🧘 धारणा, वितर्क और समाधि का भेद
(योगदर्शन के सन्दर्भ में जिज्ञासा का समाधान)
❓ जिज्ञासा
योग के आठ अंगों में छठा अंग धारणा है।
धारणा में मन को नासिका, मस्तक, हृदय आदि किसी एक स्थान पर स्थिर करने की बात कही गई है।
परंतु जब सप्रज्ञात समाधि के अन्तर्गत वितर्क अवस्था का वर्णन आता है, वहाँ अलग-अलग स्थानों पर मन लगाने का उल्लेख मिलता है।
तो प्रश्न यह है —
जब धारणा में एक स्थान चुन लिया, तो वितर्क समाधि में अलग-अलग स्थान क्यों?
📖 शास्त्रीय आधार
1️⃣ धारणा की परिभाषा
महर्षि पतञ्जलि ने (3.1) में कहा—
“देशबन्धश्चित्तस्य धारणा।”
अर्थात् चित्त को किसी एक देश (स्थान) में बाँध देना ही धारणा है।
महर्षि दयानन्द ने में लिखा है कि—
मन को चंचलता से हटाकर नाभि, हृदय, मस्तक, नासिका या जिह्वा के अग्रभाग आदि स्थानों में स्थिर कर ओंकार जप एवं परमेश्वर का चिन्तन करना ही धारणा है।
👉 मुख्य बात: मन को स्थिर करना।
2️⃣ धारणा, ध्यान और समाधि का संबंध
पतञ्जलि का सूत्र—
“त्रयमेकत्र संयमः।” (योगसूत्र 3.4)
अर्थात् धारणा + ध्यान + समाधि — जब एक ही विषय में एकत्र हो जाएँ, तो वह संयम कहलाता है।
सूत्र रूप में:
धारणा + ध्यान + समाधि = संयम
धारणा जिस स्थान पर की जाती है,
उसी स्थान पर ध्यान गहराता है
और वहीं समाधि लगती है।
धारणा क्या है सरल भाषा में
योग के आठ अंगों में धारणा
देशबन्धश्चित्तस्य धारणा अर्थ
संयम का अर्थ योग में
त्रयमेकत्र संयमः व्याख्या
वितर्क समाधि क्या होती है
सप्रज्ञात समाधि का अर्थ
सालंब समाधि क्या है
नासिकाग्र ध्यान का महत्व
जिह्वाग्र धारणा क्यों
प्राणायाम से मन की स्थिरता
योगसूत्र 1.35 अर्थ
योगसूत्र 3.1 व्याख्या
महर्षि पतंजलि का योग दर्शन
धारणा ध्यान समाधि में अंतर
अष्टांग योग के अंग
मन को स्थिर कैसे करें
दिव्य गंध अनुभव ध्यान
चित्तवृत्ति निरोध का अर्थ
स्थूल और सूक्ष्म आलंबन
योग में एकाग्रता कैसे बढ़ाएँ
ध्यान का सही तरीका
आध्यात्मिक साधना क्रम
समाधि की अवस्थाएँ
योग दर्शन प्रश्नोत्तर
🔍 अब आपकी शंका का समाधान
आपने जो वितर्क समाधि का संदर्भ दिया, वह वास्तव में 1.35 के सूत्र से संबंधित है—
“विषयवती वा प्रवृत्तिरुत्पन्ना मनसः स्थितिनिबन्धनी।”
यहाँ वितर्क समाधि का नहीं,
मन की स्थिरता के उपायों का वर्णन है।
🧠 धारणा और वितर्क समाधि में अंतर
🔹 धारणा क्या है?
- किसी एक स्थान का चयन
- उसी में चित्त स्थिर करना
- स्थिरता प्राप्त करना
स्थान अनेक बताए गए हैं —
नाभि, हृदय, नासिका, जिह्वाग्र आदि।
परंतु साधक एक समय में एक ही स्थान चुनता है।
🔹 वितर्क समाधि क्या है?
- यह सालंब (आधारयुक्त) समाधि है
- इसमें स्थूल विषय (जैसे पृथ्वी, नासिकाग्र आदि) का आलंबन लिया जाता है
- अलग-अलग स्थूल विषयों के अनुसार अलग-अलग स्थान चुने जाते हैं
उदाहरण:
- दिव्य गन्ध का अनुभव → नासिकाग्र
- दिव्य रस का अनुभव → जिह्वाग्र
- अन्य स्थूल तत्वों के लिए भिन्न आलंबन
👉 इसलिए यहाँ स्थान बदलते दिखाई देते हैं।
🌿 मुख्य समझ
धारणा में:
“अनेक स्थानों में से एक का चयन”
वितर्क समाधि में:
“अनेक स्थूल विषयों के अनुसार अलग-अलग आलंबन”
जब एक ही विषय लेकर साधना करेंगे,
तो स्थान भी एक ही रहेगा।
✨ सार
- ऋषि ने धारणा के लिए केवल एक स्थान निर्धारित नहीं किया।
- अनेक स्थान बताए हैं — पर साधक एक समय में एक ही चुनता है।
- वितर्क समाधि स्थूल विषयों पर आधारित है।
- विषय भिन्न होंगे तो आलंबन भी भिन्न होंगे।
- इसलिए विरोध नहीं, बल्कि साधना के क्रम का विस्तार है।
🕉 निष्कर्ष
धारणा मन को स्थिर करने की प्रक्रिया है।
वितर्क समाधि उस स्थिर मन को स्थूल विषयों पर गहराई से लगाने की अवस्था है।
दोनों में विरोध नहीं —
बल्कि एक क्रमिक प्रगति है।
जिज्ञासा 1- योग के आठ अंगों में जिनका ‘साधन पाद’ में उल्लेख है, छठा अंग ‘धारणा’ है। उसमें मन को शरीर के किसी एक अंग- जैसे नासिका, मस्तक आदि पर स्थिर करने की बात कही है। इसी स्थान पर आगे ध्यान, समाधि लगती है, परन्तु ‘समाधि पाद’ में सप्रज्ञात समाधि के अन्तर्गत जब वितर्क रूपी स्थिति, जिसमें पृथिवी आदि स्थूल भूतों का साक्षात्कार होता है, उसमें मन को नासिका, जिह्वा आदि अलग-अलग स्थानों पर लगाने का उल्लेख है। मेरी शंका यही है कि धारणा के समय जब एक स्थान चुन लिया है तो फिर वितर्क समाधि में अलग-अलग स्थान क्यों?
योग में धारणा का अर्थ
धारणा ध्यान और समाधि का संबंध
संयम क्या है योग में
वितर्क समाधि क्या है
सप्रज्ञात समाधि का अर्थ
योगसूत्र 3.1 अर्थ
योगसूत्र 1.35 व्याख्या
देशबन्धश्चित्तस्य धारणा
त्रयमेकत्र संयमः अर्थ
महर्षि पतंजलि योग दर्शन
आशा है, मैं अपनी जिज्ञासा को ठीक प्रकार प्रकट कर पाया हूँ। आपसे निवेदन है कि इसका समाधान देने की कृपा करें।
समाधान– योग के आठ अंगों में धारणा छठा अंग है। धारणा की परिभाषा करते हुए महर्षि पतञ्जलि ने लिखा- ‘‘देशबन्धश्चित्तस्य धारणा।’’ इस सूत्र की व्याया करते हुए महर्षि दयानन्द ने ऋग्वेदादिभाष्यभूमिका के उपासना प्रकरण में लिखा- ‘‘जब उपासना योग के पूर्वोक्त पाँचों अंग सिद्ध हो जाते हैं, तब उसका छठा अंग धारणा भी यथावत् प्राप्त होती है। धारणा उसको कहते हैं कि मन को चञ्चलता से छुड़ाके नाभि, हृदय, मस्तक, नासिका और जीभ के अग्रभाग आदि देशों में स्थिर करके ओंकार का जप और उसका अर्थ जो परमेश्वर है, उसका विचार करना।’’ धारणा के लिए मुय बात अपने मन को एक स्थान पर टिका लेना, स्थिर कर लेना है। टिके हुए स्थान पर ही ध्यान करना और वहीं पर समाधि का लगना होता है। इसके लिए महर्षि पतञ्जलि ने लिखा- ‘‘त्रयमेकत्र संयमः’’ अर्थात् धारणा, ध्यान, समाधि तीनों का एक विषय हो जाना संयम कहलाता है। इस सूत्र पर महर्षि दयानन्द ने लिखा- ‘‘जिस देश में धारणा की जाये, उसी में ध्यान और उसी में समाधि, अर्थात् ध्यान करने योग्य परमेश्वर में मग्न हो जाने को संयम कहते हैं, जो एक ही काल में तीनों का मेल होना, अर्थात् धारणा से संयुक्त ध्यान और ध्यान से संयुक्त समाधि होती है। उसमें बहुत सूक्ष्म काल का भेद रहता है, परन्तु जब समाधि होती है, तब आनन्द के बीच में तीनों का फल एक ही हो जाता है।’’ ऋग्वेदादिभाष्यभूमिका
धारणा+ध्यान+समाधि= संयम।
अब आपकी बात पर आते हैं, आपने जो कहा कि ‘‘……सप्रज्ञात समाधि के अन्तर्गत जब वितर्क रूपी स्थिति जिसमें पृथिवी आदि स्थूल भूतों का साक्षात्कार होता है, उसमें मन को नासिका, जिह्वा आदि अलग-अलग स्थानों पर लगाने का उल्लेख है।’’ आपकी यह बात ‘‘वितर्कविचारानन्दास्मिता…..।’’ योगदर्शन 1.17 इस सूत्र में नहीं कही गई, हाँ ‘‘विषयवती वा प्रवृत्तिरुत्पन्ना मनसः स्थितिनिबन्धनी।’’ योगदर्शन 1.35 इसमें कही है। इसमें वितर्क समाधि की बात नहीं, यहाँ तो मन की स्थिरता का कारण बताया है। यहाँ कहा है- नासिकाग्र आदि स्थानों पर चित्त को स्थिर करने से उत्पन्न दिव्यगन्धादि विषयों वाली प्रवृत्ति मन की स्थिति का कारण होती है।
इस सूत्र से पहले प्राणायाम का वर्णन किया हुआ है। ऋषि ने प्राणायाम को चित्त की स्थिरता का प्रमुख उपाय कहा है, अर्थात् प्राणायाम मन स्थिर करने का प्रमुख उपाय है। अब इसके आगे मन को स्थिर करने के अन्य गौण उपाय कहे हैं, उनमें यह उपाय भी है। जब योगायासी जिह्वाग्र, नासिकाग्र आदि स्थानों पर मन को स्थिर करता है, तब दिव्यरसादि की अनुभूति होती है। यह अनुभूति रूप व्यापार सामान्य न होकर उत्कृष्ट होता है। यह प्रवृत्ति मन को एकाग्र करने में सहायक होती है और साधक का अतीन्द्रिय पदार्थों को जानने में विश्वास पैदा होता है और श्रद्धा पैदा होती है। तात्पर्य यह हुआ कि स्थान विशेष पर धारणा कर मन को स्थिर (एकाग्र) करना है।
वितर्क आदि समाधि सालब हैं। वहाँ स्थूल का आलबन करते हैं, अर्थात् नासिकाग्रादि का आलबन करना वितर्क कहलाता है। वितर्क समाधि एक-एक स्थान का आलबन करने से होती है। आपने जो पूछा- ‘धारणा के समय जब एक स्थान चुन लिया है तो फिर वितर्क समाधि में अलग-अलग स्थान क्यों?’ आप इस वितर्क समाधि के स्वरूप को समझेंगे तो आपको यह शंका नहीं होगी। वितर्क समाधि सालब समाधि है और वे आलबन स्थूल हैं, अलग-अलग हैं। अलग-अलग होने पर अलग-अलग स्थान धारणा के लिए चुने हैं।
धारणा के लिए भी ऋषि ने केवल एक ही स्थान निश्चित नहीं किया, वहाँ भी अनेक स्थान कहें हैं। अनेक में से कोई एक तो है, पर केवल एक नहीं है। जब दिव्य गन्ध की अनुभूति करनी है तो धारणा स्थल एक नासिकाग्र ही होता है, वहाँ स्थान बदले नहीं जाते। ऐसे ही अन्य विषयों में भी है। इसलिए जो अलग-अलग स्थान आप देख रहे हैं, वे अनेक विषयों को लेकर देख रहे हैं, जब एक ही विषय को लेकर देखेंगे तो अलग-अलग धारणा स्थल न देखकर एक ही स्थान देख पायेंगे।
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