निष्ठा का नरमेध: संकल्प का विज्ञान
गुरु गोविन्द सिंह जी का 'पंच प्यारे' का चुनाव केवल एक घटना नहीं, बल्कि मृत्युलोक के उस सिद्धांत की पुष्टि है जहाँ सामर्थ्य से अधिक उच्चस्तरीय भावनाओं का मूल्य है।
GVB सामरिक विश्लेषण:
- प्रथम गतिशील चेतन: जिस 'सूक्ष्म चेतन' की हमने नासदीय सूक्त में बात की थी, वही यहाँ 'वीर रस' बनकर प्रकट हुई। जब दयाराम आगे बढ़े, तो उन्होंने 'मृत्यु' के भय को उसी 'अग्नि' में स्वाहा कर दिया।
- शून्य और सामर्थ्य: गुरु ने रक्त की धार दिखाकर भीरुओं को छाँट दिया। यह 'Filtering of Energy' है। केवल शुद्ध और स्थिर ऊर्जा (निष्ठावान) ही बड़े लक्ष्य को सिद्ध कर सकती है।
- अग्रगामी अवतार: अवतार केवल वे नहीं जो जन्म लेते हैं, बल्कि वे हैं जो परिस्थिति को पहचान कर 'बलिदान' का मार्ग चुनते हैं।
निष्कर्ष: परिस्थितियाँ चाहे कितनी ही विपरीत हों, यदि कुछ 'देवदूत' (निष्ठावान व्यक्ति) खड़े हो जाएँ, तो इतिहास की धारा बदल जाती है। मृत्युलोक में जीवित रहने और सफल होने का मूल मंत्र है—भय का अंत और संकल्प का उदय।
👉 गुरु गोविन्दसिंह के पाँच प्यारे
प्रश्न सामर्थ्य और क्षमता का नहीं, उच्चस्तरीय भावनाओं का है। गुरु गोविन्दसिंह ने एक ऐसा ही नरमेध यज्ञ किया। उक्त अवसर पर उन्होंने घोषणा की-"भाइयो। देश की स्वाधीनता पाने और अन्याय से मुक्ति के लिए चण्डी बलिदान चाहती है, तुम से जो अपना सिर दे सकता हो, वह आगे आये। गुरु गोविन्दसिंह की मांग का सामना करने का किसी में साहस नहीं हो रहा था, तभी दयाराम नामक एक युवक आगे बढ़ा।
"गुरु उसे एक तरफ ले गये और तलवार चला दी, रक्त की धार बह निकली, लोग भयभीत हो उठे। तभी गुरु गोविन्दसिंह फिर सामने आये और पुकार लगाई अब कौन सिर कटाने आता है। एक-एक कर क्रमश: धर्मदास, मोहकमचन्द, हिम्मतराय तथा साहबचन्द आये और उनके शीश भी काट लिए गये। बस अब मैदान साफ था कोई आगे बढ़ने को तैयार न हुआ।
गुरु गोविन्दसिंह अब उन पाँचों को बाहर निकाल लाये। विस्मित लोगों को बताया यह तो निष्ठा और सामर्थ्य की परीक्षा थी, वस्तुत: सिर तो बकरों के काटे गये। तभी भीड़ में से हमारा बलिदान लो-हमारा भी बलिदान लो की आवाज आने लगी। गुरु ने हँसकर कहा-"यह पाँच ही तुम पाँच हजार के बराबर है। जिनमें निष्ठा और संघर्ष की शक्ति न हो उन हजारों से निष्ठावान् पाँच अच्छे?'' इतिहास जानता है इन्हीं पाँच प्यारो ने सिख संगठन को मजबूत बनाया।
जो अवतार प्रकटीकरण के समय सोये नहीं रहते, परिस्थिति और प्रयोजन को पहचान कर इनके काम में लग जाते है, वे ही श्रेय-सौभाग्य के अधिकारी होते हैं, अग्रगामी कहलाते है।
कभी भी परिस्थितियाँ कितनी ही
आँधी-सीधी क्यों न हों, यदि प्रारम्भ में कुछ भी निष्ठावान् देवदूत
खड़े हो गये तो न केवल लक्ष्य पूर्ण हुआ, अपितु वह इतिहास भी
अमर हो गया।
