आत्मा, ब्रह्मज्ञान और वर्तमान क्षण का जीवन-दर्शन
“अहम् इन्द्रं न शरीरम् – ब्रह्मज्ञान और आत्मा का जीवन-दर्शन”
“अहम् इन्द्रं न शरीरम् – ब्रह्मज्ञान और आत्मा का जीवन-दर्शन”
प्रस्तावना
यह लेख जीवन, आत्मा और ब्रह्मज्ञान के महत्व को समझने के लिए है।
“अहम् इन्द्रं न शरीरम्, यस्मिन्सर्वाणि भूतान्यात्मैवाभूद्विजानतः। तत्र को मोहः कः शोक एकत्वमनुपश्यतः।।”
यह मंत्र हमें सिखाता है कि हम केवल शरीर नहीं हैं, बल्कि शरीर के अंदर बैठा साक्षी-स्वामी (इन्द्र) ही हमारा वास्तविक स्वरूप है। जो स्वयं को जानता है, उसके लिए मोह और शोक का अस्तित्व नहीं रहता।
इस लेख में हम इसे विस्तार से समझेंगे और जानेंगे कि कैसे वर्तमान क्षण में जागरूक रहकर जीवन का पूर्ण आनंद लिया जा सकता है।
यह लेख जीवन, आत्मा और ब्रह्मज्ञान के महत्व को समझने के लिए है।
“अहम् इन्द्रं न शरीरम्, यस्मिन्सर्वाणि भूतान्यात्मैवाभूद्विजानतः। तत्र को मोहः कः शोक एकत्वमनुपश्यतः।।”
यह मंत्र हमें सिखाता है कि हम केवल शरीर नहीं हैं, बल्कि शरीर के अंदर बैठा साक्षी-स्वामी (इन्द्र) ही हमारा वास्तविक स्वरूप है। जो स्वयं को जानता है, उसके लिए मोह और शोक का अस्तित्व नहीं रहता।
इस लेख में हम इसे विस्तार से समझेंगे और जानेंगे कि कैसे वर्तमान क्षण में जागरूक रहकर जीवन का पूर्ण आनंद लिया जा सकता है।
1. वर्तमान क्षण में जीवन का महत्व
हम अक्सर अपने जीवन को भूत और भविष्य के चिंतन में खो देते हैं।
- कल की चिंता में आज का आनंद खो जाता है।
- मानसिक अव्यवस्था, तनाव और मोह जीवन का प्राकृतिक आनंद छीन लेते हैं।
सार: केवल आज में जीकर ही जीवन की पूर्णता अनुभव की जा सकती है।
हम अक्सर अपने जीवन को भूत और भविष्य के चिंतन में खो देते हैं।
- कल की चिंता में आज का आनंद खो जाता है।
- मानसिक अव्यवस्था, तनाव और मोह जीवन का प्राकृतिक आनंद छीन लेते हैं।
सार: केवल आज में जीकर ही जीवन की पूर्णता अनुभव की जा सकती है।
2. जीवन और सांस्कृतिक संस्कार
संसार और संस्कृति ने हमें यह सिखाया है कि कैसे स्वयं को नियंत्रित और अनुशासित किया जाए।
- हमारी आदतें और संस्कार जन्म से हमारे अंदर रचे-बसे हैं।
- यदि हम उन्हें नहीं समझेंगे, तो स्वयं को भौतिक दुनिया की मर्यादाओं में फंसते पाएंगे।
सार: जीवन को समझने के लिए आन्तरिक निरीक्षण आवश्यक है।
संसार और संस्कृति ने हमें यह सिखाया है कि कैसे स्वयं को नियंत्रित और अनुशासित किया जाए।
- हमारी आदतें और संस्कार जन्म से हमारे अंदर रचे-बसे हैं।
- यदि हम उन्हें नहीं समझेंगे, तो स्वयं को भौतिक दुनिया की मर्यादाओं में फंसते पाएंगे।
सार: जीवन को समझने के लिए आन्तरिक निरीक्षण आवश्यक है।
3. ब्रह्मज्ञान और आत्मा का स्वरूप
“यस्मिन्सर्वाणि भूतान्यात्मैवाभूद्विजानतः। तत्र को मोहः कः शोक एकत्वमनुपश्यतः।।”
- सब कुछ आत्मा में व्याप्त है।
- जो आत्मा को जानता है, वह सर्वव्यापी और स्वतंत्र होता है।
- मोह और शोक का प्रभाव उन पर नहीं पड़ता।
आधुनिक दृष्टि: स्वयं की पहचान और जागरूकता मानसिक शांति और तनावमुक्ति का मूल है।
“यस्मिन्सर्वाणि भूतान्यात्मैवाभूद्विजानतः। तत्र को मोहः कः शोक एकत्वमनुपश्यतः।।”
- सब कुछ आत्मा में व्याप्त है।
- जो आत्मा को जानता है, वह सर्वव्यापी और स्वतंत्र होता है।
- मोह और शोक का प्रभाव उन पर नहीं पड़ता।
आधुनिक दृष्टि: स्वयं की पहचान और जागरूकता मानसिक शांति और तनावमुक्ति का मूल है।
4. ध्यान और समाधि का महत्व
- मानसिक तटस्थता और मौन की अवस्था आत्मा के अनुभव का मार्ग है।
- प्रत्यक्ष और भौतिक दुनिया के भ्रम से मुक्ति पाने के लिए ध्यान आवश्यक है।
- ध्यान से हम वर्तमान क्षण में पूर्ण रूप से उपस्थित होते हैं और जीवन का आनंद उठाते हैं।
- मानसिक तटस्थता और मौन की अवस्था आत्मा के अनुभव का मार्ग है।
- प्रत्यक्ष और भौतिक दुनिया के भ्रम से मुक्ति पाने के लिए ध्यान आवश्यक है।
- ध्यान से हम वर्तमान क्षण में पूर्ण रूप से उपस्थित होते हैं और जीवन का आनंद उठाते हैं।
5. ब्रह्मचर्य और जीवन-शक्ति
- ब्रह्मचर्य केवल यौन संयम नहीं, बल्कि आध्यात्मिक ऊर्जा का संरक्षण और रूपान्तरण है।
- यह ऊर्जा जीवन में जागरूकता, शक्ति और सृजनात्मकता प्रदान करती है।
सार: ब्रह्मचर्य से मानसिक और शारीरिक शक्ति संतुलित रहती है, और ध्यान एवं समाधि में गहनता आती है।
- ब्रह्मचर्य केवल यौन संयम नहीं, बल्कि आध्यात्मिक ऊर्जा का संरक्षण और रूपान्तरण है।
- यह ऊर्जा जीवन में जागरूकता, शक्ति और सृजनात्मकता प्रदान करती है।
सार: ब्रह्मचर्य से मानसिक और शारीरिक शक्ति संतुलित रहती है, और ध्यान एवं समाधि में गहनता आती है।
6. समानदृष्टि और बैराग्य
- सभी प्राणियों को समान दृष्टि से देखने वाला ही समदर्शी कहलाता है।
- बैराग्य और द्वेष का संतुलन आत्मा के विकास के लिए आवश्यक है।
- यह दृष्टिकोण मानव मन को अज्ञान और मोह से मुक्त करता है।
- सभी प्राणियों को समान दृष्टि से देखने वाला ही समदर्शी कहलाता है।
- बैराग्य और द्वेष का संतुलन आत्मा के विकास के लिए आवश्यक है।
- यह दृष्टिकोण मानव मन को अज्ञान और मोह से मुक्त करता है।
7. शरीर और आत्मा का अंतर
- शरीर क्षणिक और नश्वर है, आत्मा शाश्वत और अमर।
- स्वयं को केवल शरीर समझना मानव चेतना का सबसे बड़ा भ्रम है।
- ध्यान, आत्मनिरीक्षण और ब्रह्मज्ञान से ही वास्तविक स्वरूप का ज्ञान होता है।
सार: शरीर का ध्यान करना आवश्यक है, लेकिन आत्मा का जागरूक होना जीवन की सच्ची स्वतंत्रता है।
- शरीर क्षणिक और नश्वर है, आत्मा शाश्वत और अमर।
- स्वयं को केवल शरीर समझना मानव चेतना का सबसे बड़ा भ्रम है।
- ध्यान, आत्मनिरीक्षण और ब्रह्मज्ञान से ही वास्तविक स्वरूप का ज्ञान होता है।
सार: शरीर का ध्यान करना आवश्यक है, लेकिन आत्मा का जागरूक होना जीवन की सच्ची स्वतंत्रता है।
8. जीवन में योग और प्राणशक्ति
- प्राणायाम शरीर और मन को नियंत्रित करने का वैज्ञानिक तरीका है।
- यह प्राणशक्ति का संरक्षण करता है और मानसिक संतुलन बनाए रखता है।
- जो व्यक्ति प्राण और मन का संतुलन करता है, वह आत्मा का साक्षात्कार कर सकता है।
- प्राणायाम शरीर और मन को नियंत्रित करने का वैज्ञानिक तरीका है।
- यह प्राणशक्ति का संरक्षण करता है और मानसिक संतुलन बनाए रखता है।
- जो व्यक्ति प्राण और मन का संतुलन करता है, वह आत्मा का साक्षात्कार कर सकता है।
9. चेतना और ज्ञान
- चेतना स्थायी है, और इसमें परिवर्तन नहीं होता।
- वास्तविक ज्ञान (ब्रह्मज्ञान) से जीवन के तीन प्रकार के दुःख – शारीरिक, मानसिक और आध्यात्मिक – समाप्त हो जाते हैं।
- सिद्ध पुरुष हमेशा प्रसन्न, जागरूक और आनंदित रहते हैं।
- चेतना स्थायी है, और इसमें परिवर्तन नहीं होता।
- वास्तविक ज्ञान (ब्रह्मज्ञान) से जीवन के तीन प्रकार के दुःख – शारीरिक, मानसिक और आध्यात्मिक – समाप्त हो जाते हैं।
- सिद्ध पुरुष हमेशा प्रसन्न, जागरूक और आनंदित रहते हैं।
10. निष्कर्ष
- हम केवल शरीर नहीं हैं, बल्कि आत्मा के रूप में साक्षी और स्वतंत्र हैं।
- वर्तमान क्षण में जागरूक रहना जीवन का सर्वोच्च आनंद है।
- ध्यान, ब्रह्मचर्य और समाधि से मानसिक और आध्यात्मिक शक्ति प्राप्त होती है।
- समान दृष्टि, मोहमुक्ति और विवेकपूर्ण जीवन ही सच्ची स्वतंत्रता है।
- जीवन का सबसे बड़ा रहस्य आत्मा का अनुभव है, और यही ब्रह्मज्ञान का मार्ग है।
“यस्मिन्सर्वाणि भूतान्यात्मैवाभूद्विजानतः। तत्र को मोहः कः शोक एकत्वमनुपश्यतः।।”
इस मंत्र के अनुसार, जो स्वयं को जानता है, वह संपूर्ण और मुक्त होता है।
अहम् इन्द्रं न शरीरंम्, ।। शून्य की नाव भाव की जिज्ञासा ।।
ओ३म् नमः शम्भवाय च मयोभवायं च।नमः शङ्कराय च मयस्कराय च।नमः शिवाय च शिवतराय च।
यस्मिन्सर्वाणि भूतान्यात्मैवाभूद्विजानतः। तत्र को मोहः कः शोक एकत्वमनुपश्यतः।।
कल्याण कारक प्रभु के लिए हमारा नमस्कार हो और सुखकारक सुख आनन्द का दान देने वाले प्रभु को हम सब का नमस्कार, और शान्ति दायक शान्ति को देने वाले उस सर्व शक्तिमान प्रभु को मेंरा नमस्कार, श्रद्धा और आदर भाव से और आदर भाव से मैं उसको नमस्कार करता हूं अत्यन्त मंगल रूप प्रभु के लिए हमारा बार-बार नमस्कार प्रणाम पहुचें।
मतलब सिर्फ इतना है कि तुम जीवन को उसकी पूर्णता में नहीं जी रहे हो, क्योंकि कल की चिन्ता में आज को पूर्ण रूप से आनन्दित होकर नहीं जी रहें हो, हाँ जूने में रुकावट अवश्य खड़ी करते हो, कल कभी नहीं आता है। यह एक तरीका है स्वयं को यातना, कष्ट, प्रताणीत और तरह-तरह के अविद्या आदि क्लेशों से क्लेशित रखने के लिए। इसके लिए ही तुम सब को लम्बे समय संस्कारीत किया गया है और आज भी यह सब निरन्तर किया जा रहा है, इसी के कल्चरल संस्कृति संस्कार नाम दिया है। और यह सब तुम सब के नश नाड़ीयों में रच वश गया है और तुम्हें ज्ञात ही नहीं है कि आखिर तुम हो कौन, तुम्हारा ना ही भुत है ना ही तुम्हारा भविष्य है। तुम्हारें पास तो केवल सिवाय तुम्हारा आज है, और आज को तुम अपने आने वाले कल कि चिन्ता में खर्च किये जा रहे हो की आने वाला कल अपने साथ साथ सुख सुबिधा और समृद्धि ले कर आयेगा। इससे बड़ा कोई बकवास हो सकता है। यह सब तुम्हारें जीवन को कबाड़ा सम्सान बनाना के लिए परयाप्त है। तुम स्वयं अपनी चिता सजाने में इतने अधीक ब्यस्त हो की भुल ही गए हो कि तुम्हारा वास्तवीक स्वरूप क्या है? इसमें तुम सब की कोई गल्ती नहीं है ऐसा तो तुम सब को बनाया गया। तुम सब का उपयोग किया जा रहा है। जिसे तुम अपना समझते हो वहीं तुम्हारें कब्र तैयार कर रहें है और यही बात समाप्त नहीं होती है उसमें तुम स्वयं भरपूर उनका सहयोंग कर रहें हो। क्योंकि यह जो समाज है और इसकी व्यवस्था रूपी जो सणयन्त्रकारी नीव वह एक दूसरें के शोषण पर ही आश्रीत है। जैसा की संस्कृत का एक कथन है की जीव जीवस्य भोजनम्। यह तो प्रकृत का स्वभाव है एक प्राणी दूसरें के जीवन का अन्रत करके ही अपने जीवन को बरकरार रख सकता है। लेकिन इसके लिए जो परम आवश्यक संयम सन्तुलन है वह मानव जीवन से प्रायः लुप्त हो रहा है। जिसकी वजह क्या ठीक है और क्या गलत है उसका ज्ञान हीं नहीं है? और यदि तुम्हें यह ज्ञान हो जाए तो बड़ी समस्या खड़ी हो जाती हैं क्योंकि ज्ञान विज्ञान और अज्ञान अपूर्ण है। मानव जिससे पूर्ण होता है वह ब्रह्मज्ञान हैं। ब्रह्म का मतलब है ब्रह्म जैसा जीवन जीना जो इन तीनो से परें है। उसकी अनुभूति भर जाओ उसके लिए केवल आज और अभी में है जो किया जा सकता है वह इसी पल में होगा इसके लिए अलग से समय कभी नहीं मिलने वाला है। करना कुछ भी नहीं है सब कुछ जो भी कार्य उसके होने दो, उसमें स्वयं केवल द्रष्टा की तरह तटस्थ रखना है। मौन और शान्त हो जाओ चिन्ता करने का कोई प्रश्न नहीं है सारी चिन्तायें स्वतः अदृश्य हो जाएगी यह साइकोलाजीकल साइन्स है। इस क्षण में आने से तुम इस क्षण का भरपूर आनन्द ले पाओगें जो अद्वितीय होगा। यह जानकर तुमको आश्चर्य होगा की सव कुछ तो तुम्हारें पास था तुम ही अनुपस्थित थे ऐसा ही सभी प्रबुद्ध पुरुषों ने जाना है। तुम और तुम्हारी समद्धि तुम्हारें साथ हर पल रहती है उससे तुमको दुनीया की कोई ताकत अलग नहीं सकती है। मगर तुम हमेंशा से बिते हुए कल में जीने के आदि हो जिसके कारण जीवन में कुछ भी तरो-ताजा नया नवेला ओश की बुदं की भांति नहीं दिखता है सब तरफ से सड़ान्ध ही दिखाई देता है। उसे कितना ही सजाओं सवारों वह आंख को और इन्द्रिययों को मात्र धोखा को धोखा ही दे सकते है। मगर उसमें सजीवता नहीं पैदा कर सकते है। मैं चाहता हूं कि लोग यह समझे अपने अस्तित्व को को और उसकी भाषा को जीवन अभी और अभी में ही उसका आनान्द है उसके आगोस में तत्त्क्षण है। उसके लिए किसी विज्ञान या गणीत की आवश्यकता नहीं है, जरूरत है तो सिर्फ जागने कि और जो इस पल में जाग गया वह शरीर नहीं रहा वह शरीर का स्वामी हो गया और जो स्वामी है उसको तनाव कहां होता है। तनाव तो दास को होता है।
यस्मिन्सवार्णि भूतान्यात्मेंवाभूद्विजानतः। तत्र को मोहः कऋ शोक एकत्वमनुपश्यतः।
जैसा कि यह मन्त्र कह रहा है जो स्वयं को जानते है उसको यह लगता है। सब कुछ तो उसके पास है उसको किस वस्तु कि चिन्ता, तनाव, शोक मोह हो सकता है वह देखने से मूक्त हो जाता है।
यह तो निर्विचार, निर्विकल्प, निर्बिज समाधि कि अनुभूति का प्रथम पल है। जिसकी यात्रा पर प्रत्येक पथिक को चलना है, जो स्वयं को पाना चाहते हैं जो परम सत्य या कल्याण मार्ग का पथिक बनना चाहते है। उनके लिए ही झेनों में एक प्रसिद्ध कहानी कहते है।
सबको चोरी करने की कला सीखना चाहिए। जापान में एक बहुत ही प्रसिद्ध चोर था वह इतना ज्यादा प्रसिद्ध था। जिस प्रकार से भारत में सबसे अच्छे महा पुरुषों को सम्मान प्राप्त है। जिस प्रकार भारत में राम जैसे महापुरुषों को पुजा जाता है, और पश्चिम में नोबेल प्राप्त वैज्ञानिकों सम्मान मिलता है और पुजा जाता है।
उस चोर के अन्दर एक कला थी वब चोरी करता था लेकिन वह अपने जीवन में पकड़ा नहीं गया अर्थात सरकारी मुरजीम नहीं बना वह महापुरुषों में अग्रणी है वह बड़ी सफाई से अपना कार्य करता था। वह चोर अपना कार्य इस तरह से करता था जैसे वह प्रभु की ध्यान, प्रार्थना, साधना, समाधिसिद्धि के लिए उपासना कर रहा हो। यहां तक उसको वहां के राजा के द्वारा सबसे श्रेष्ट पुरष्कार उस देश का उसको दिया गया था। जिस प्रकार से भारत में सबसे अच्छे उच्य महापुरुष जो सज्जन के प्रकृत के है उनको पुरष्कार में भारत रत्न, पद्म श्री, पद्म भुषण दिया जाता है। इसी प्रकार से उस चोर को भी पुरष्कृत किया गया था। लेकिन आज लोग अपनी योग्यता से कहीं ज्यादा पाते है और बाद में उसका दुर्पयोग करते उसको पाने में ही उनका जीवन उनके लिए पूर्रणतः सोख लिया जाता है जैसे कपड़े में से पानी को निचोण लेते है। कपड़ा सुख कर कड़ा हो जाता है। सुखने का मतलब है उसमें से तरलता नष्ट हो जाती है। लेकिन उस चोर की प्रकृत बहुत अलग थी, और यह बहुत प्रसिद्ध जापान के रहस्यदर्शि का क्लासिकल सिद्ध योग का दृष्टान्त है। जब वह चोर 80 साल का बृद्ध हो गया। उस समय केवल उसका एक युवा लड़का था। उसने एक दिन अपने पिता से कहा अब आपकी उम्र बहुत हो गई है मरने से पहले आप अपनी कला को मुझको भी सीखा दे क्योंकि वह चोर बहुत श्रेष्ट चोरों का गुरू भी था। उसके पिता ने उससे कहा यह तो बहुत कठीन कार्य है यह तो ऐसा ही है जैसे ध्यान में उतरना हो और यह सबके लिए कहां सुलभ है। उसके बेटे ने उसकी कोई बात नहीं मानी जैसा कि बेटे बाप की बात कहा मानते है जिसे ऐसा लगता है की उसका बेटा उसकी बात मान रहा है तो यह उसके लिए सबसे बड़ा भ्रम है। क्योंकि इस जगत में ना ही ऐसे बेटे है ना ही ऐसे बाप ही है। यह एक रहस्यदर्शि है इसकी तुलना किसी से नहीं की जा सकती है वह अपने आप में अतुलनीय है। अन्त में उसने जब देखा की उसका लड़का उसकी बात नहीं मान रहा है तब उसने कहा ठीक है तुम आज रात मेंरे साथ चलना। रीत्री के समय उस चोर के साथ उसका बेटा भी हो लिया जब वह एक बड़े घर के पास पहुंचा तब वह चोर वहीं पर रुक गया, और अपना औजार निकाल कर उस मकान की निव खोंदने लगा। वह निव खोदने का कार्य ऐसे कर रहा था जैसे वह अपने घर में कार्य कर रहा हो। उसका लड़का उसके पास ही खड़ा हो कर थर-थर कापं रहा था उसके पसिने छुट रहें थे। वह बार-बार चारों तरफ घुम-घुम कर देख रहा था उसको भय सताए जा रहा था की उसको चोरी करते कोई पकड़ सकता है। उसका पिता उस समय अपने निव खोदने के कार्य में ऐसे तल्लीन था जैसे वह ध्यान में हो चारों तरफ से बेखबर था। नीव में जब सुराख हो गया तो वह मकान के अन्दर घुस गया और अपने बेटे को भी मकान के अन्दर बुला लिया। जब उसका पूत्र मकान के अन्दर पहुच गया तब उसके पिता ने अपनी जेब से चाभी का एक बड़ा गुच्छा निकाला कर घर में जो एक बड़ी आलमारी थी उसके ताले को खोल कर अपने बेटे से कहा जाओ आलमारी के अन्दर और देखो क्या-क्या बहुमूल्य अपने काम की जो भी बस्तु है उस को उसको निकाल कर ले कर आवों। जब उसका बेटा आलमारी के अन्दर गया तो बाहर से उसके पिता ने बाहर से आलमारी के दरवाजे को बन्द कर दिया, और जिस निंव को खोद कर मकान में प्रवेस किया था उसी मार्ग से वह निकल कर बाहर आकर अपने घर का रास्ता पकड़ा। उधर उसका बेटा आलमारी के अन्दर फंस गया और अपने बाप को बुहुत कोसने लगा कि इस मुर्ख ने यह मुझको कहां पर लाकर फंसा दिया? उसका दिमांग बिल्कुल शून्य हो गया उसको कुछ समझ में ही नहीं आ रहा था कि वह अब क्या करें? जिसकी उसने कभी कल्पना भी नहीं की थी वह उसके साथ हो रहा था। आलमारी के अन्दर उसको काफि देर गुजर गया लेकिन कोई नहीं आया उसको भय सताने लगा की थोड़े साय में ही सुबह होने वाली है और उस समय यदि किसी के हाथ वह लग गया तो उसके जिवन के लिए बड़ी समस्या उपस्थित हो जायेगी। जो भी कार्य यहां से निकलने के लिए किया जा सकता है किया जा सकता वह अभी रात्री में ही उसे अभी करना होगा अन्यथा बहुत देर हो जायेगी। यह विचार करके उसने आलमारी के अन्दर से आलमारी को इस तरह से खुरचने लगा जैसे कोई चुहा या बिल्ली आलमारी में फस गई है। खुरचने की आवाज को सुन उस घर की नौकरानी जाग गई और उसने विचार किया जरुर कोई बिल्ली आलमारी के अन्दर फंस गई है इसलिए उसने एक हाथ में चाभी का गुच्छा लिया और दूसरें हाथ में उसने एक दिपक लेकर वह आलमारी के पास आई और उसको खोलने लगी जैसे ही आलमारी खुली उस चोर के बेटे तुरन्त दिपक पर फुंक मार कर उसको बुझा दिया और उस औरत को धक्का देकर एक तरफ ढकलते हुए जिस मार्ग से मकान के अन्दर आया था उसी रास्ते से वह बाहर की तरफ अपने पैर को अपने सर पर रख कर वहां से भागा। जब उस नौकरानी ने चोर को देखा तो उसके तो हास उड़ गए उसने किसी तरह स्वयं को जल्दी से संतुलित किया और चिल्लाने लगी चोर-चोर उसकी आवाज को सुन कर उस घर के सभी सदस्य उठ खड़े हुए और पड़ोसी भी जाग गये और पूछा कहां है चोर नौकरानी तुरन्त उस सुराग को दिखाया जिससे वह बाहर की तरफ भागा था। सभी लोग उस चोर के बेटे के पिछे लग गये उसको पकड़ने के लिए चिल्लाते हुए पकड़ों मारों। चोर का लड़का तो ऐसे भाग रहा था जैसे नदी समन्दर की तरफ बरीष के दिनों में भागती है। तुफान के समय में जैसे धुल के कण हवा के साथ भागते है। जब उसने देखा की इस तरह से इन सब लोगों से स्वयं की जान को बचाना बहुत दुर्गम कठीन होगा। तभी उसकी निगाह रास्ते में एक कुए पर पड़ी जिसके पास ही एक बड़ा पत्थर पड़ा था उसने तुरन्त पलक झपकते ही उस पत्रथर के टुकड़े को उठा कर अपनी पूरी ताकत के साथ जोर से कुए में फेंक पत्थर के कुए में गीरते ही बहुत तेज आवाज हुई जो लोग उस चोर पिछे उसको पकड़ने के लिए भाग रहे थे जब तक वह सब कुए के पास पहुचे उससे पहले ही वह चोर का लड़का स्वयं को कुए पास के ही झाड़ीयों में छुपा लिया और लोगों ने समझा की वह चोर कुएं में कुद गया है सभी लोगों ने उस कुए को चारों तरफ से घेर लिया और चोर को कुएं में से निकालने का विचार करने लगें।
जबकी चोर का लड़का उन झाड़ीयों से निकल कर पिछे के मार्ग से अपने घर पहुचा तो क्या देखता है? उसका पिता अपने मुंह पर कम्बल डाल कर खर्राटे मार-मार कर आराम सो रहा है। उसने अपने पिता के मुंह से कम्बल को खीचा और पूछने लगा की तुमने क्या किया? मुझको फंसा कर चले आए और यहां आराम से सो रहें हो, वहां मेरी जान पर मुसिबत आ पड़ी थी। उसके पिता ने उघते हुए कहा तो तुम आ गए चलो अब सो जाओ सुबह इसके बारें में बात करेंगे। इसके बाद पुनः मुंह पर कम्बल डाल कर सोने लगा। उसके बेटे ने कहा यह क्या कर रहें हो तुम मुझे बताओ वहां मुझको छोड़ कर क्यों चले आए नहीं तो मैं सो नहीं पाउगा? उसके पिता ने कहा यह कार्य रोज नया होता है और रोज नया घर नयी अवस्था में जाते हैं इस कार्य में पूराना किसी प्रकार कोई अनुभव काम नहीं आता है वह भले ही मेंरा ही अनुभव क्यों ना हो? यहां तो स्वयं का निजी ज्ञान और अनुभव ही काम आता है। जो तुम ने कर लिया है अब तुम पक्के चोर बन गए हो कल से तुम अकेले ही चोरी करने के लिए जा सकते हो। होगा भी क्यों नहीं तुम मेरें बेटे हो और तुम्हारें अन्दर मेरा खुन है मेरा सारा गुण तुम्हारें अन्दर होना ही था। सुफी झेन कहते है कि जिस प्रकार चोरी करने में किसी प्रकार का पुराना अनुभव काम नहीं आता है क्योंकि रोज नए घर में और नई परीस्थिति जाना पड़ता है। उसी प्रकार से सत्य की जिसको प्यास है उसके लिए भी सब कुच हर पल नया होता है। वहां पर किसी दूसरें का अनुभव कभी भी स्वयं के काम नहीं आता है।
अहम् इन्द्रं न शरीरम् अर्थात हम शरीर नहीं इसके स्वामी है। जिसके पास सिर्फ शरीर है भले ही वह स्त्री या पुरुष वह अपूर्ण और अन्धे के समान है, और जिसके पास आखें हैं वह कोइ स्त्री हो या पुरुष हो वहीं इन्द्र, वहीं स्वामी, वही राजा है। स्त्री पुरुष जहां पूर्ण होते है जहां पर एक दूसरें में कोई अन्तर नहीं रह जाता है। शिव लिंग है जो किसी योनी प्रधान नहीं है। शिवलिंग तो मात्र एक प्रतिकात्मक है। वह मात्र संकेत के लिए है जो अन्धे की तरह अपने जीवन को जी रहें हैं। जिनकी अन्तरदृष्टि किसी कारण बस कार्य सही तरीके से नहीं कर रही है। वह शिवलिंग को देख कर समझ सके की वास्तवीकता क्या है? जैसा की प्रतिक को प्रस्तुत किया गया है आज भी दुनिया के किसी कोने में देख सकते है। किसी ना किसी रूप से प्रेरणा देने के लिए ही स्त्री और पुरुष के लिंग को आपस में एक साथ संभोग के समय की घटना को मन्दिरों में दर्साया या स्थापित किया गया है और वह पुजा और ध्यान के योग्य है ऐसा लोग आज भी करते है। वह सब मात्र प्रतिक और अलंकार से सुसज्रजीत किया गया है उसके पिछे एक दूसरा ही रहस्य छुपा है। मानव शरीर सबसे महत्त्वपूर्ण संवेदनशील बहुमूल्य सबसे अधीक आकर्षण पूर्ण है। वास्तविकता तो यह की हम सब को अपने लिंग को ध्यान के माध्यम से जानना चाहिए। लिंग का अर्थ है जाती से और इस पृथ्वी पर केवल एक जाती है जिसे मानव कहते है। जैसा की तुलसी दास कहते है कि लिंग थापी बिधीवत करी पुजा। शिव समान शिव मोही न दूजा।। अर्थात लिंग को स्थापीत करके ध्यानस्थ हो करों पुजा। अर्थात स्वयं को भली प्रकार से जानो उसके समान कोई नहीं है। जो मन से आत्रमा को छुड़ाने वाला है इसको ब्रह्मचर्य से जोड़ा गया है शिव का मतलब है जो सबका कल्याण करने वाला है। जननेन्द्रियों को भी कहते है इसका मतलब है जिससे सभी जीव को जन्रम लेने का सुअवसर मिलता है।
जैसा की न्याय दर्शन कार गौतम कहते है इच्छा-द्वेष-प्रयत्न-सुख-दुःख-ज्ञानान्यात्मनो लिग्ड़म्।। अर्थात इच्छा, द्वेष, प्रयत्न, सुख, दुःख का जिसको ज्ञान होता है वही लिंग मती आत्मा है। भ्रम होना स्वाभाविक है। क्योंकि लिंग से काम संभोग इस ब्रह्माण्ड की सबसे श्रेष्ट अद्भुत अद्वितीय और दिव्य घटना है जिसको सबसे अधीक बदनाम और कुरूप कर दिया है। इस पृथ्वी पर संभोग और समाधि दोनो एक दूसरें के पूरक है। मानव का मुंह बहुत सुन्दर है जिसको सभी बहुत पसन्रद करते हैं । पैर जो कुरूप समझा जाता है वह जितना आकर्षण नहीं है। उसे कम पसन्द करते है। लेकिन मानव शरीर के पूर्रणता के लिए परम आवश्यक है। ऐसा ही स्थान सब के जीवन में संभोग का भी है। संभोग के द्वारा ही प्रत्येक मानव का जन्रम हुआ है। और जिससे स्वयं की उत्पत्ती हो रही है उसी को हम सब बुरा कुरूप और गलत कहते है। इसको मानव जीवन से यदि किसी तरह से अलग कर दिया जाये तो मानव किस स्थिती को उपलब्ध करेंगा उसकी कल्पना भी हम सब नहीं कर सकते है। क्योंकि संभोग किसी प्रकार से यज्ञ से कम नहीं है। इसके लिए आवश्यक है जो ऋषि कह रहें है भद्रं पश्येमाक्षभिर्यजत्रा।। अर्थात हम सब यज्ञ भाव से जिससे सभी जीव जन्तु का कल्याण होता है सभी प्रणीयों का कल्याण हो। ऐसे दृश्यों को कभी ना देखें जिससे किसी का अकल्याण हमारी दृष्टि में ना आये।
जब तक इसको नहीं समझेगें तब तक शिव जो सबका कल्याण करने वाला है उसको समझना मुश्किल ही नहीं नामुमकिन-सा है। क्योंकि लिंग ही वह मुख्य आधार है जिससे शिवलिंग का जन्म होता है। जब लिंग समझ में आ गया तो शिव स्वतः समझ में आ जायेंगा। जैसा की स्वामी दयानन्द ने समझा उनको जो पहली झलक सच्चे शिव को प्राप्त करने की इच्छा शिवलिंग की मुर्ति को देख कर ही मिली उन्होंने देखा की यह तो मात्र प्रतिक है। सच्चा शिव तो प्रत्येक कण में व्याप्त है उसके लिए किसी बिषेश मुर्ति की पुजा करने की बात कहीं भी नहीं की गई है। वहां तो ध्यान करने की बात हो रही है, और वह सब इस लिए है कि ब्रह्मचर्य को समझा जा सके इस लिए ही स्वामी दयानन्द ब्रह्मचर्य के एक महान उपासक थे, और उनका ही नहीं सम्पूर्ण संस्कृत साहित्य में ब्रह्मचर्य पर बहुत जोर दिया गया है यह कहा जाए तो गलत नहीं की सम्पूर्ण संस्कृत साहित्य आधार भुत सिद्धान्त ब्रह्मचर्य की नीव पर ही खड़ा है। ब्रह्मचर्य तो रूपान्तरण की मुख्य किमीयां या विज्ञान है। इस विज्ञान को जिसने भी समझा वह स्वयं को सच्चे शिव का साक्षात्कार करके सदा-सदा की प्यास जो भौतिक किसी भी वस्तु को प्राप्त कर लेने पर भी बुझती वह भी बुझ जाती है। वह इस मृगतृष्णा से स्वयं को तृप्त और परम आनन्द को प्राप्त कर लिया है।
जो अन्धे है उनकी आखें ठीक की जा सकती सकती है। आखों के ठीक होते ही प्रकास का प्रमाण मिल जाता है। लेकिन यह भौतिक आखों से नहीं देख सकते हैं। जिसको शिव का शिव नेत्र कहते है। उस नेत्र की जो बिधी है उसका यदि सही उपयोग करेंगे तो उसमें सक की कोई गुन्जाईस नहीं है जिसे कृष्ण परम ज्ञान या परम बचन कहते है उसकी अनुभूति नहीं कर सकते है, और यह शिव नेत्र हम सभी में है। आवश्यक्ता है मात्र उस आख को खोलने का और उसे खोलने की जो तकनिकी है उसे ध्यान कहते है। कृष्ण जिसे परम बचन कहते है वह सब परम बचन उन्होंने वेदों से लिए है। क्योंकि जो भी इस पृथ्वी आज तक उस संम्पूर्ण ज्ञान विज्ञान और ब्रह्मज्ञान का श्रोत वेद ही है और आगे भी जो भी जाना जायेगा वह भी वेदों के अन्तरगत होगा। वेदों को एक अर्थ में आत्मा, ज्ञान, ब्रह्मचर्य, ऋत, और शिव को भी कहते है। क्योंकि आध्यात्म का अर्थ ही होता है अध्याय को आत्मा से जोड़ दिया है। अर्थात आध्यात्म आत्मा का पाठ आत्मा का ज्ञान सम्पूर्ण ज्ञान विज्ञान और ब्रह्मज्ञान का प्रारम्भ आत्मा से ही होता है। क्योंकि बिना आत्मा के शरीर मिट्टी से ज्यादा कुछ नहीं है। कृष्ण उसी के आधार पर बोलते है इस तरह से जो वेदों में है वह सब परम बचन है जिसे ना ही सत्य ही कह सकते है ना ही उनको असत्य ही कह सकते है। परम बचन इन दोनों के मध्य में है जिसे आत्मज्ञानी महापुरुष ऋत कहते है जो शास्वत और रहस्यपूर्ण है उसमें एक यह भी है की मानव सिर्फ शरीर नहीं है। इसके स्वामी इन्द्र राजा है।
मानव मन का शिकार हो गया वह अपने मन का दास बन गया और स्वयं को शरीर समझने की बहुत बड़ी बिमारी या महामारी का जो प्रकोप है उससे ग्रसित हो गया है।
इसका केवल इलाज है अन्तर्यामी के पास है। धर्म वह है जिसको अन्तर्यामी धारण करता है धर्म ही के पास एक मात्र समाधान है उनकी जो मानव में हजारों प्रकार की बिमारी हैं जिसमें से एक भयंकर बिमारी उब भी है उब सदा के सदा के लिए समाप्त हो सकती है या युं कहे की खत्म होने की भरपूर सम्भावना भी है। किसी ने आज तक सिद्ध पुरुषों के चेहरें पर किसी तरह की सिकन या संसार और उसकी प्रत्येक वस्तु से किसी प्रकार का द्वन्द बिरोध अन्तर्द्वन्द पिड़ा की शिकायत नहीं देखी है। लेकिन आज समय बदल गया है ऐसा लोग कहते है। वह जो मानव चेतना के बारें में नहीं जानते है कि चेतना कभी भी नहीं बदलती है। यहां इस जगत में एक अलग स्थिति पैदा हो रही है। जो कभी निराश, हराश, उदास किसी प्रकार का डेपरेसन का शिकार नहीं हुआ वह आदमी कैसा होगा क्या हम सब उसकी कल्पना कर सकते है, क्योंकि आज के समय में इस पृथ्वी पर स्वस्थ्य मानव को तलासना बहुत जोखीम भरा कठीन कार्य है उसकी सम्भावना कम ही हैं। जैसा कि हमने पहले ही विचार कीया था की दुःख मुख्यतः तीन तरह के होते है शारीरिक, मानसिक, और आध्यात्मिक तो इस सम्पूर्रण जगत में ऐसे बहुत है जो कहेंगे की मैं पूर्णरूप से स्वस्थ्य हूं। जो ऐसा कहते है वह शरीर से स्वस्थ्य है जिनमें मानसीक बिमारी की मात्रा सबसे अधीक है। दैविक और आध्यात्मिक परेशानि से लग-भग सभी लोग ग्रसित या पिड़ीत है। जो सिद्ध पुरुष होते है वह हमेंशा प्रफुल्लीत और तरोताजा आनन्दित उत्साहित रहते है। क्रयोंकि उनके जीवन में ध्यान की महत्त्व पूर्रण भुमिका होती है जो उन सभी को और उनके चेहरें को मुर्झाने नहीं देती है ध्यान का कार्य यही है कि जो भी पूराना है उसे खत्म कर देता है वह मानव अस्तित्व को रेफ्रेस करने का कार्य करता है।
जीवन से अद्वितीय और भी कोई वस्तु हो सकती है इसकी कल्पना भी फी करना असम्भव है, और यह भी बात है की जीवन से निकृष्ट भी कोइ वस्तु इस भुमंण्डल पर नहीं हैं। हम किसी भी विषय पर विचार दो प्रकार से कर सकते है। एक पक्ष ज्ञान का प्रकाश का जीवन का पाजटीव विधायक दृष्टि है। दूसरा अज्ञान अन्धकार नकारात्मक जीवन का पक्ष है। एक तीसरा पक्ष भी है जिसके पक्ष में ऋषि, महर्षि, ब्रह्मज्ञानी, साधु, सन्त फकीर, योगी और सद्गुरु खड़े है। इस बात को समझ ले की यह सब केवल शरीर का प्रतिनिधित्व नहीं करते है यदि वह शरीर या आत्मा का प्रतिनिधित्व करतें है तो यह जान लेना की वह गुढ़ ज्ञान की दुनिया के अनुपम सम्राट नहीं बन पायें हैं। वह भी संसारी से कुछ अधीक नहीं है। जो यह तीसरा पक्ष है वही इस पृथ्वी पर सबसे बहुमूल्य अन्यथा सब कुछ कौड़ीयों का समान है। यद्यपि ऋषि कह रहा है की यह शरीर भष्म होने वाली है अर्थात शरीर का अन्त होने वाला है। इसमें दो बातें है एक शरीर भष्म हो रही है और दूसरी बात है शरीर का अन्त होने वाला है। इसमें तुम सब कहोगे की नया क्या है दोनो का इर्रथ एक समान है जबकी वेद का मंत्र ऐसा बिल्कुल नहीं कह रहा है। वेद तीसरी बात की तरफ संकेत कर रहे है। जो इसमें अनन्त निरन्तर यात्रा कर रहा है। द्रष्टा जो देखने वाला है ऋषि कहना चाहते हैं की साक्षी भाव को जागृत करने के लिए क्योंकि आगे मंत्र कह रहा है कृतम स्मरः अपने किये हुए कर्मों को देखो उनका निरीक्षण करों अथवा स्मरण करों। अब सवाल उठता है कि यह आत्मनिरीक्षण का कार्य कौन करेगा? जो भष्म हो रहा वह है या जो अन्त की तरफ निरन्तर एक-एक कदम बढ़ रहा है वह। या जो इस कृया को द्रष्टा बन कर जो देख रहा है। जो भष्म ही हो रहा है यह भष्म होने की कृया आन्तरीक घट रही है जिस प्रकार से दीपक का तेल खत्म हो रहा हो और दीपक में तेल खत्म होते ही वह बुझ जाएगा। उसी प्रकार से इस शरीर में भी जो प्राण उर्जा है समाप्त भष्म कोयले की तरह से राख हो रही हैं। इसलिए ही ऋषियों ने प्रणायाम जैसी बिधीयों का आविस्कार सृजन किया है।
क्या है? इसका उत्तर पतञ्जली दे रहें है। तस्मिन् सति श्वास प्रश्वासयोर्गतिविच्छेदः प्रणायामः।। जो हमारी शांसे चल रही हैं श्वांस प्रश्वांस को उसको उसी स्रथान पर रोक देने का या उस पर अपना नियंत्रण करलेना ही प्रणायाम है। हम श्वांस में केवल आक्सिजन ही नहीं लेते है यद्यपि वह तो मात्र एक माध्यम की तरह से है उसके साथ हम सब प्राण उर्जा को ग्रहण करते है। अर्थात जिस तरह से हम सब रूपये को खुब बचा-बचा कर खर्च या व्यय करते है उसी तरह से प्रकार से एक योगी, ज्ञानी, ध्यानी प्राण उर्जा को व्यय करते हैं। जिससे इस खत्म होने वाली प्राण उर्जा को जल्रदी सामाप्त होने से बचाया जा सके।
श्रोत्रमसि श्रोत्रं में दाः स्वाहा। प्रभो तू श्रोत्र असी हैमुझे तू सुनने की शक्ति दे यह मैं सच्चे मन से कह रमा हूं जिससे विश्वआत्मा का कल्याण हो। जिस प्रकारों से हम सब रूपये को व्यय करते हैं बचा-बचा कर उसी प्रकार से यह प्राण उर्जा भी उससे भी बहुत अधीक किमती है। जो निरन्तर अपने अन्रत की तरफ़ ही बढ़ रहा है वह कैसे आत्मा का निरीक्षण कर सकता है? और अन्रत की तरफ यह शरीर ही बढ़ रही है। क्योंकि शरीर शाश्वत नहीं है यह शरीर मिट्टि के पुतले से ज्यादा नहीं लेकिन जो इस शरीर में रहने वाले को जानते है’ उनके लिए यह शरीर सम्पूर्ण विश्व ब्रह्माण्ड के समान है। आत्मा भी स्वयं का आत्म चिन्तन नहीं कर सकती है क्योंकि आत्मा— तो स्वयं पूर्ण और परम आनन्द में है वह अपने बारें में क्या चिन्तन करेंगी? यह कार्य तो बुद्धि को करना है इसलिए ही संस्कृत के प्रकाण्ड विद्वान चाणक्य कहते बुद्धि यस्य बलमं तस्य, अर्रथात जहां पर बुद्धि है वहीं पर बल है। एक किनारें पर शरीर है और दूसरें किनारें पर आत्मा है लेकिन द्रष्टा साक्षी भाव इन दोनो के मध्य में है। इस लिए ही वेद कहते है कि मध्रय में आ जाओ। जैसा की महात्मा बुद्ध कहते है मध्यमनिकाह् अर्थात ना सागर के इस तरफ जो शरीर की भांति है ना सागर के दूसरें किनारें पर ही जो आत्मा की तरह से है। इन दोनो किनारें पर नहीं ठहरना है क्योंकि यह दोनो किनारें खतरनाक है। यहां तो जो प्रय है वह भी अपना शिकार बना लेता है और जो दूसरें किनारें पर प्रय है वह भी स्वयं की आत्मा को गुलाम बनाकर दुःख ही देते हैं। यहो इस जगत में ना ही कोई प्रीय है ना ही कोई अप्रीय ही है। हमें को समान रूप से देखने की दृटि को विकसीत करने की आवश्यक्ता है जो ऐसा करते है उनको ही समदर्शी कहते है। जैसा की महात्मा बुद्ध कहते है जो समान रूप से सबको देखता है। जिसको ज्रयादा दुःख अपने शत्रु से होती है जो अप्रीय है। इसका मतलब यह है कि वह अपने मित्र से कही अधीक अपने शत्रु से जुड़ा है। क्योंकि नफरत का ही एक रूप उदासी बैराग्य है। अन्रतर सिर्फ इतना है जो शत्रु को देखने वाला व्यक्ति है यदि वह बुद्धिमान है तो वह उससे स्वयं को उलझाने के बजाय वह अपनी शक्ति को अपने शत्रु से लड़ने के बजाय किसी दूसरें कार्रय को सम्पन्न करने में लगाता है। बैराग्य के दिए पतञ्जली कहते है। दृष्टानुश्रविकविषयवितृष्णस्य वशीकारसंज्ञा बैराग्यम्।।
- हम केवल शरीर नहीं हैं, बल्कि आत्मा के रूप में साक्षी और स्वतंत्र हैं।
- वर्तमान क्षण में जागरूक रहना जीवन का सर्वोच्च आनंद है।
- ध्यान, ब्रह्मचर्य और समाधि से मानसिक और आध्यात्मिक शक्ति प्राप्त होती है।
- समान दृष्टि, मोहमुक्ति और विवेकपूर्ण जीवन ही सच्ची स्वतंत्रता है।
- जीवन का सबसे बड़ा रहस्य आत्मा का अनुभव है, और यही ब्रह्मज्ञान का मार्ग है।
“यस्मिन्सर्वाणि भूतान्यात्मैवाभूद्विजानतः। तत्र को मोहः कः शोक एकत्वमनुपश्यतः।।”
इस मंत्र के अनुसार, जो स्वयं को जानता है, वह संपूर्ण और मुक्त होता है।



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