विवेकचूडामणि: साक्षी आत्मा का स्वरूप श्लोक २११ - २१५

Vivekachudamani: The Crest Jewel of Discrimination


विवेकचूडामणि - साक्षी निरूपण

विवेकचूडामणि: साक्षी आत्मा का स्वरूप

श्लोक २११ - २१५

योऽयमात्मा स्वयञ्ज्योतिः पञ्चकोशविलक्षणः ।
अवस्थात्रयसाक्षी सन्निर्विकारो निरञ्जनः ।
सदानन्दः स विज्ञेयः स्वात्मत्वेन विपश्चिता ॥ २११॥

हिन्दी: जो यह आत्मा स्वयं-प्रकाश (Self-luminous) है, पाँचों कोशों से भिन्न है, तीनों अवस्थाओं (जाग्रत, स्वप्न, सुषुप्ति) का साक्षी है, निर्विकार, दोषरहित और सदानन्द स्वरूप है—विद्वान पुरुष को उसे ही अपना वास्तविक स्वरूप समझना चाहिए।

English: This Self is self-luminous, distinct from the five sheaths, the witness of the three states, changeless, untainted, and everlasting bliss. The wise person should realize this as their own true Self.

शिष्य उवाच (The Disciple Asked)
मिथ्यात्वेन निषिद्धेषु कोशेष्वेतेषु पञ्चसु ।
सर्वाभावं विना किञ्चिन्न पश्याम्यत्र हे गुरो ।
विज्ञेयं किमु वस्त्वस्ति स्वात्मनाऽऽत्मविपश्चिता ॥ २१२॥

हिन्दी: हे गुरुदेव! जब इन पाँचों कोशों को मिथ्या मानकर हटा दिया जाता है, तब मुझे 'शून्य' (सबके अभाव) के सिवा और कुछ दिखाई नहीं देता। फिर वह कौन सी वस्तु शेष रहती है जिसे विद्वान पुरुष अपना स्वरूप जानकर अनुभव करते हैं?

English: O Master, after negating these five sheaths as unreal, I find nothing but a total void. What then remains to be known as the Self by the wise?

श्रीगुरुरुवाच (The Master Replied)
सत्यमुक्तं त्वया विद्वन्निपुणोऽसि विचारणे ।
अहमादिविकारास्ते तदभावोऽयमप्यनु ॥ २१३॥

हिन्दी: हे विद्वान! तुमने सत्य कहा, तुम विचार करने में निपुण हो। अहंकार आदि जो भी विकार हैं और उनका जो यह अभाव (शून्यता) तुम अनुभव कर रहे हो, इन सबको भी...

English: You have spoken the truth, O wise one! You are indeed skilled in discrimination. These modifications like the ego, and even the "void" that follows their absence...

सर्वे येनानुभूयन्ते यः स्वयं नानुभूयते ।
तमात्मानं वेदितारं विद्धि बुद्ध्या सुसूक्ष्मया ॥ २१४॥

हिन्दी: ...जिसके द्वारा यह सब (अहंकार और उसका अभाव दोनों) अनुभव किए जाते हैं, किन्तु जो स्वयं किसी और के द्वारा अनुभव नहीं किया जाता, उस 'जानने वाले' (ज्ञाता) को ही अपनी अत्यंत सूक्ष्म बुद्धि से आत्मा जानो।

English: ...That by which all these are perceived, but which itself is not perceived by anything else—know that Knower to be the Self, through an extremely subtle intellect.

तत्साक्षिकं भवेत्तत्तद्यद्यद्येनानुभूयते ।
कस्याप्यननुभूतार्थे साक्षित्वं नोपयुज्यते ॥ २१५॥

हिन्दी: जो भी वस्तु जिसके द्वारा अनुभव की जाती है, वह अनुभव करने वाला उसका 'साक्षी' कहलाता है। यदि कोई अनुभव करने वाला (साक्षी) न हो, तो किसी भी वस्तु (या अभाव) की सिद्धि नहीं हो सकती।

English: Whatever is perceived by someone, that perceiver is the witness of it. Where there is no one to perceive a thing, its very existence (or absence) cannot be established.

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