कादंबरी कथा: रानी विलासवती का गर्भधारण और राजकुमार चन्द्रापीड का जन्म (पृष्ठ ६६-७०)

कादंबरी बाणभट्ट, रानी विलासवती गर्भधारण, राजा तारापीड पुत्र प्राप्ति, चन्द्रापीड जन्म, सूतिका गृह वर्णन, वैदिक जन्मोत्सव, बाणभट्ट की संस्कृत गद्य शैली। पृष्ठ ६६-६७: रानी विलासवती के गर्भ के लक्षणों का वर्णन और राजा तारापीड का हर्ष। ​पृष्ठ ६८: प्राचीन भारतीय सूतिका-गृह (लेबर रूम) की सुरक्षात्मक और मांगलिक सजावट। ​पृष्ठ ६९: राजा और रानी के बीच मधुर परिहास और गर्भ के शारीरिक परिवर्तनों का सूक्ष्म चित्रण। ​पृष्ठ ७०: राजकुमार का भव्य जन्म और उज्जयिनी में मनाया गया ऐतिहासिक जन्मोत्सव। कादंबरी भाष्य - पृष्ठ ६६
कादंबरी: पृष्ठ ६६ - विलासवती का गर्भधारण और मंगल समाचार
ताभ्यां स्वप्रभाभ्यां विलासवतीमानन्दयांचकार। कतिपयदिवसापगमे च देवताप्रसादात्सरसीिमव प्रतिमाधशशी विवेश गर्भो विलासवतीम्। येन नन्दनवनराजिरिव पारिजातेन मधुसूदनवक्षःस्थलीव कौस्तुभमणिना सा सुतरां मराजत। दर्पणश्रीरिव गर्भच्छलेन संक्रान्तमवनपालप्रतिबिम्बमुवाह। शनैः शनैश्च प्रतिदिनमुपचीयमानगर्भा निर्भरपरीपीतसागरसलिलभरमन्थरेव मेघमाला मन्दं मन्दं संचचार। मुहुर्मुहुरनुबद्धविजृम्भिकामाजिह्रतलोचना सालसं निशश्वास। तथावत्स्थां तामहरहः स्वयमनेकरस्वाञ्छितपानभोजनां प्रावृषमिव श्यामायमानपयोधरमुखीं केतकीमिव गर्भच्छविपाण्डुरामालोक्येङ्गितकुशलः परिजनो विज्ञातवान्।

अथ तस्याः सर्वपरिजनप्रधानभूता सदा राजकुलसंवासचतुरा सदा च राजसंनिकर्षप्रगल्भा सर्वमङ्गलकुशला कुलवर्धना नाम महत्तरिका प्रशस्ते दिवसे प्रदोषवेलायामभ्यन्तरस्थानमण्डपगतं गन्धतैलावसेकज्वलितदीपिकासहस्रपरिवारमुडुिनकरमध्यवर्तिनमिव पूर्णमासीशशिनमुरगराजफणमणिसहस्रान्तरालस्थितमिव नारायणं मूर्धावसिक्तैः परिमितैः प्रधाननरेन्द्रैः परिवृतमतिदूरावस्थितपरिजनमन्तरमुत्तुङ्गवेत्रासनोपविष्टं धौतधवलाम्बरपरिधानेनानुल्बणवेषेण जलनिधिनेवागाधगाम्भीर्येण समुपारूढविश्रम्भिनिर्भरास्तास्ताः कथाः शुकनासेन सह कुर्वाणं भूमिपालमुपसृत्य रहः कर्णमूले विदितं विलासवतीगर्भवृत्तान्तमकार्षीत।
पद (Word) विग्रह / विवरण विशेष / अर्थ
प्रतिमाशशीप्रतिमा इव शशी (उपमित समास)प्रतिबिम्ब रूपी चंद्रमा
श्यामायमानपयोधरमुखीम्श्यामायमानौ पयोधरौ मुखे यस्याः सा (बहुव्रीहि)स्तनों के अग्रभाग के काले होने वाली (गर्भवती का लक्षण)
गर्भच्छविपाण्डुराम्गर्भस्य च्छव्या पाण्डुरा (तृतीया तत्पुरुष)गर्भ की कांति के कारण पीली/धवल
महत्तरिकामहत् + तरप् + इका (स्त्रीलिंग)प्रधान दासी या परिचारिका
मूर्धावसिक्तैःमूर्धनि अभिषिक्तैः (सप्तमी तत्पुरुष)राज्याभिषेक प्राप्त (प्रमुख राजाओं) के द्वारा
हिन्दी अनुवाद: देवताओं की कृपा से, कुछ दिनों के बाद, रानी विलासवती के गर्भ में उसी प्रकार बालक ने प्रवेश किया, जैसे सरोवर में चंद्रमा का प्रतिबिंब प्रवेश करता है। उस गर्भ से वह रानी वैसे ही सुशोभित होने लगी, जैसे पारिजात वृक्ष से नंदनवन और कौस्तुभ मणि से भगवान विष्णु का वक्षस्थल सुशोभित होता है। वह दर्पण की शोभा के समान गर्भ के बहाने राजा के ही प्रतिबिंब को धारण करने लगी। धीरे-धीरे प्रतिदिन बढ़ते हुए गर्भ के कारण वह समुद्र के जल को पीकर भारी हुई मेघमाला की तरह मंद-मंद चलने लगी। वह बार-बार जम्हाई लेती, आँखें मूँदती और आलस्य के साथ लंबी साँसें लेती थी। स्तनों के मुख के काले पड़ने और केतकी के समान शरीर के पाण्डु (पीला/धवल) होने जैसे लक्षणों को देखकर चतुर परिचारिकाओं ने जान लिया कि रानी गर्भवती हैं।

इसके बाद, राजकुल में रहने वाली और सभी कार्यों में निपुण 'कुलवर्धना' नाम की प्रधान परिचारिका ने एक शुभ दिन संध्या के समय राजा के पास जाकर यह समाचार दिया। उस समय राजा तारापीड हजारों दीपकों से प्रकाशित मण्डप में प्रमुख राजाओं से घिरे हुए थे और मन्त्री शुकनास के साथ गहन चर्चा कर रहे थे। कुलवर्धना ने राजा के पास पहुँचकर उनके कान में धीरे से रानी विलासवती के गर्भवती होने का शुभ समाचार कह दिया।
Full English Translation: By the grace of the deities, after a few days, a child entered the womb of Queen Vilasavati, just as the reflection of the moon enters a lake. Because of that pregnancy, she shone brilliantly, like the Nandana forest with the Parijata tree or the chest of Lord Vishnu with the Kaustubha gem. Like the beauty of a mirror, she seemed to carry the reflection of the King himself in the guise of the fetus. Gradually, as the pregnancy progressed day by day, she moved slowly like a line of clouds heavy with the waters of the ocean. She frequently yawned, closed her eyes, and breathed deeply with languor. Seeing symptoms such as the darkening of the tips of her breasts and her complexion turning pale like a Ketaki flower, the clever attendants understood that she was pregnant.

Then, on an auspicious day at twilight, a head-attendant named 'Kulavardhana'—who was skilled in royal etiquette and all auspicious matters—approached the King. At that time, King Tarapida was seated in a pavilion lit by thousands of lamps, surrounded by prominent vassal kings, and engaged in deep conversation with Minister Shukanasa. Approaching the King privately, Kulavardhana whispered the joyful news of Queen Vilasavati's pregnancy into his ear.
कादंबरी भाष्य - पृष्ठ ६७
कादंबरी: पृष्ठ ६७ - राजा तारापीड का हर्ष और संशय
हर्षमिव दशनांशुवितानच्छलेन विकिरतो राज्ञः शुकनासमुखे लोलतारकमानन्दजलबिन्दुक्लिन्नपक्ष्ममालं तत्क्षणं पपात चक्षुः। अनालोकितपूर्वं तु हर्षप्रकर्षमभिसमीक्ष्य भूपतेः कुलवर्धनां च स्मितविकसितमुखीमागतां दृष्ट्वा तस्य चार्थस्य सततं मनसि विपरिवर्तमानत्वादविदितवृत्तान्तोऽपि तत्कालमुचितमपरमतिमहतो हर्षस्य कारणमपश्यञ्छुकनासः स्वयमुत्प्रेक्ष्य समुत्सर्पितासनः समीपतरमुपसृत्य नातिप्रकाशमाबभाषे।

देव किमस्ति किंचित्तस्मिन्स्वप्नदर्शने सत्यम्? अत्यन्तमुत्फुल्ल्लोचना हि कुलवर्धना दृश्यते। देवस्यापीदं प्रियवचनश्रवणकुतूहलादिव श्रवणमूलमुपसर्पदुपरचयदिव नीलकुवलयकर्णपूरशोभामानन्दजलप्लुतं तरलतारकं विकसदावेदयति महतप्रहर्षकारणमीक्षणयुगलम्। उपारूढमहोत्सवश्रवणकुतूहलमुत्सुकोत्सुकं क्लाम्यति मे मनः। तदावेदयतु देवः किमिवम्। इत्युक्तवति तस्मिन् राजा विहस्याब्रवीत्। यदि सत्यमनया यथा कथितं तथा सर्वमवितथं स्वप्नदर्शनम्। अहं तु न श्रद्दधे। कुतोऽस्माकमीयती भाग्यसंपत्। अभाजनं हि वयमीदृशां प्रियवचनश्रवणानाम्। अवितथवादिनीमप्यहं कुलवर्धनामेवंविधानां कल्याणानामसंभावितमात्मानं मन्यमानो विपरीतामिवाद्य पश्यामि। तदुत्तिष्ठ स्वयमेव गत्वा किमत्र सत्यमिति देवीं पृष्ट्वा ज्ञास्यामि। इत्यभिधाय विसृज्य सकलनरेन्द्रलोकमुन्मुच्य स्वाङ्गेभ्यो भूषणानि कुलवर्धनायै दत्त्वा तथा च दत्तप्रसादानन्तरमवनितलाश्लिष्टललाटलेखया शिरःप्रणामेनाभ्यर्चितः सह शुकनासेनोत्थाय हर्षविशेषनिर्भरं त्वर्यमाणो मनसा पवनचलितानीलकुवलयदललीलाविडम्बकेन दक्षिणेनाक्ष्णा परिस्फुरताभिनन्द्यमानस्तत्कालसेवासमुचितेन विरलविरलेन परिजनेनानुगम्यमानः पुरः -
पद (Word) विग्रह / विवरण विशेष / अर्थ
दशनांशुवितानच्छलेनदशनानां अंशवः (षष्ठी तत्पुरुष), तेषां वितानस्य छलेनदाँतों की किरणों के समूह के बहाने (मुस्कुराहट)
आनन्दजलबिन्दुक्लिन्नपक्ष्ममालम्आनन्दजलस्य बिन्दवः (षष्ठी), तैः क्लिन्ना पक्ष्मणां माला यस्य तत् (बहुव्रीहि)आनन्द के आँसुओं से भीगी हुई पलकों वाला (नेत्र)
अविदितवृत्तान्तोऽपिन विदितः वृत्तान्तः येन सः (नञ् बहुव्रीहि)वृत्तान्त (समाचार) न जानते हुए भी
नीलकुवलयकर्णपूरशोभाम्नीलकुवलयमेव कर्णपूरः (रूपक), तस्य शोभा (षष्ठी)नीले कमल के कर्ण-आभूषण जैसी शोभा
अभाजनम्न भाजनम् (नञ् तत्पुरुष)अपात्र या अयोग्य
अवनितलाश्लिष्टललाटलेखयाअवनितले आश्लिष्टा ललाटलेखा यया सा (बहुव्रीहि)जमीन से लगे हुए ललाट (मस्तक) वाली (प्रणाम)
हिन्दी अनुवाद: अपनी मुस्कुराहट (दाँतों की चमक) के बहाने मानो प्रसन्नता को बिखेरते हुए राजा की दृष्टि उसी क्षण शुकनास के मुख पर पड़ी; राजा की आँखों की पुतलियाँ चंचल थीं और पलकें आनंद के आँसुओं से भीगी हुई थीं। राजा के चेहरे पर पहले कभी न देखी गई ऐसी अपार प्रसन्नता को देखकर और खिली हुई मुस्कान के साथ आई कुलवर्धना को देखकर, शुकनास ने (यद्यपि वे समाचार नहीं जानते थे) स्वयं ही अनुमान लगा लिया। उन्होंने अपना आसन राजा के पास खिसकाया और धीमे स्वर में कहा—

"हे देव! क्या उस स्वप्न की कोई बात सत्य हुई है? क्योंकि कुलवर्धना की आँखें अत्यंत हर्ष से खिली हुई दिखाई दे रही हैं। आपके ये नेत्र भी, मानो किसी प्रिय समाचार को सुनने के कौतूहल से कानों के पास पहुँचकर नीले कमल के आभूषण की शोभा बढ़ा रहे हैं। आनंद के आँसुओं से युक्त आपकी ये चंचल पुतलियाँ किसी बड़ी खुशी का संकेत दे रही हैं। उत्सव का समाचार सुनने के लिए मेरा मन व्याकुल हो रहा है, कृपया बताइए क्या बात है?"

शुकनास के ऐसा कहने पर राजा ने हंसकर कहा— "यदि इस कुलवर्धना ने जो कहा है वह सत्य है, तो समझो कि स्वप्न की बात भी पूरी तरह सच है। परंतु मुझे विश्वास नहीं हो रहा है; हमारे पास इतनी बड़ी सौभाग्य-संपत्ति कहाँ से आएगी? हम ऐसे प्रिय वचनों को सुनने के पात्र नहीं हैं। यद्यपि कुलवर्धना कभी झूठ नहीं बोलती, फिर भी अपने आप को इस कल्याणकारी समाचार के अयोग्य मानने के कारण, मुझे यह सब विपरीत सा लग रहा है। अतः उठो, स्वयं चलकर देवी (विलासवती) से पूछेंगे कि सत्य क्या है।" ऐसा कहकर राजा ने अन्य सामंतों को विदा किया, अपने अंगों से आभूषण उतारकर कुलवर्धना को पुरस्कार स्वरूप दिए और शुकनास के साथ उठ खड़े हुए। कुलवर्धना ने भूमि पर मस्तक झुकाकर उन्हें प्रणाम किया। राजा का मन हर्ष से भरा था और उनकी दाहिनी आँख नीले कमल के पत्ते के समान फड़क रही थी, जो शुभ संकेत दे रही थी।
Full English Translation: As if scattering joy through the brilliance of his teeth (a smile), the King's eyes immediately fell upon Shukanasa's face; his pupils were restless and his eyelashes were wet with drops of tears of joy. Seeing such an unprecedented peak of joy on the King's face and observing Kulavardhana approaching with a blossoming smile, Shukanasa guessed the matter even though he had not been formally told. Moving his seat closer to the King, he spoke in a low voice:

"My Lord, has something from that dream come true? Kulavardhana's eyes appear extremely bright with joy. Your own eyes, as if eager to reach your ears to hear some pleasant news, are creating the beauty of a blue lotus ornament near your ears. Filled with tears of joy and with restless pupils, they herald the cause of some great happiness. My mind is languishing with curiosity to hear of this great celebration. Please tell me, what is it?"

When Shukanasa said this, the King laughed and replied— "If what Kulavardhana has said is true, then consider the entire dream-vision as reality. But I do not believe it; how can such immense good fortune belong to us? We are not worthy of hearing such delightful words. Even though Kulavardhana speaks no lies, I consider myself so unworthy of such auspicious news that I see it as something contrary to reality today. Therefore, let us rise and go ourselves to ask the Queen what the truth is." Saying this, he dismissed the assembly of vassal kings, took off his own ornaments and gave them to Kulavardhana as a reward. She bowed her head to the floor in reverence. With a heart full of joy, the King rose with Shukanasa, his right eye throbbing like the petal of a blue lotus—an auspicious sign.
कादंबरी भाष्य - पृष्ठ ६८
कादंबरी: पृष्ठ ६८ - अंतःपुर प्रवेश और गर्भिणी विलासवती का वर्णन
संसर्पिणीनामनीललोलस्थूलशिखानां प्रदीपिकानामालोकेन समुत्सार्यमाणकक्षान्तरतिमिरसंहतिरन्तःपुरमयासीत्। तत्र च सुकृतरक्षासंविधाने नवसुधानुलेपनधवलिते प्रज्वलितमङ्गलप्रदीपे पूर्णकलशाधिष्ठितद्वारपक्षके प्रत्यग्रलिखितमङ्गल्यालेख्योज्ज्वलितभित्तिभागमनोहारिण्यूपरचितसितविताने वितानपर्यन्तावबद्धमुक्तागुणे मणिप्रदीपप्रहततिमिरे वासभवने भूतिलिखितपञ्चलताकृतरक्षापरिक्षेपं शिरोभागविन्यस्तधवलनिद्रामङ्गलकलशामाबद्धविविधौषधिमूलयन्त्रपवित्रमवस्थापितरक्षाशक्तिवलयमितस्ततोविप्रकीर्णगौरसर्षपमवलम्बितबालोक्षप्रग्रथितलोलपिप्पलपत्रमासक्तहरितारिष्टपल्लवमुत्तुङ्गपादपीठप्रतिष्ठितमिन्दुदीधितिधवलप्रच्छदपडमचलराजशिलातलविशालं गर्भोचितं शयनतलमधिशयानां कनकपात्रपरिगृहीतैरविच्छिन्नविरलावस्थितदधिलवैर्र्जलतरंगतरलसितशालिसिक्थनिकरैरग्रथितकुसुमाञ्जलिसनाथैः पूर्णभाजनैरखण्डिताननमत्स्यपटलैश्च प्रत्यग्रपिशितपिण्डमिश्रैरविच्छिन्नसलिलधारानुगम्यमानमागैः पटलकप्रज्वलितैश्च शीतलप्रदीपैर्गोरोचनामिश्रैर्गौरसर्षपैश्च सलिलाञ्जलिभिश्चाचारकुशलेनान्तःपुरजरतीजनेन क्रियमाणावतरणकमङ्गलां धवलाम्बरविविक्तवेषेण प्रमुदितेन प्रस्तुतप्रमङ्गल्यालापेन परिजनेनोपास्यमानामुपारूढगर्भवतयान्तर्गतकुलशैलामिव क्षितिं सलिलनिमग्मैरावतामिव मन्दाकिनीं गुहागतसिंहामिव गिरिराजमेखलां जलधरपटलान्तरितदिनकरामिव दिवसश्रियमुदयगिरितिरोहितशशिमण्डलामिव विभावरीमभ्युन्नतब्रह्मकमलविनिर्गमामिव नारायणनाभिमासभागस्त्योदयामिव दक्षिणाशां फेनावृतामृतकलशामिव क्षीरोदवेलां गोरोचनाचित्रितदशमनुपहतमतिधवलं दुकूलयुगलं वसानां...
पद (Word) विग्रह / विवरण विशेष / अर्थ
नवसुधानुलेपनधवलितेनवायाः सुधायाः अनुलेपनेन धवलितम् (तृतीया तत्पुरुष)नयी सफेदी (चूने) से पुता हुआ सफेद भवन
मुक्तागुणेमुक्तानां गुणाः (हार) यस्मिन् तत्मोतियों की लड़ियों से युक्त वितान
गौरसर्षपम्गौराः च ते सर्षपाः च (कर्मधारय)पीली सरसों (सुरक्षा हेतु बिखेरी गई)
शयनतलमधिशयानाम्शयनतलं अधिशेते इति (द्वितीया विभक्ति, 'अधि' उपसर्ग के कारण)पलंग पर सोई हुई (रानी)
अन्तर्गतकुलशैलाम्अन्तर्गताः कुलशैलाः यस्यां सा (बहुव्रीहि)जिसके भीतर कुलपर्वत (गर्भस्थ शिशु) हों ऐसी पृथ्वी के समान
दुकूलयुगलम्दुकूलयोः युगलम् (षष्ठी तत्पुरुष)रेशमी वस्त्रों का जोड़ा
हिन्दी अनुवाद: राजा तारापीड हवा में हिलती हुई दीपकों की बड़ी-बड़ी शिखाओं के प्रकाश से कमरों के अंधेरे को दूर करते हुए अंतःपुर (रानी के महल) में पहुँचे। वह वासभवन (शयनकक्ष) रक्षा के उपायों से सुरक्षित था, ताजी सफेदी से धवल था, और वहां मंगल-दीपक जल रहे थे। द्वार के दोनों ओर जल से भरे कलश रखे थे और दीवारों पर ताजे मांगलिक चित्र बने थे। छत पर सफेद चांदनी (वितान) तनी थी, जिसके किनारों पर मोतियों की लड़ियां लटक रही थीं और मणियों के दीपकों ने अंधेरे को नष्ट कर दिया था।

रानी के बिस्तर के चारों ओर रक्षा के लिए राख (भूति) से पांच लताओं के चित्र बने थे और सिरहाने की ओर 'निद्रा-मंगल' के सफेद कलश रखे थे। वहां अनेक औषधियों की जड़ें और रक्षा-यंत्र बंधे थे, चारों ओर पीली सरसों बिखेरी गई थी और नीम के ताजे पत्तों के साथ पीपल के पत्ते लटकाए गए थे। ऊंचे पाए वाले उस विशाल पलंग पर, जो चंद्रमा की किरणों के समान सफेद चादर से ढका था, रानी विलासवती लेटी हुई थीं। अंतःपुर की वृद्ध महिलाएं दही, अक्षत (चावल), फूलों की अंजलि और ताजे मांस के टुकड़ों के साथ उनका 'नजर उतारने' (अवतंरणक मंगल) जैसा अनुष्ठान कर रही थीं।

उस समय रानी विलासवती गर्भ के कारण ऐसी सुशोभित हो रही थीं, मानो वह पृथ्वी हो जिसके भीतर कुलपर्वत छिपे हों, या मन्दाकिनी नदी हो जिसमें ऐरावत हाथी डूबा हो, या वह गुफा हो जिसमें सिंह बैठा हो। वह बादलों से ढकी सूर्य की आभा के समान और उदयगिरि पर्वत के पीछे छिपे चंद्रमा वाली रात्रि के समान लग रही थीं। उन्होंने गोरोचन (मांगलिक पीला पदार्थ) से किनारों पर चित्रित, अत्यंत सफेद और स्वच्छ दो रेशमी वस्त्र धारण किए हुए थे।
Full English Translation: King Tarapida entered the inner apartments, dispelling the darkness of the chambers with the light of large torches whose blue flames flickered in the wind. The bedchamber was well-guarded with protective rituals, white with fresh lime-wash, and lit with auspicious lamps. Full water-pots were placed on either side of the door, and the walls were adorned with fresh auspicious paintings. A white canopy with pearl strings hanging from its edges covered the ceiling, and the darkness was entirely banished by jewel-lamps.

Protective lines of five creepers were drawn with sacred ash around the bed, and white 'Nidra-Mangala' (auspicious sleep) pots were placed near the head. Various medicinal roots, talismans, and protective bands were installed, yellow mustard seeds were scattered everywhere, and fresh neem and pipal leaves were hung. Queen Vilasavati was lying on a large, high-seated bed covered with a cloth as white as moonlight. The elderly women of the palace were performing protective 'Arati' rituals (Avataranaka Mangala) using curd, rice, flower offerings, and fresh meat pieces.

In her pregnant state, the Queen appeared like the Earth containing the great ancestral mountains within, or like the river Mandakini in which the elephant Airavata is submerged, or like a mountain cave housing a lion. She resembled the beauty of a day hidden by clouds or a night whose moon is behind the Sunrise Mountain. She was wearing a pair of extremely white, fresh silk garments whose borders were decorated with yellow Gorochan.
कादंबरी भाष्य - पृष्ठ ६९
कादंबरी: पृष्ठ ६९ - राजा का परिहास और विलासवती की लज्जा
विलासवतीं ददर्श। ससंभ्रमपरिजनप्रसारितकरतलावलम्बनावष्टम्भेन वामजानुविन्यस्तहस्तपल्लवां प्रचलितभूषणमणिरवमुखरमुत्तिष्ठन्तीं विलासवतीमलमलमतयादरेण देवि नोत्थातव्यमित्यभिधाय सह तया तस्मिन्नेव शयनीये पार्थिवः समुपाविशत्। प्रमृष्टचामीकरचारुपादे धवलोपच्छदे चासन्ने शयनान्तरे शुकनासोऽपि न्यषीदत्।

अथ तामुपाूढगर्भामालोक्य हर्षभरमन्थरेण मनसा प्रस्तुतपरिहासो राजा देवि शुकनासः पृच्छति यदाह कुलवर्धना किमपि तत्किं तथैव इत्युवाच। अथाव्यक्तस्मितच्छुरितकपोलधरोचना लज्जया दशनांशुजालव्याजेनांशुकेनेव मुखमाच्छादयन्ती विलासवती तत्क्षणमधोमुखी तस्थौ। पुनः पुनश्चानुबध्यमाना किं मामतिमात्रं त्रपापरवशां करोषि नाहं किंचिदपि वेद्मि इत्यभिदधाना तिर्यग्वलिततारकेण चक्षुषावनतमुखी राजानं साभ्यसूयमिवपश्यत्।

अपरिस्फुटहासज्योत्स्नाविशदेन मुखशशिना भूभुजां पतिरेनां भूयो बभाषे। सुतनु यदि मदीयेन वचसा तव त्रपा वितन्यते तदियमहं स्थितो निभृतम्। अस्य तु किं प्रतिविधास्यसि विघटनानन्दलकोशविशदचम्पकद्युतेः सवर्णतया परिमलानुमीयमानस्य कुङ्कुमरागस्य पाण्डुरतामापद्यमानस्य अनयोश्च गर्भसंभवामृतवसेकनिर्वार्प्यमाणहृदयशोकानलप्रभवं धूममिव वमतोर्गृहीत्नीलोत्पलयोरिव चक्रवाकयोः तमालपल्लवलाञ्छितमुखयोरिव कनककलशयोः सकृदिवालिखितकृष्णागुरुपङ्कपत्रलतयोः श्यामायमानचूचुकयोः पयोधरयोः अस्य च प्रतिदिनमतिगाढतरमापद्यमानेन काञ्चीकलापेन दूयमानस्य नश्यत्त्रिवलिलेखावलयस्य क्रशिमानमुज्झतो मध्यभागस्य। इत्येवं ब्रुवाणमवनिपालमन्तर्मुखविनिगूढहासः शुकनासो देव किमायास्यते...
पद (Word) विग्रह / विवरण विशेष / अर्थ
चामीकरचारुपादेचामीकरस्य (स्वर्णस्य) इव चारवः पादाः यस्य तत् (बहुव्रीहि)सोने के समान सुंदर पायों वाला (आसन)
दशनांशुजालव्याजेनदशनानां अंशवः (षष्ठी), तेषां जालं तस्य व्याजेन (बहाने)दाँतों की किरणों के समूह के बहाने
श्यामायमानचूचुकयोःश्यामायमानौ चूचुकौ ययोः तौ (बहुव्रीहि)काले पड़ते हुए स्तनों के अग्रभाग वाले (गर्भ लक्षण)
त्रपापरवशाम्त्रपायाः (लज्जायाः) परवशा (तत्पुरुष)लज्जा के वशीभूत
नश्यत्त्रिवलिलेखावलयस्यनश्यन्तः त्रिवलिलेखानां वलयाः यस्मिन् सः (बहुव्रीहि)मिटती हुई पेट की तीन लकीरों (बलियों) वाला
हिन्दी अनुवाद: राजा तारापीड ने रानी विलासवती को देखा। जब रानी दासियों के हाथों का सहारा लेकर और अपने कोमल हाथ को बाएं घुटने पर रखकर, आभूषणों के मधुर स्वर के साथ उठने लगीं, तो राजा ने उन्हें रोकते हुए कहा— "देवी! रहने दें, इतना आदर न करें, आपको उठने की आवश्यकता नहीं है।" ऐसा कहकर राजा स्वयं उनके बिस्तर पर ही उनके पास बैठ गए। पास ही रखे हुए सोने के सुंदर पायों वाले और सफेद चादर से ढके एक अन्य आसन पर मन्त्री शुकनास भी बैठ गए।

रानी के गर्भवती रूप को देखकर प्रसन्न मन वाले राजा ने परिहास करते हुए कहा— "देवी! शुकनास पूछ रहे हैं कि जो कुलवर्धना ने कहा है, क्या वह सचमुच वैसा ही है?" यह सुनकर विलासवती के कपोलों पर हल्की मुस्कान फैल गई और उन्होंने लज्जा के कारण अपने दाँतों की चमक के बहाने (मानो घूंघट से) अपना मुँह छिपा लिया और सिर झुकाकर खड़ी रहीं। जब राजा ने बार-बार पूछा, तो उन्होंने कहा— "आप मुझे इतना शर्मिंदा क्यों कर रहे हैं? मैं कुछ नहीं जानती।" ऐसा कहते हुए उन्होंने अपनी आँखों की चंचल पुतलियों से तिरछी नजरों से राजा को मानो नाराजगी के साथ देखा।

मुस्कान रूपी चांदनी से प्रकाशित मुख वाले राजा ने पुनः कहा— "सुतनु (सुंदर अंगों वाली)! यदि मेरे वचनों से तुम्हें लाज आती है, तो मैं चुप हो जाता हूँ। लेकिन इन लक्षणों का क्या करोगी? जो विकसित हो रहे कमल के समान कांति वाले हैं, जिन पर लगा केसर का लेप अब शरीर की सफेदी (गर्भ के कारण) के कारण केवल सुगंध से पहचाना जा रहा है, और जिनके चूचुक (अग्रभाग) काले पड़ गए हैं। ये ऐसे लग रहे हैं मानो हृदय की शोकाग्नि (पुत्र न होने का दुःख) के शांत होने पर निकलने वाला धुआं हो, या नीले कमल लिए हुए चक्रवाक पक्षी हों। तुम्हारा यह मध्य भाग (कमर) भी, जो अब प्रतिदिन बढ़ रहा है और जिस पर बंधी करधनी (काञ्ची) अब चुभने लगी है तथा पेट की तीन बलियां मिटती जा रही हैं, सब सच बता रहा है।" राजा को इस प्रकार बोलते देख शुकनास मन ही मन अपनी हंसी छिपाने लगे।
Full English Translation: King Tarapida saw Queen Vilasavati. As the Queen attempted to rise by leaning on the hands of her attendants and placing her tender palm on her left knee, with her ornaments jingling, the King stopped her, saying— "My Queen, enough of this formality! There is no need to rise." Saying this, the King sat beside her on the same bed. Minister Shukanasa also took a seat on a nearby golden-legged stool covered with a white cloth.

Seeing her pregnant form, the King, with a heart heavy with joy, started a playful conversation: "Queen, Shukanasa asks if what Kulavardhana said is indeed true?" At this, a faint smile spread across Vilasavati’s cheeks; overcome with modesty, she hid her face behind the brilliance of her teeth as if behind a veil and stood with her head bowed. When pressed repeatedly, she said— "Why do you make me so bashful? I know nothing of this." As she spoke, she looked at the King with an air of mock-resentment, her eyes darting sideways.

The King, his face bright with the moonlight of his smile, spoke again: "O beautiful one! If my words cause you embarrassment, I shall remain silent. But how will you hide these signs? Your breasts have become pale like blossoming Champaka flowers, where the saffron paste is now recognized only by its scent. Their tips (nipples) have turned dark, appearing like smoke emerging from the fire of grief in your heart being extinguished by the nectar of pregnancy. Your waist, which is expanding daily, causing your girdle to pinch and the three folds of your belly to vanish, reveals the truth." Hearing the King speak thus, Shukanasa suppressed a laugh.
कादंबरी भाष्य - पृष्ठ ७०
कादंबरी: पृष्ठ ७० - पुत्र जन्म और जन्मोत्सव का वर्णन
यसि देवीमियमनया कथयापि लज्जते यज कुलवर्धनाकथितवार्तासंबद्धमालापमित्यब्रवीत्। एवंविधाभिश्च नर्मप्रायाभिः कथाभिः सुचिरं स्थित्वा शुकनासः स्वभवनमयासीत्। नरेन्द्रोपि तस्मिन्नेव वासगृहे तया सह तां निशामत्यवाहयत्।

ततः क्रमेण यथासमीहितगर्भोदोहदसंपादनप्रमुदिता पूर्ण प्रसवसमये पुण्येऽहन्यनवरतगलन्नाडिकाकलितकालबलैर्बहिर्गृहीतच्छायैर्गणकैर्गृहीते लग्ने प्रशस्तायां वेलायामिमं दमिमिव जलधरमाला सकललोकहृदयानन्दकारिणं विलासवती सुतमतसूत। तस्मिन् जाते सरभसमितस्ततः प्रधावितस्य परिजनस्य चरणशतसंक्षोभचलितक्षितितलो भूपालाभमुखप्रसृतस्खलद्गतिविकलकञ्चुकिसहस्रो जनसंमर्दनिष्पिष्यमाणपतितकुब्जवामनकिरातगणो विस्फार्यमाणान्तःपुरजनाभरणझंकारमनोहरः पूर्णपात्राहरणविलुप्यमानवसनभूषणः संक्षोभितनगरो राजकुले दिष्टिवृद्धिसंमोति महानभूत्।

अनन्तरं च मन्दरमध्यमानजलधिघोषगम्भीरदुन्दुभिध्वानपुरःसरेण प्रहतमृदङ्गमृदङ्गशङ्खकाहलानकनिवहनिनदनिर्भरं मङ्गलपटहपटुरवसंर्धितेनानेकजनसहस्रकलकलबहुलेन त्रिभुवनमापूरयतोत्सवकोलाहलेन ससामन्ताः सान्तःपुराः सप्रकृतयः सराजलोकाः सवेश्यायुवतयः सबालवृद्धा नर्तुराग गोपालमुन्मत्ता इव हर्षनिर्भरः प्रजाः। प्रतिदिनमवर्धत चन्द्रोदयेनेव जलधिः कलकलमुखरो राजसूनोर्जन्ममहोत्सवः।

पार्थिवस्तु तनयाननदर्शनोत्सवहृतहृदयोपि दिवसवशेन मौहूर्तिकगणोपदिष्टे प्रशस्ते मुहूर्ते निवारितनिखिलपरिजनः शुकनासद्वितीयो मणिमयमङ्गलकलशयुगलशून्येननासक्तबहुपुत्रिकालंकृतेन विविधवनपल्लवनिवहनिरन्तरनिचितेन संनिहितकनकमयहलमुसलयु-
पद (Word) विग्रह / विवरण विशेष / अर्थ
नर्मप्रायाभिःनर्म (परिहास) प्राया यासु ताभिः (बहुव्रीहि)मजाक से भरी हुई (कथाओं) के द्वारा
सकललोकहृदयानन्दकारिणम्सकललोकानां हृदयानां आनन्दं करोति इति (उपपद तत्पुरुष)संपूर्ण संसार के हृदय को आनंदित करने वाले (पुत्र)
विस्फार्यमाणान्तःपुरजनाभरणझंकारविस्फार्यमाणानां आभरणानां झंकारः (तत्पुरुष)बजते हुए आभूषणों की मधुर झंकार
दिष्टिवृद्धिसंमोतिदिष्ट्या (भाग्येन) वृद्धिः (बधाई)भाग्य की वृद्धि या 'बधाई हो' का शोर
त्रिभुवनमापूरयतात्रिभुवनं आपूरयति इति तेनतीनों लोकों को गुंजायमान करते हुए
शुकनासद्वितीयोशुकनासः द्वितीयः यस्य सः (बहुव्रीहि)शुकनास जिसके साथ (दूसरे व्यक्ति) थे
हिन्दी अनुवाद: राजा ने कहा— "यह देवी तो इस चर्चा से ही लज्जित हो रही हैं, इसलिए अब कुलवर्धना द्वारा कही गई बातों को रहने दें।" ऐसी अनेक परिहास भरी बातों के बाद मन्त्री शुकनास अपने घर चले गए और राजा ने वह रात रानी के साथ उसी शयनकक्ष में बिताई।

इसके बाद, समय बीतने पर रानी की सभी इच्छाएं (दोहद) पूरी हुईं और प्रसव का समय आने पर, एक अत्यंत पवित्र दिन, ज्योतिषियों द्वारा छाया और घड़ियों की गणना से निश्चित किए गए शुभ लग्न में, रानी विलासवती ने एक सुंदर पुत्र को जन्म दिया। वह पुत्र ऐसा था मानो मेघों की पंक्ति ने बिजली को जन्म दिया हो, जो संपूर्ण संसार को आनंदित करने वाला था।

पुत्र के जन्म लेते ही चारों ओर दौड़ते हुए सेवकों के पैरों की धमक से पृथ्वी कांपने लगी। राजा को समाचार देने के लिए हजारों कंचुकी (महल के रक्षक) लड़खड़ाते हुए भागे, भीड़ में कुबड़े, बौने और सेवक आपस में टकराने लगे। रानियों और दासियों के आभूषणों की झंकार से वातावरण गुंजायमान हो उठा। खुशी के मारे लोग एक-दूसरे के वस्त्र और आभूषण छीनने लगे (पुरस्कार स्वरूप) और पूरे नगर में 'बधाई हो, बधाई हो' का कोलाहल मच गया।

समुद्र मन्थन के समय होने वाली गूँज के समान नगाड़ों (दुन्दुभि), मृदंग, शंख और नगाड़ों की आवाजें गूँजने लगीं। हजारों लोगों के जयकारों और मांगलिक ढोलों के शब्द से तीनों लोक भर गए। सामंत, मंत्री, रानियाँ, प्रजा, बच्चे और बूढ़े—सभी खुशी में पागलों की तरह नाचने लगे। राजकुमार के जन्म का यह उत्सव समुद्र के समान प्रतिदिन बढ़ता ही गया।

यद्यपि राजा अपने पुत्र का मुख देखने के लिए अत्यंत व्याकुल थे, फिर भी उन्होंने मुहूर्त के अनुसार शुभ समय की प्रतीक्षा की। फिर ज्योतिषियों द्वारा बताए गए समय पर, केवल शुकनास के साथ, उन्होंने पुत्र के दर्शन के लिए सूतिका गृह (जहाँ बालक का जन्म हुआ) में प्रवेश किया। वह द्वार मणियों के कलशों, पुतलियों, ताजे पत्तों और सोने के हल-मुसल जैसे मांगलिक प्रतीकों से सजा हुआ था।
Full English Translation: The King said— "The Queen is embarrassed even by this conversation, so let us end the discussion regarding what Kulavardhana said." After such playful talks, Shukanasa departed for his home, and the King spent the night with the Queen in that very chamber.

In due course, her pregnancy cravings having been fulfilled, at a holy hour on an auspicious day, determined by astrologers through the measurement of shadows and water-clocks, Queen Vilasavati gave birth to a son. The child was like a flash of lightning produced by a row of clouds, bringing joy to the hearts of all people.

Upon the birth, the ground shook with the tremors caused by hundreds of attendants running to and fro. Thousands of chamberlains (Kanchukis) rushed with stumbling steps to inform the King; hunchbacks, dwarfs, and servants were crushed and fell in the dense crowd. The atmosphere was filled with the melodious jingling of the ornaments of the palace women. People snatched garments and jewels from each other in joy, and the entire city was stirred with cries of "Congratulations! Good fortune!"

Then followed the deep sound of kettledrums (Dundubhis), like the roar of the ocean being churned by Mount Mandara, accompanied by mridangas, conchs, and horns. The roar of thousands of people and the sound of festive drums filled the three worlds. Vassal kings, ministers, queens, common folk, the young and the old—all danced as if intoxicated with joy. The celebration of the prince's birth increased daily like the ocean swelling at moonrise.

Although the King was eager to see his son's face, he waited for the auspicious moment prescribed by the astrologers. Accompanied only by Shukanasa, he approached the birth-chamber, which was decorated with jeweled pots, figurines, fresh foliage, and auspicious golden symbols like the plough and pestle.
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