विवेकचूडामणि: अखण्ड परब्रह्म निरूपण
श्लोक २३६ - २४०
इदन्तया ब्रह्म सदैव रूप्यते त्वारोपितं ब्रह्मणि नाममात्रम् ॥ २३६॥
हिन्दी: भ्रमित व्यक्ति को भ्रम के कारण जो कुछ भी प्रतीत होता है, वह सब वास्तव में ब्रह्म ही है; जैसे सीप में दिखने वाली चाँदी वास्तव में सीप ही होती है। यह सारा संसार जिसे हम 'यह' कहकर पुकारते हैं, वह केवल ब्रह्म पर आरोपित एक नाम मात्र है।
English: Whatever a deluded person perceives in their delusion is nothing but Brahman. Just as the silver seen in a mother-of-pearl is only the shell, so is this world, which is superimposed on Brahman as mere names and forms.
प्रशान्तमाद्यन्तविहीनमक्रियं निरन्तरानन्दरसस्वरूपम् ॥ २३७॥
निरस्तमायाकृतसर्वभेदं नित्यं सुखं निष्कलमप्रमेयम् ।
अरूपमव्यक्तमनाख्यमव्ययं ज्योतिः स्वयं किञ्चिदिदं चकास्ति ॥ २३८॥
हिन्दी: वह परब्रह्म 'सत्' और अद्वितीय है; वह विशुद्ध विज्ञान का घन है, दोषरहित, शांत, आदि-अंत से रहित और अक्रिय है। वह माया के भेदों से परे, नित्य सुखस्वरूप, अविभाज्य और वाणी से परे है। वह एक ऐसी स्वयं-प्रकाश ज्योति है जो अव्यक्त और अविनाशी है।
English: The Supreme Brahman is the non-dual Existence, the mass of pure Knowledge, untainted, serene, without beginning or end, and actionless. It is the essence of eternal Bliss, beyond all differences made by Maya, formless, and self-luminous Light.
केवलाखण्डचिन्मात्रं परं तत्त्वं विदुर्बुधाः ॥ २३९॥
हिन्दी: विद्वान पुरुष उस परम तत्व को ज्ञाता, ज्ञेय और ज्ञान (त्रिपुटी) के भेद से रहित, अनन्त, निर्विकल्प और केवल अखण्ड चेतना मात्र जानते हैं।
English: The wise know that Supreme Reality as being devoid of the distinctions of knower, known, and knowledge—infinite, beyond doubt, and pure absolute Consciousness.
अप्रमेयमनाद्यन्तं ब्रह्म पूर्णमहं महः ॥ २४०॥
हिन्दी: जिसे न त्यागा जा सकता है (अहेय) और न ग्रहण किया जा सकता है (अनुपादेय), जो मन और वाणी का विषय नहीं है, जो प्रमाणों से परे और आदि-अंत से रहित है—वही पूर्ण ज्योति स्वरूप ब्रह्म "मैं हूँ"।
English: That which can neither be discarded nor taken up, which is beyond the reach of mind and speech, immeasurable and without beginning or end—that full, radiant Brahman am I.