अग्निवेश कृत और महर्षि चरक द्वारा प्रतिसंस्कृत चरकसंहिता के सूत्रस्थान का तेरहवाँ अध्याय - 'स्नेहविधि अध्यायः' (शरीर के स्नेहन और तेलीकरण की वैज्ञानिक मीमांसा) का संपूर्ण प्रामाणिक हिंदी अनुवाद नीचे दिया गया है। यह अध्याय पंचकर्म (शोधन) से पूर्व शरीर को आंतरिक और बाह्य रूप से स्निग्ध करने के नियमों का अद्वितीय दस्तावेज है।
चरकसंहिता - सूत्रस्थानम् (अध्याय १३) : स्नेहविधि अध्यायः
१. अग्निवेश की जिज्ञासा और उच्च स्तरीय प्रश्न (The Scientific Queries)
पीठिका सूत्र:
अथ स्निग्धपदार्थानां स्रोतांसि, तेषां गुणाः, मात्राः, योनिः च विमर्शः।
तद्यथा- सांख्य दर्शन के आचार्यों के मध्य विराजमान पुनर्वसु आत्रेय से अग्निवेश ने संपूर्ण स्नेहन विज्ञान पर प्रश्न पूछे ॥ (चरक सूत्र १३/३-८)
अग्निवेश ने संसार के कल्याणार्थ गुरु पुनर्वसु से स्नेहन से संबंधित १८ गूढ़ प्रश्न किए: जैसे स्नेह के स्रोत क्या हैं? उनके गुण, ऋतु, मात्रा, पाचन काल, विचारणाएँ (तैयारियाँ) कितनी हैं? किसे स्नेहन देना चाहिए और किसे नहीं? तथा अल्प, सम्यक और अति-स्नेहन के वैज्ञानिक लक्षण क्या हैं?
२. स्नेह के दो मूल स्रोत (The Two Sources of Oleation)
संशय-निवारक भगवान पुनर्वसु ने स्पष्ट किया कि ब्रह्मांड में स्नेह (चिकनाई) के केवल दो ही मूल स्रोत हैं:
- स्थावर योनि (Vegetable Sources): इसके अंतर्गत तिल, महुआ, अरंडी (Castor), अलसी, सरसों, अखरोट, पिस्ता, मूली के बीज, और सहजन आदि २१ वनस्पतियाँ आती हैं। इनमें तिल का तेल (Sesame Oil) बल और मर्दन के लिए सर्वश्रेष्ठ है, और अरंडी का तेल (Castor Oil) विरेचन (Laxative) के लिए सर्वोत्तम है।
- जंगम योनि (Animal Sources): इसके अंतर्गत जलचर, थलचर और नभचर जीवों के दूध, दही, घी, मांस, वसा (Animal Fat) और मज्जा (Bone Marrow) आते हैं।
३. चार प्रधान स्नेह और उनके विशिष्ट गुण (The Four Principal Oleating Agents)
आयुर्वेद में घी, तेल, वसा और मज्जा को 'चतुर्स्नेह' कहा गया है। चिकित्सा विज्ञान में इनका वर्गीकरण और कार्यप्रणाली निम्नलिखित है:
| स्नेह का नाम | विशिष्ट गुण (Properties) | प्रमुख औषधीय संकेत (Indications) |
|---|---|---|
| १. घृत (Ghee) *सर्वश्रेष्ठ स्नेह* |
शीतल, मधुर, पित्त-वात नाशक, ओज और वीर्य वर्धक, स्वर और वर्ण को निखारने वाला। यह अपने गुणों को छोड़े बिना दूसरों के गुणों को अपना लेता है (संस्कारस्य अनुवर्तनात्)। | वात-पित्त विकार, मंद बुद्धि, स्मृति चाहने वाले, वृद्ध, बालक, विष, अग्नि और शस्त्र से घायल व्यक्ति। |
| २. तैल (Sesame Oil) | उष्ण, तीक्ष्ण, वात नाशक परंतु कफ को न बढ़ाने वाला, त्वचा के लिए परम हितकारी, स्थिर करने वाला और योनि शोधक। | कफ-मेदा की अधिकता वाले रोगी, कठोर कोष्ठ (Constipation), कृमि (Pet के कीड़े), और शीताधिक्य वाले वात रोगी। |
| ३. वसा (Animal Fat) | मांसपेशियों को जोड़ने वाली, भारी, बलवर्धक, घावों और अस्थि-भंग (Fractures) को ठीक करने वाली। | अत्यधिक शारीरिक श्रम करने वाले, भार ढोने वाले, गर्भाशय भ्रंश (Prolapse), कान और सिर के तीव्र दर्द से पीड़ित। |
| ४. मज्जा (Bone Marrow) | बल, वीर्य, कफ, मेद और मज्जा धातु को बढ़ाने वाली। अस्थियों (Hues) को वज्र जैसी दृढ़ता प्रदान करने वाली। | दीप्ताग्नि (अत्यधिक तीव्र भूख), क्रूर कोष्ठ, केवल वात से पीड़ित और अत्यधिक स्नेह के अभ्यासी व्यक्ति। |
४. स्नेहन के लिए उपयुक्त ऋतुएँ और काल चक्र (Chrono-biology of Oleation)
ऋतुओं के अनुसार स्नेह का सेवन न करने पर वह विष के समान घातक हो सकता है:
- घृत (Ghee): शरद ऋतु (Autumn) में सेवन करें।
- तैल (Oil): वर्षा ऋतु के प्रारंभ (First Rains) में सेवन करें।
- वसा और मज्जा: वसंत ऋतु (Spring) में सेवन करें।
- विशेष नियम: अत्यधिक ठंड या अत्यधिक गर्मी में स्नेहपान वर्जित है। वात-पित्त प्रधान व्यक्ति को गर्मी में रात्रि के समय और कफ प्रधान व्यक्ति को ठंड में दिन के समय (जब सूर्य चमकीला हो) स्नेहपान कराना चाहिए।
- उल्लंघन का परिणाम: नियम विरुद्ध दिन में स्नेह लेने से मूर्च्छा, तृष्णा, उन्माद या पीलिया हो सकता है। रात्रि में गलत सेवन से आनाह (कब्ज), अरुचि, शूल और एनीमिया (पाण्डु) हो सकता है।
५. स्नेह की तीन खुराकें और उनका पाचन काल (The Three Doses)
जठराग्नि के बल के अनुसार स्नेह की मात्रा को तीन भागों में मापा जाता है:
- उत्तम मात्रा (Maximum Dose): जिसे पचने में पूरे २४ घंटे (अहोरात्र) लगते हैं। यह गुल्म, सर्पदंश, उन्माद और तीव्र वात विकारों में विकृतियों को जड़ से उखाड़ फेंकती है।
- मध्यम मात्रा (Moderate Dose): जिसे पचने में १२ घंटे (अर्ध-दिवस) लगते हैं। यह त्वचा रोग (कुष्ठ), प्रमेह, और मध्यम बल वाले रोगियों के शोधन के लिए उत्तम है। इसमें जटिलताएँ नहीं होतीं।
- ह्रस्व मात्रा (Minimum Dose): जिसे पचने में केवल ६ घंटे लगते हैं। यह बूढ़े, बच्चों, मंदाग्नि वाले और सुकुमार लोगों के लिए बलवर्धक और दीर्घकालिक प्रयोग के लिए सुरक्षित है।
६. सम्यक, अल्प और अति-स्नेहन के क्लीनिकल लक्षण
स्नेहपान कराते समय चिकित्सक को रोगी के शरीर में निम्नलिखित लक्षणों की कड़ाई से निगरानी करनी चाहिए:
| १. असम्यक / अल्प स्नेहन (Under-Oleation) | २. सम्यक / सफल स्नेहन (Optimum) | ३. अति-स्नेहन (Over-Oleation) |
|---|---|---|
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✔ आदर्श स्थिति:
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७. कोष्ठ विज्ञान: मृदु और क्रूर कोष्ठ (Gut Physiology)
स्नेहन की अवधि पूरी तरह मनुष्य के कोष्ठ (पाचन तंत्र की प्रकृति) पर निर्भर करती है:
- मृदु कोष्ठ (Soft Bowel): जिन व्यक्तियों में पित्त की अधिकता और कफ-वात की न्यूनता होती है, वे मृदु कोष्ठ वाले होते हैं। इन्हें दूध, गन्ने का रस, गुड़, अंगूर या गर्म पानी देने मात्र से ही पेट साफ हो जाता है। इनका स्नेहन मात्र ३ दिन में पूरा हो जाता है।
- क्रूर कोष्ठ (Hard Bowel): जिन व्यक्तियों में वात की प्रचंडता होती है, उनके कोष्ठ क्रूर होते हैं। उपर्युक्त साधारण द्रव्यों से इनका पेट साफ नहीं होता। इनका पूर्ण स्नेहन होने में पूरे ७ दिन का समय लगता है। ७ दिन से अधिक स्नेहन नहीं देना चाहिए क्योंकि फिर शरीर उसे आत्मसात (सात्मीकरण) कर लेता है।
८. स्नेहपान के अनुपान और भोजन के विशिष्ट नियम (Post-Oleation Rules)
स्नेह को पचाने और स्रोतों को साफ रखने के लिए निम्नलिखित अनुपान (Post-drink) अनिवार्य हैं:
घृतपान के बाद गर्म पानी (उष्णोदक), तैलपान के बाद यूष (सूप), तथा वसा और मज्जा के सेवन के बाद मण्ड (चावल का मांड़) पीना चाहिए। सभी स्नेहों के सामान्य अनुपान के रूप में गर्म पानी सर्वोपरि है।
नमक (Saindhava Lavam) का महत्व: स्नेह में नमक मिलाकर देने से स्नेहन की प्रक्रिया अत्यंत तीव्र हो जाती है, क्योंकि नमक सूक्ष्म, उष्ण, व्यवायी और स्रोतों को पिघलाने वाला (द्रवीकरण) होता है। यह स्नेह को शरीर के सूक्ष्मतम छिद्रों तक पहुँचा देता है।
९. मिथ्या स्नेहन की जटिलताएँ और उनकी चिकित्सा (Management of Complications)
१०. २४ विचारणाएँ और सद्यः स्नेहन (Alternative Formulations)
जो लोग शुद्ध स्नेह (अकेले घी या तेल) नहीं पी सकते, उनके लिए ६३ प्रकार के रस-संयोगों और १ शुद्ध स्नेह को मिलाकर कुल ६४ स्नेह विचारणाएँ बताई गई हैं। इनमें ओदन (भात), विलेपी, मांस रस, दूध, दही, खड़, कम्बलिक आदि २४ खाद्य रूपों में स्नेह मिलाकर (जैसे पंचप्रसृत पेया) 'सद्यः स्नेहन' (तत्काल तेलीकरण) किया जाता है।
॥ इस प्रकार अग्निवेश द्वारा संकलित और चरक द्वारा प्रतिसंस्कृत सूत्रस्थान का "स्नेहविधि" नामक तेरहवाँ अध्याय पूर्ण हुआ ॥
चरकसंहिता हिन्दी अनुबाद
अध्याय 13 - तेल चिकित्सा (स्नेहा)
1. अब हम स्नेहा प्रक्रिया नामक अध्याय का विस्तारपूर्वक वर्णन करेंगे ।
2. इस प्रकार पूज्य आत्रेय ने घोषणा की ।
अग्निवेश के प्रश्न ओलीएशन ( स्नेहा ) के संबंध में
3. अग्निवेश ने पुनर्वसु से , जो सांख्य नामक अंकशास्त्र के आचार्यों के साथ बैठे थे , जिन्होंने सत्य की सभी विद्यमान श्रेणियों की गणना की थी, संसार के कल्याण को ध्यान में रखते हुए निम्नलिखित प्रश्न किया।
4. चिपचिपा पदार्थों के स्रोत क्या हैं? चिपचिपा पदार्थों के कितने समूह हैं? चिपचिपा पदार्थों के प्रत्येक समूह के गुण क्या हैं? उनका मौसम क्या है और उनमें से प्रत्येक का सुधार क्या है? कितने और उनकी तैयारी क्या है?
5. खुराक कितने प्रकार की होती है और उन्हें कैसे मापा जाता है? किस मामले में कौन सा नुकसान फिर से शुरू किया जाता है? कौन सा चिकना पदार्थ समूह किसके लिए फायदेमंद है? प्रशासन की अधिकतम अवधि क्या है?
6. स्नेहन के लिए कौन से व्यक्ति उपयुक्त हैं और कौन से नहीं? सफल स्नेहन, अल्प स्नेहन और अति स्नेहन के लक्षण क्या हैं? स्नेहन के मिश्रण के पूर्ण पाचन से पहले, बाद में और बाद में क्या अच्छा है और क्या बुरा?
7. कौन नरम आंत वाले हैं और कौन कठोर आंत वाले? कौन सी जटिलताएँ उत्पन्न होने की संभावना है और उनके उपचार क्या हैं? सरल और शोधक तेल में क्या नियम अपनाए जाने चाहिए?
8. स्नेहक पदार्थों की तैयारी किसे दी जानी चाहिए? विधि क्या है? हे, अथाह ज्ञान के स्वामी! मैं स्नेहन ( स्नेह ) का संपूर्ण विज्ञान जानना चाहता हूँ।
चिकनाईयुक्त पदार्थों के दो स्रोत
9. तब संशय निवारणकर्ता पुनर्वसु ने कहा, 'हे भद्रे! चिकनाई के दो स्रोत हैं - वनस्पति और पशु।
10. तिल, बुकानन आम, अभिषुका, बेलरिक मर्वोबालन, लाल फिजीक नट, चेबुलिक मायरोबालन, अरंडी के बीज, महवा, रेपसीड, कुसुम, बेल, आड़ू, गार्डन मूली, अलसी, पिस्ता, अखरोट, भारतीय बीच और सहजन।
पशु स्रोत
11. ये सभी तेल देने वाले पदार्थ वनस्पति समूह के हैं जबकि चिकनाई वाले पदार्थों के पशु स्रोत मछली, पशु और पक्षी हैं। इनका दूध और औषधि, घी , मांस, वसा और मज्जा स्नेहन प्रक्रिया ( स्नेह ) में निर्धारित हैं।
तिल के तेल के गुण
12. सभी प्रकार के वनस्पति तेलों में से तिल का तेल शक्ति प्रदान करने तथा मलहम लगाने के लिए सर्वोत्तम माना जाता है; अरंडी का तेल सबसे अच्छा रेचक है।
अरंडी के तेल के गुण
13.-(1) अरंडी का तेल तीखा, गरम, भारी और वात - कफ को ठीक करने वाला होता है । कसैले, मीठे और कड़वे पदार्थों के साथ मिलकर यह पित्त को भी ठीक करता है ।
घी की श्रेष्ठ उत्कृष्टता
13. घी, तेल, वसा और मज्जा सभी चिकनाईयुक्त पदार्थों में श्रेष्ठ माने गए हैं; इनमें भी औषधि निर्माण में अपनी विशेष अनुकूलता के कारण घी सर्वश्रेष्ठ है।
घी के गुण
14. घी पित्त और वात को नष्ट करने वाला है, शरीर के पोषक द्रव्य, वीर्य और प्राण के लिए लाभदायक है; यह शीतल और शीतल करने वाला है, तथा स्वर और रंग को साफ करता है।
तेल के गुण
15. वनस्पति तेल वात को ठीक करता है, कफ को नहीं बढ़ाता, शक्ति बढ़ाता है, त्वचा को शक्ति देता है, गर्म, स्थिर करने वाला और योनि को शुद्ध करने वाला है।
पशु वसा के गुण
16. पशु वसा घाव, फ्रैक्चर, आघात, गर्भाशय के आगे को बढ़े हुए भाग, कान के दर्द और सिर दर्द में उपयोगी है; इसका उपयोग पुरुषत्व बढ़ाने के लिए, स्नेह प्रक्रियाओं में और व्यायाम के बाद भी किया जाता है ।
मज्जा के गुण
17. मज्जा बल, वीर्य, पोषक द्रव्य, कफ, मेद और मज्जा को बढ़ाती है। यह हड्डियों की मजबूती बढ़ाने और स्नेह क्रिया में विशेष रूप से लाभदायक है ।
घी के उपयोग का उचित मौसम
18. शरद ऋतु में घी, बसंत ऋतु में वसा और मज्जा तथा पहली वर्षा ऋतु में तेल पीना चाहिए। बहुत गर्मी और बहुत ठंड के मौसम में मनुष्य को तेल नहीं पीना चाहिए।
ओलीएशन के संदर्भ में संकेत और प्रतिसंकेत
19. जिस व्यक्ति में वात और पित्त की अधिकता हो, वह स्नेहा की खुराक रात में ले सकता है, यहां तक कि बहुत गर्म मौसम में भी, और जिस व्यक्ति में कफ की अधिकता हो, वह इसे ठंड के मौसम में भी दिन में ले सकता है, जब सूरज साफ और चमकीला हो।
नियमों के उल्लंघन की बुराइयाँ
20. लेकिन यदि स्नेहा का सेवन दिन में किया जाए, चाहे वह अत्यधिक गर्मी के मौसम में हो या वात-पित्त की अधिकता से पीड़ित व्यक्ति द्वारा, तो इससे बेहोशी, प्यास, पागलपन या पीलिया हो सकता है।
21. और यदि स्नेहा का सेवन रात्रि में किया जाए, चाहे वह अत्यधिक शीत ऋतु में हो या कफ की अधिकता से पीड़ित व्यक्ति द्वारा, तो इससे कब्ज, भूख न लगना, शूल या रक्ताल्पता उत्पन्न होती है।
स्नेहा ( ओलिएशन ) में बाद की औषधियाँ
22. घी के सेवन के बाद गर्म पानी पीना चाहिए; तेल के बाद सूप पीना चाहिए; वसा और मज्जा के बाद चावल का पानी पीना चाहिए; तथा सभी प्रकार के तेल की खुराक के बाद गर्म पानी पीना चाहिए।
चौबीस ओलियोस तैयारियाँ
23. पका हुआ चावल, गाढ़ा दलिया, मांस-रस, मांस, दूध, दही, दलिया, दाल-सूप, सब्जियां, सादा सूप, दही-सूप, करी-सूप;
24. भुना हुआ अनाज का आटा, तिल-पेस्ट, शराब, लिंक्टस, मिष्ठान्न, इनंक्शन, एनीमाटा और योनि डूश;
25. गरारे, कान भरना, नाक, कान और नेत्र की औषधियाँ - ये चौबीस औषधियाँ स्नेहन प्रक्रिया (तेलीकरण प्रक्रिया ) में उपयोग की जाती हैं।
26. विशुद्ध रूप से अकेले लिया गया चिकना पदार्थ 'तैयारी' नहीं कहलाता। यह चिकना पदार्थों से बनी सभी तैयारियों का आधार है।
27-28. स्वाद की छह श्रेणियों के क्रमपरिवर्तन और संयोजन की प्रक्रिया से, तेल की तैयारी 63 किस्मों की होती है, जबकि इसमें मिलाए गए चिकनाई वाले पदार्थ का शुद्ध घूंट एक और बनाता है। इस प्रकार वे कुल मिलाकर चौसठ तेल की तैयारी करते हैं। उन्हें उस चिकित्सक द्वारा निर्धारित किया जाना चाहिए जो रोगी की आदत, मौसम, बीमारी और जीवन शक्ति को पहचानने में विशेषज्ञ हो।
स्नेहा (Oleation ) में तीन खुराक
29. स्नेहमात्र की अधिकतम, मध्यम और न्यूनतम खुराक वह मात्रा है जिसके पाचन में क्रमशः चौबीस घंटे, बारह घंटे और छह घंटे लगते हैं।
30. इस प्रकार पाचन में लगने वाले समय के अनुसार तीन प्रकार की खुराकों का वर्णन किया गया है। अब मैं तुम्हें विभिन्न प्रकार के व्यक्तियों में उनके प्रयोग की विधि समझाऊंगा।
अधिकतम खुराक के लिए संकेत
31-32. जो व्यक्ति अधिक तेल पीने के आदी हों, भूख-प्यास से व्याकुल हों, जिनकी पाचन शक्ति बहुत प्रबल हो, जो बहुत बलवान हों तथा जो गुल्म , सर्पदंश, तीव्र ज्वर, पागलपन, मूत्रकृच्छ तथा मल के विकार से पीड़ित हों, उन्हें स्नेह की अधिक मात्रा लेनी चाहिए ।
अधिकतम खुराक के गुण
33-34. अब, अधिकतम खुराक के लाभों को सुनिए। यदि यह खुराक ठीक से दी जाए, तो यह ऊपर बताए गए विकारों को शीघ्र ही समाप्त कर देती है। यह अधिकतम खुराक शरीर के हर अंग में व्याप्त होकर सभी रोगग्रस्त पदार्थों को बाहर निकालने में सक्षम है। यह शरीर, इंद्रियों और मन को स्फूर्तिदायक और पुनर्जीवित करने वाली है।
मध्यम खुराक के लिए संकेत
35-36. फोड़े, फुंसी, फुंसी, खुजली, दाने और इसी प्रकार के अन्य विस्फोटों से पीड़ित व्यक्तियों को, साथ ही चर्मरोग, मूत्र-स्राव की असामान्यता, आमवात से पीड़ित व्यक्तियों को, तथा जो अधिक भोजन नहीं करते हैं, जिनकी आंतें मुलायम हैं, तथा जिनकी जीवन शक्ति सामान्य है, उन्हें मध्यम मात्रा में दवा लेनी चाहिए।
मध्यम खुराक के लाभ
37. इस खुराक से गंभीर जटिलताएँ नहीं होतीं। यह शक्ति को बहुत कम नहीं करती, आसानी से स्नेहन प्रदान करती है और शुद्धिकरण के लिए निर्धारित है ।
न्यूनतम खुराक के लिए संकेत
38-39. जो वृद्ध, युवा, नाजुक, आरामपसंद, आँतों की खालीपन से पीड़ित, जिनकी जठराग्नि मंद, जीर्ण ज्वर, दस्त या खांसी से पीड़ित तथा मंद जीवनशक्ति वाले हों, उन्हें न्यूनतम मात्रा में औषधि लेनी चाहिए।
न्यूनतम खुराक के गुण
40. इस खुराक को बहुत कम देखभाल की आवश्यकता होती है, यह चिकनाई प्रदान करती है, बलवर्धक, बलवर्धक, स्फूर्तिदायक और हानिरहित है तथा इसका प्रयोग लम्बे समय तक किया जा सकता है।
घी के मिश्रण के लिए संकेत
41-43. जो वात-पित्त के रोगी हैं, वात-पित्त के विकारों से पीड़ित हैं, जो अपनी दृष्टि को सुरक्षित रखने के इच्छुक हैं, जो घायल, दुर्बल, वृद्ध, युवा या दुर्बल हैं, जो दीर्घायु, बल, रूप, स्वर, मोटापा, संतान, यौवन की वृद्धि चाहते हैं, तथा तेज, दीप्ति, स्मरण, तेज, उष्णता, बुद्धि और इन्द्रिय-शक्ति की वृद्धि चाहते हैं, जो गर्मी से पीड़ित हैं, तथा जो शस्त्र, विष और अग्नि से घायल हुए हैं, उन्हें घी का सेवन करना चाहिए।
तेल की औषधि के लिए संकेत
44. जिनके शरीर में कफ और चर्बी अधिक हो, जिनकी गर्दन और पेट लटक रहा हो और चर्बीयुक्त हो, जो वात विकारों से ग्रस्त हों; जो वात प्रकृति के हों,
45-46. जो लोग बल, दुबलापन, हल्कापन, दृढ़ता, अंगों की स्थिरता और कोमल, चिकनी और पतली त्वचा चाहते हैं, जिनके पेट में कीड़े हो गए हों, जिनकी आंत कठोर हो गई हो, जो साइनस या फिस्टुला से पीड़ित हों और तेल के आदी हों, उन्हें ठंड के मौसम में तेल पीना चाहिए।
वसा की औषधि के लिए संकेत
47-49. जो लोग तेज हवा और धूप के आदी हो गए हैं, जो बोझ उठाने और यात्रा करने से सूखे, दुर्बल हो गए हैं, जिनके वीर्य, रक्त, कफ और चर्बी कम हो गई है, जिनकी हड्डियों, जोड़ों, वाहिकाओं, मांसपेशियों, महत्वपूर्ण अंगों और पाचन तंत्र में बहुत दर्द है, और जिनमें बहुत उत्तेजित वात ने स्थानीय रूप से शरीर के विभिन्न छिद्रों को अवरुद्ध कर दिया है, जिनकी पाचन शक्ति बहुत अधिक है और जिनके लिए पशु-वसा उपयोगी है - इन सभी मामलों में, जहां स्नेहन ( तेल ) संकेत दिया जाता है, पशु वसा निर्धारित की जाती है।
मज्जा औषधि के लिए संकेत
50-50½. जिनकी जठराग्नि बहुत सक्रिय है, जो कष्टों से अभ्यस्त हैं, जो लोभी हैं, तथा स्नेहा के अभ्यस्त हैं , वात से पीड़ित हैं, कठोर आँतों वाले हैं तथा जिन्हें स्नेहन की आवश्यकता है, उन्हें स्नेहन के लिए मज्जा का उपयोग करना चाहिए। इस प्रकार प्रत्येक समूह के स्नेहन का वर्णन किया गया है, तथा यह भी बताया गया है कि कौन सा समूह किस प्रकार के रोगी के लिए उपयोगी है।
स्नेहा ( स्नेहा ) के दो पाठ्यक्रम
51. तेल लगाने के दो कोर्स हैं: एक सात दिन का और दूसरा तीन दिन का।
वे व्यक्ति जिनके लिए ओलीएशन का संकेत दिया गया है
52. स्नेहा उन लोगों के लिए संकेतित है जिन्हें स्नान या शुद्धिकरण प्रक्रिया से गुजरना है, जो निर्जलित हैं, वात विकारों से पीड़ित हैं; जो व्यायाम, शराब और महिलाओं के आदी हैं, और जो मानसिक परिश्रम में लीन हैं ।
वे व्यक्ति जिनमें यह प्रतिसंकेतित है
53. स्नेहा उन लोगों के लिए वर्जित है जिन्हें शोधन प्रक्रिया के बिना निर्जलीकरण चिकित्सा की सलाह दी गई है, और जिनमें कफ और वसा बढ़ गई है।
54. जिनके मुख या मलाशय से बलगम अधिक निकलता हो, जिनकी जठराग्नि सदैव मंद रहती हो, जो प्यास से व्याकुल रहते हों, गर्भवती होने पर बेहोश हो जाते हों, जिनका तालू सूख गया हो,
55-56. जिनको भोजन से घृणा हो, वमन हो, जो पेट के रोग, कफ विकार और जीर्ण विष से पीड़ित हों, जो दुर्बल और अत्यन्त दुर्बल हों, जो तेल से घृणा करते हों, जो जीर्ण मदिरापान से पीड़ित हों तथा जो नाक से औषधि या एनिमा ले रहे हों, उन्हें स्नेह नहीं देना चाहिए, क्योंकि अन्यथा रोगी भयंकर रोगों से ग्रस्त हो सकता है।
अल्प-तेलीकरण के संकेत
57. मल का चिपचिपा और सूखा रहना, वात का नियमन न होना, पाचन शक्ति का कमजोर रहना, अंगों का रूखापन और सूखापन बना रहना - ये सब अल्प तेलीकरण के लक्षण हैं।
सफल ओलीएशन के संकेत
58. वात का नियमन होना, जठराग्नि का सक्रिय होना, मल का चिकना और चिकना होना, तथा शरीर का कोमल और चिकना होना - ये सफल तेलीकरण के लक्षण हैं।
अति-तेलीकरण के संकेत
59. मल का पीलापन, भारीपन, सुस्ती, मल का अपचय, सुस्ती, भूख न लगना और उबकाई आना अतितेलीकरण के लक्षण हैं।
स्नेहा (Oleation ) की तैयारी
60. जो व्यक्ति अगले दिन सुबह स्नेह लेने के इच्छुक हो, उसे तरल, गर्म, कफ को उत्तेजित न करने वाला, बहुत चिकना न और बहुत अधिक कामुक न होने वाला आहार लेना चाहिए ।
शुद्धि और शामक औषधियों के लिए उचित समय
61. यदि व्यक्ति भूखा हो तो स्नेह की शामक खुराक भोजन के समय ली जा सकती है; जबकि शोधक खुराक रात्रि भोजन के पूर्णतः पच जाने के बाद लेनी चाहिए।
ओलिटेड व्यक्ति में संकेत और प्रतिसंकेत
62-64. उसे केवल गर्म पानी पीना चाहिए, ब्रह्मचर्य का पालन करना चाहिए, केवल रात को सोना चाहिए, मल, मूत्र, पेट फूलना और डकार की इच्छाओं को दबाना नहीं चाहिए, शारीरिक व्यायाम, ऊंची आवाज में बोलना, क्रोध, शोक, तेज ठंड और धूप से बचना चाहिए, और हवा से मुक्त जगह पर सोना और बैठना चाहिए। तेल लगाने के बाद और उसके दौरान इस तरह की दिनचर्या का पालन करना चाहिए। तेल लगाने की प्रक्रिया ( स्नेहा ) के दौरान गलत दिनचर्या से गंभीर विकार उत्पन्न होते हैं।
नरम आंत्र और कठोर आंत्र की स्थिति की प्रकृति
65. शुद्ध तेलीकरण पदार्थों के प्रयोग से कोमल आंत वाले व्यक्ति का तेलीकरण तीन दिन में हो जाता है, जबकि कठोर आंत वाले व्यक्ति का तेलीकरण होने में सात दिन लगते हैं।
66-67. गुड़, गन्ने का रस, दही, जल, दूध, दही, खीर, खिचड़ी, घी, सफेद सागवान और तीनों हरड़ का रस, अंगूर का रस, तुरई का रस, गर्म जल और ताजा मदिरा - इनमें से किसी एक का सेवन करने से मृदु आंत वाला व्यक्ति शुद्ध हो जाता है।
68. ये सभी कठोर आंत वाले व्यक्ति को शुद्ध करने में असफल रहते हैं। कठोर आंत वाले व्यक्ति के पाचन अंग वात की अधिकता से प्रभावित होते हैं।
69. कोमल आँतों वाले व्यक्ति के पाचन अंग पित्त की अधिकता, कफ की अल्पता और वात की मृदुता से प्रभावित होते हैं; इसलिए ऐसे व्यक्ति को सरलता से मलत्याग योग्य कहा जाता है।
डिप्सोसिस की जटिलता का उपचार
70. जिसके पाचन-क्षेत्र में पित्त की अधिकता हो और जिसकी जठराग्नि बहुत प्रबल हो, उसका पिया हुआ घी जठराग्नि की गर्मी से शीघ्र ही नष्ट हो जाता है।
71. स्नेह से प्रेरित प्रबल जठराग्नि , स्नेह की मात्रा को पीकर तथा जीवनशक्ति को क्षीण करके, तीव्र प्यास के साथ-साथ अनेक अन्य जटिलताएं उत्पन्न करती है।
72. बहुत भारी भोजन भी घी से बढ़ी हुई जठराग्नि को शांत नहीं कर पाता। यदि इस व्यक्ति को बहुत ठण्डे जल से प्यास न बुझाई जाए तो वह बहुत अधिक गरम हो जाता है, जैसे बंद बिल में फँस जाने पर साँप अपने ही विष की गर्मी से तड़प उठता है।
73. यदि रोगी को प्यास की शिकायत हो और तेल का घूंट न पचा हो तो चिकित्सक को चाहिए कि वह रोगी को उल्टी करवा दे। इसके बाद रोगी ठंडा पानी पी सकता है और सूखा भोजन ले सकता है; तथा उसे फिर उल्टी करवा सकता है।
गलत तरीके से तेल लगाने की जटिलताएं
74. पित्त की स्थिति में और खासकर जब यह काइमेडिसॉर्डर से जुड़ा हो, तो सादा घी नहीं खाना चाहिए। यह पूरे शरीर में पीलिया (पीलिया) पैदा कर सकता है, और चेतना को नष्ट कर सकता है, यहाँ तक कि रोगी की मृत्यु भी हो सकती है।
75-76. अकर्मण्यता, जी मिचलाना, कब्ज, ज्वर, अकड़न, बेहोशी, चर्मरोग, खुजली, पीलापन, सूजन, बवासीर, भूख न लगना, प्यास, पेट के विकार और पाचन-विकार, कठोरता, वाणी का दमन, शूल और कफ-विकार आदि विकार गलत स्नेहन क्रिया के फलस्वरूप उत्पन्न होते हैं ।
इसका उपचार
77-78. इन मामलों में, प्रत्येक जटिलता की गंभीरता का पता लगाने के बाद, उल्टी, पसीना और गर्भवती उपचार और रेचक का प्रबंध किया जाना चाहिए। मक्खन-दूध, शराब, सूखे खाने और पीने का उपयोग, विभिन्न मूत्र और तीन हरड़ का सेवन तेल लगाने की गलत प्रक्रिया से उत्पन्न जटिलताओं के लिए उपचार हैं।
जटिलताओं के कारण
79. गलत समय पर, विपरीत परिस्थितियों में, गलत मात्रा में, गलत उपचार के साथ या बहुत लंबे समय तक लिया गया स्नेहा, जटिलताओं को जन्म देता है ।
80. रोगी को तेल की खुराक लेने के बाद तीन रात आराम करना चाहिए तथा तीन दिन तक चावल के साथ चिकना, तरल तथा गर्म मांस-रस पर निर्वाह करना चाहिए। इसके बाद रोगी को रेचक खुराक लेनी चाहिए।
शामक तेलीकरण में नियम
81.-(1). उबकाई की खुराक एक दिन आराम करने के बाद इस तरीके से ली जा सकती है।
81. स्नेहन में जो विधि विरेचन प्रक्रिया में नहीं अपनाई जाती, वह विधि विरेचन प्रक्रिया के लिए निर्धारित विधि के समान ही है।
82. स्नेहा उन लोगों को देना चाहिए जिन्हें स्नेहन से घृणा हो, जो चिकनाई के आदी हों, जो मृदु हृदय वाले हों, जो कष्ट नहीं सह सकते हों तथा जो शराब पीने के आदी हों।
83. सामान्य बटेर, तीतर, मोर, हंस, सूअर, मुर्गा, बैल, बकरी, जंगली भेड़ और मछली के मांस का रस स्नेहन प्रक्रिया में देने के लिए स्वास्थ्यवर्धक होता है ।
84. जौ, बेर, चना, चिकनाई वाले पदार्थ, गुड़, चीनी, अनार, दही और तीन मसाले, ये वे पदार्थ हैं जिनका उपयोग मांस-रस के साथ किया जाता है।
85. तिल को भोजन से पहले चिकनाईयुक्त वस्तुओं और गुड़ के साथ लेने से स्नेह मिलता है , तथा इसी प्रकार तिल के साथ बिना पका हुआ दही और सूप भी स्वादिष्ट लगता है।
86. जल से पीड़ित व्यक्ति को गुड़, अदरक और तेल को सूरा मदिरा के साथ लेना चाहिए , और जब यह पच जाए तो उसे भुना हुआ मांस खाना चाहिए।
87. वात-प्रधान मनुष्य को सुरा मदिरा के साथ तेल, पशु की चर्बी या मज्जा, या गुड़ मिले दूध का सेवन करने से वसा प्राप्त होती है।
88. थनों के गर्म दूध में चिकनाई और चीनी मिलाकर पीने से या दही की मलाई को गुड़ के साथ पीने से पुरुष प्रसन्न होता है।
89. पंचप्रसृति का पतला दलिया और काले चने की खीर तथा चिकनाई मिलाकर खाने से मनुष्य शीघ्र ही मोटा हो जाता है।
90. स्नेह चाहने वाले को आठ तोला घी, तेल, वसा, मज्जा और चावल से बना पंचप्रसृति द्रव्यों का पतला दलिया खाना चाहिए ।
91.-(1). सूअर के रस में चिकनाई मिलाकर, घी और नमक मिलाकर, दिन में दो बार सेवन करने से शीघ्र ही पुरुष को प्रसन्नता मिलती है।
स्नेहा (Oleation ) के संदर्भ में मतभेद
91. चर्मरोग, सूजन और मूत्र-स्राव की असामान्यता से पीड़ित व्यक्तियों को स्नेह के लिए घरेलू, आर्द्रभूमि और जलीय पशुओं का मांस, गुड़, दही, दूध और तिल का उपयोग नहीं करना चाहिए ।
92. उन्हें बताए अनुसार तेल लगाया जाना चाहिए, तथा तेल लगाने के लिए ऐसी सामग्री का प्रयोग करना चाहिए जो सभी जटिलताओं से बचाती हो, जैसे कि पिप्पली, हरड़ या तीन हरड़ से बनी सामग्री।
93. चिकित्सक को अंगूर और हरड़ के काढ़े में खट्टी दही और तीनों मसालों का गूदा मिलाकर स्नेह तैयार करना चाहिए। इस स्नेह को पीने से मनुष्य को स्नेह प्राप्त होता है ।
94. दूध से सीधे निकाला गया घी, जौ, बेर, चना, क्षार, सुरा और दही के सूप के साथ तैयार किया गया घी स्नेहन के लिए सबसे अच्छा घी है ।
95. बेर और तीनों हरड़ के काढ़े से बना तेल, मज्जा, पशु चर्बी और घी स्त्री रोग और वीर्य विकारों में प्रयोग करना चाहिए।
96. जिस प्रकार जल कपड़े को पूरी तरह भिगोकर बाहर निकाल देता है, उसी प्रकार चिकनाई भी जठराग्नि की शक्ति के अनुसार पच जाती है और अधिक होने पर बाहर निकल जाती है।
97. अथवा जिस प्रकार मिट्टी के ढेले पर जल्दी से डाला गया जल उसे भिगोये बिना ही बह जाता है, उसी प्रकार जल्दी से लिया गया चिकना द्रव्य शरीर को पूरी तरह भिगोये बिना ही निकल जाता है।
नमक डालने के फायदे
98. नमक के साथ मिलाया गया चिकना पदार्थ स्नेहन की प्रक्रिया को तेज करता है , क्योंकि नमक में द्रवीभूत, गैर-शुष्क, सूक्ष्म, गर्म और फैलने वाले गुण होते हैं।
99. पहले स्नेहन करना चाहिए, फिर स्नान देना चाहिए, और जब स्नेहन और स्नान हो जाए, तब शोधन या शामक देना चाहिए।
सारांश
100. यहाँ एक पुनरावर्ती श्लोक है-
स्नेहयुक्त पदार्थ, स्नेहन की पूरी विधि , संभावित जटिलताएं तथा उनके उपचार तथा आवश्यक औषधियां - इन सबका वर्णन चन्द्रभागा के पूज्य पुत्र ने पूछे गए प्रश्नों के अनुसार किया है।
13. इस प्रकार अग्निवेश द्वारा संकलित तथा चरक द्वारा संशोधित ग्रन्थ के सामान्य सिद्धान्त अनुभाग में स्नेह विधि नामक तेरहवाँ अध्याय पूर्ण हुआ।
अध्याय 12 - वाट के मूल्यवान और व्यापारिक प्रभाव
चरकसंहिता के सूत्रस्थान का चौदहवाँ अध्याय - 'स्वेदविधि अध्यायः'

