सृष्टि के परमाण्विक रहस्य से लेकर आत्म-साक्षात्कार की कथा तक

पूर्ण जीवन दर्शन: मंत्र, विज्ञान और बोध

पूर्ण जीवन दर्शन

सृष्टि के परमाण्विक रहस्य से लेकर आत्म-साक्षात्कार की कथा तक

चरण १: उत्पत्ति (Cosmos)

१. तम की परतें और गुप्त चेतन

"तम आसीत्तमसा गूढमग्रेऽप्रकेतं सलिलं सर्वमा इदं।
तुच्छ्येनाभ्वपिहितं यदासीत्तपसस्तन्महिना जायतैकं॥"

ब्रह्मांड के प्रारंभ में 'पदार्थ' और 'चेतना' दोनों अंधकार से ढके थे। इस आवरण के नीचे वह सूक्ष्म चेतन सक्रिय हुआ, जिसका सामर्थ्य 'सबकुछ पचाने' में सक्षम है। यह वही 'तुच्छ' (सूक्ष्म) शक्ति है जो परमाणु के केंद्र (Nucleus) में निहित होकर पूरे अस्तित्व को थामे हुए है।

चरण २: ऊर्जा (Energy)

२. जातवेदा: ब्रह्मांडीय अग्नि

"अग्निरस्मि जन्मना जातवेदा... अर्कस्त्रधातू रजसो विमानो..."

यही सूक्ष्म शक्ति 'अग्नि' बनकर स्वयं को प्रकट करती है। यह ऊर्जा अजस्र घर्म (अविनाशी ताप) है, जो कण-कण में सूचना (Information) बनकर स्थित है। यही ऊर्जा मानव शरीर में 'नाम-रूप-संस्कार' की महिमा बनकर स्वयं को अभिव्यक्त करती है।


चरण ३: स्थिति (Perspective)

३. मानचित्र में आपका स्थान?

जैसे एक धनवान सेठ अपने महलों पर गर्व करता था, पर दुनिया के नक्शे में उसे अपनी कोठी का एक बिंदु भी नहीं मिला, वैसे ही हम भी अपनी 'पदार्थिक परतों' पर गर्व करते हैं।

चरण ४: बोध (Awakening)

४. समझिये भी: तोतारटन्त से परे

जब तक ज्ञान केवल शब्दों (Data) में है, तब तक वह 'तम' के समान है। जब पंडित जी ने शास्त्र को केवल पढ़ा नहीं बल्कि 'जिया', तब उनकी आँखों से निकले आंसू उस तप का प्रतीक थे, जिसने उनके भीतर 'अमृत' को जाग्रत किया।

परम सत्य

"वही 'अग्नि' जो सितारों को चमकाती है, परमाणु को बांधती है और मानचित्र के परे अनंत ब्रह्मांड का निर्माण करती है, वही आपके भीतर 'चेतना' बनकर बैठी है। उसे शब्दों में नहीं, अनुभव में उतारें।"

© 2026 ज्ञान विज्ञान ब्रह्मज्ञान (GVB) अनुसंधान

ऋग्वेद - यजुर्वेद - आधुनिक भौतिकी - आत्मिक बोध

 

👉 सुनिये ही नहीं समझिये भी

 

एक पण्डित किसी को भागवत की कथा सुनाने जाया करते थे। वे बड़े प्रकाण्ड विद्वान थे। शास्त्रज्ञ थे। राजा भी बड़ा भक्त और निष्ठावान था। पण्डित कथा सुनाते हुए बीच−बीच में राजा से पूछ लिया करते, यह जानने के लिए कि राजा का ध्यान कथा में है या नहीं “राजा कुछ समझ रहे हो?” तब राजा ने कहा “महाराज! पहले आप समझिये।” पण्डित जी राजा का यह उत्तर सुनकर आश्चर्यचकित हो गये। वे राजा के मन की बात नहीं जान पाये।

 

एक दिन फिर पण्डित जी ने राजा से पूछा “राजा कुछ समझ रहे हो?” “महाराज पहले आप समझें” राजा ने उतर दिया। पण्डित जी असमंजस में थे कि आखिर इस भागवत में क्या है जो मेरी समझ से बाहर है। जब−जब पण्डित जी पूछते राजा उसी प्रकार कहता।

 

एक दिन पण्डित जी घर पर भागवत की पुस्तक लेकर एकाग्र चित्त हो पढ़ने लगे। आज पंडित जी को बड़ा आनन्द आ रहा था कथा में। पंडित जी ने समझा कि राजा ठीक कहता है। वे मनोयोगपूर्वक कथा पढ़ने लगे। खाना पीना सोना नहाना सब भूल गये। कथा में ही मस्त हो गये। पंडित जी की आँखों से अश्रु बहने लगे। कई दिन बीत गये, पंडित जी राजा को कथा सुनाने नहीं पहुँचे। वे वहीं पर कथा पढ़ते रहते। बहुत दिन हुए। राजा ने सोचा पंडित जी नहीं आ रहे। उसे सन्देह हुआ। वेश बदलकर राजा पंडित जी के घर पहुँचे और जहाँ कथा पढ़ रहे थे वहाँ बैठकर कथा सुनने लगे। राजा के मन में पंडित जी का भाव देखकर भक्ति भावना प्रबल हो गई। पंडित जी पाठ पूरा करके उठे तो राजा को पहचान लिया। राजा ने उन्हें साष्टांग प्रणाम किया। पंडित ने कहा “राजन्! आपने तो मुझे मार्गदर्शन देकर कृतार्थ किया।”

 

ईश्वर विषयक चर्चा कथायें केवल तोतारटन्त की तरह पढ़ लेने या सुन लेने से कुछ नहीं होता। समझने, मनन करने और जीवन में उतारने से ही कोई ज्ञान अथवा सत्परिणाम उत्पन्न कर सकता है।

 

📖 अखण्ड ज्योति अप्रैल 1962

एक टिप्पणी भेजें

If you have any Misunderstanding Please let me know

और नया पुराने