kadambari-harita-varnanam-shastriya-vyakarana-page-37

Sage Harita holding a leaf-bowl of flowers followed by a deer Kadambari


कादम्बरी पृष्ठ ३७, हारीत वर्णनम्, बाणभट्ट उपमा, Sanskrit Vyakarana Vyakhya, Kadambari Sanskrit Commentary.
परीतमूर्तिरभिनवसितसूत्रनिर्मितेनेव परिधुसतया परवल्लोकेनेव निमीलितविरल्पाश्वकपञ्जरमिव गणयता वामांसावलम्बिना यज्ञोपवीतेनोद्भासमानो देवतार्चनार्थगृहीतवनलताकुसुमपरपूर्णपर्णपुटेन परिकररेणाषाढदण्डेन व्याप्तसव्येतरपाणिर्विषाणशिखरोत्खातामुद्वहता ज्ञानमृदमुपजातपरिचयेन नीवारमुष्टिसंवाधितेन कुरबककुसुमकलतयास्यमानलोलदृष्टिना तपोवनमृगेणानुयातो विटप इव कोमलवल्कलाधृतक्रीरो गिरिरिव समेखलो राहुरिवासकृदास्वादितसोमः पद्मंनिकर इव दिवसकरमरीचिपो नदीतटतरुरिव सततजलक्षालननिर्मलजटः करिकलभ इव विकचकुमुददलधवलितदशनो द्रौणिरिव कृपानुगतो नक्षत्रराशिरिव चित्रमृगकृत्तिकाश्लेषोपशोभितो धर्मकालदिवस इव क्षपितबहुदोषो जलधरसमय इव प्रशमितरजःप्रसरो वरुण इव कृतोदवासो हरिरिवायनीतृनरकमयः प्रदोषारम्भ इव संध्यापिङ्गलतारकः प्रभातकाल इव बालआतपकपिलः रविरथ इव दृढनियमितअक्षचक्रः सुराजेव विगूढमन्त्रसाधनक्षपितविग्रहः जडनिधिरिव कण्ठघमण्डलावर्तगतो भगीरथ इवासकृद्दृष्टगङ्गावतारो मधुकर इवासकृदनुभूतपुष्करवनवासो वनचरोऽपि कृतमहापथप्रवेशोऽसंयतोऽपि मोक्षार्थी सामप्रयोगपरोऽपि सततावलम्बिदण्डः सुप्तोऽपि प्रबुद्धः संनिहितनेत्रद्वयोऽपि परित्यक्तवामलोचनस्तदेव कमलसरः सिज्ञासुरुपागमत्‌ । प्रायेणाकारणमित्राण्यतिकरुणाद्राणि च सदा खलु भवन्ति सतां चेतांसि । यतः स मां तदवस्थमालोक्य समुपजातदयः समीपवर्तिनमृषिकुमारकमन्यतममब्रवीत्‌ । अयं कथमपि शक्तिहीनोऽजातपक्षपुट एव तरुशिखरादस्मात्परिच्युतः । श्येनमुखपरिभ्रष्टेन वानेन...
पद-विवरणम् एवं व्याकरण-विशेषः: १. परीतमूर्ति: - परितः इता (व्याप्ता) मूर्तिः यस्य सः (बहुव्रीहि समासः) । हारीतस्य तेजसा व्याप्तं शरीरम् । २. आषाढदण्डेन: - पलाशदण्डेन (ब्रह्मचारिणां चिह्नम्) । आषाढमासे छिद्ररहितो दण्डः 'आषाढ' इत्युच्यते । ३. सव्येतरपाणि: - सव्यात् (वामभागात्) इतरः (भिन्नः) अर्थात् दक्षिणहस्तः । तेन व्याप्तः । ४. द्रौणिरिव कृपानुगतो: - (श्लेषालंकारः) अश्वत्थामा यथा कृपेन (आचार्येण) अनुगतः, तथा हारीतः कृपय (करुणया) अनुगतः । ५. क्षपितबहुदोषो: - धर्मकालदिवसः यथा बहुन् दोषान् (रात्रीः) क्षपयति, तथा हारीतः बहुन् दोषान् (कामक्रोधादीन्) नाशितवान् । ६. संध्यापिङ्गलतारकः: - प्रदोषकाल इव, हारीतस्य नेत्रतारकाः (Pupils) संध्याकालस्य इव पिङ्गलवर्णाः सन्ति । ७. सामप्रयोगपरोऽपि सततावलम्बिदण्डः: - (विरोधाभासः) 'साम' (शान्ति) प्रयोगे रतः अपि दण्डं (यष्टिं) धारयति । दण्डनीत्यां 'दण्डः' हिंसार्थकः, अत्र तु यष्ट्यर्थकः । ८. अकारणमित्राणि: - विना कारणं ये मित्राणि भवन्ति । "सतां चेतांसि सदा अकारणमित्राणि भवन्ति" - अत्र अर्थान्तरन्यास अलङ्कारः । शास्त्रीय-टिप्पणी: हारीतस्य वर्णने महाकविना बाणभट्टेनात्र 'विरोधाभास' तथा 'श्लेष' अलङ्काराणां प्रयोगः सुचारुतया कृतः । यथा— "असंयतोऽपि मोक्षार्थी" (बन्धनरहितोऽपि मोक्षम् इच्छति), अत्र मोक्षस्य अर्थः केवलं मुक्तिः न, अपि तु 'जटाबन्धनमोचनम्' इति श्लेषः ।
वह हारीत मुनि अपने श्वेत यज्ञोपवीत से सुशोभित थे, जो ऐसा प्रतीत होता था मानो नवीन सूत से बना हो और उनके कंधे पर लटका हुआ उनकी पसुलियों की गणना कर रहा हो। उनके दाहिने हाथ में पलाश का दण्ड (आषाढ दण्ड) था और बाएं हाथ में उन्होंने देव-पूजन के लिए वन-लताओं के फूलों से भरा हुआ पत्तों का दोना (पर्णपुट) ले रखा था।

उनके पीछे-पीछे तपोवन का एक मृग चल रहा था, जिसके साथ उनका गहरा परिचय था। वह मृग अपनी चंचल आँखों से हारीत के हाथ में स्थित फूलों को देख रहा था। हारीत का व्यक्तित्व विभिन्न उपमानों से युक्त था:
  • द्रौणि (अश्वत्थामा) के समान: जैसे अश्वत्थामा 'कृपा' (आचार्य) के साथ रहते थे, वैसे ही हारीत 'कृपा' (दया) से युक्त थे।
  • नक्षत्रराशि के समान: जैसे नक्षत्र मण्डल 'चित्र', 'मृग', 'कृत्तिका' और 'आश्लेषा' से सुशोभित होता है, वैसे ही हारीत विचित्र मृगचर्म (मृगकृत्तिका) और जटाओं के विन्यास (आश्लेष) से शोभित थे।
  • समुद्र के समान: जैसे समुद्र में जल का भँवर होता है, वैसे ही हारीत के कण्ठ में रेखाओं का चक्र था।
  • प्रभात काल के समान: जैसे सुबह की धूप कपिल (लाल-पीली) होती है, वैसे ही उनका शरीर तपस्या के तेज से कपिल वर्ण का था।
विशेष सूक्ति:
"प्रायेणाकारणमित्राण्यतिकरुणाद्राणि च सदा खलु भवन्ति सतां चेतांसि"
अर्थात्: सज्जनों के चित्त सदैव बिना किसी स्वार्थ के दूसरों के मित्र होते हैं और करुणा से आर्द्र (कोमल) रहते हैं।

इसी करुणा के वशीभूत होकर उन्होंने मुझ (वैशम्पायन) को उस दयनीय अवस्था में देखा और अपने साथ के ऋषिकुमार से कहा— "यह छोटा सा पक्षी, जिसके अभी पंख भी नहीं उगे हैं, वृक्ष के शिखर से गिर पड़ा है।"
The young sage Harita was resplendent with his sacred thread (Yajnopavita) of white silk, which rested upon his left shoulder as if counting the ribs of his ascetic frame. In his right hand, he held the staff of a celibate (Ashadha-danda), and in his left, a vessel made of leaves (Parnaputa) filled with forest blossoms gathered for the worship of the deities.

He was followed by a forest deer, a familiar companion nurtured by handfuls of wild grains (Nivara). The sage was described through masterful metaphors:
  • Like Ashwatthama (Drauni): Just as Ashwatthama was followed by Kripa (his uncle and teacher), Harita was followed by Kripa (boundless compassion).
  • Like the Celestial Firmament: Adorned with the skin of a spotted deer, much as the sky is adorned with constellations like Chitra and Mrigashira.
  • Like the Dawn: His complexion was tawny (Kapila), glowing with the radiant heat of his rigorous penance, much like the rays of the rising sun.
"The hearts of the virtuous are ever moist with compassion and act as friends to all without any hidden motive."
Driven by this innate kindness, he looked at me (Vaishampayan) in my pitiable state and addressed a fellow young ascetic: "This little bird, whose wings are yet to sprout, has somehow fallen from the treetop, or perhaps escaped the jaws of a predator."
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