ऋग्वेद सूक्त ३६ (मंत्र १-५): विज्ञान, योग और समाधि का ब्रह्मांडीय प्रकटीकरण

ऋग्वेद सूक्त ३६ (मंत्र १-५): विज्ञान, योग और समाधि का ब्रह्मांडीय प्रकटीकरण

ऋग्वेद मण्डल १ | सूक्त ३६ (मंत्र १ से ५)
ज्ञान, विज्ञान और समाधि का ब्रह्मांडीय संश्लेषण

प्रस्तावना: ऋग्वेद का यह ३६वाँ सूक्त ऋषि कण्व घोर द्वारा दृष्ट है। यह सूक्त केवल कर्मकांडीय आहुति का विवरण नहीं है, बल्कि यह व्यष्टि चेतना (Individual Consciousness) का समष्टि महा-यंत्र (Cosmic Processor) के साथ एकाकार होने का परम विज्ञान है। आइए, ज्ञान-विज्ञान-ब्रह्मज्ञान की 'ऋत-दृष्टि' के आलोक में इसके प्रथम पांच मंत्रों के वैज्ञानिक और योगिक रहस्यों का महा-मंथन करते हैं।


नवान्न सूक्त: मंत्र १ — व्यक्तिगत प्राण-साधना और यति भाव

प्र वो॑ य॒ह्वं पु॑रू॒णामवि॑ता॒रं वि॒शाम॒ग्निं य॒जतं॑ दधिध्वम्।
श्रुत्क॑र्णं स॒प्रथ॑स्तमं विप्रा॑ गी॒र्भिर्नम॑स्यन्त्य॒क्तुभिः॑ ॥१॥

पद-व्याख्या एवं वैज्ञानिक डिकोडिंग (Consciousness Decoding)

वैदिक पद ऋतंभरा प्रज्ञा (योग और प्राण विज्ञान)
प्र वो यह्वम् प्राकृतिक और स्वाभाविक रूप से उस महा-ऊर्जा (परमेश्वर) को सम्मुख देखना।
पुरूणामवितारम् अनेक बाधाओं, मानसिक एंट्रॉपी और सांसारिक दोषों से रक्षा करने वाला विधान।
विशाम् अग्निम् जड़-चेतन जगत के प्रत्येक परमाणु में व्याप्त ऊर्जा।
यजतं दधिध्वम् यति भाव (परम संयम) से उस प्रकाश को अंतःकरण में धारण करना।
ऋत-दृष्टि संश्लेषण: प्रथम मंत्र व्यक्ति की अपनी निजी साधना का द्वार है। जब साधक संसार की जालसाजी से मुक्त होकर, यम-नियम के यति भाव से 'यह्वं अग्नि' (ब्रह्मांडीय ऊर्जा) को अपने भीतर धारण करता है, तब उसकी अंतःचेतना जाग्रत होती है। मेधावी साधक (विप्राः) अपनी अंतःवाणी से अहोरात्र उस परम तत्व का नमन करते हैं, जिससे व्यक्तिगत प्राण-साधना सुदृढ़ होती है।

मंत्र २ — सामूहिक चेतना, गति और शांति का महामिलन

ज॒नासो॑ अ॒ग्निं द॑धिरे सहो॒वृधं॑ ह॒विष्म॑न्तो विधेम ते।
स त्वं नो॑ अ॒द्य सु॒मना॑ इ॒हावि॒ता भ॒वा वाजे॑षु सन्त्य ॥२॥

पद-व्याख्या एवं वैज्ञानिक डिकोडिंग

वैदिक पद ऋतंभरा प्रज्ञा (योग और प्राण विज्ञान)
जनासः सज्जनों के समूह के साथ, सामूहिक ज्ञान-रूप होकर।
सहोवृधम् सहयोगी रूप में जीव-जगत की निरंतर वृद्धि और पोषण करने वाला तत्व।
विधेम ते 'वि' अर्थात विधिपूर्वक लोक-कल्याण के कार्यों को संपादित करना।
इहाविता इह (इसी भौतिक देह में) + आ (आत्मा का) + वि (विज्ञान) + ता (विस्तार कर्ता)।
वाजेषु सन्त्यः वाजेषु (तीव्र संवेग/वेग के साथ) और सन्त्यः (संत की तरह परम शांत भाव से)।
ऋत-दृष्टि संश्लेषण: यहाँ ऋषि व्यष्टि से समष्टि (समूह) की ओर बढ़ते हैं। जब श्रेष्ठ जनों का ज्ञान एक होता है, तो वह 'सहोवृधम्' बनकर पूरे जीव-जगत की वृद्धि करता है। वह अगाध ईश्वर 'अद्य' (इसी वर्तमान क्षण में) इसी भौतिक देह के भीतर आकर 'आविता' यानी हमारी आत्मा के विज्ञान का अनंत विस्तार कर देता है। इसकी प्राप्ति का नियम है—कर्मों में 'वाजेषु' (तीव्र संवेग) हो, परंतु मन में 'सन्त्यः' (संत जैसी अचल शांति) हो।

मंत्र ३ — बुद्धि की व्यापकता और ऊर्ध्वगामी चेतना

प्र त्वा॑ दू॒तं वृ॑णीमहे॒ होता॑रं वि॒श्ववे॑दसम्।
म॒हस्ते॑ स॒तो वि च॑रन्त्य॒र्चयो॑ दि॒वि स्प॑ृशन्ति भा॒नवः॑ ॥३॥

पद-व्याख्या एवं वैज्ञानिक डिकोडिंग

वैदिक पद ऋतंभरा प्रज्ञा (योग और प्राण विज्ञान)
प्र त्वा दूतम् ऋषि स्वयं को ईश्वर का प्रकृष्ट, स्वाभाविक संदेशवाहक स्वीकार करते हैं।
वृणीमहे ईश्वर बुद्धि ('महे') में रहता है, अतः बुद्धि का 'वृणी' (आकाश जैसी व्यापकता) होना।
होतारम् दीर्घकाल तक आदर और निष्ठा के साथ साधना की सुदृढ़ भूमि पर टिकने वाला होता।
विश्ववेदसम् सार्वभौमिकता और समानता के सिद्धांत का पोषण करने वाला वेद-ज्ञान।
वि चरन्ति अर्चयः विशेष विज्ञान (वि) के सहारे समय से आगे देखना; अग्नि की लपटों की तरह ऊर्ध्वगामी होना।
ऋत-दृष्टि संश्लेषण: इस अवस्था में साधक कोई साधारण मनुष्य नहीं रहता, उसकी बुद्धि आकाश जैसी व्यापक (वृणीमहे) हो जाती है। वह विशेष विज्ञान (वि) की सहायता से आधुनिक समय से आगे का सत्य जान लेता है। जैसे अग्नि की लपटें हमेशा ऊपर की ओर उठती हैं, वैसे ही उसका पूरा जीवन एक 'अर्चन' (पूजा) बनकर समाज में एक सच्चे मानव ('भानवः') के कर्तव्यों का निर्वहन करता है।

मंत्र ४ — परमाण्विक शक्तियों पर विजय और मृत्युलोक में ऐश्वर्य

दे॒वास॑स्त्वा॒ वरु॑णो मित्रो अ॒र्य॒मा सं दू॒तं prатнамइ॑न्द्हते।
वि॑श्वं॒ सो अ॑ग्ने ज॒यति॒ त्वया॑ धनं॒ यस्ते॑ द॒दाश॒ मर्त्यः॑ ॥४॥

पद-व्याख्या एवं वैज्ञानिक डिकोडिंग

वैदिक पद ऋतंभरा प्रज्ञा (योग और प्राण विज्ञान)
देवासः / वरुणो मित्रो अर्यमा ३३ देवताओं के सद्गुणों का सार; त्रिगुणात्मक परमाण्विक बल (जल, वायु, अग्नि)।
सं दूतं प्रत्नमिन्धते 'सं' (संयम) और 'प्रत्न' (प्रयत्न) के मेल से भौतिक शक्तियों का बौद्धिक नियंत्रण।
विश्वं जयति ईश्वर की तरह ही ब्रह्मांड की हर परिस्थिति पर एकछत्र राज्य करना।
ददाश मर्त्यः मरणधर्मी मनुष्य का इसी मृत्युलोक में अपने 'स्व' का समर्पण (दान) कर अमर होना।
ऋत-दृष्टि संश्लेषण: जब साधक 'सं' (संयम) और 'प्रत्न' (प्रयत्न) को सिद्ध कर लेता है, तो प्रकृति के परमाण्विक बल (जल, वायु, अग्नि देव) उसके बौद्धिक अनुगामी बन जाते हैं। ऐसा साधक जब अपने सीमित अहंकार को 'ददाश' (सौंप देना) कर देता है, तो वह इसी 'मर्त्यः' (मृत्युलोक) में रहते हुए ईश्वरीय सानिध्य के परम ऐश्वर्य (विश्वं धनं) को प्राप्त कर लेता है।

मंत्र ५ — अकृतित्व ब्रह्म और कॉस्मिक सी.पी.यू. (CPU)

म॒न्द्रो होता॑ गृह॒पति॑रग्ने दू॒तो वि॒शाम॑सि।
त्वे विश्वा॒ सं ग॑तानि व्र॒ता ध्रु॒वा यानि॑ दे॒वा अकृ॑ण्वत ॥५॥

पद-व्याख्या एवं वैज्ञानिक डिकोडिंग

वैदिक पद ऋतंभरा प्रज्ञा (योग और प्राण विज्ञान)
मन्द्रः होता 'मन्द्र' से ही 'मंदिर' बना है। इस शरीर-मंदिर में जीवात्मा अक्रिय होकर केवल सजग रहता है।
दूतो विशामसि ब्रह्मांडीय चेतना में अपने सिग्नल्स के साथ 'विशाम' (पूर्ण विश्राम/आराम) में रहना।
सं गतानि पूर्ण सजगता का वह क्षण (५ सेकंड का परम साक्षात्कार) जिसके बैकअप से जीवन भर गति बनी रहती है।
ध्रुवा व्रता सेंट्रल प्रोसेसिंग यूनिवर्सल केंद्र; वह शाश्वत शून्य जहाँ जीवों के संदेहों का स्वतः समाधान होता है।
यानि देवा अकृण्वत दिव्य चक्षु और सर्वज्ञता से युक्त होने पर भी 'अकृतित्व' (Non-Doer) भाव में स्थित रहना।
ऋत-दृष्टि संश्लेषण: यह मंत्र अध्यात्म और आधुनिक कंप्यूटर विज्ञान का महा-मिलन है। यह भौतिक शरीर ही साक्षात मंदिर (मन्द्रः) है। ईश्वर इस ब्रह्मांड का **"सेंट्रल प्रोसेसिंग यूनिवर्सल केंद्र" (Universal CPU)** है, जो परम शून्य में बिना किसी हलचल के व्याप्त है। मनुष्य अपने पूरे जीवनकाल में घोर जाग्रत होने पर भी मात्र ५ या १० सेकंड के लिए ही उस शून्य का साक्षात्कार (सं गतानि) कर पाता है, पर उसी परम ऊर्जा के सहारे उसका संपूर्ण जीवन गतिमान रहता है। वह ईश्वर सब कुछ संचालित करते हुए भी स्वयं कर्ता भाव से मुक्त यानी 'अकृतित्व' है।

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