जीवन का उद्देश्य

दुःखजन्मप्रवृत्तिदोषमिथ्याज्ञानानामुत्तरोत्तरापाये तदनन्तरापायादपवर्गः II1/1/2 न्यायदर्शन अर्थ : तत्वज्ञान से मिथ्या ज्ञान का नाश हो जाता है और मिथ्या ज्ञान के नाश से राग द्वेषादि दोषों का नाश हो जाता है, दोषों के नाश से प्रवृत्ति का नाश हो जाता है। प्रवृत्ति के नाश होने से कर्म बन्द हो जाते हैं। कर्म के न होने से प्रारम्भ का बनना बन्द हो जाता है, प्रारम्भ के न होने से जन्म-मरण नहीं होते और जन्म मरण ही न हुए तो दुःख-सुख किस प्रकार हो सकता है। क्योंकि दुःख तब ही तक रह सकता है जब तक मन है। और मन में जब तक राग-द्वेष रहते हैं तब तक ही सम्पूर्ण काम चलते रहते हैं। क्योंकि जिन अवस्थाओं में मन हीन विद्यमान हो उनमें दुःख सुख हो ही नहीं सकते । क्योंकि दुःख के रहने का स्थान मन है। मन जिस वस्तु को आत्मा के अनुकूल समझता है उसके प्राप्त करने की इच्छा करता है। इसी का नाम राग है। यदि वह जिस वस्तु से प्यार करता है यदि मिल जाती है तो वह सुख मानता है। यदि नहीं मिलती तो दुःख मानता है। जिस वस्तु की मन इच्छा करता है उसके प्राप्त करने के लिए दो प्रकार के कर्म होते हैं। या तो हिंसा व चोरी करता है या दूसरों का उपकार व दान आदि सुकर्म करता है। सुकर्म का फल सुख और दुष्कर्मों का फल दुःख होता है परन्तु जब तक दुःख सुख दोनों का भोग न हो तब तक मनुष्य शरीर नहीं मिल सकता !

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MK PANDEY PRESIDNT OF GVB

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परछाई

 *परछाई* 





घड़ी का कांटा छह पार करके सात के पीछे झूल रहा था। दादाजी हर रोज की तरह घर के सामने वाले बाग में अखबार लेकर बैठे थे। मन्नू जमीन पर बैठकर घास तोड़ रहा था। एक जगह से घास तोड़ता और दूसरी जगह ले जाकर रख देता। जब सौलवी बार ऐसा करने जा रहा था, उसे एक दम से अपनी परछाई दिखी। वो डर के मारे भागकर अपने दादाजी के पास चला गया। 


"क्या हुआ मन्नू?" मन्नू के सर को दादाजी ने सहलाते हुए पूछा। 


"दादाजी यहाँ भूत हैं.." मन्नू ने और कसकर दादाजी को पकड़ते हुए कहा। 


"कहाँ?"


मन्नू उठा और अपनी परछाई दिखाकर कहा - "ये देखो!"। दादाजी ये देखकर जोर से हंसने लगे। 


"ये भूत नहीं है बेटा, ये तुम्हारी परछाई है.."


कर्म भी उसी परछाई के तरह होता हैं। जिस तरह शरीर परछाई से पीछा नहीं छूटा पाता, उसी प्रकार हमारी आत्मा भी कर्म से पीछा नहीं छूटा सकती। ये पागलपन हैं जो हमें सोचने में मजबूर करता है कि "टेंशन क्या लेना, सब हो ही जाएगा।" माना कि टेंशन लेना अच्छी बात नहीं है पर कर्म न करना तो बुरी बात है। आप कब तक कर्म से पीछा छुड़ा पाओगे? कब तक यूं ही कंबल में लेटे-लेटे रील्स देखते हुए हंस पाओगे? याद रखिए- मनुष्य कर्म से दूर भाग सकता है लेकिन कर्म मनुष्य से दूर नहीं भाग सकता। कुछ न करना भी एक कर्म है। मगर वो एक खाली कर्म है जो आपके भविष्य को खाली और खोखला करता जाता है। 


इसलिए, मेहनत से ना भागों। दुनिया में अभी तक पैदा होने वाले सभी महानपुरुषों की गाथाएँ पढ़ लीजिए, सभी एक ही बात कहते हैं। "मेहनत करो"। मनोज बाजपायी जी ने एक इंटरव्यू में कहा है कि इंसान को तीस वर्ष तक ये नहीं देखना चाहिए कि कितना सोये हैं, कितना आराम किया है। उसे बस मेहनत करनी चाहिए। क्योंकि तब तक आपके पास ऊर्जा होती है। उसके बाद आपका शरीर भी जवाब देने लगता है।   


मनोज सर की बात मानो या मानो, एक बात परमसत्य है कि आप आज जो भी कर रहे हैं, वो कल आपको वापस जरूर मिलेगा। वो कहते हैं ना, "जब बोया पेड़ बबूल का, अमरूद कहाँ से होये"। इसलिए, है पार्थ! मेहनत करो। कर्म करो। और अपनी सफलता की परछाई को रंगबिरंगा करो।  



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