित है और सूर्य को आँख कहा गया है। इसका अर्थ है कि प्रकृति का जागरण और प्रकाश का स्रोत सूर्य है।
  2. वायु और अग्नि – वायु को प्राण और अग्नि को वैश्वानर (सर्वज्ञ अग्नि) कहा गया है। यह दर्शाता है कि जीवन और ऊर्जा का संचार इन्हीं तत्वों से होता है।
  3. अंतरिक्ष, पृथ्वी और दिशाएँ – आकाश, पृथ्वी और दिशाओं का विवरण इस बात को दिखाता है कि समस्त सृष्टि का विस्तार व्यापक और व्यवस्थित है।
  4. ऋतु, मास, अर्धमास, पर्व, दिन और रात – समय और काल के घटक भी इस सृष्टि व्यवस्था का अंग हैं।
  5. नक्षत्र, समुद्र, पर्वत, वनस्पति – प्रकृति के विविध रूप जैसे नक्षत्र, सागर, पर्वत, पौधे और वनस्पति का उल्लेख है।
  6. प्रकाश, वर्षा, वायु और वाणी – जो भी उदय, प्रकाश, वर्षा, वायु और संवाद उत्पन्न करता है, वह भी इस समग्र सृष्टि का हिस्सा है।

सारांश:
यह श्लोक कहता है कि सृष्टि के प्रत्येक घटक – चाहे वह प्रकाश हो, जल, अग्नि, वायु, वनस्पति या समय के चक्र – सब मिलकर जीवन और विश्व के संचालन का कार्य करते हैं। यह प्रकृति की व्यापकता और प्रत्येक तत्व के महत्व को दर्शाता है।


English Translation & Explanation

This verse is a metaphorical and philosophical description of nature and its components:

  1. Usha and Surya (Dawn and Sun) – Dawn is likened to the horse’s horn, and the Sun is the eye. It symbolizes the awakening of nature and the source of light.
  2. Vayu (Air) and Agni (Fire) – Air is considered the prana (life force), and fire is called Vaishvanara, representing energy and vitality.
  3. Space, Earth, and Directions – The verse describes the vastness of space, the earth, and directions, emphasizing the orderly and expansive nature of creation.
  4. Seasons, Months, Fortnights, Festivals, Day & Night – Time cycles are also integral parts of the cosmic order.
  5. Stars, Oceans, Mountains, and Flora – Stars, oceans, mountains, and vegetation symbolize the diversity of nature and life forms.
  6. Light, Rain, Wind, and Speech – Elements like light, rain, wind, and speech signify phenomena that sustain life and communication in the universe.

Summary:
The verse highlights that every element of nature – be it light, water, fire, air, plants, or the cycles of time – works together in harmony to sustain life and maintain cosmic order. It portrays the vastness, interconnectedness, and interdependence of all things in the universe.

          मन्त्र २ [I.i.2]


यह 'श्लोक बहुत ही गूढ़ और वैदिक प्रतीकात्मकता से भरा हुआ है। इसे समझने और हिंदी एवं अंग्रेज़ी में व्याख्या करने के लिए मैं इसे क्रमबद्ध तरीके से समझाऊँगा।


श्लोक:

अहर्वा अश्वं पुरस्तान्महिमाऽन्वजायत तस्य पूर्वे समुद्रे योनी
रात्रिरेनं पश्चान्महिमाऽन्वजायत तस्यापरे समुद्रे योनिरेतौ वा अश्वं
महिमानावभितः सम्बभूवतुर्हयो भूत्वा देवानवहद् वाजी गन्धर्वान्
अर्वाऽसुरान् अश्वो मनुष्यान् समुद्र एवास्य बन्धुः समुद्रो योनिः ॥ २॥


हिंदी व्याख्या:

  1. प्रारंभिक अर्थ:

    • “अहर्वा अश्वं” – दिन का अश्व (रथ या शक्ति का प्रतीक)
    • “रात्रिरेनं” – रात का अश्व
    • “महिमा” – शक्ति, विस्तार या प्रभाव
    • “योनि” – उत्पत्ति का स्रोत, जन्मस्थान
    • “समुद्र” – समुद्र का प्रतीक, जीवन और जन्म का व्यापक स्रोत
  2. मुख्य संदेश:

    • दिन और रात के अश्वों के माध्यम से पृथ्वी पर जीवन की उत्पत्ति होती है।
    • पूर्व और पश्चिम में महासागरों से जीवन की उत्पत्ति और विकास होती है।
    • इस प्रक्रिया में अश्व (शक्ति) ही देवताओं, गंधर्वों, असुरों और मनुष्यों के जन्म का माध्यम बनता है।
    • समुद्र जीवन का आधार और उत्पत्ति का स्रोत है।
  3. गूढ़ अर्थ:

    • यहाँ “अश्व” केवल घोड़े नहीं, बल्कि ब्रह्मांडीय ऊर्जा और जीवन शक्ति का प्रतीक हैं।
    • दिन और रात के अश्वों का जन्म, जीवन की अनवरत गति और समय के चक्र का प्रतिनिधित्व करता है।
    • देवता, असुर, मनुष्य सभी इस समुद्र (प्रकृति, ब्रह्मांड) के बंधु हैं।

English Explanation:

  1. Literal Meaning:

    • “Aharva Ashwa” – the horse of the day (symbolizing energy or divine vehicle of light)
    • “Ratrirenam” – the horse of the night (symbolizing the energy of darkness or rest)
    • “Mahima” – power, magnitude, or influence
    • “Yoni” – origin or source of life
    • “Samudra” – the ocean, representing the vast source of creation and sustenance
  2. Core Message:

    • Through the “horses” of day and night, life manifests on Earth.
    • From the oceans in the east and west, beings emerge and grow.
    • These cosmic “horses” facilitate the creation of gods, humans, gandharvas, and asuras.
    • The ocean represents the source of life and the origin of existence.
  3. Symbolic/Philosophical Meaning:

    • “Ashwa” (horse) symbolizes cosmic energy or life force, not just the literal horse.
    • The horses of day and night indicate the unending cycles of time and life.
    • All beings, divine or mortal, are connected through this cosmic ocean, emphasizing unity in creation.

इति प्रथमं ब्राहमणम् ॥


अथ द्वितीयं ब्राह्मणम् ।

          मन्त्र १ [I.ii.1]

यह श्लोक वेदों में प्रकृति और ब्रह्मांड की उत्पत्ति और जीवन की प्रारंभिक प्रक्रिया का दार्शनिक वर्णन करता है। इसे हिंदी और अंग्रेज़ी में समझाया जा सकता है:

नैवेह किंचनाग्र आसीन् मृत्युनैवेदमावृतमासीदशनाययाऽशनाया

हि मृत्युस्तन्मनोऽकुरुताऽऽत्मन्वी स्यामिति । सोऽर्चन्नचरत्

तस्यार्चत आपोऽजायन्तार्चते वै मे कमभूदिति । तदेवार्क्यस्यार्कत्वम् ।

कꣳ ह वा अस्मै भवति य एवमेतदर्कस्यार्कत्वं वेद ॥ १॥


हिंदी में व्याख्या:

  1. श्लोक सार:

    • शुरुआत में कहा गया है कि मृत्यु के अलावा कुछ भी प्रकट नहीं था। सभी चीजें मृत्यु से ढकी हुई थीं।
    • मन ने अपनी पहचान नहीं बनाई थी; अस्तित्व का कोई भान नहीं था।
    • यह अन्धकार या निःसर्ग स्थिति थी।
    • फिर “सोऽर्चन्नचरत्” – अर्थात यह ऊर्जा या आत्मा ने प्रकाश फैलाना शुरू किया।
    • उस क्रिया से जल (आप) उत्पन्न हुआ।
    • इसी क्रिया से सूर्य (अर्क) का रूप प्रकट हुआ।
    • यह दर्शाता है कि सूर्य और प्रकाश की उत्पत्ति उस मूल अनादि स्रोत से हुई, जिसे ब्रह्म या परमात्मा कहा गया है।
  2. मुख्य संदेश:

    • यह श्लोक ब्रह्म और सृष्टि की उत्पत्ति के सिद्धांत को बताता है।
    • मृत्यु और अज्ञान की स्थिति से चेतन शक्ति (मन/आत्मा) ने सृष्टि की दिशा में क्रिया प्रारंभ की।
    • सूर्य (अर्क) और जल जैसे तत्व उसी प्रारंभिक क्रिया के परिणाम हैं।
    • यह प्रकृति और जीवन के आरंभिक क्रम का दार्शनिक विवरण है।

English Explanation:

  1. Verse Summary:

    • In the beginning, there was nothing except death; everything was enveloped in death.
    • The mind had not yet created itself; there was no awareness of existence.
    • This was a state of darkness or primal nothingness.
    • Then “so’rchannacharat” – the primal energy or consciousness began to radiate.
    • From this action, water (Ap) came into being.
    • Subsequently, the Sun (Arka) was manifested.
    • This symbolizes that the Sun and light originated from the eternal, primordial source, often identified as Brahman or the Supreme Being.
  2. Key Concept:

    • The verse describes the philosophy of creation and the origin of the cosmos.
    • From a state of death and ignorance, conscious energy initiated the process of creation.
    • Elements like water and the Sun are the outcomes of this initial divine action.
    • It portrays the sequential unfolding of the universe and the manifestation of life.

          मन्त्र २[I.ii.2]


आपो वा अर्क तद्यदपाꣳ शर आसीत् तत्समहन्यत ।

सा पृथिव्यभवत्तस्यामश्राम्यत् तस्य श्रान्तस्य तप्तस्य तेजो रसो निरवर्तताग्निः ॥ २॥

इस श्लोक का भाव और हिंदी-इंग्लिश व्याख्या इस प्रकार है:


हिंदी में व्याख्या:

इस श्लोक में वर्णित है कि प्रारंभ में “आप” अर्थात जल और “अर्क” अर्थात सूर्य (सौर शक्ति) अस्तित्व में आए। जल और सूर्य का मेल हुआ, जिससे पृथ्वी का निर्माण हुआ। इसके बाद सूर्य की थकावट और तप से उत्पन्न ऊर्जा (तेज) से अग्नि का उद्भव हुआ। यहाँ प्रकृति के मौलिक तत्व—जल, सूर्य, पृथ्वी, अग्नि—के क्रमिक और सृष्टि-संबंधी उद्भव का वर्णन किया गया है।

संक्षेप में:

  1. आप (जल) – प्रारंभिक जीवन और सृजन का आधार।
  2. अर्क (सूर्य) – जीवनदायक ऊर्जा और प्रकाश।
  3. पृथ्वी – स्थूल और ग्रहणशील आधार।
  4. अग्नि (तेज) – सृजन और परिवर्तन की शक्ति।

यह श्लोक हमें बताता है कि सृष्टि तत्वों के संतुलन और परस्पर क्रिया से उत्पन्न होती है।


English Explanation:

This verse describes the emergence of cosmic elements: first Ap (Water) and Arka (Sun/solar energy) came into existence. Their union led to the creation of Prithvi (Earth). Then, from the exhaustion and heat of the Sun, Agni (Fire) arose, representing the energy and transformative power in creation.

In summary:

  1. Ap (Water) – the primary source of life and creation.
  2. Arka (Sun) – the vital energy and light provider.
  3. Prithvi (Earth) – the tangible, supportive base.
  4. Agni (Fire) – the energy that drives creation and transformation.

The verse illustrates the Vedic view of creation, where the cosmic elements interact and give rise to the manifested universe.


         मन्त्र ३  [I.ii.3]


मन्त्र

स त्रेधाऽऽत्मानं व्यकुरुताऽऽदित्यं तृतीयं वायुं तृतीयम् ।
स एष प्राणस्त्रेधा विहितस्तस्य प्राची दिक्षिरोऽसौ चासौ चोर्माव
अथास्य प्रतीची दिक्पुच्छमसौ चासौ च सक्थ्यौ दक्षिणा चोदीची
च पार्श्वे द्यौः पृष्ठमन्तरिक्षमुदरमियमुरः स एषोऽप्सु
प्रतिष्ठितो यत्र क्व चैति तदेव प्रतितिष्ठत्येवं विद्वान् ॥ ३॥


हिंदी में विस्तृत व्याख्या

यह मन्त्र सृष्टि के प्राणतत्त्व और ब्रह्मांडीय संरचना का अत्यन्त गूढ़ वर्णन करता है।

1. आत्मा का तीन रूपों में विभाजन

मन्त्र कहता है कि परम आत्मा ने स्वयं को तीन भागों में प्रकट किया:

  1. आदित्य (सूर्य) – प्रकाश और ऊर्जा का स्रोत
  2. वायु – प्राण और गति का आधार
  3. प्राण – जीवन को चलाने वाली शक्ति

अर्थात् सम्पूर्ण जगत में जो जीवन और चेतना है, वह इन तीन शक्तियों से संचालित है।


2. ब्रह्मांड को प्राणरूप अश्व के समान बताया गया

यहाँ ब्रह्मांड को एक जीवित प्राणमय शरीर के रूप में समझाया गया है।

  • पूर्व दिशा (प्राची) – इसका सिर है
  • पश्चिम दिशा (प्रतीची) – इसकी पूँछ है
  • उत्तर और दक्षिण दिशाएँ – इसके दोनों पार्श्व हैं
  • आकाश (द्यौ) – इसकी पीठ है
  • अन्तरिक्ष – इसका उदर (पेट) है
  • पृथ्वी – इसका वक्षस्थल (छाती) है

इस प्रकार पूरा ब्रह्मांड एक जीवित शरीर की तरह है।


3. जल में स्थित प्राण

मन्त्र आगे कहता है:

“स एषोऽप्सु प्रतिष्ठितः”

अर्थात यह प्राण जल में स्थापित है
जल जीवन का आधार है, इसलिए जहाँ जल है वहाँ जीवन और प्राण की सम्भावना है।


4. दार्शनिक अर्थ

इस मन्त्र का गहरा संदेश है:

  • सम्पूर्ण ब्रह्मांड एक जीवित चेतन व्यवस्था है।
  • सूर्य, वायु और प्राण जीवन के मूल तत्व हैं।
  • जल जीवन का आधार है।
  • जो मनुष्य इस सत्य को समझता है, वह प्रकृति और ब्रह्मांड के साथ एकता का अनुभव करता है।

English Explanation

1. Division of the Cosmic Self

The verse states that the Supreme Self divided itself into three forms:

  1. Aditya (Sun) – source of light and energy
  2. Vayu (Air) – the principle of movement and breath
  3. Prana – the life force sustaining all beings

Thus, life in the universe operates through these three cosmic powers.


2. The Universe as a Living Being

The cosmos is described as a living organism.

  • East – its head
  • West – its tail
  • North and South – its sides
  • Heaven (Sky) – its back
  • Mid-space (Antariksha) – its belly
  • Earth – its chest

This symbolic imagery shows that the universe itself is a living cosmic body.


3. Life Established in Water

The verse states:

“He is established in water.”

Water is the foundation of life, and wherever water exists, life and vitality may arise.


4. Philosophical Meaning

The deeper teaching is:

  • The universe is a living, conscious system.
  • Sun, air, and prana sustain life.
  • Water is the fundamental basis of existence.
  • One who understands this truth realizes the unity of nature and life.

         मन्त्र ४[I.ii.4]

मन्त्र

सोऽकामयत द्वितीयो म आत्मा जायेतेति । स मनसा वाचं
मिथुनꣳ समभवदशनाया मृत्युस्तद्यद्रेत आसीत् स
संवत्सरोऽभवन् न ह पुरा ततः संवत्सर आस । तमेतावन्तं
कालमबिभर्यावान्संवत्सरस्तमेतावतः कालस्य परस्तादसृजत ।
तं जातमभिव्याददात् स भाणकरोत् सैव वागभवत् ॥ ४॥


हिंदी में व्याख्या

यह मन्त्र सृष्टि की उत्पत्ति, समय और वाणी के जन्म का दार्शनिक वर्णन करता है।

1. द्वितीय आत्मा की इच्छा

मन्त्र कहता है:

“सोऽकामयत द्वितीयो म आत्मा जायेतेति”

अर्थात् प्रारम्भ में जो एक परम चेतना थी, उसने इच्छा की कि मेरे समान दूसरा आत्मरूप उत्पन्न हो।

यही सृष्टि की शुरुआत की प्रेरणा है।


2. मन और वाणी का मिलन

फिर कहा गया:

“स मनसा वाचं मिथुनं समभवत्”

अर्थात् मन और वाणी का संयोग हुआ

यहाँ मन (चेतना) और वाणी (अभिव्यक्ति) के मिलन से सृष्टि की प्रक्रिया आगे बढ़ती है।


3. बीज और काल का जन्म

मन्त्र में कहा गया है:

“तद्यद्रेत आसीत् स संवत्सरोऽभवत्”

जो बीज उत्पन्न हुआ, वही आगे चलकर संवत्सर (समय / वर्ष) बन गया।

इसका अर्थ है:

  • सृष्टि के साथ ही समय का भी जन्म हुआ
  • समय सृष्टि का मूल नियम है

4. समय के बाद सृष्टि का विस्तार

संवत्सर अर्थात् एक वर्ष के बराबर समय तक उस बीज को धारण किया गया।

उसके बाद सृष्टि का प्रकट होना प्रारम्भ हुआ।


5. वाणी का जन्म

जब वह सृष्टि उत्पन्न हुई तो उसने ध्वनि उत्पन्न की

मन्त्र कहता है:

“स भाणकरोत् सैव वागभवत्”

अर्थात् उसने ध्वनि की और वही वाणी (Speech) बन गई।

इसका अर्थ है:

  • ध्वनि ही वाणी का मूल है
  • वाणी ज्ञान और अभिव्यक्ति का माध्यम है

दार्शनिक अर्थ

यह मन्त्र तीन महान सिद्धान्त बताता है:

  1. इच्छा (कामना) से सृष्टि प्रारम्भ होती है
  2. समय (काल) सृष्टि के साथ उत्पन्न होता है
  3. ध्वनि और वाणी ज्ञान और सृष्टि की अभिव्यक्ति हैं

वेदों में इसलिए वाणी को दिव्य शक्ति माना गया है।


English Explanation

This verse describes the origin of creation, time, and speech.

1. Desire for a Second Self

The primordial consciousness desired:

"May another self be born from me."

This desire initiated creation.


2. Union of Mind and Speech

The verse says:

"He united mind and speech."

The union of mind (thought) and speech (expression) became the driving force of creation.


3. Birth of Time

The seed that emerged became Samvatsara (Time / Year).

This implies:

  • Time began with creation
  • Time governs the unfolding of the universe

4. Emergence of Creation

The seed was held for the duration of a year, after which creation manifested.


5. Birth of Speech

When the being was born, it made a sound.

That sound became speech (Vāk).

This symbolizes that sound is the origin of language and knowledge.


Main idea of the verse

Creation arises from:

  • Desire
  • Time
  • Sound / Speech

These are fundamental principles in Vedic cosmology.


 


       मन्त्र ५[I.ii.5]

मन्त्र

स ऐक्षत यदि वा इममभिमꣳस्ये कनीयोऽन्नं करिष्य इति ।
स तया वाचा तेनाऽऽत्मनेदꣳ सर्वमसृजत यदिदं
किञ्चर्चो यजूꣳषि सामानि छन्दाꣳसि यज्ञान् प्रजाः
पशून् स यद्यदेवासृजत तत्तदत्तुमध्रियत । सर्वं वा अत्तीति
तददितेरदितित्वꣳ । सर्वस्यैतस्यात्ता भवति सर्वमस्यान्नं भवति
य एवमेतददितेरदितित्वं वेद ॥ ५॥


हिंदी में विस्तृत व्याख्या

यह मन्त्र सृष्टि, वेदों की उत्पत्ति और “अदिति” के सिद्धान्त को समझाता है।

1. सृष्टि करने का विचार

मन्त्र कहता है:

“स ऐक्षत…”
अर्थात् परम चेतना ने विचार किया —
“मैं इस जगत की रचना करूँ और जीवों के लिए अन्न की व्यवस्था करूँ।”

यहाँ यह बताया गया है कि सृष्टि केवल पदार्थ नहीं है, बल्कि जीवन के पालन-पोषण की व्यवस्था भी है


2. वाणी से सृष्टि की रचना

फिर कहा गया:

“स तया वाचा तेनात्मनेदं सर्वमसृजत”

अर्थात् उसने वाणी और अपनी शक्ति से सम्पूर्ण जगत की रचना की


3. वेद और सृष्टि के अंग

मन्त्र में कहा गया कि सृष्टि के साथ ही उत्पन्न हुए:

  • ऋचः (ऋग्वेद के मन्त्र)
  • यजूंषि (यजुर्वेद के मन्त्र)
  • सामानि (सामवेद के मन्त्र)
  • छन्द (वेदों के छन्द)
  • यज्ञ
  • प्रजा (जीव)
  • पशु (प्राणी)

अर्थात् धर्म, ज्ञान और प्रकृति — सब सृष्टि के साथ ही प्रकट हुए।


4. अन्न का सिद्धान्त

मन्त्र कहता है:

“स यद्यदेवासृजत तत्तदत्तुमध्रियत”

जिसे भी परमात्मा ने उत्पन्न किया, वह अन्न (जीवन का आधार) बन गया।

यहाँ अन्न का अर्थ केवल भोजन नहीं है, बल्कि संपूर्ण पोषण का सिद्धान्त है।


5. अदिति का अर्थ

मन्त्र कहता है:

“सर्वं वा अत्तीति तददितेरदितित्वम्”

जो सबको धारण करता है और सबका पोषण करता है, वही अदिति है।

अदिति का अर्थ:

  • असीम
  • अखण्ड
  • सबको धारण करने वाली शक्ति

6. ज्ञान का फल

मन्त्र कहता है:

जो व्यक्ति अदिति के इस रहस्य को जानता है, वह:

  • सबका पोषक बनता है
  • उसके लिए सम्पूर्ण जगत अन्नस्वरूप हो जाता है

अर्थात् वह प्रकृति और जीवन के एकत्व को समझ लेता है।


English Explanation

This verse explains creation, the origin of the Vedas, and the principle of Aditi.

1. Intention to Create

The Supreme Consciousness thought:

"Let me create nourishment (food) for this universe."

Creation is therefore not just matter, but also a system for sustaining life.


2. Creation through Speech

The verse states that through speech (Vāk) and divine power, the entire universe was created.


3. Emergence of the Vedas

Along with creation appeared:

  • Rigvedic hymns (Ṛc)
  • Yajurvedic formulas (Yajus)
  • Sāmaveda chants (Sāman)
  • Vedic metres (Chandas)
  • Sacrifices (Yajña)
  • Beings (Prajā)
  • Animals (Paśu)

Thus knowledge, ritual, and life itself arose with creation.


4. Principle of Nourishment

Whatever was created became food (sustenance) for life.

Here food symbolizes the cycle of nourishment and interdependence in nature.


5. Meaning of Aditi

Aditi means:

  • the infinite
  • the all-embracing reality
  • the power that contains and sustains everything

6. Result of Knowledge

One who understands this truth becomes a knower of the cosmic order, seeing the universe as an interconnected system of life and nourishment.


 


        मन्त्र ६[I.ii.6]

मन्त्र

सोऽकामयत भूयसा यज्ञेन भूयो यजेयेति । सोऽश्राम्यत् स
तपोऽतप्यत । तस्य श्रान्तस्य तप्तस्य यशो वीर्यमुदक्रामत् प्राणा
वै यशो वीर्यम् । तत् प्राणेषूत्क्रान्तेषु शरीरꣳ श्वयितुमध्रियत
तस्य शरीर एव मन आसीत् ॥ ६॥


हिन्दी में शब्दार्थ (Word-by-Word Meaning)

संस्कृत शब्द हिन्दी अर्थ
सः वह (परम चेतना)
अकामयत इच्छा की
भूयसा अधिक
यज्ञेन यज्ञ के द्वारा
भूयः और अधिक
यजेय यज्ञ करूँ
अश्राम्यत वह थक गया
तपः अतप्यत तपस्या की
श्रान्तस्य थके हुए
तप्तस्य तप करने वाले
यशः तेज / यश
वीर्यम् शक्ति
उदक्रामत् बाहर निकल गया
प्राणाः जीवन शक्तियाँ
शरीरम् शरीर
मनः मन

हिन्दी में विस्तृत व्याख्या

यह मन्त्र यज्ञ, तप, प्राण और मन के सम्बन्ध को समझाता है।

1. अधिक यज्ञ करने की इच्छा

मन्त्र कहता है कि सृष्टिकर्ता ने विचार किया:

“मैं और अधिक यज्ञ करूँ।”

यहाँ यज्ञ का अर्थ केवल अग्नि में आहुति देना नहीं है, बल्कि सृष्टि का सतत् निर्माण और पालन है।


2. तप और परिश्रम

फिर कहा गया:

“सोऽश्राम्यत् स तपोऽतप्यत”

अर्थात् उसने परिश्रम किया और तपस्या की

यह संकेत देता है कि सृजन और महान कार्य तप और प्रयास से ही सम्भव होते हैं।


3. प्राण ही यश और वीर्य हैं

मन्त्र में कहा गया:

“प्राणा वै यशो वीर्यम्”

अर्थात् प्राण ही यश और शक्ति हैं।

जब प्राण शरीर में रहते हैं तब:

  • ऊर्जा
  • शक्ति
  • जीवन

सब बने रहते हैं।


4. प्राण निकलने पर शरीर निर्जीव

जब प्राण बाहर निकल जाते हैं, तब:

शरीर शिथिल और निर्जीव हो जाता है।

इसलिए वेद बताते हैं कि प्राण ही जीवन का मूल आधार है।


5. शरीर में मन का निवास

मन्त्र का अन्त कहता है:

“तस्य शरीर एव मन आसीत्”

अर्थात् उस शरीर में मन का निवास था

यह बताता है कि:

  • प्राण → जीवन शक्ति
  • मन → चेतना और विचार

दोनों मिलकर जीवन को संचालित करते हैं।


English Explanation

This verse explains the relationship between sacrifice (yajña), austerity (tapas), life force (prāṇa), and mind.

1. Desire for Greater Sacrifice

The creator desired:

"Let me perform a greater sacrifice."

Here yajña symbolizes the ongoing process of creation and cosmic order.


2. Effort and Austerity

He performed tapas (austerity) and exerted great effort.

This symbolizes that creation and transformation require discipline and energy.


3. Prana as Power and Glory

The verse states:

“Prāṇa indeed is glory and strength.”

Prana represents:

  • vitality
  • power
  • life force

4. When Prana Leaves

When the prana departs from the body, the body becomes lifeless.

Thus life exists only as long as prana remains.


5. Mind in the Body

Finally, the verse says that the mind resides in the body, guiding thought and awareness.

  


        मन्त्र ७[I.ii.7]

मन्त्र

सोऽकामयत मेध्यं म इदꣳ स्यादात्मन्व्यनेन स्यामिति ।
ततोऽश्वः समभवद् यदश्वत् तन्मेध्यमभूदिति ।
तदेवाश्वमेधस्याश्वमेधत्वं एष ह वा अश्वमेधं वेद य एनमेवं वेद ।
तमनवरुध्यैवामन्यत । तꣳ संवत्सरस्य परस्तादात्मन आलभत ।
पशून्देवताभ्यः प्रत्यौहत् तस्मात्सर्वदेवत्यं प्रोक्षितं प्राजापत्यमालभन्त ।
एष ह वा अश्वमेधो य एष तपति तस्य संवत्सर आत्मा ।
अयमग्निरर्कस्तस्येमे लोका आत्मानस्तावेतावर्काश्वमेधौ ।
सो पुनरेकैव देवता भवति मृत्युरेवाप पुनर्मृत्युं जयति ।
नैनं मृत्युराप्नोति मृत्युरस्याऽऽत्मा भवत्येतासां देवतानामेको भवति ॥ ७॥


शब्दार्थ (Word-by-Word Meaning)

संस्कृत हिन्दी अर्थ
सः वह (परम चेतना)
अकामयत इच्छा की
मेध्यम् पवित्र यज्ञ
आत्मना अपने द्वारा
अश्वः घोड़ा
समभवत् उत्पन्न हुआ
अश्वमेध अश्व यज्ञ
संवत्सर वर्ष
अग्नि अग्नि
अर्क सूर्य
लोकाः लोक
मृत्यु मृत्यु

हिन्दी में विस्तृत व्याख्या

यह मन्त्र अश्वमेध यज्ञ के गूढ़ आध्यात्मिक अर्थ को बताता है। यहाँ अश्वमेध केवल राजकीय यज्ञ नहीं बल्कि ब्रह्मांडीय प्रतीक है।


1. यज्ञ करने की इच्छा

मन्त्र कहता है:

“सोऽकामयत मेध्यं म इदं स्यात्”

अर्थात् परम चेतना ने इच्छा की कि
“मैं एक महान पवित्र यज्ञ करूँ।”


2. अश्व का उत्पन्न होना

उस इच्छा से अश्व (घोड़ा) उत्पन्न हुआ।

यहाँ अश्व का अर्थ केवल पशु नहीं है।
वेदों में अश्व = शक्ति, गति और प्राण का प्रतीक है।


3. अश्वमेध का वास्तविक अर्थ

मन्त्र कहता है:

“तदेव अश्वमेधस्य अश्वमेधत्वम्”

अर्थात् यही अश्वमेध का वास्तविक रहस्य है।

जो व्यक्ति इस ज्ञान को समझता है वही वास्तव में अश्वमेध का ज्ञाता है।


4. संवत्सर और सूर्य

मन्त्र में कहा गया है:

  • सूर्य ही अश्वमेध का प्रतीक है
  • संवत्सर (वर्ष) उसका आत्मा है

अर्थात् सूर्य का वर्ष भर का चक्र ही ब्रह्मांडीय यज्ञ है।


5. अग्नि और लोक

फिर कहा गया:

  • अग्नि उसका प्रकाश है
  • समस्त लोक उसका विस्तार हैं

इस प्रकार पूरा ब्रह्मांड एक महान यज्ञ है।


6. मृत्यु पर विजय

अन्त में मन्त्र कहता है:

जो इस ज्ञान को जानता है:

  • वह मृत्यु के भय से मुक्त हो जाता है
  • मृत्यु उस पर अधिकार नहीं कर पाती

यह ज्ञान उसे अमर आत्मा की अनुभूति कराता है।


English Explanation

This verse explains the symbolic and cosmic meaning of the Ashvamedha sacrifice.


1. Desire for a Sacred Sacrifice

The Supreme Being desired to perform a sacred sacrifice (medhya yajña).


2. Emergence of the Horse

From that intention arose the horse (ashva).

In Vedic symbolism, the horse represents:

  • power
  • energy
  • cosmic movement

3. True Meaning of Ashvamedha

The text explains that the true Ashvamedha is symbolic knowledge, not merely a ritual.

One who understands this symbolism truly knows the Ashvamedha.


4. Sun and the Year

The verse states that:

  • The Sun represents the Ashvamedha
  • The year (samvatsara) is its soul

Thus the cosmic cycle of the Sun is itself a universal sacrifice.


5. Fire and the Worlds

Fire represents its energy and the worlds represent its expansion.

The universe itself becomes a living yajña.


6. Victory Over Death

One who realizes this truth transcends death.

Such a person understands the immortal nature of the Self.

इति द्वितीयं ब्राह्मणम् ॥



अथ तृतीयं ब्राह्मणम् ।

          मन्त्र १  [I.iii.1]

मन्त्र

द्वया ह प्राजापत्या देवाश्चासुराश्च ।
ततः कनीयसा एव देवा ज्यायसा असुराः ।
त एषु लोकेष्वस्पर्धन्त ।
ते ह देवा ऊचुः हन्त असुरान् यज्ञ उद्गीथेन अत्ययाम इति ॥ १॥


शब्दार्थ (Word-by-Word Meaning)

संस्कृत शब्द हिन्दी अर्थ
द्वया दो प्रकार के
प्राजापत्या प्रजापति की सन्तान
देवाः देवता
असुराः असुर
कनीयसः संख्या में कम
ज्यायसः अधिक
स्पर्धन्त प्रतिस्पर्धा करने लगे
देवा ऊचुः देवताओं ने कहा
यज्ञ यज्ञ
उद्गीथेन उद्गीथ (ॐ स्वर) के द्वारा
अत्ययाम पराजित करेंगे

हिन्दी में विस्तृत व्याख्या

यह मन्त्र देव और असुरों के संघर्ष तथा उद्गीथ (ॐ) की शक्ति को बताता है।


1. प्रजापति की दो सन्तान

मन्त्र कहता है कि प्रजापति की दो प्रकार की सन्तान थीं:

  • देव (दैवी प्रवृत्ति)
  • असुर (अधोगामी प्रवृत्ति)

यह केवल देवता और दानव की कहानी नहीं है, बल्कि मानव के भीतर की दो प्रवृत्तियों का प्रतीक है।


2. संख्या में अंतर

मन्त्र बताता है:

  • देव संख्या में कम थे
  • असुर संख्या में अधिक थे

यह संकेत देता है कि सत्य और सद्गुण कम दिखाई देते हैं, परन्तु उनका महत्व अधिक होता है।


3. लोकों में संघर्ष

देव और असुर इन लोकों में परस्पर स्पर्धा करने लगे

यह संघर्ष प्रतीक है:

  • धर्म और अधर्म का संघर्ष
  • ज्ञान और अज्ञान का संघर्ष

4. उद्गीथ की शक्ति

देवताओं ने कहा:

“हम असुरों को यज्ञ के उद्गीथ से जीतेंगे।”

उद्गीथ का अर्थ है:

  • ॐ का दिव्य स्वर
  • सामवेद का उच्च स्वर

यह दर्शाता है कि दिव्य ज्ञान और पवित्र ध्वनि से अधर्म पर विजय मिलती है।


English Explanation

This verse describes the symbolic conflict between the Devas and Asuras and the power of the sacred chant (Udgītha).


1. Two Types of Beings

The verse states that Prajapati had two kinds of offspring:

  • Devas (divine tendencies)
  • Asuras (negative tendencies)

This represents the dual nature within the human mind.


2. Difference in Numbers

The Devas were fewer, while the Asuras were more numerous.

This symbolizes that virtue may appear small but is powerful.


3. Cosmic Conflict

They began to compete in the worlds.

This represents the eternal struggle between truth and ignorance.


4. Victory Through Udgītha

The Devas decided to defeat the Asuras through Udgītha, the sacred chant of Om used in Vedic rituals.

This teaches that spiritual sound and knowledge overcome negativity.


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