महर्षि का श्राप

 

महर्षि का श्राप

प्रजापति दक्ष अपने दामाद शिवजी से ईर्ष्या रखते थे। एक बार उन्होंने शिवजी को नीचा दिखाने के कलुषित उद्देश्य से कनखल में यज्ञ का आयोजन किया । उन्होंने यज्ञ में देवर्षियों , महर्षियों तथा देवताओं को आमंत्रित किया,किंतु अपनी पुत्री सती व शिवजी की उपेक्षा की । सर्वयज्ञों में पारंगत महर्षि दधीचि को भी सादर आमंत्रित किया गया था ।

महर्षि दधीचि ने शिवजी को अनुपस्थित देखकर दक्ष को समझाते हुए कहा, देवादिदेव भगवान् शंकर की कृपा के बिना कोई भी यज्ञ सफल नहीं होता । राग- द्वेष की कुत्सित भावना से किया गया कोई भी सत्कर्म विनाश का कारण बनता है । इसलिए अब भी समय है, हठ त्यागकर भगवान् महादेव को सादर आमंत्रित करो ।

यह सुनते ही प्रजापति दक्ष शिवजी के प्रति कटु वचनों का उपयोग करने लगे । वे उन्हें भूतों और पिशाचों का स्वामी कहने लगे । दक्ष के भय से मंडप में उपस्थित जनों में से किसी ने भी इसका प्रतिवाद नहीं किया , लेकिन महर्षि दधीचि उठे और निर्भीकता से बोले, शिवजी के प्रति अपशब्द सुनना मेरे लिए असहनीय है । मैं भविष्यवाणी करता हूँ कि यह यज्ञ तुम्हारे कल्याण का नहीं , विनाश का कारण बनेगा । भगवान् रुद्र की क्रोधाग्नि से सबकुछ ध्वस्त हो जाएगा । कहते - कहते महर्षि यज्ञ मंडप से उठकर अपने आश्रम को लौट गए । इसी यज्ञ में भगवती सती ने आत्मदाह किया और यह यज्ञ दक्ष के सकल विनाश का कारण बना ।


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