अनूठी विनम्रता
लंका में रावण, उसके पुत्रों तथा राक्षस सेना का संहार करने के बाद भगवान श्रीराम ने विभीषण को यह आदेश दिया कि सीताजी को ससम्मान पुष्प वाटिका से ले आओ। विभीषण ने लंका में उपलब्ध सर्वोत्कृष्ट पालकी मँगवाई। राक्षसियों ने सीताजी को स्नान कराया, सुंदर वस्त्र पहनाए, उत्तम आभूषणों से श्रृंगार किया। उन्हें ससम्मान पालकी में बिठाया गया। निभीषण के सेवक राक्षस पालकी को उठाकर श्रीराम के शिविर की ओर चल दिए। पालकी में रेशमी वस्त्रों के आवरण (परदे ) लगे थे। जब सीताजी को लिये पालकी हनुमानजी की वानर सेना के निकट पहुँची, तो वानर सैनिक उनके दर्शन के लिए लालायित होकर पालकी के चारों ओर आने लगे। दर्शन के लिए उतावले कुछ वानरों ने पालकी के रेशमी परदों को हटाने का प्रयास किया। पहरेदारों ने अनुशासन बनाए रखने के उद्देश्य से उन्हें दूर जाने तथा बाद में दर्शन करने के लिए कहा।
श्रीराम शिविर के द्वार पर खड़े यह दृश्य देख रहे थे। उन्होंने विभीषण से कहा, 'सीताजी की पालकी को आवरण से नहीं घेरा जाना चाहिए था। हनुमान और सुग्रीव की अनुयायी इस वानर सेना ने सीताजी की मुक्ति के लिए लंका तक की लंबी यात्रा की, अनेक कष्ट उठाए। वे उनमें माँ की श्रद्धा भावना रखकर दर्शन को उत्सुक हैं। सीताजी को पैदल चलकर इनके बीच आना चाहिए था।'
श्रीराम की बात सुनकर सभी उनकी इस विनम्रता के समक्ष नतमस्तक हो उठे।
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