वैदिक मन्त्र एवं अंग्रेजी व्याख्या | Grihastha Khand - Vedic Mantras with English Explanation

गृहस्थ खण्ड - वैदिक मन्त्र एवं अंग्रेजी व्याख्या | Grihastha Khand - Vedic Mantras with English Explanation

गृहस्थ खण्ड - वैदिक मन्त्र एवं अंग्रेजी व्याख्या

Vedic Mantras for Ideal Grihastha Life | Householder's Duties, Happy Home & Family

1. सुरभिमय जीवन (Fragrant / Auspicious Life)

कस्ये मृजाना अति यन्ति रिप्रमायुर्दधानः प्रतरं नवीयः ।
आप्यायमानाः प्रजया धनेनाध स्याम सुरभयो गृहेषु ॥
"Purifying ourselves in knowledge, holding a long new life, removing impurities, increasing with progeny and wealth, may we be fragrant (virtuous) in our homes."
(अथर्ववेद १८।३।१७ | Atharvaveda 18.3.17)
शब्दार्थ (Word Meaning): ज्ञान में आत्मा शुद्ध करते हुए, नवीन दीर्घ आयु धारण करते हुए, पाप-दोष दूर करते हुए, सुसन्तान और धन से बढ़ते हुए हम घरों में सुगन्धित (सदाचारी) बनें।
English Explanation: In this mantra, the beautiful picture of human household life is drawn. Every person should purify his soul through knowledge, strive for a long and excellent life, wash away sins and impurities, create good progeny, acquire wealth, and spread the divine fragrance of good conduct in the home.
मुख्य बिंदु / Key Points:
  • Purify the soul through knowledge.
  • Strive for excellent and long life.
  • Remove sins, impurities and defects.
  • Create noble progeny.
  • Acquire wealth and prosperity.
  • Spread virtuous conduct like divine fragrance in the home.

2. हमारे घर (Our House)

इहैव ध्रुवा प्रतितिष्ठ शालेऽश्वावती गोमती सूनृतावती।
ऊर्जस्वती घृतवती पयस्वत्युच्छयस्व महते सौभगाय ॥
"Stand firm here, O House, rich in horses, cattle, and sweet speech. Rich in food, ghee, and milk, rise high for great fortune."
(अथर्ववेद ३।१२।२ | Atharvaveda 3.12.2)
शब्दार्थ: यह विशाल भवन चिरकाल तक दृढ़ खड़ा रहे। इसमें घोड़े, गौएँ हों, लोग सत्य-मधुर भाषी हों, अन्न, घी, दूध से भरपूर हो और महान् सौभाग्य के लिए ऊँचा उठे।
English Explanation: How should our homes be? The Veda instructs building large, strong houses. They should withstand storms, rain, lightning and earthquakes. The house should be spacious enough for cattle and horses, full of grain stores, ghee and milk. It portrays an ideal householder's home.
Key Points:
  • Own a grand and strong building.
  • Horses for riding.
  • Cows for milk.
  • All family members truthful and sweet-spoken.
  • Home full of food, milk, curd — no scarcity.

3. ऐसे हों हमारे घर (May Our Homes Be Like This)

सुनतावन्तः सुभगा इरावन्तो हसामुदाः।
अतृष्या अक्षुध्या प्राध्यास्त गृहा मास्मद् विभीतन ॥
"Rich in sweet speech, fortunate, full of food, ever smiling, free from thirst and hunger — may our homes be thus, and fear us not."
(अथर्ववेद ७।६०।६ | Atharvaveda 7.60.6)
शब्दार्थ: हे गृहस्थो! सत्य-मधुर भाषी, सौभाग्यशाली, अन्न-धन से भरपूर, हँसमुख, तृष्णारहित, सदा तृप्त और एक-दूसरे से निर्भय बनो।
English Explanation: The mantra paints a picture of an ideal Vedic household where all members are truthful, prosperous, cheerful, content, and live without fear of each other.
Key Points:
  • All members truthful, sweet-spoken and well-organized.
  • Everyone fortunate and prosperous.
  • No scarcity of food and wealth.
  • Always smiling and cheerful.
  • Contented and free from greed.
  • No one in want; all desires fulfilled.
  • No fear among family members.

4. दम्पति-कर्तव्य (Duties of Husband and Wife)

मा वां वृको मा वृकीरा दधर्षन्मा परि वर्तमुत माति धक्तम् ।
अयं वां भागो निहित इयं गीर्दस्राविमे वां निधयो मधूनाम् ॥
"Let no wolf (cruel man) nor she-wolf (cruel woman) harass you. Do not abandon each other, nor transgress limits and hurt one another. This is your share; this is the Vedic ordinance. These treasures of sweets are laid up for you."
(ऋग्वेद १।१८३।४ | Rigveda 1.183.4)
शब्दार्थ: हिंसक पुरुष या स्त्री न सताएँ। एक-दूसरे का त्याग न करें। मर्यादा का उल्लंघन न करें। वेद की यही व्यवस्था है। घर में अन्न-जल-फलों के खजाने तुम्हारे लिए रखे हैं।
English Explanation: This mantra beautifully directs the duties of husband and wife: protect each other from harm, never abandon one another, respect household boundaries, and ensure abundance of food and sweetness in the home.
Key Points:
  • No cruel person should harass you.
  • Husband and wife should never abandon each other.
  • Do not hurt each other by crossing limits.
  • Follow Vedic conduct.
  • Home full of food, water and fruits.

5. पुत्र (Son / Wealth)

अभि नो वाजसातमं रयिमर्ष पुरुस्पहम् ।
इन्दो सहस्रभर्णसं तुविद्युम्नं विश्वासहम् ॥
"O Indra, bring us that wealth (or son) which is most victorious in battle, much desired, thousand-nourishing, highly glorious, and conquering all."
(ऋग्वेद ८।६८।१ | Rigveda 8.68.1)
शब्दार्थ: हे तेजस्वी! हमें ऐसा पुत्र (या धन) दे जो अन्नदाता, सहस्रों का पालन करने वाला, बहुतों को प्रिय, अत्यधिक यशस्वी और विश्वविजयी हो।
English Explanation: The devotee prays for a son (or wealth) who is a giver of food, capable of nourishing thousands, beloved by many, highly renowned, and able to overcome great challenges.
Key Points:
  • Son who provides food so no one goes hungry.
  • Capable of supporting thousands.
  • Pleasant and gentle natured.
  • His fame spreads far and wide.
  • Able to defeat powerful opponents when needed.

6. ऐसा पुत्र उत्पन्न कर (Give Birth to Such a Son)

अधास मन्द्रो अरतिर् विभावा ब स्यति द्विवर्तनिर्वनेषाट् ।
ऊर्जा यच्छ्रेणिर्न शिशुर्दन्मथू स्थिरं शेवृधं सूत माता।
"May the mother bring forth a son who is delightful, not attached to excessive pleasures, radiant like the sun, fearless, beneficial even in forests, innocent like a child, firm as a rock, augmenter of happiness, and quickly ascending like a ladder."
(ऋग्वेद १०।६१।२० | Rigveda 10.61.20)
शब्दार्थ: माता ऐसा पुत्र उत्पन्न करे जो प्रसन्न, विषय-रहित, सूर्य समान तेजस्वी, निर्भय, जंगल में मंगलकारी, निष्पाप, स्थिर, सुखवर्धक और उन्नतिशील हो।
English Explanation: The mantra beautifully describes what kind of children mothers should give birth to — joyful, pure, radiant, brave, innocent yet firm, happiness-increasing and progressive.
Key Points:
  • Always cheerful and blissful.
  • Free from excessive sensual indulgence.
  • Radiant like the sun.
  • Fearless, courageous and heroic.
  • Innocent and playful like a child.
  • Steady as a rock in difficulties.
  • Increaser of happiness and progressive.

7. गृहस्थ कर्तव्य (Duties of Householder)

ध्रुवासि ध्रुवोऽयं यजमानोऽस्मिन्नायतने प्रजया पशुभिर्भूयात् ।
घृतेन द्यावापृथिवी पूर्वथामिन्द्रस्य छदिरसि विश्वजनस्य छाया।
"You are firm; may this sacrificer (husband) also be firm in this abode with progeny and cattle. With ghee may you both fill heaven and earth. You are the shelter of Indra and the shade for all people."
(यजुर्वेद ५।२८ | Yajurveda 5.28)
शब्दार्थ: हे गृहपत्नी! जैसे तू ध्रुव है, वैसे पति भी सन्तान और पशुओं से समृद्ध हो। घृत या स्नेह से द्यावा-पृथिवी भर दो। तू आत्मा का रक्षक और विश्व का आश्रय है।
English Explanation: The wife, being heart-centered, is addressed: Just as you are steady in household duties, may your husband be prosperous with progeny and cattle. Daily yajna should fill the worlds with fragrance, or fill the world with love. Householders must protect the distressed and provide shelter to the helpless.
Key Points:
  • Husband and wife both remain firm and prosperous.
  • Daily yajna or ghee offerings in the home.
  • Behave with love and affection towards all.
  • Protect humanity from suffering and give shelter to the needy.

यह संग्रह गृहस्थाश्रम के आदर्श वैदिक जीवन को दर्शाता है। इन मन्त्रों का नियमित पाठ घर में सुख, समृद्धि और सदाचार स्थापित करता है।
Vedic Mantras for Grihastha | Happy Vedic Family Life | Householder Duties in Vedas

 

गृहस्थ खण्ड - वैदिक मन्त्रों की व्याख्या

गृहस्थ खण्ड

1. सुरभिमय जीवन

कस्ये मृजाना अति यन्ति रिप्रमायुर्दधानः प्रतरं नवीयः ।
आप्यायमानाः प्रजया धनेनाध स्याम सुरभयो गृहेषु ॥
(अथर्वेद १८।३।१७)
शब्दार्थ: (कस्ये) ज्ञान में (मजानाः) अपनी आत्मा को शुद्ध करते हुए अत्युत्तम दीर्घ (नवीयः) नवीन (आयु:) जीवन को (दधानाः) धारण करते हुए (अध) और (रिप्रम्) मल को, पाप को, दोष को (प्रतियन्ति) दूर हटाते हुए (प्रजया) सुसन्तान से (धनेन) धनैश्वर्य से (आप्यायमानाः) बढ़ते हुए हम लोग (गृहेषु) घरों में (सुरभयः) सुगन्धरूप, उत्तम, प्रशंसनीय गुणों से युक्त, सदाचारी (स्याम) होवें।
भावार्थ: मनुष्यों के गृहस्थ-जीवन का इस मन्त्र में सुन्दर चित्रण किया गया है।
मुख्य बिंदु:
  • प्रत्येक व्यक्ति को ज्ञान के द्वारा अपनी आत्मा को शुद्ध करना चाहिए।
  • उत्तम और दीर्घ जीवन प्राप्त करने का प्रयत्न करना चाहिए।
  • जीवन के पाप-ताप, दोष और मलों को धो डालना चाहिए।
  • सुसन्तान का निर्माण करना चाहिए।
  • धनैश्वर्य का उपार्जन करना चाहिए।
  • प्रशंसनीय गुणों से युक्त होकर घर में अपने सदाचार की दिव्य-गन्ध फैलानी चाहिए।

2. हमारे घर

इहैव ध्रुवा प्रतितिष्ठ शालेऽश्वावती गोमती सूनृतावती।
ऊर्जस्वती घृतवती पयस्वत्युच्छयस्व महते सौभगाय ॥
(अथर्ववेद ३।१२।२)
शब्दार्थ: (शाले) यह विशाल भवन (इह एव) जहाँ बना है वहाँ ही चिर काल तक (ध्रुवा) खूब दृढ़ होकर (प्रति तिष्ठ) खड़ा रहे। (अश्वावती) इसके अन्दर घोड़े हों (गोमती) गौएँ हों (सूनृतावती) इसके अन्दर रहनेवाले लोग सदा सत्य, मीठा और मधुर बोलनेवाले हों (ऊर्जस्वती) यह अन्न से भरपूर हो (घृतवती) घी से भरपूर हो (पयस्वती) दूध और जलादि पेय पदार्थों से सम्पन्न हो और (महते सौभगाय) हमारी महान् सुख-समृद्धि के लिए (उत् श्रयस्व) खूब ऊँचा होकर खड़ा रह।
भावार्थ: हमारे घर कैसे हों? हमारे घर टूटे-फूटे न हों। वेद मनुष्यों को विशाल भवन निर्माण कर उनमें रहने का आदेश देता है। हमारे घर ऐसे दृढ़ हों कि तूफान, वृष्टि, बिजली और भूचाल भी उनका कुछ बिगाड़ न सकें। साथ ही घर इतने विशाल होने चाहिएँ कि उनमें गाय और घोड़े बाँधे जा सकें। उनमें अन्नागार हों, घी और दूध के कोठे हों। मन्त्र में एक आदर्श गृहस्थ का चित्रण खींचा गया है।
मुख्य बिंदु:
  • गृहस्थ के पास अपना भव्य एवं दृढ़ भवन होना चाहिए।
  • सवारी के लिए घोड़े होने चाहिए।
  • दूध पीने के लिए गौ होनी चाहिए।
  • घर के सभी व्यक्ति सत्यवादी और मधुरभाषी हों।
  • घर अन्न से भरपूर हो; दूध, दही आदि किसी वस्तु का अभाव न हो।

3. ऐसे हों हमारे घर

सुनतावन्तः सुभगा इरावन्तो हसामुदाः।
अतृष्या अक्षुध्या प्राध्यास्त गृहा मास्मद् विभीतन ॥
(अथर्ववेद ७।६०।६)
शब्दार्थ: (गृहा) हे गृहस्थ लोगो! आप (सुनृतावन्तः) सत्यभाषी, मधुरभाषी और सुव्यवस्थित बनो (सुभगाः) उत्तम सौभाग्यशाली, ऐश्वर्य-सम्पन्न बनो (इरावन्तः) अन्न और धन से भरपूर रहो (हसामुदः) सदा हँसमुख और प्रसन्न रहो (अतृष्याः) तृष्णारहित, संतोषी बनो (अक्षुध्याः) सदा तृप्त रहो, कभी अभावग्रस्त मत बनो और (अस्मद्) हमसे (मा विभीतन) भयभीत मत होओ।
भावार्थ: मन्त्र में एक आदर्श गृहस्थ का चित्रण किया गया है। हमारे घर ऐसे होने चाहिएँ जहाँ परिवार के सदस्य सत्यवादी, मधुरभाषी, सुव्यवस्थाप्रिय, सौभाग्यशाली, अन्न-धन से सम्पन्न, हँसमुख, संतोषी और एक-दूसरे से निर्भय हों।
मुख्य बिंदु:
  • घर के सभी सदस्य सत्यवादी, मधुरभाषी और सुव्यवस्थाप्रिय हों।
  • सभी पारिवारिक जन सौभाग्यशाली हों।
  • घर में अन्न और धन-धान्य की न्यूनता न हो।
  • परिवार के सभी सदस्य सदा हँसते और मुस्कराते रहें।
  • सभी निर्लोभी और सन्तोषी हों।
  • घर में कोई भी व्यक्ति अभावग्रस्त न हो, सभी तृप्त हों।
  • घर के सदस्य एक-दूसरे से भयभीत न हों।

4. दम्पति-कर्तव्य

मा वां वृको मा वृकीरा दधर्षन्मा परि वर्तमुत माति धक्तम् ।
अयं वां भागो निहित इयं गीर्दस्राविमे वां निधयो मधूनाम् ॥
(ऋग्वेद १।१८३।४)
शब्दार्थ: हे स्त्री-पुरुषो! (वाम्) तुमको (मा) न तो (वृकः) भेडिया के समान कुटिल, हिंसक अथवा चोर स्वभाववाला पुरुष सताए और (मा) न (वृकी:) दुष्ट स्वभाववाली, हिंसक वृत्तिवाली स्त्री सताए। तुम दोनों (मा परिवर्तम्) कभी एक-दूसरे का परित्याग मत करो (उत) और (मा) न कभी (अतिधक्तम्) मर्यादा का उल्लंघन करके एक-दूसरे के हृदय को दुखायो। (वाम) तुम दोनों के लिए (अयं भागः) यह सेवन करने योग्य निश्चित भाग है (इयं गीः) यह वेद की व्यवस्था है (दस्रौ) हे दर्शनीयो ! एक-दूसरे के दुःख का नाश करनेवालो (इमे) ये (मधूनाम्) मधुर अन्न, जल और फलों के (निधयः) कोश, खजाने (वाम्) तुम दोनों के लिए (निहितः) रखे गये हैं।
भावार्थ: मन्त्र में पति-पत्नी के कर्तव्यों का सुन्दर निर्देश है। पति-पत्नी को एक-दूसरे का सम्मान करना चाहिए, कभी त्याग न करना चाहिए और घर में सुख-समृद्धि बनाए रखनी चाहिए।
मुख्य बिंदु:
  • हिंसक और कुटिल पुरुष तुम्हें न सताएँ।
  • दुष्ट स्वभाववाली स्त्रियाँ भी तुम्हें पीड़ा न दें।
  • पति-पत्नी कभी एक-दूसरे का त्याग न करें।
  • दम्पती गृहस्थ की मर्यादाओं का उल्लंघन करके एक-दूसरे के हृदय को जलानेवाले न बनें।
  • घर में अन्न, जल और फलों के ढेर सेवन करने के लिए होने चाहिए।

5. पुत्र

अभि नो वाजसातमं रयिमर्ष पुरुस्पहम् ।
इन्दो सहस्रभर्णसं तुविद्युम्नं विश्वासहम् ॥
(ऋग्वेद ८।६८।१)
शब्दार्थ: (इन्दो) हे तेजस्विन् ! तू (नः) हमें (वाजसातमम्) अन्न देनेवाला (सहस्रभर्णसम्) सहस्रों के पालन-पोषण में समर्थ (पुरुस्पृहम) बहुतों को अच्छा लगनेवाला (तुविद्युम्नम्) अत्यधिक यशस्वी (विश्वासहम) बड़े-बड़ों का भी पराभव करनेवाला (रयिम्) पुत्र (अभि अर्ष) प्रदान कर।
भावार्थ: भक्त प्रभु से प्रार्थना करता है कि हमें ऐसा पुत्र प्राप्त हो जो अन्नदाता, यशस्वी, निर्भीक और बहुतों का भरण-पोषण करने वाला हो।
मुख्य बिंदु:
  • पुत्र अन्न देनेवाला हो, जिसके घर से कोई भूखा न जाए।
  • वह सहस्रों का भरण-पोषण करने की क्षमता रखता हो।
  • वह बहुतों को अच्छा लगनेवाला, सौम्य स्वभाव का हो।
  • उसका यश दूर-दूर तक फैला हो।
  • वह समय पड़ने पर बड़े-बड़ों का भी पराभव करनेवाला हो।

6. ऐसा पुत्र उत्पन्न कर

अधास मन्द्रो अरतिर् विभावा ब स्यति द्विवर्तनिर्वनेषाट ।
ऊर्जा यच्छणिर्न शिशुर्दन्मथू स्थिरं शेवृधं सूत माता।
(ऋग्वेद १०।६१।२०)
शब्दार्थ: (माता सूत) माता (ऐसा पुत्र) उत्पन्न कर (यत्) जो (मन्द्रः) सदा सुप्रसन्न और आनन्दमग्न रहनेवाला हो (अरतिः) जो प्रविषयी, भोगी, विलासी और लम्पट न हो (विभावा) जो सूर्य के समान कान्तिमान् और प्रकाशमान् हो (द्विवर्तनिः) जो द्वन्द्वरहित, निर्भय और निडर हो (वनेषाट्) जो जंगल में मंगल करनेवाला हो (शिशुः) जो शिशु के समान निष्पाप और क्रीड़ाशील हो (स्थिरम्) जो चट्टान की भाँति सुदृढ़ और स्थिर रहता हो (शेवृधम्) जो सुखों की वृद्धि करनेवाला हो (अध) और (ऊर्जा श्रेणिः न) ऊपर ले जानेवाली सीढ़ी के समान शीघ्र उन्नतिशील हो।
भावार्थ: माता को किस प्रकार की सन्तानों को जन्म देना चाहिए, मन्त्र में इसका सुन्दर चित्रण है।
मुख्य बिंदु:
  • पुत्र सदा प्रसन्न रहनेवाला होना चाहिए।
  • वह विषय-भोगी और लम्पट न होकर शुद्ध होना चाहिए।
  • वह सूर्य के समान देदीप्यमान होना चाहिए।
  • वह निर्भय, साहसी और पराक्रमी होना चाहिए।
  • वह शिशु के समान निष्पाप और क्रीड़ाशील होना चाहिए।
  • वह कष्टों में भी चट्टान की भाँति स्थिर रहना चाहिए।
  • वह सुखों की वृद्धि करनेवाला और उन्नतिशील होना चाहिए।

7. गृहस्थ कर्तव्य

ध्रुवासि ध्रुवोऽयं यजमानोऽस्मिन्नायतने प्रजया पशुभिर्भूयात् ।
घृतेन द्यावापृथिवी पूर्वथामिन्द्रस्य छदिरसि विश्वजनस्य छाया।
(यजुर्वेद ५।२८)
शब्दार्थ: हे गृहपत्नी! (ध्रुवा असि) जैसे तू ध्रुव, निश्चल और स्थिर है उसी प्रकार (अयं यजमानः) तेरा पति भी (अस्मिन् आयतने) इस गृहस्थ में, इस संसार में (प्रजया पशुभिः) श्रेष्ठ सन्तानों और पशुओं से (ध्रुवं भूयात्) समृद्ध हो। तुम दोनों (घृतेन) घृत के द्वारा या आत्म-स्नेह से (द्यावापृथिवी) आकाश और भूमि को पूर्ण कर दो। हे सद्गृहस्थ! तू (इन्द्रस्य छदिः असि) आत्मा का छत्र, रक्षक है और (विश्वजनस्य छाया असि) संसार के लोगों का आश्रय है।
भावार्थ: स्त्री हृदयप्रधान होती है, इसलिए उसे सम्बोधित कर कहा गया है कि जैसे वह गृहकार्यों में दृढ़ है, वैसे ही पति भी प्रजा और पशुओं से समृद्ध हो। गृह में यज्ञ होना चाहिए तथा सभी के प्रति स्नेह रखना चाहिए। गृहस्थ को दीन-दुखियों को शरण देनी चाहिए।
मुख्य बिंदु:
  • पति-पत्नी दोनों गृहस्थाश्रम में दृढ़ और समृद्ध रहें।
  • घर में प्रतिदिन यज्ञ या घृताहुति होनी चाहिए।
  • सभी के साथ स्नेहपूर्ण व्यवहार करना चाहिए।
  • मानवमात्र को दुःखों से बचाना और दीन-दुखियों को आश्रय देना चाहिए।

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