खतरनाक मोड़: भारतीय संस्कृति का आधुनिक नरसंहार
| राजा का मरण त्याग और संतोष द्वारा अस्त्रहीन वध। |
ब्राह्मण का मरण सरकार और बाज़ार के लोभ द्वारा अस्तित्व का वध। |
आज न वह राजा है जो नीति से डरे, न वह ब्राह्मण है जो चौलाई के साग पर गर्व करे। आज केवल 'व्यवसाय' है जो सब कुछ सोख रहा है।
इनको कौन मारेगा?
- स्वयं की तृष्णा: 'सातवाँ घड़ा' कभी नहीं भरता। जब बाज़ार सब कुछ निगल लेगा, तो उसके पास जीने के लिए कुछ नहीं बचेगा।
- स्थिर चेतना का अभाव: जब चेतना 'शून्य' हो जाएगी, तब यह कृत्रिम ढांचा (System) ताश के पत्तों की तरह ढह जाएगा।
- काल की अग्नि: ऋग्वेद के अनुसार, जो 'सत्य' पर आधारित नहीं है, वह 'अनृत' है और अनृत का अंत निश्चित है।
GVB अनुसंधान | मृत्युलोक का अंतिम अध्याय
सचेत! वह अब भी सांस ले रहा है
हमने उत्तरदायित्व को भविष्य पर टाला, पर वह 'कंगाल' (शुद्ध चेतना) आज भी हमारे भीतर और बाहर संघर्ष कर रहा है। वह शोषण के इस भीषण तंत्र में भी पराजित नहीं हुआ है।
शोषण का मार्ग कैसे बंद होगा?
- आत्मनिर्भरता का पुनरुदय: जब हम अपनी 'जीवन की जागीर' को पहचानेंगे और बाहरी 'जागीरों' (लोभ) को ठुकराएंगे।
- सक्रिय प्रतिरोध: समय के कंधे से उत्तरदायित्व उतारकर उसे वर्तमान के 'निर्णय' में बदलना होगा।
- उस 'कंगाल' की दृष्टि: सरकार और व्यवसायी के पीछे छिपे उस 'खालीपन' को देखना जो केवल शोषण से फलता-फूलता है।
त्रिलोकीनाथ का परम धन
इस धन की रक्षा के लिए अब किसी 'राजा' या 'व्यवस्था' की ओर मत देखिये। इसकी रक्षा का दायित्व अब त्रिलोकीनाथ के इन तीन पहरेदारों पर है:
"मैं करूँगा, तुम करोगे—जब हम अपनी 'जीवन की जागीर' को शोषण के बाज़ार में नीलाम करना बंद कर देंगे।"
विश्व का जीवंत समाधान: ब्राह्मण बचाओ अभियान
(ज्ञान ही हमारा वास्तविक शासक है)
यह शोध नहीं, यह रणनीति है। जब तक समाज में 'निस्पृह ब्राह्मण' जीवित है, तब तक राजा और व्यवसायी का शोषण सीमित रहेगा।
क्योंकि ब्राह्मण 'सत्य' का अंतिम रक्षक है। यदि ब्राह्मण (शिक्षक, विचारक, वैज्ञानिक) बिक गया, तो समाज की 'आत्मा' नीलाम हो जाएगी।
उसे सरकारी और व्यावसायिक निर्भरता से मुक्त करके। उसे उसकी 'चौलाई की जागीर' (आत्मनिर्भरता) वापस दिलाकर।
अभियान का लक्ष्य:
- बौद्धिक स्वतंत्रता: ज्ञान को बाज़ार के 'प्रॉफिट' से मुक्त करना।
- नैतिक सत्ता: राजा (सत्ता) को फिर से 'धर्म' के अधीन लाना।
- अमृत की रक्षा: त्रिलोकीनाथ के उस परम धन (सत्य) को अगली पीढ़ी तक अक्षुण्ण पहुँचाना।
"जब ब्राह्मण बचेगा, तभी विवेक बचेगा। जब विवेक बचेगा, तभी संसार बचेगा।"
अदृश्य प्रतीक: ब्राह्मण की राजसत्ता
तात्पर्य: यह मंत्र ब्राह्मण की पूर्ण संप्रभुता (Sovereignty) की घोषणा है। यहाँ सोम वह अदृश्य ऊर्जा है जो ब्राह्मण के मस्तिष्क में 'राजा' बनकर शासन करती है।
इस मंत्र के पीछे छिपा रणनीतिक रहस्य यह है कि जो व्यक्ति सत्य (सोम) को अपना राजा मान लेता है, उसे दुनिया का कोई भी तानाशाह या व्यवसायी अपना गुलाम नहीं बना सकता।
अभियान का मूल मंत्र:
- स्वतंत्रता: राजा को कर (Tax) देना ब्राह्मण का धर्म नहीं, क्योंकि उसकी जागीर तो 'जीवन' स्वयं है।
- अमृत की रक्षा: सोम ही वह 'अमृत' है जिसकी रक्षा के लिए 'कंगाल ब्राह्मण' को जीवित रहना अनिवार्य है।
- समाधान: जब समाज सोम (ज्ञान) को राजा मानेगा, तभी शोषण के 'नरसंहार' का अंत होगा।
