विवेकचूडामणि: कोश विवेक एवं देह-विचार श्लोक 151 -155

Vivekachudamani: The Crest Jewel of Discrimination


विवेकचूडामणि - पञ्चकोश विवेक

विवेकचूडामणि: कोश विवेक एवं देह-विचार

पञ्चानामपि कोशानामपवादे विभात्ययं शुद्धः ।
नित्यानन्दैकरसः प्रत्यग्रूपः परः स्वयञ्ज्योतिः ॥ १५१॥
हिन्दी: पाँचों कोशों (अन्नमय, प्राणमय, मनोमय, विज्ञानमय और आनंदमय) का निषेध कर देने पर, यह शुद्ध, नित्य आनंदस्वरूप, आंतरिक, परम और स्वयं-प्रकाशित आत्मा प्रकाशित होती है।
English: When the five sheaths are negated, the Self shines—pure, of the nature of eternal bliss, the innermost, supreme, and self-luminous.
आत्मानात्मविवेकः कर्तव्यो बन्धमुक्तये विदुषा ।
तेनैवानन्दी भवति स्वं विज्ञाय सच्चिदानन्दम् ॥ १५२॥
हिन्दी: बंधन से मुक्ति के लिए बुद्धिमान पुरुष को आत्मा और अनात्मा का विवेक करना चाहिए। उसी विवेक के द्वारा अपने आप को 'सच्चिदानंद' जानकर वह आनंदित होता है।
English: To free oneself from bondage, the wise must practice discrimination between the Self and the non-Self. By that alone, knowing oneself as Existence-Knowledge-Bliss, one becomes happy.
मुञ्जादिषीकामिव दृश्यवर्गात् प्रत्यञ्चमात्मानमसङ्गमक्रियम् ।
विविच्य तत्र प्रविलाप्य सर्वं तदात्मना तिष्ठति यः स मुक्तः ॥ १५३॥
हिन्दी: जैसे मूँज घास से उसकी सींक (भीतरी कोमल हिस्सा) अलग कर ली जाती है, वैसे ही दृश्य प्रपंच से असंग और अक्रिय आंतरिक आत्मा को पृथक करके, सब कुछ उसमें विलीन कर जो आत्मरूप में स्थित रहता है, वही मुक्त है।
English: Just as one extracts the stalk from the Munja grass, one should differentiate the innermost Self—unattached and actionless—from the world of objects. He who merges everything in that and remains as the Self, is liberated.
देहोऽयमन्नभवनोऽन्नमयस्तु कोशश्चान्नेन जीवति विनश्यति तद्विहीनः ।
त्वक्चर्ममांसरुधिरास्थिपुरीषराशिर्नायं स्वयं भवितुमर्हति नित्यशुद्धः ॥ १५४॥
हिन्दी: यह शरीर अन्न से बना है और 'अन्नमय कोश' है। यह अन्न से ही जीता है और उसके बिना नष्ट हो जाता है। यह त्वचा, चर्म, मांस, रक्त, हड्डी और मल का समूह है; यह नित्य शुद्ध आत्मा स्वयं कभी नहीं हो सकता।
English: This body is a product of food and constitutes the Annamaya-kosha. It lives by food and dies without it. Being a mass of skin, flesh, blood, bones, and filth, it can never be the eternally pure Self.
पूर्वं जनेरधिमृतेरपि नायमस्ति जातक्षणः क्षणगुणोऽनियतस्वभावः ।
नैको जडश्च घटवत्परिदृश्यमानः स्वात्मा कथं भवति भावविकारवेत्ता ॥ १५५॥
हिन्दी: यह शरीर जन्म से पहले और मृत्यु के बाद नहीं रहता। यह क्षणभंगुर है, इसके गुण अनिश्चित हैं और यह स्वभाव से परिवर्तनशील है। यह जड़ है और घड़े की तरह देखा जाने वाला दृश्य है। जो विकारों को जानने वाला (आत्मा) है, वह यह शरीर कैसे हो सकता है?
English: This body does not exist prior to birth or after death. It lasts for a moment, its properties are fleeting, and its nature is changeable. It is inert and is perceived like a jar. How can it be one's own Self, the witness of all changes?

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