अनूठा प्रेम
भगवान् बुद्ध के शिष्य उपगुप्त परम सदाचारी थे। वेभिक्षुओं से कहते थे कि
प्रेम और संयम ही भौतिक व आध्यात्मिक विकास के साधन हैं । समाज द्वारा बहिष्कृत
लोगों से प्रेम करनेवाला ही सच्चा धार्मिक है । एक दिन एक सुंदरी उपगुप्त के पास
पहुँची । उपगुप्त उसका अनूठा सौंदर्य देखकर आकर्षित हो गए , लेकिन उसी क्षण उन्हें बुद्ध के वचन याद आए गए
कि शारीरिक सौंदर्य में नहीं , मन के सौंदर्य में सच्चा आकर्षण होता है । सुंदरी भी उपगुप्त को देखते ही
प्रेमपाश में बंध गई थी । उसने उपगुप्त से प्रार्थना की कि वे उसके साथ कुछ क्षण
बिताकर उसे उपकृत करें । उपगुप्त ने वचन दिया कि उपयुक्त अवसर पर वे एक बार अवश्य
मिलेंगे ।
कुछ वर्ष बीत गए । भोग-विलास में रत रहने के कारण युवती को अनेक रोगों ने
घेर लिया । उसका रूप - लावण्य नष्ट हो गया । उसके शरीर से दुर्गंध आने लगी । लोगों
ने उसे कुलटा बताकर नगर से बाहर निकाल दिया । वह जंगल में दयनीय हालत में अंतिम
दिन बिताने लगी । उपगुप्त को अचानक युवती की दुर्दशा का पता चला और उन्हें अपना
वचन भी याद हो आया । वे उससे मिलने जा पहुँचे। उन्हें देखते ही युवती की आँखों से
आँसू बहने लगे । उपगुप्त ने उसके सिर पर हाथ फेरा, तो वह चमत्कृत होकर बोली, जब मैं प्रेम करने योग्य थी , तब तो आप आए नहीं , अब क्या लाभ ? उपगुप्त ने कहा, देवी, शारीरिक
आकर्षण को प्रेम नहीं, वासना कहते हैं । मैं आज भी तुमसे प्रेम करता हूँ । युवती यह सुनकर आह्लादित
हो उठी ।

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