कर्मों का संस्कार और उसका फल कब मिलता है?

कर्मों का संस्कार (कर्माशय) — योगदर्शन के प्रकाश में विस्तृत विवेचन मूल सूत्र “क्लेशमूलः कर्माशयो दृष्टादृष्टजन्मवेदनीयः।”

🕉 कर्मों का संस्कार (कर्माशय) — योगदर्शन के प्रकाश में विस्तृत विवेचन

मूल सूत्र

“क्लेशमूलः कर्माशयो दृष्टादृष्टजन्मवेदनीयः।”
— (2.12)

कर्मों का संस्कार क्या होता है

क्लेशमूलः कर्माशयः अर्थ

दृष्टादृष्टजन्मवेदनीय व्याख्या

योगसूत्र 2.12 अर्थ

कर्म और संस्कार का संबंध

पुण्य और पाप संस्कार

कर्मफल सिद्धांत योग दर्शन

वर्तमान और भविष्य जन्म का फल

कर्माशय कैसे नष्ट होता है

व्यासभाष्य कर्माशय व्याख्या


1️⃣ कर्माशय क्या है?

‘कर्माशय’ शब्द दो भागों से बना है —

  • कर्म = क्रिया
  • आशय = संस्कार (मन पर पड़ी छाप)

👉 कर्माशय = कर्मों का संस्कार

जब मनुष्य कोई कर्म करता है, तो वह क्रिया तो समाप्त हो जाती है, पर उसकी छाप (संस्कार) चित्त में रह जाती है। वही संस्कार आगे चलकर सुख या दुःख के रूप में फल देता है।

इन संस्कारों को ही शास्त्रों में

  • धर्म–अधर्म
  • पुण्य–अपुण्य
  • अदृष्ट

कहा गया है।


2️⃣ ‘क्लेशमूलः’ का अर्थ

सूत्र में कहा गया है कि कर्माशय क्लेशमूल है।

क्लेश पाँच हैं:

  1. अविद्या
  2. अस्मिता
  3. राग
  4. द्वेष
  5. अभिनिवेश

इन क्लेशों के कारण ही मनुष्य कर्म करता है।

जब तक अविद्या है, तब तक राग-द्वेष है;
और जब तक राग-द्वेष है, तब तक कर्म और कर्माशय है।


3️⃣ दृष्ट और अदृष्ट जन्म वेदनीय

सूत्र का तीसरा भाग कहता है—

दृष्टजन्मवेदनीय = वर्तमान जन्म में अनुभव करने योग्य फल
अदृष्टजन्मवेदनीय = भविष्य जन्म में अनुभव करने योग्य फल

अर्थात् कर्माशय का फल या तो इसी जन्म में मिलता है,
या आगे आने वाले जन्मों में।


4️⃣ कर्माशय का निर्माण कैसे होता है?

महर्षि वेदव्यास (योगभाष्य) के अनुसार —

पुण्य और अपुण्य कर्माशय काम, लोभ, मोह और क्रोध से उत्पन्न होते हैं।

जब मनुष्य कामना, लोभ, मोह या क्रोध से प्रेरित होकर कर्म करता है, तो वही कर्म संस्कार बन जाता है।

उदाहरण:

  • स्वर्ग की कामना से यज्ञ करना → पुण्य
  • लोभ से छल करना → पाप
  • क्रोध से हिंसा करना → पाप
  • द्वेष से श्रेष्ठ बनने का प्रयास → कभी पुण्य भी

इस प्रकार एक ही भाव से पुण्य और पाप दोनों हो सकते हैं।

कर्माशय क्या है सरल भाषा में

योगसूत्र 2.12 का अर्थ

क्लेशमूलः कर्माशयः व्याख्या

कर्म और संस्कार में अंतर

कर्मफल कब मिलता है

वर्तमान जन्म का कर्मफल

भविष्य जन्म में कर्मफल

पुण्य और पाप संस्कार क्या हैं

कर्माशय कैसे बनता है

कर्माशय कैसे नष्ट होता है

योग दर्शन में कर्म सिद्धांत

व्यासभाष्य कर्माशय अर्थ

दृष्टजन्मवेदनीय का अर्थ

अदृष्टजन्मवेदनीय का अर्थ

पुनर्जन्म और कर्म संबंध

क्लेश क्या हैं योग में

अविद्या से कर्म कैसे बनते हैं

दग्धबीज कर्म क्या है

योग से पुनर्जन्म कैसे रुकता है

कर्माशय और मोक्ष

तीव्र संवेग का अर्थ योग में

मन्त्र तप समाधि का महत्व

कर्म सिद्धांत वेदांत और योग

नन्दीश्वर और नहुष उदाहरण

पुण्य कर्म शीघ्र फल कैसे देता है

पाप कर्म का तत्काल फल

योगी का कर्माशय

क्लेश और पुनर्जन्म

मनुष्य योनि और कर्मफल

धर्म अधर्म संस्कार


5️⃣ कौन-सा कर्म तुरंत फल देता है?

महर्षि वेदव्यास कहते हैं —

तीव्र संवेग, मन्त्र, तप, समाधि, ईश्वर-उपासना, विद्वानों की सेवा आदि से किया गया पुण्य कर्म शीघ्र फल देता है।

शीघ्र फल देने वाले पुण्य के साधन:

  • वेद अध्ययन
  • गायत्री जप
  • तप (शरीर, वाणी, मन का संयम)
  • समाधि
  • ईश्वर-भक्ति
  • ऋषि ग्रंथों का स्वाध्याय

ऐसा पुण्य वर्तमान जन्म में भी फल दे सकता है।


6️⃣ शीघ्र फल देने वाला पाप

यदि कोई व्यक्ति:

  • भयभीत लोगों को कष्ट दे
  • रोगियों का शोषण करे
  • निर्धनों को सताए
  • विश्वासघात करे
  • तपस्वियों का अपकार करे

तो उसका पाप भी शीघ्र फल देता है


7️⃣ उदाहरण — तत्काल फल

महर्षि वेदव्यास दो उदाहरण देते हैं:

🔹 नन्दीश्वर कुमार

तीव्र तप, मन्त्र और समाधि से मनुष्यत्व से देवत्व को प्राप्त हुए।

🔹 नहुष

अहंकार और अन्याय के कारण राजपद से पतित हुए।

(विवरण: 2.13 व्यासभाष्य)

👉 यहाँ ध्यान देने योग्य बात:
इनका परिवर्तन उसी जन्म में हुआ, नया शरीर लेकर नहीं।


8️⃣ वर्तमान जन्म में कौन-सा फल मिलता है?

वर्तमान जन्म में कर्माशय का फल दो प्रकार से मिलता है:

  1. भोग (सुख-दुःख)
  2. आयु (जीवन अवधि)

परंतु जाति परिवर्तन (मनुष्य से पशु आदि) वर्तमान जन्म में नहीं होता।
वह नए जन्म में होता है।


9️⃣ विशेष स्थिति

🔥 अत्यंत पापी के लिए:

कुछ घोर कर्म ऐसे होते हैं जिनका फल केवल भविष्य जन्म में मिलता है।

🕉 योगी के लिए:

जो योगी अपने क्लेशों को “दग्धबीज” (जले हुए बीज) बना देता है, उसका अदृष्टजन्मवेदनीय कर्माशय नहीं रहता।

अर्थात् उसका पुनर्जन्म नहीं होता — वह मुक्ति को प्राप्त होता है।


📌 सारांश

  • कर्म समाप्त हो जाता है, पर उसका संस्कार (कर्माशय) रह जाता है।
  • कर्माशय क्लेशों से उत्पन्न होता है।
  • उसका फल वर्तमान या भविष्य जन्म में मिलता है।
  • तीव्र साधना से पुण्य शीघ्र फल देता है।
  • तीव्र पाप भी शीघ्र फल देता है।
  • योगी क्लेशों को नष्ट कर पुनर्जन्म से मुक्त हो सकता है।

✨ अंतिम निष्कर्ष

मनुष्य ही ऐसा प्राणी है जो कर्म करने की स्वतंत्रता और बुद्धि रखता है।
वही कर्म करता है, वही संस्कार बनाता है, और वही फल भोगता है।

योग का उद्देश्य है —
क्लेशों को जला कर कर्माशय को समाप्त करना।

क्लेशमूलः कर्माशयो दृष्टादृष्टजन्मवेदनीयः

प्रस्तुत सूत्र में ‘कर्माशयः’ शद आया है, इसका अभिप्राय है – कर्मों का संस्कार, जिन्हें धर्माधर्म अथवा पुण्यापुण्य शदों से कथन किया जाता है और इसे अदृष्ट शद से भी बोला जाता है। कर्माशय शद में ‘कर्म’ का अभिप्राय हम जानते ही हैं और ‘आशय’ का अभिप्राय संस्कार है। कर्माशय अर्थात् कर्मसंस्कार। इसका तात्पर्य यह है कि मनुष्य कर्म करता है, वह कर्म क्रिया होने से कर्म करने के उपरान्त समाप्त होता है। यह सर्वविदित है कि क्रिया,क्रिया काल में ही विद्यमान रहती है और क्रिया के बाद समाप्त होती है, इसलिए क्रिया के काल में क्रिया की छाप मन में पड़ती है, उस छाप को संस्कार कहते हैं। वह संस्कार धर्म-पुण्य अथवा अधर्म-अपुण्य के रूप में दो प्रकार का होता है। इसी धर्माधर्म-पुण्यापुण्य रूपी संस्कार को कर्माशय शद से सूत्रकार ने स्पष्ट किया है। इस कर्माशय के आधार पर ही परमेश्वर मनुष्य को सुख-दुःा रूपी फल प्रदान करता है। सूत्र में ‘क्लेशमूलः’ पद आया है, इसका अभिप्राय है- अविद्या, अस्मिता, राग, द्वेष, अभिनिवेश मूल= कारण वाले कर्माशय, अर्थात् अविद्या आदि पाँचों क्लेशों के कारण ही मनुष्य कर्म करता है, इसलिए कर्माशय क्लेशमूल= क्लेशकारण वाले हैं। सूत्र में तीसरा पद आया है-‘दृष्टादृष्टजन्मवेदनीयः’। इस शद को अलग-अलग करने पर ‘दृष्टजन्मवेदनीय’और ‘अदृष्टजन्मवेदनीय’ दो शद बनते हैं। दृष्ट का अभिप्राय वर्तमान काल से है और अदृष्ट का अभिप्राय भविष्यत काल से है। जन्म शद से हम परिचित हैं। वेदनीय शद का अभिप्राय है- अनुभवनीय, अर्थात् अनुभव करने योग्य। इस प्रकार दृष्टजन्मवेदनीय का अर्थ हुआ वर्तमान जन्म में अनुभव करने योग्य सुख-दुःख रूपी फल और अदृष्टजन्मवेदनीय का अर्थ हुआ भविष्यतकाल में अनुभव करने योग्य सुख-दुःख रूपी फल।
प्रस्तुत सूत्र का अर्थ इस प्रकार समझना चाहिए कि क्लेशमूल- क्लेश आधार- क्लेशकारण वाले कर्माशय के फल वर्तमान जन्म में और आगे भविष्य में मिलने वाले जन्मों में अनुाव किये जाते हैं। मनुष्य प्रवाह (परपर) से, अनादि काल से धर्मयुक्त और अधर्मयुक्त कर्मों को करता हुआ आ रहा है और उनके फलों को काल के अनुसार, अर्थात् इस वर्तमान जन्म में और आगे आने वाले भविष्य के जन्मों में भोगता हुआ आ रहा है और भोगेगा। इस प्रकार फल देने वाले कर्मों को करने की योग्यता और सामर्थ्य केवल मनुष्य में ही संभव है, अर्थात् मनुष्य से इतर योनियों में सभव नहीं है। वेदादि शास्त्रों में विधि या निषेध केवल मनुष्य जाति के लिए ही किये हैं। परमात्मा ने मनुष्य को ऐसी बुद्धि दी है, जिसका प्रयोग करके वह प्रवाह (परपरा) से चले आ रहे क्लेशों और कर्मों को जानकर और अपनी बुद्धि में बिठाकर इस संसार में आने के प्रयोजन को पूर्ण करना चाहता है।
सूत्र की व्याया करते हुए महर्षि वेदव्यास लिखते हैं-
तत्र पुण्यापुण्यकर्माशयः कामलोभमोहक्रोधप्रभवः।
अर्थात् पुण्य-धर्मयुक्त संस्कार और अपुण्य-अधर्मयुक्त कर्म संस्कार काम, लोभ, मोह और क्रोध से उत्पन्न होते हैं, इसका तात्पर्य इस प्रकार समझना चाहिए कि अविद्या आदि पाँचों क्लेशों के कारण मनुष्य में काम कीाावना, लोा की भावना, मोह की भावना और क्रोध कीाावना उत्पन्न होती है। इन्हीं काम आदि की भावनाओं से मनुष्य पुण्य कर्म और पाप कर्म करने में तत्पर होता रहता है। मनुष्य क्लेशों से युक्त होकर जहाँ अधर्म करता है, वहाँ धर्म भी करता है। देश, काल और परिस्थिति के अनुसार मनुष्य जहाँ काम भावना से बड़े-बड़े सोम याग आदि करके स्वर्ग की कामना करता है, वहाँ काम भावना से अधर्म करने में तनिक विचार न करते हुए ऐसे-ऐसे निकृष्ट कर्म भी करता है, जिनकी सपूर्ण समाज निन्दा करता है। मनुष्य लोभ की भावना से जहाँ विद्या, धन, नौकरी आदि को पाने के लिए धर्मयुक्त कर्मों को करता है, वहाँ उन्हीं को पाने के लिए अधर्म युक्त कार्यों को भी कर लेता है। मनुष्य मोह की भावना से जहाँ दान, सेवा आदि पुण्य कर्म कर लेता है, वहाँ घोर हिंसा (मनुष्य बलि, पशु बलि आदि) करने में तनिक विचार भी नहीं करता है। क्र ोध की भावना से बड़े-बड़े अनर्थ करता हुआ देखा जाता है। जहाँ मनुष्य क्रोध से अनर्थ करता है, वहाँ क्रोध से पुण्य भी क रता है, जैसे अन्य लेखकों से द्वेष करता हुआ स्वयं उत्तम लेख या पुस्तक लिखना। इसी प्रकार दानी से, प्रवक्ता से, बलवान से द्वेष करते हुए स्वयं भी दान देना, प्रवचन करना, बल का संपादन करना रूपी पुण्य कर्म करते हुए देखे जाते हैं। इस प्रकार मनुष्य काम, लोभ, मोह और क्रोध पूर्वक उत्तम कर्म और निकृष्ट कर्म करते रहते हैं।
‘स दृष्टजन्मवेदनीयश्चादृष्टजन्मवेदनीयश्च।’
अर्थात् वह पुण्य और अपुण्य कर्माशय दृष्टजन्म= वर्तमान जन्म में फल देने वाला और अदृष्टजन्म= भविष्य में- आने वाले जन्मों में फल देने वाला होता है। चाहे पुण्य कर्माशय हो या अपुण्य कर्माशय हो, दोनों में से कोई भी कर्माशय वर्तमान जन्म में फल दे सकता है। यदि वर्तमान जन्म में फल नहीं दे रहा हो, तो आगे आने वाले किसी भी जन्म में फल दे सकता है। कौन-सा पुण्य-अपुण्य कर्माशय वर्तमान जन्म में फल देने वाला है और कौन-सा पुण्य अपुण्य कर्माशय अगले जन्मों में फल देने वाला है, इसका मापदण्ड क्या है? कैसे पता लग सकता है? इसका समाधान करते हुए महर्षि वेदव्यास कहते हैं-
तत्र तीव्रसंवेगेन मन्त्रतपः समाधिभिर्निवर्तितः ईश्वरदेवतामहर्षिमहानुभावानामाराधनाद्वा यः परिनिष्पन्नः स सद्यः परिपच्यते पुण्यकर्माशय इति।
अर्थात् उन पुण्य-अपुण्य कर्माशयों में से जो पुण्य कर्माशय है, वह शीघ्र फल देने वाला कैसे बनता है? इसका उपाय बताते हुए महर्षि वेदव्यास कहते हैं-‘तीव्र संवेग’से योगायासी पुरुषार्थ करता है, अर्थात् वह पूर्ण रूप से अहिंसा, सत्य आदि का पालन निष्ठा-श्रद्धा आदि से करता जाता है। किसी प्रकार की त्रुटि न रखते हुए सावधानीपूर्वक उत्तम पवित्र कर्म करता जाता है। ‘मन्त्र’ का अभिप्राय है- वेद-अध्ययन के द्वारा वेदों में स्थित रहस्य का बोध होता है, जिससे विभिन्न प्रकार के जनोपयोगी यन्त्रों का निर्माण करके जन कल्याण के उत्तम कर्म किये जाते हैं और गायत्री आदि मन्त्रों के जप से परमेश्वर के निकट जाया जाता है। ‘तप’ से योगसाधक अपने शरीर वाणी और मन को तपाता है, अर्थात् मन, वाणी और शरीर को संयम में रखता हुआ सभी द्वन्द्वों (भूख-प्यास, सर्दी-गर्मी आदि) को सहन करता हुआ उत्तम कर्म करता जाता है।
वह ‘समाधि’ लगा-लगा कर अपने कुसंस्कारों को कमजोर और नष्ट करता हुआ निष्काम कर्मों को करता जाता है। ईश्वर की उपासना, देवता= विद्वानों की सेवा और ऋषि-महर्षियों के ग्रन्थों के स्वाध्याय से उनकी आज्ञा का पालन करता हुआ योग साधक अपने लक्ष्य की ओर अग्रसर होता है। इस प्रकार तीव्र संवेग के द्वारा मन्त्र, तप, समाधि आदि को व्यवहार में उतारने से ईश्वरोपासना, विद्वानों की सेवा और ऋषि-महर्षियों के ग्रन्थों के स्वाध्याय से उत्पन्न पुण्य कर्माशय शीघ्र फल प्रदान करता है।
इसी प्रकार अपुण्य कर्माशय के सबन्ध में ऋषि कहते हैं-
तथा तीव्रक्लेशेन भीतव्याधितकृपणेषु विश्वासोपगतेषु वा महानुभावेषु वा तपस्विषु कृतः पुनः पुनरपकारः स चापि पापकर्माशयः सद्य एव परिपच्यते।
अर्थात् योगायास न करने वाला लौकिक व्यक्ति तीव्रता से= अत्यधिक पाप में (डूबा हुआ) संलग्न होकर अविद्या में आकण्ठ डूब कर पाप कर्म करने में लगा रहता है। वह किनके प्रति पाप कार्य करता है? इसका समाधान करते हुए ऋषि लिखते हैं- जो ‘भीत’ -डरे हुए हैं, उन डरे हुए लोगों को वह अन्याय, अत्याचार आदि के माध्यम से दुःख पहुँचाता है। एक बार नहीं, बार-बार दुःा देने का कर्म करता रहता है।‘व्याधित’ जो रोगों से ग्रस्त हैं, दुःाी हैं, उन रोग ग्रस्त लोगों को और दुःा पहुँचाता रहता है। ‘कृपण’ जो दीन-हीन हैं अर्थात् बुद्धि से, धन से, रोटी, कपड़ा और मकान से और अन्य-अन्य साधनों से रहित हैं, ऐसे-ऐसे दीन-हीन लोगों को और अधिक दुःख पहुँचाता रहता है। जो लोग विश्वास करके चलते हैं, ऐसे विश्वास करने वालों को अन्याय, अत्याचार करके दुःख पहुँचाता रहता है। जो लोग महान हैं, तपस्वी हैं, श्रेष्ठ हैं, परोपकारी हैं, ऐसे-ऐसे उत्तम पवित्र लोगों का जो बार-बार अपकार करता है, उसे भी शीघ्र फल प्राप्त होता है।
महर्षि वेदव्यास शीघ्र फल देने वाले पाप और पुण्य कर्माशयों का  वर्णन करके उन दोनों के उदाहरण प्रस्तुत करते हुए लिखते हैं-
यथा नन्दीश्वरः कुमारो मनुष्यपरिणामं हित्वा देवत्वेन परिणतः।
अर्थात् जिस प्रकार से नन्दीश्वर कुमार तीव्रता से मन्त्र, तप समाधि आदि के द्वारा उत्तम कर्म करके  मनुष्यत्व से देवत्व को प्राप्त हुआ है, ठीक इसी प्रकार
‘तथा नहुषोऽपि देवानामिन्द्रः स्वकं परिणामं हित्वा तिर्यक्त्वेन पिरणत इति।’
अर्थात् नहुष नामक राजा, जो देवों का भी देव राजा था, उसने अपने पद-प्रतिष्ठा के अहंकार(अविद्या) से युक्त होकर प्रजा पर अन्याय, अत्याचार किया था, जिसके कारण उसे अपने राज-पाट से हाथ धोना पड़ा, अर्थात् राजगद्दी से च्युत होकर नीचत्व को प्राप्त होना पड़ा । ये दोनों उदाहरण वर्तमान जन्म में फल देने से सबन्धित हैं। इसका अभिप्राय यह है कि जिन कर्मों का फल वर्तमान जन्म में मिलता है, वे दो प्रकार के होते हैं। वह फल आयु और भोग के रूप में प्राप्त होता है, इसलिए यहाँ पर नन्दीश्वर कुमार और नहुष वर्तमान जन्म में, अर्थात् उसी शरीर में रहते हुए, मनुष्य न होकर देव कहलाये। यहाँ पर कोई यह न समझे कि वे दोनों वर्तमान शरीरों को छोड़ कर नये शरीरों को प्राप्त हुए। ऐसा सभव नहीं होगा। यदि सभव होता तो महर्षि वेदव्यास यह नहीं लिखते कि-
‘दृष्टजन्मवेदनीयस्त्वेकविपाकारभी भोगहेतुत्वात् द्विविपाकारभी वा आयुर्भोगहेतुत्वान्नन्दीश्वरवन्नहुषवद्वेति।’
(योग. 2.13 व्यासभाष्य)
अर्थात् वर्तमान जन्म में फल देने वाला कर्माशय या तो एक फल को देता है, केवल भोग का कारण होने से अथवा दो फल को देने वाला होता है, केवल भोग और आयु का कारण होने से। जैसे नन्दीश्वर कुमार और राजा नहुष को प्राप्त हुआ। इससे स्पष्ट होता है कि वर्तमान जन्म में भोग या आयु के रूप में फल तो मिलता है, परन्तु जाति- मनुष्य, पशु, पक्षी आदि के रूप में फल नहीं मिलता है। जाति रूप फल तो नये जन्म के साथ मिलता है, ऐसा समझना चाहिए।
महर्षि वेदव्यास एक और विशेष बात को लेकर स्पष्टता करते हैं कि जो मनुष्य अत्यन्त निकृष्ट कर्म मात्रा की दृष्टि से व गुणवत्ता की दृष्टि से बहुत अधिक करता है, उसके लिए वर्तमान जन्म में फल देने वाला कर्माशय नहीं होता है, बल्कि आगे के जन्मों में फल देने वाला अदृष्टजन्मवेदनीय कर्माशय होता है- तत्र नारकाणां नास्ति दृष्टजन्मवेदनीयः कर्माशयः।
और ऋषि यह भी कहते हैं कि जो योगायासी अपने क्लेशों (अविद्या अस्मिता आदि) को दग्धबीज (जले हुए-भुने हुए चने के समान) कर लेता है, ऐसे योगायासी का अदृष्टजन्मवेदनीय (अगले जन्म का) कर्माशय  नहीं होता, अर्थात् उसका पुनर्जन्म नहीं होता, बल्कि वह मुक्ति में जाता है-
क्षीणक्लेशानामपि नास्त्यदृष्टजन्मवेदनीयः कर्माशय इति।

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