हारीत का दिव्य स्वरूप और जाबालि आश्रम का आध्यात्मिक तेज | कादम्बरी पृष्ठ 36

Sage Harita's divine appearance in Kadambari Page 36


कादम्बरी पृष्ठ 36, हारीत का वर्णन (Description of Harita), जाबालि पुत्र, बाणभट्ट की गद्य कला, Sanskrit to Hindi Interpretation.
दिवसस्य चेयमपिकष्टा दशा वर्तते। तथा हि। रविरम्बरतलमध्यवर्ती स्फुरन्तमातपमनवरतमनलधूलिनिकरमिव विकिरति करैः। अधिकामुपजनयति तृषामातपस्पर्शसंतप्तपांसुपटला दुःसहा भूमिः। अतिप्रबलपिपासावसन्नानि गन्तुमल्पमपि मे नालमङ्गकानि। अपि नाम खलो विधिरनिच्छतोऽपि मे मरणमद्योपपादयेत्। इत्येवं चिन्तयत्येव मयि तस्मात्सरसो नातिदूरवर्तिनि तपोवने जाबालिर्नाम महातपा मुनिः प्रतिवसति स्म। तत्तनयश्च हारीतनामा तापसकुमारकः सनत्कुमार इव सर्वविद्यावदातचेताः सवयोभिरपरैस्तपोधनकुमारकैरनुगम्यमानस्ततैव पथा द्वितीय इव भगवान्विभावसु रतितेजस्वितया दुनिरीक्ष्यमूर्तिरुदयतो दिवसकरमण्डलादिवोत्कीर्णस्तडिद्भिरिव रचितावयवस्तप्तकनकद्रवेणेव बहिरुपसिक्तमूर्तिरापिशङ्गावदातया देहप्रभया सुरत्न्य सर्वाशातपमिव दिवसं सदावानलभिव वनमुपजनयन्... जटानां निकरेणोपेतः... स्फाटिकेनाक्षवलयेन दक्षिणश्रवणावलम्बिना विराजमानः... स्फटिकमणिकमण्डलुनाध्यासितवामकरतलः स्कन्धदेशावलम्बिना कृष्णाजिनेन नीललोहितभासा तपसतृष्णानिपीतेनान्तर्निष्पतता धूमपटलेनेव।
व्याख्या:
दोपहर की प्रचंड गर्मी में जब वैशम्पायन के प्राण कंठगत हो रहे थे, तब उसे महर्षि जाबालि के पुत्र हारीत के दर्शन हुए। बाणभट्ट ने हारीत के रूप में साक्षात् 'ब्रह्मतेज' का मूर्त रूप चित्रित किया है।

"तप्तकनकद्रवेणेव बहिरुपसिक्तमूर्तिः"
अर्थात्: उनकी देह ऐसी प्रतीत होती थी मानो पिघले हुए स्वर्ण (Molten Gold) से सींची गई हो।
हारीत का वर्णन करते हुए कवि ने उन्हें सनत्कुमार के समान ज्ञानी और अग्निदेव (विभावसु) के समान देदीप्यमान बताया है। उनके कंधे पर लटकता 'कृष्णाजिन' (काले मृग की खाल) ऐसा लग रहा था मानो तपस्या की अग्नि से निकला हुआ धुआं हो। यहाँ 'उत्प्रेक्षा' और 'उपमा' अलंकारों का उत्कृष्ट संगम है।
Metaphysical Interpretation:
"As the sun reached its zenith, scattering rays like fiery dust, I felt my life force fading. At that very moment, Harita, the son of Sage Jabali, appeared like a divine apparition. His intellect was as pure as that of Sanatkumara."

"A form difficult to behold, like a second Sun descending to Earth."
"He seemed fashioned out of lightning and molten gold. His physical radiance was so profound that it seemed to burn away the midday heat. Adorned with a crystal rosary on his ear and carrying a crystal pitcher (Kamandalu), he embodied the supreme tranquility of the forest. The black deerskin upon his shoulder appeared like a column of smoke emerging from the internal fire of his great penance."
पिछला भाग कादंबरी कथा next part of the story of Kadambari

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