Upasana Khand - Vedic Mantras with English Explanation

उपासना खण्ड - वैदिक मन्त्र एवं अंग्रेजी व्याख्या | Upasana Khand - Vedic Mantras with English Explanation

उपासना खण्ड

Vedic Upasana Khand - Time, Preparation, Praise, Place, Self-Kingdom and Fruits of Upasana

1. उपासना का समय और फल

नाम नाम्ना जोहवीति पुरा सूर्यात पुरोषसः । यदजः प्रथमं सं बभूव स ह तत् स्वराज्यमियाय यस्मान्नान्यत् परमस्ति भूतम् ।।
"He who, before sunrise and before dawn, unites with the Unborn Supreme, and repeatedly invokes the adorable Lord by His Name — he attains that Self-Kingdom (Swarajya / Moksha), than which no other higher existence exists."
(अथर्ववेद १० । ७ । ३१ | Atharvaveda 10.7.31)
शब्दार्थ: (यत्) जो (अजः) अजन्मा, प्रगतिशील महात्मा (प्रथमम्) सर्वश्रेष्ठ ब्रह्म के प्रति (उषसः पुरा) उषाकाल से पूर्व, सूर्योदय से पूर्व और (सूर्यात् पुरा) सूर्यास्त से पूर्व (सं बभूव) संयुक्त हो जाया करता है और (नाम) नमस्कार करने योग्य परमेश्वर को (नाम्ना) नाम, ओंकार के द्वारा (जोहवीति) जपता है (सः ह) वह ही (तत्) उस (स्वराज्यम्) स्वराज को, आत्मप्रकाश को, मुक्ति को (इयाय) प्राप्त करता है (यस्मात् परम्) जिससे बढ़कर (अन्यत् भूतम्) अन्य कुछ भी, अन्य कोई भी पदार्थ (न अस्ति) नहीं है।
भावार्थ: वैदिक सच्छास्त्रों में दो ही समय सन्ध्या करने का विधान है, सूर्योदय से पूर्व और सूर्यास्त के समय । इस मन्त्र में दो ही समय सन्ध्या करने का विधान है। त्रिकाल सन्ध्या अवैदिक है। जो भक्त, जो उपासक सूर्योदय और सूर्यास्त के समय परमात्मा से संयुक्त होते हैं, प्रभु-उपासना करते हैं उन्हें आत्म-राज्य की, मोक्ष की प्राप्ति होती है जिससे बढ़कर संसार में और कोई पदार्थ नहीं है।
English Explanation: The Vedas prescribe only two times for performing Sandhya — before sunrise and before sunset. Triple Sandhya (Trikal Sandhya) is non-Vedic. The devotee or worshipper who unites with the Supreme at sunrise and sunset times and performs Upasana attains the Kingdom of the Self (Swarajya) and Moksha, than which there is nothing greater in the world.
मुख्य बिंदु / Key Points:
  • उपासना / सन्ध्या का समय: सूर्योदय से पूर्व और सूर्यास्त से पूर्व।
  • त्रिकाल सन्ध्या अवैदिक है।
  • परमात्मा का जप नाम (ओंकार) द्वारा करना चाहिए।
  • फल: आत्म-राज्य / मोक्ष की प्राप्ति, जिससे बढ़कर कुछ नहीं।

2. उपासना से पूर्व तैयारी

विश्वाहा त्वा सुमनसः सुचक्षसः प्रजावन्तो अनमीवा अनागसः।
उद्यन्तं त्वा मित्रमहो दिवे दिवे ज्योग्जीवाः प्रतिपश्येम सूर्य ।
"May we, always with good minds, clear-sighted, blessed with progeny, free from disease and sin, daily behold You rising, O Sun, O Friend of all, for long life."
(ऋग्वेद १० । ३७ । ७ | Rigveda 10.37.7)
शब्दार्थ: (सूर्य) हे प्रकाशस्वरूप प्रभो ! (मित्र-महः) हे स्नेहीजनों से पूजनीय ! (जीवाः) हम जीवगण, तेरे उपासक (विश्वाहा) सदा (सुमनसः) उत्तम मनवाले (सुचक्षसः) निर्मल दृष्टिवाले (प्रजावन्तः) शक्तिशाली, वीर्यवान् होकर (अनमीवाः) रोगरहित रहकर (अनागसः) पाप-वासनाओं से पृथक् रहकर (दिवे दिवे) प्रतिदिन (उद्यन्तं त्वा) हृदय-मन्दिर में उदय होते हुए आपको (ज्योक्) निरन्तर (प्रतिपश्येम) देखा करें, आपके दर्शन किया करें।
भावार्थ: किसी भी कार्य को करने से पूर्व तैयारी करनी पड़ती है। प्रभु-उपासना से पूर्व हमें अपने जीवन को कैसा बनाना चाहिए इस बात का मन्त्र में सुन्दरता से निर्देश किया गया है।
English Explanation: Before starting any work, preparation is necessary. Before divine Upasana, we must prepare our life as guided beautifully in this mantra.
मुख्य बिंदु / Key Points:
  • चित्त की वृत्तियों को निरुद्ध करो, मन को शुद्ध, पवित्र और निर्मल बनायो।
  • निर्मल दृष्टिवाले बनो। 'सुचक्षसः' यहाँ सभी इन्द्रियों का उपलक्षण है। अपनी सभी इन्द्रियों को निर्मल बनाओ।
  • शरीर की उपेक्षा मत करो। शरीर को बलवान् और शक्तिशाली बनाओ।
  • अपना खान-पान, दिनचर्या इस प्रकार की रखो कि रोग आपके ऊपर आक्रमण न करें।
  • वासनाओं, ऐषणाओं और तृष्णाओं को पर हटाकर मन, वचन और कर्म से शुद्ध-पवित्र बन जाओ।
  • ऐसा बनने पर हृदय में उदय होनेवाले परमात्मा के निरन्तर दर्शन होते रहते हैं।

3. कैसे स्तुति करूँ!

वि मे कर्णा पतयतो वि चक्षुर्वीदं ज्योतिर्हदय माहितं यत।
वि मे मनश्चरति दूर आधीः किं स्विद वक्ष्यामि किमु नु मतिष्ये ॥
"My ears fly towards sounds, my eyes towards forms, this light placed in the heart wanders about; my mind roams far with thoughts — what shall I say, what shall I think?"
(ऋग्वेद ६ । ६ । ६ | Rigveda 6.6.6)
शब्दार्थ: (मे कर्णा वि पतयतः) मेरे कान शब्द-विषय में गिर रहे हैं। (चक्षुः वि) आँख रूप की ओर भाग रही है (इदं ज्योतिः) यह ज्योति (यत् हृदये आहितम्) जो हृदय में रक्खी हुई है (वि) इधर-उधर दौड़ रही है (मे मनः) मेरा मन (दूरे आधीः) दूर-दूर ध्यान करता हुआ (वि चरति) विचर रहा है (किं स्विद् वक्ष्यामि) भला मैं क्या कहूँ (किं उ नु मनिष्ये) और क्या मनन करूँ !
भावार्थ: उपासक जब उपासना करने के लिए बैठता है तो उसकी इन्द्रियाँ उसे विषयों में भटकाती हैं। ... (पूर्ण मूल भावार्थ के अनुसार) जब दृढ़ निश्चय के साथ साधना प्रारम्भ कर देता है तो एक दिन ऐसी स्थिति आती है कि कान प्रभु-स्तुति सुनने लगते हैं, आँखें प्रभु की छवि निहारने लगती हैं, मन केवल परमात्मा का स्मरण करता है।
English Explanation: When the worshipper sits for Upasana, his senses distract him towards worldly objects. Ears run after sounds, eyes after forms, the light in the heart wanders, and the mind thinks far away. But with firm determination, gradually the senses turn towards God — ears hear divine praise, eyes behold the Lord, and the mind rests only in Him. The devotee then wonders at this wonderful state which words cannot fully express.

4. ऋतु-महिमा

वसन्त इन्नु रन्त्यो ग्रीष्म इन्नु रन्त्यः ।
वर्षाण्यनु शरदो हेमन्तः शिशिर इन्नु रन्त्यः॥
"Verily the spring is delightful, the summer is delightful; the rains and the autumn, the winter and the cool season — all are delightful."
(सामवेद ६१६ | Samaveda 616)
भावार्थ: भारतवर्ष एक अद्भुत एवं निराला देश है । ... ये सभी ऋतुएँ सुन्दर हैं। प्रत्येक ऋतु का अपना सौन्दर्य है, अपनी विशेषता है, अपनी रमणीयता है, और अपना आनन्द है। भगवद्भक्त, ईश्वरोपासक किसी भी ऋतु की निन्दा नहीं करता। सभी ऋतुओं में ईश्वर-उपासना करनी चाहिए क्योंकि सभी ऋतुएँ रमणीय हैं।

5. उपासना का स्थान

उपह्वरे गिरीणां सङ्गमे च नदीनाम् ।
धिया विप्रो अजायत ।।
"In the recesses of the mountains and at the confluence of rivers, the wise man is born (united with God) through meditation."
(ऋग्वेद ८ । ६ । २८ | Rigveda 8.6.28)
शब्दार्थ: (गिरीणाम्) पर्वतों की (उपह्वरे) गुहाओं, कन्दराओं में (च) और (नदीनाम्) नदियों के (सङ्गमे) सङ्गम-स्थान पर (विप्रः) मेधावी जन (धिया) योगाभ्यास द्वारा (अजायत) ईश्वर से युक्त होते हैं।
भावार्थ: ध्यान कहाँ जाकर लगाना चाहिए? १. पर्वत की गुफाओं और कन्दराओं में। २. नदियों के सङ्गम-स्थल पर । ... योगपरक अर्थ: हड्डियों की गुहा (हृदय-गुहा) और नाड़ियों के संगम (आज्ञाचक्र) पर ध्यान लगाना चाहिए।
English Explanation: Where should one meditate? In mountain caves for solitude and at river confluences. Yogic meaning: In the cave of the heart (below the chest) and at the meeting point of the three main nadis (Ajna Chakra between the eyebrows). Meditation in pure, solitary places leads to union with God.

6. आत्म-राज्य

प्रेहि धृष्णुहि न ते वज्रो न यंसते।
इन्द्र नम्नं हि ते शवो हनो वृत्रं ज्या अपोऽर्चन्ननु स्वराज्यम् ॥
"Advance boldly! No one can stop your thunderbolt. O Indra (Soul), your strength is indeed subduing; destroy Vritra (ignorance), conquer evil deeds, and attain Self-Kingdom."
(सामवेद ४१३ | Samaveda 413)
भावार्थ: प्रस्तुत मन्त्र में आत्मसाक्षात्कार के लिए क्या-कुछ तैयारी करनी पड़ती है इसका दिग्दर्शन सुन्दर ढंग से कराया गया है। आत्मिक आनन्द को प्राप्त करने के लिए आगे बढ़ो, बाधाओं को मार भगाओ, अविद्या और दुष्कर्मों पर विजय प्राप्त कर आत्म-राज्य प्राप्त करो।

7. सम्मिलित प्रार्थना

सखाय प्र नि षीदत पुनानाय प्र गायत ।
शिशुं न यज्ञः परि भूषत श्रिये ॥
"O friends! Sit together and sing praises to the purifying Lord. Adorn the child with yajnas for his welfare, just as a mother adorns her baby."
(ऋग्वेद ६ । १०४ । १ | Rigveda 6.104.1)
भावार्थ: इस मन्त्र में सामूहिक प्रार्थना का विधान किया गया है। ... जैसे माताएँ बच्चे को अलंकृत करती हैं उसी प्रकार बच्चों को प्रारम्भ से ही उपासना, यज्ञ आदि के संस्कारों से संस्कृत करना चाहिए।
English Explanation: This mantra ordains collective prayer. Vedic religion is not limited to temples; it is personal, family and social. Friends and family should sit together and sing the glory of the Lord. Children should also participate from a young age so that auspicious impressions are formed early in life.

8. उपासना का फल

न घ्रस्तताप न हिमो जघान प्र नभतां पृथिवी जीरदानुः।
प्रापश्चिदस्मै घृतमित् क्षरन्ति यत्र सोमः सदमित् तत्र भद्रम् ॥
"Neither the scorching heat nor the cold harms him. The earth showers comforts upon him; the waters flow like streams of ghee for him. Where the divine Soma (love-nectar) flows, there is always welfare."
(अथर्ववेद ७ । १८ । २ | Atharvaveda 7.18.2)
शब्दार्थ: भगवद्भक्त को, उपासक को (घ्रस्तताप) ग्रीष्मकाल का प्रचण्ड सूर्य (न तताप) नहीं तपाता (हिमः) हिम, पाला, सर्दी (न जघान) उसे पीड़ित नहीं करती। (पृथिवी) यह पृथिवी (जीरदानुः) जीवन देनेवाली बनकर (प्र नभताम्) उसके ऊपर सुखों की वृष्टि करती है (प्रापः चित्) जलधाराएँ भी इसके लिए (घृतम् क्षरन्ति) घृत की धाराएँ बनकर सुख की वृष्टि करती हैं। (यत्र सोमः) जहाँ प्रभु का प्रेमरस होता है (तत्र) वहाँ (सदम् इत्) सदा ही (भद्रम्) कल्याण होता है।
भावार्थ: वेद में ईश्वर को 'वृषः' कहा गया है। वह मेघ बनकर सुखों की वृष्टि करता है। जब भक्त पर प्रभु-कृपा की वृष्टि होने लगती है तो गर्मी और सर्दी उसे नहीं सताती, पृथिवी और जलधाराएँ सुखों की वृष्टि करती हैं। जहाँ प्रभु का मधुर प्रेमरस बहता है, वहाँ सदा कल्याण ही होता है।
English Explanation: The true devotee is not troubled by extreme heat or cold. The earth rains comforts and waters flow like ghee for him. Where the divine nectar of God's love flows, there is eternal welfare and no inauspiciousness.

यह संग्रह वैदिक उपासना के सभी महत्वपूर्ण पहलुओं को पूर्ण रूप से दर्शाता है। नियमित सन्ध्या, शुद्ध तैयारी, सामूहिक प्रार्थना और एकाग्र उपासना से आत्म-साक्षात्कार और परम कल्याण प्राप्त होता है।
Vedic Upasana Khand | Sandhya Time | Preparation for Worship | Fruits of Upasana in Vedas

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