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जीवन का उद्देश्य

दुःखजन्मप्रवृत्तिदोषमिथ्याज्ञानानामुत्तरोत्तरापाये तदनन्तरापायादपवर्गः II1/1/2 न्यायदर्शन अर्थ : तत्वज्ञान से मिथ्या ज्ञान का नाश हो जाता है और मिथ्या ज्ञान के नाश से राग द्वेषादि दोषों का नाश हो जाता है, दोषों के नाश से प्रवृत्ति का नाश हो जाता है। प्रवृत्ति के नाश होने से कर्म बन्द हो जाते हैं। कर्म के न होने से प्रारम्भ का बनना बन्द हो जाता है, प्रारम्भ के न होने से जन्म-मरण नहीं होते और जन्म मरण ही न हुए तो दुःख-सुख किस प्रकार हो सकता है। क्योंकि दुःख तब ही तक रह सकता है जब तक मन है। और मन में जब तक राग-द्वेष रहते हैं तब तक ही सम्पूर्ण काम चलते रहते हैं। क्योंकि जिन अवस्थाओं में मन हीन विद्यमान हो उनमें दुःख सुख हो ही नहीं सकते । क्योंकि दुःख के रहने का स्थान मन है। मन जिस वस्तु को आत्मा के अनुकूल समझता है उसके प्राप्त करने की इच्छा करता है। इसी का नाम राग है। यदि वह जिस वस्तु से प्यार करता है यदि मिल जाती है तो वह सुख मानता है। यदि नहीं मिलती तो दुःख मानता है। जिस वस्तु की मन इच्छा करता है उसके प्राप्त करने के लिए दो प्रकार के कर्म होते हैं। या तो हिंसा व चोरी करता है या दूसरों का उपकार व दान आदि सुकर्म करता है। सुकर्म का फल सुख और दुष्कर्मों का फल दुःख होता है परन्तु जब तक दुःख सुख दोनों का भोग न हो तब तक मनुष्य शरीर नहीं मिल सकता !

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अनूठी विनयशीलता

 

अनूठी विनयशीलता

गोस्वामी तुलसीदासजी यह जानते थे कि श्रीराम, श्रीकृष्ण और भगवान् शंकर में कोई अंतर नहीं है । इसलिए वे एक बार भगवान् श्रीकृष्ण की लीला भूमि के दर्शन के लिए वृंदावन पहुँचे। वे श्रीराम गुलेला नामक स्थान पर रुके ।

श्री भक्तमाल के रचयिता परम भागवत संत श्री नाभाजी उन दिनों वृंदावन आए हुए थे। उन्होंने संतों को प्रसाद (भोजन ) ग्रहण करने के लिए आमंत्रित किया । उन्हें यह पता नहीं था कि तुलसीदास भी वृंदावन आए हुए हैं । तुलसीदास ने नाभाजी की ख्याति सुन रखी थी । उन्हें जैसे भगवान् से प्रेरणा मिली कि नाभादासजी द्वारा आयोजित भंडारे में जाकर वैष्णव संतों के दर्शन करें । वे चुपचाप वहाँ जा पहुंचे। उन्होंने देखा कि प्रसाद के लिए संत पंक्ति में बैठ चुके हैं । कहीं जगह नहीं बची है । तुलसीदास उस स्थान पर बैठ गए , जहाँ संतों की जूतियाँ रखी हुई थीं । किसी ने उनके सामने भी पत्तल रख दी । प्रसाद परोसने वाले ने सब्जियाँ व पूरियाँ पत्तल में परोस दीं । बालटी में खीर लेकर आए संत- सेवक ने पूछा, बाबा, खीर किस पात्र में परो ?

तुलसीदासजी ने एक संत की जूती की ओर संकेत कर कह दिया , इसमें परोस दो । यह सुनते ही खीर परोसने वाला नाराज होकर शोर मचाने लगा ।

शोर सुनकर संत नाभादास वहाँ पहुँचे। तुलसीदास को देखते ही वे उनके चरणों में पड़ गए । संत नाभाजी तथा अन्य संतगण गोस्वामीजी की विनयशीलता देखकर हतप्रभ थे ।


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