शृङ्गार शतक (97-108): वासना से मुक्ति और शिव-साक्षात्कार | व्याख्या

भर्तृहरि वैराग्य बोध, शिव भक्ति श्लोक, कामदेव पराजय, सर्वं ब्रह्ममयम् अर्थ, मुक्ति का मार्ग। H1: शृङ्गार शतक का चरम: काम से पूर्ण वैराग्य की ओर ​H2: श्लोक 97-102: स्त्री-संग का त्याग और विवेक की महिमा ​H2: श्लोक 103-105: योगाभ्यास का आनंद और इंद्रियों की शांति ​H2: श्लोक 107-108: कामदेव की हार और 'सर्वं ब्रह्ममयम्' का अनुभव ​H3: क्यों भर्तृहरि ने कहा - "अब यह जगत नारीमय नहीं, ब्रह्ममय है"?
श्लोक ९७: योषित-सर्प (स्त्री रूपी सर्प)
छंद: हरिणी
अपसर सखे दूरादस्मात्कटाक्षविषानलात्
प्रकृतिकुटिलाद्योषित्सर्पाद्विलासफणाभृतः ॥

इतरफणिना दष्टः शक्यश्चिकित्सितुमौषधे-
श्चतुरवनिताभोगिग्रस्तं त्यजन्ति हि मन्त्रिणः ॥ ९७॥
हिंदी व्याख्या:

हे मित्र! कटाक्ष (तिरछी नजर) रूपी विष की अग्नि उगलने वाले और स्वभाव से टेढ़े, इस 'स्त्री रूपी सर्प' से दूर भागो, जिसने विलास रूपी फन फैला रखा है। साधारण सांप के डंसे हुए व्यक्ति का इलाज तो जड़ी-बूटियों या दवाओं से संभव है, परंतु चतुर नारी रूपी सांप जिसे डस ले, उसे तो झाड़-फूंक करने वाले 'मांत्रिक' (विद्वान) भी छोड़ देते हैं।

English Explanation:

Friend, stay away from the 'woman-serpent' who is naturally crooked and carries the fire of poison in her glances. While a normal snake bite can be cured by medicine, even the most expert healers abandon one who is bitten by the seductive power of a clever woman.

श्लोक ९८: वृद्धावस्था और काम
छंद: पुष्पिताग्रा
इदमनुचितमक्रमश्च पुंसां
यदिह जरास्वपि मान्मथा विकाराः ।

यदपि च न कृतं नितम्बिनीनां
स्तनपतनावधि जीवितं रतं वा ॥ ९८॥
हिंदी व्याख्या:

यह पुरुषों के लिए बहुत अनुचित और मर्यादा के विरुद्ध है कि बुढ़ापे में भी उनके मन में काम-विकार (वासना) उत्पन्न होते हैं। साथ ही यह भी विडंबना है कि प्रकृति ने स्त्रियों के विलास और जीवन की अवधि को उनके शारीरिक सौंदर्य (स्तनों के ढलने) के साथ ही समाप्त क्यों नहीं कर दिया।

English Explanation:

It is inappropriate and disorderly for men to harbor lustful desires even in old age. Similarly, it is a paradox of nature that the life or sexual appeal of women is not limited by the duration of their physical prime.

श्लोक ९९: धन्य है वह मन
छंद: वसंततिलका
धन्यास्त एव तरलायतलोचनानां
तारुण्यदर्पघनपीनपयोधराणाम् ॥

क्षामोदरोपरिलसत्त्रिवलीलतानां
दृष्ट्वाऽऽकृतिं विकृतिमेति मनो न येषाम् ॥ ९९॥
हिंदी व्याख्या:

वे पुरुष वास्तव में धन्य हैं, जिनका मन चंचल और विशाल नेत्रों वाली, यौवन के गर्व से युक्त सुंदर अंगों वाली और पतली कमर वाली स्त्रियों की सुडौल आकृति को देखकर भी विचलित (विकारग्रस्त) नहीं होता। ऐसे संयमी लोग ही महान हैं।

English Explanation:

Blessed are those whose minds do not become agitated or distorted upon seeing the captivating beauty and youthful form of women with large eyes and slender waists. Only a truly self-controlled person is worthy of praise.

श्लोक १००: मन का मिलन
छंद: आर्या
विरहोऽपि सङ्गमः खलु परस्परं सङ्गतं मनो येषाम् ।
हृदयमपि विघट्टितं चेत्सङ्गो विरहं विशेषयति ॥ १००॥
हिंदी व्याख्या:

जिन दो लोगों के मन आपस में गहराई से जुड़े हुए हैं, उनके लिए शारीरिक दूरी (विरह) भी मिलन के समान ही है। इसके विपरीत, यदि हृदय एक-दूसरे से अलग हो चुके हों, तो शारीरिक रूप से साथ रहना (संग) वियोग से भी अधिक दुखद होता है।

English Explanation:

For those whose minds are united in thought, even separation is a kind of union. But if the hearts are divided, physical proximity only intensifies the pain of separation.

श्लोक १०१: पथिक की दुविधा
छंद: रथोद्धता
किं गतेन यदि सा न जीवति
प्राणिति प्रियतमा तथाऽपि किम् ॥

इत्युदीर्य नवमेघदर्शने
न प्रयाति पथिकः स्वमन्दिरम् ॥ १०१॥
हिंदी व्याख्या:

आकाश में नए बादलों को देखकर घर से दूर गया हुआ यात्री (पथिक) सोचता है—"यदि मेरे वियोग में प्रियतमा जीवित न रही तो घर जाने से क्या लाभ? और यदि वह मेरे बिना भी जीवित है, तो ऐसी निष्ठुर प्रिया के पास जाकर भी क्या करूँगा?" ऐसा सोचकर वह अपने घर की ओर प्रस्थान नहीं करता।

English Explanation:

Upon seeing the first clouds of the rainy season, a traveler hesitates: "If my beloved has died in my absence, going home is futile. If she is still alive despite my absence, then what is the point of returning to someone so indifferent?" Thus, he stays back.

श्लोक १०२: नरक में कोई शरण नहीं
छंद: हरिणी
विरमत बुधा योषित्सङ्गात् सुखात्क्षणभङ्गुरात्
कुरुत करुणामैत्रीप्रज्ञावधूजनसङ्गमम् ॥

न खलु नरके हाराक्रान्तं घनस्तनमण्डलं
शरणमथवा श्रोणीबिम्बं रणन्मणिमेखलम् ॥ १०२॥
हिंदी व्याख्या:

हे विद्वानों! स्त्रियों के क्षणभंगुर (जल्दी मिटने वाले) सुख का मोह छोड़ दो। इसके बदले करुणा, मैत्री और प्रज्ञा (बुद्धि) रूपी वधुओं का साथ अपनाओ। याद रहे, नरक की यातनाओं के समय स्त्री का सुंदर शरीर, हार या उसकी मधुर करधनी की आवाज तुम्हें बचाने के लिए शरण नहीं देगी।

English Explanation:

Wise men, stop pursuing the fleeting pleasures of women. Instead, seek the company of Compassion, Friendship, and Wisdom. In the afterlife or in times of suffering, no physical beauty or worldly attraction will provide you refuge.

श्लोक १०३: योग का आनंद
छंद: शिखरिणी
यदा योगाभ्यासव्यसनवशयोरात्ममनसो-
अविच्छिन्ना मैत्री स्फुरति यमिनस्तस्य किमु तैः ॥

प्रियाणामालापैरधरमधुभिर्वक्त्रविधुभिः
सनिःश्वासामोदैः सकुचकलशाश्लेषसुरतैः ? ॥ १०३॥
हिंदी व्याख्या:

जब योगाभ्यास के माध्यम से आत्मा और मन की अटूट मैत्री हो जाती है और योगी को आंतरिक आनंद मिलने लगता है, तब उसे स्त्रियों के वार्तालाप, उनके अधरों के रस, चंद्रमा जैसे मुख और आलिंगन के सुख की कोई आवश्यकता नहीं रह जाती। वह इन सबसे ऊपर उठ जाता है।

English Explanation:

When a yogi attains an inseparable bond between his soul and mind through yoga, what use does he have for the sweet talk of women, their beauty, or their physical embrace? Spiritual bliss far exceeds worldly pleasures.

श्लोक १०४: राग और विराग
छंद: शिखरिणी
सुधाशुभ्रं धाम स्फुरदमलरश्मिः शशधरः
प्रियावक्त्राम्भोजं मलयजरसश्चातिसुरभिः ॥

स्रजो हृद्यामोदास्तदिदमखिलं रागिणि जने
करोत्यन्तःक्षोभं न तु विषयसंसर्गविमुखे ॥ १०४॥
हिंदी व्याख्या:

अमृत जैसा सफेद महल, निर्मल चांदनी, प्रियतमा का कमल जैसा मुख, चंदन का सुगंधित लेप और फूलों की मालाएँ—ये सब केवल उसी व्यक्ति के मन में हलचल (क्षोभ) पैदा करते हैं जो विषयों में आसक्त है। जो व्यक्ति विषयों से विमुख हो चुका है (वैरागी है), उस पर इनका कोई प्रभाव नहीं पड़ता।

English Explanation:

White palaces, moonlight, a beloved's face, and fragrant flowers—all these disturb only the mind of a person filled with desire. For one who is detached from worldly objects, these things have no power to cause agitation.

श्लोक १०५: व्यर्थ का श्रम
छंद: मंदाक्रान्ता
बाले लीलामुकुलितममी सुंदरा दृष्टिपाताः
किं क्षिप्यन्ते विरम विरम व्यर्थ एष श्रमस्ते ॥

सम्प्रत्यन्त्ये वयसि विरतं बाल्यमास्था वनान्ते
क्षीणो मोहस्तृणमिव जगज्जालमालोकयामः ॥ १०५॥
हिंदी व्याख्या:

हे सुंदरी! तुम मुझ पर ये कटाक्ष और विलासपूर्ण दृष्टियां क्यों डाल रही हो? रुक जाओ, तुम्हारा यह श्रम व्यर्थ है। अब मेरी वह आयु बीत गई है। अब मेरा मोह क्षीण हो चुका है और मैं अब वन में रहने की इच्छा रखता हूँ। मेरे लिए अब यह पूरा संसार एक तिनके के समान तुच्छ है।

English Explanation:

O young woman, why do you cast these flirtatious glances at me? Stop, for your effort is in vain. My days of worldly infatuation are over; my attachment has vanished. I now look upon the entire world as a mere blade of grass as I prepare for a life of solitude.

श्लोक १०६: शांत हुई ज्वाला
छंद: शिखरिणी
इयं बाला मां प्रत्यनवरतमिन्दीवरदल-
प्रभाचोरं चक्षुः क्षिपति किमभिप्रेतमनया ? ॥

गतो मोहोऽस्माकं स्मरशबरबाणव्यतिकर-
ज्वलज्ज्वालाः शांतास्तदपि न वराकी विरमति ॥ १०६॥
हिंदी व्याख्या:

यह युवती मुझ पर बार-बार नील कमल जैसी अपनी सुंदर आँखें क्यों डाल रही है? इसका क्या इरादा है? मेरा मोह अब जा चुका है और कामदेव के बाणों से उत्पन्न होने वाली वह अग्नि अब शांत हो चुकी है। फिर भी यह बेचारी (नारी) अपनी कोशिशें नहीं छोड़ रही है।

English Explanation:

Why does this woman keep casting her lotus-like glances at me? What is her goal? My delusion is gone, and the fire ignited by Cupid's arrows has long been extinguished. Yet, poor she does not cease her efforts.

श्लोक १०७: शिव के चरणों में ध्यान
छंद: शार्दूलविक्रीडित
किं कन्दर्प ! शरं कदर्थयसि रे कोदण्डझङ्कारितै ?
रे रे कोकिल कोमलं कलरवं किं वा वृथा जल्पसि ॥

मुग्धे ! स्निग्धविदग्धमुग्धमधुरैर्लोलैः कटाक्षैरलं
चेतः सम्प्रति चंद्रचूडचरणध्यानामृते वर्तते ॥१०७॥
हिंदी व्याख्या:

हे कामदेव! तुम अपने धनुष की टंकार और बाणों से मुझे क्यों परेशान कर रहे हो? हे कोयल! तू क्यों व्यर्थ में मीठी तान छेड़ रही है? और हे सुंदरी! तू अपनी तिरछी नजरों का वार मुझ पर मत कर। अब मेरा चित्त भगवान शिव (चंद्रचूड) के चरणों के ध्यान रूपी अमृत में लीन हो चुका है।

English Explanation:

O Cupid, why do you trouble me with your arrows? O Cuckoo, why do you sing in vain? And O beautiful woman, enough with your glances! My mind is now immersed in the nectar of meditating upon the feet of Lord Shiva.

श्लोक १०८: सर्वं ब्रह्ममयम्
छंद: शिखरिणी
यदाऽऽसीदज्ञानं स्मरतिमिरसञ्चारजनितं
तदा सर्वं नारीमयमिदमशेषं जगदभूत् ।

इदानीमस्माकं पटुतरविवेकाञ्जनदृशां
समीभूता दृष्टिस्त्रिभुवनमपि ब्रह्म मनुते ॥ १०८॥
हिंदी व्याख्या:

जब तक मुझमें अज्ञान था और कामदेव का अंधेरा छाया हुआ था, तब तक मुझे यह सारा संसार 'नारीमय' (स्त्रियों से भरा) दिखाई देता था। किंतु अब, जब मैंने विवेक रूपी काजल अपनी आँखों में लगा लिया है, मेरी दृष्टि सम हो गई है और अब मुझे तीनों लोकों में केवल 'ब्रह्म' ही दिखाई देता है।

English Explanation:

When I was ignorant and blinded by lust, the whole world appeared to me as centered around women. But now, with the ointment of wisdom in my eyes, my vision has cleared, and I see nothing but the Divine Essence (Brahman) in all three worlds.

॥ भर्तृहरिकृत शतकत्रयी (शृङ्गारशतकम्) समाप्त ॥
​"जब प्यास बुझ जाती है, तो पानी की तलाश खत्म हो जाती है। शृङ्गार शतक के इन अंतिम श्लोकों में भर्तृहरि ने दिखाया है कि कैसे ज्ञान का एक कतरा पूरी दुनिया को देखने का नजरिया बदल देता है। जहाँ पहले सिर्फ 'नारी' दिखती थी, वहां अब केवल 'ईश्वर' (ब्रह्म) दिखता है। पढ़िए इस महान ग्रंथ का प्रेरणादायक समापन।"

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