कादम्बरी पृष्ठ 38, हारीत वैशम्पायन रक्षा, जाबालि आश्रम गमन, बाणभट्ट गद्य, Sanskrit Hindi English Kadambari.
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भवितव्यम् । तथा हि । अतिदवीयस्तया प्रपातस्यात्यशेषजीवितोऽयमामीलितलोचनो मुहुर्मुहुर्मुखेन पतति मुहुर्मुहुरतितप्तमुष्णं श्वसिति मुहुर्मुहुश्च चक्षुपुटं विवृणोति । न शक्रोति शिरोधरां धारयितुम् । तदेहि यावदेवायमसुभिर्न वियुज्यते तावदेव गृहाणेममवतारय सलिलसमीपम् । इत्यभिधाय तेन मां सरस्तीरमनाययत् । उपसृत्य च जलसमीपमेकदेशनिहितदण्डकमण्डलुरादाय स्वयं मां मुक्तप्रयत्नमुत्तानितमुखमङ्कस्य कतिचित्सलिलबिन्दूनपाययत । अम्भःशरोद्धृतसेकं च समुपजातनवीनप्राणमुपतटप्ररूढस्य नलिनीपलाशस्य जलशिशिरायां छायायां निधाय समुचितमकरोत्स्नानविधिम् । अभिषेकावसाने चानेकप्राणायामपूतो जपन्पवित्राण्यघमर्षणानि प्रत्यग्रमज्जन्मुखो रक्तारविन्दैर्नलिनीपत्रपुटेन भगवते सवित्रे दत्त्वार्घ्यमुदतिष्ठत । आगृहीतधौतधवलवल्कलश्च सहज्योत्स्न इव संध्यातापः करतलनिर्मृष्टविशदजटः कमण्डलुमापूर्य निजसगोत्रवारिणा प्रत्यग्रमज्जार्द्रजटेन सकलेन तेन मुनिकुमारकदम्बकेनानुगम्यमानो मां गृहीत्वा तपोवनाभिमुखं शनैरगच्छत् । अनतिदूरमिव गत्वा दिशि दिशि सदासंनिहितकुसुमफलै... दण्डकारण्यस्थलीभिरुपशोभितप्रान्तमार्गमदीक्षितसमि...
पद-विवरणम् एवं व्याकरण-विशेषः:
१. अतिदवीयस्तया: - अतिशयेन दूरम् 'दवीयस्', तस्य भावः 'दवीयस्त्वम्', तेन । प्रपातः अत्यन्तं दूरस्थः आसीत्, अतः एषा अवस्था ।
२. आमीलितलोचनो: - ईषत् मिलिते (मुद्रिते) लोचने यस्य सः । अर्ध-निमीलित-नेत्रः ।
३. शिरोधराम्: - कण्ठम् (Neck) । शिरः धरति इति शिरोधरा ।
४. अघमर्षणानि: - पापनाशकानि सूक्तानि । स्नानसमये जप्यमानानि पवित्राणि मन्त्राणि ।
५. निजसगोत्रवारिणा: - निजं (स्वकीयं) सगोत्रं (समानकुलं) वारि येन । अर्थात् गङ्गाजलमिव पवित्रं जलम्, अथवा मुनिकुलसम्बद्धं जलम् ।
६. मुनिकुमारकदम्बकेन: - मुनिकुमाराणां समूहेन (कदम्बकम् = समूहः) ।
शास्त्रीय-टिप्पणी:
अत्र 'करुण-रसस्य' परिपोषः वर्तते । वैशम्पायनस्य मरणतुल्यावस्थां दृष्ट्वा हारीतस्य मनसि दया उत्पन्ना । बाणभट्टेन 'मुहुर्मुहुः' इति वीप्सा-प्रयोगेण पक्षिणः कष्टस्य तीव्रता प्रदर्शिता । 'अघमर्षण' मन्त्राणां उल्लेखेन तपोवनस्य आचार-शुद्धिः सूचिता ।
हारीत मुनि ने वैशम्पायन की अत्यंत दयनीय अवस्था को देखकर अत्यंत करुणा भरे शब्दों में कहा— "निश्चित रूप से, वृक्ष के बहुत ऊँचे शिखर से गिरने के कारण यह पक्षी अपनी अंतिम साँसें गिन रहा है। इसकी आँखें बंद हो रही हैं, यह बार-बार मुँह से गर्म साँसें छोड़ रहा है और अपनी गर्दन को संभालने में भी समर्थ नहीं है। इससे पहले कि इसके प्राण पखेरू उड़ जाएँ, इसे जल के पास ले चलना चाहिए।"
"अम्भःशरोद्धृतसेकं च समुपजातनवीनप्राणम्"
अर्थात्: जल की शीतल बूंदों के सिंचन से उसमें नए प्राणों का संचार हुआ।
हारीत ने वैशम्पायन को अपनी गोद में लेकर सरोवर के तट पर पहुँचाया, उसे जल पिलाया और फिर नलिनी (कमलिनी) के पत्तों की ठंडी छाया में रख दिया। मुनि ने अपना नित्य स्नान कर्म पूर्ण किया, सूर्य को अर्घ्य दिया और फिर अत्यंत सावधानी से उस असहाय पक्षी को लेकर तपोवन के मार्ग पर चल पड़े। यहाँ बाणभट्ट ने एक मुनि की 'जीव-दया' का अत्यंत मार्मिक चित्रण किया है।
अर्थात्: जल की शीतल बूंदों के सिंचन से उसमें नए प्राणों का संचार हुआ।
Witnessing the bird’s state, Harita observed with profound empathy, "Indeed, having fallen from a vast height, this creature’s life is flickering like a dying lamp. His eyes remain half-closed, his breath is labored and hot, and he lacks the strength to hold up his head. Let us bring him to the water swiftly, before his life departs."
The sage tenderly carried the bird to the bank, offered him life-giving water, and placed him under the cooling shade of lotus leaves. After completing his ritual purification and offering libations to the Sun God, Harita donned his pure bark garments. With the grace of a celestial being, he began his journey back to the sacred Tapovan, cradling the tiny life in his hands as he was followed by a serene assembly of young ascetics.
The sage tenderly carried the bird to the bank, offered him life-giving water, and placed him under the cooling shade of lotus leaves. After completing his ritual purification and offering libations to the Sun God, Harita donned his pure bark garments. With the grace of a celestial being, he began his journey back to the sacred Tapovan, cradling the tiny life in his hands as he was followed by a serene assembly of young ascetics.