विवेकचूडामणि: महावाक्य अर्थ-शोधन
श्लोक २४६ - २५०
इत्थं दृश्यं साधुयुक्त्या व्यपोह्य ज्ञेयः पश्चादेकभावस्तयोर्यः ॥ २४६॥
हिन्दी: "यह सत्य नहीं है, यह सत्य नहीं है"—इस प्रकार कल्पित होने के कारण इस दृश्य जगत को रस्सी में साँप या स्वप्न की तरह मिथ्या जानकर, युक्तिपूर्वक इसका निषेध कर देना चाहिए। तत्पश्चात (ईश्वर और जीव) के उस 'एक भाव' (अखण्ड चैतन्य) को जानना चाहिए जो अवशेष रहता है।
English: "Not this, not this"—since the world is imagined, it is not real, like a snake in a rope or like a dream. After negating the objective world through sound reasoning, one should realize the underlying identity of the two (Jiva and Ishwara).
नालं जहत्या न तथाऽजहत्या किन्तूभयार्थात्मिकयैव भाव्यम् ॥ २४७॥
स देवदत्तोऽयमितीह चैकता विरुद्धधर्मांशमपास्य कथ्यते ।
यथा तथा तत्त्वमसीतिवाक्ये विरुद्धधर्मानुभयत्र हित्वा ॥ २४८॥
हिन्दी: उनकी एकता सिद्ध करने के लिए 'जहती' (छोड़ने वाली) या 'अजहती' (न छोड़ने वाली) लक्षणा पर्याप्त नहीं है, बल्कि 'जहदजहती' (दोनों वाली/भाग-त्याग) लक्षणा का प्रयोग करना चाहिए। जैसे "वही यह देवदत्त है" इस वाक्य में 'काल' और 'स्थान' के विरुद्ध अंशों को छोड़कर केवल 'पुरुष' की एकता देखी जाती है, वैसे ही "तत्त्वमसि" में भी ईश्वर और जीव की विरुद्ध उपाधियों को त्याग देना चाहिए।
English: To establish their absolute identity, neither 'Jahati' nor 'Ajahati' Lakshana is sufficient; rather, 'Jahad-Ajahati' (part-abandoning) Lakshana must be applied. Just as in the phrase "This is that Devadatta," where identity is stated by ignoring contradictory attributes of time and place, so in "Tat-Tvam-Asi," the contradictory adjuncts of both must be discarded.
एवं महावाक्यशतेन कथ्यते ब्रह्मात्मनोरैक्यमखण्डभावः ॥ २४९॥
हिन्दी: शुद्ध 'चिन्मात्र' (चेतना मात्र) के रूप में लक्ष्य करके विद्वान पुरुष 'सत्' और 'आत्मा' के अखण्ड भाव का अनुभव करते हैं। इसी प्रकार सैकड़ों महावाक्यों के द्वारा ब्रह्म और आत्मा की एकता और अखण्डता का प्रतिपादन किया गया है।
English: By looking at both as pure Consciousness, the wise realize their indivisible nature. Thus, through hundreds of Mahavakyas, the identity and indivisibility of Brahman and Atman is declared.
अतो मृषामात्रमिदं प्रतीतं जहीहि यत्स्वात्मतया गृहीतम् ।
ब्रह्माहमित्येव विशुद्धबुद्ध्या विद्धि स्वमात्मानमखण्डबोधम् ॥ २५०॥
हिन्दी: "वह न स्थूल है, न सूक्ष्म है..." (श्रुति) के द्वारा असत्य का निषेध करने पर जो स्वतःसिद्ध, आकाश की तरह व्यापक और तर्क से परे शेष रहता है, वही तुम हो। अतः इस मृषा (झूठे) जगत को जिसे तुमने 'स्वयं' मान रखा है, त्याग दो। अपनी विशुद्ध बुद्धि से यह जानो कि "मैं ब्रह्म हूँ" और स्वयं को अखण्ड बोधस्वरूप अनुभव करो।
English: Negating the unreal by texts like "not gross, etc.", what remains is self-existent, ethereal, and beyond logic. Therefore, discard this false world which you have taken to be yourself. With a pure intellect, realize your own Self as the indivisible Knowledge: "I am Brahman."