🚩‼️ओ३म्‼️🚩
🕉️🙏नमस्ते जी🙏
दिनांक - - ०४ जनवरी २०२५ ईस्वी
दिन - - शनिवार
🌒 तिथि -- पञ्चमी ( २२:०० तक तत्पश्चात षष्ठी )
🪐 नक्षत्र - - शतभिषा ( २१:२३ तक तत्पश्चात पूर्वाभाद्रपद )
पक्ष - - शुक्ल
मास - - पौष
ऋतु - - हेमन्त
सूर्य - - उत्तरायण
🌞 सूर्योदय - - प्रातः ७:१५ पर दिल्ली में
🌞 सूर्यास्त - - सायं १७:३८ पर
🌒 चन्द्रोदय -- १०:२९ पर
🌒 चन्द्रास्त २२:१३ पर
सृष्टि संवत् - - १,९६,०८,५३,१२५
कलयुगाब्द - - ५१२५
विक्रम संवत् - -२०८१
शक संवत् - - १९४६
दयानंदाब्द - - २००
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🚩‼️ओ३म्‼️🚩
🔥प्रश्न :- क्या ईश्वर को भी सुख दुःख होता है?
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उत्तर :- सुख, दु:ख, ईर्ष्या, द्वेष, इच्छा इत्यादि ये सब जीव के लक्षण है। जब आत्मा शरीर धारण करता है अर्थात् भौतिक शरीर में आता है, तब ही उसे सुख - दुःख का अहसास होता है।
ईश्वर अकाय है ( यजुर्वेद ४०\८ ) उसका कोई शरीर नही है, वह निराकार है , अत: उसमें सुख-दु:ख जैसी कोई बात नहीं होती।
वैदिक सिद्धान्तानुसार जो कर्ता होता है, वही भोक्ता होता है ।जीवात्मा शरीर में रहते अच्छे -बुरे कर्म करता है और कर्म का फल ( सुख - दु:ख ) भोक्ता है। ईश्वर आनन्दस्वरूप है। वह परिपूर्ण हैं, अत: पूर्ण को क्लेश कैसा ?
अनश्नन्नन्यो अभिचाकशीति (ऋग्वेद १\६४\२०
अर्थात परमात्मा न भोगता हुआ साक्षी है। वह निर्लेप है, सब विकारों से परे है।
ईश्वर को वेद में वृजन ( ऋग्वेद १\६१४ ) कहा है। वृजन का अर्थ है जिसमें दु:ख नही होता। परमात्मा न भोगता हुआ साक्षी है। जबकि दु:ख भोग में होता है ( ऋग्वेद १०\१६४\२० )
अकामो धीमी अमृत: स्वयंभू रसेन तृप्तो न कुतश्चनोन:।
तमेव विद्वान न बिभाय मृत्योरात्मानं धीरमजरं युवानाम।
ईश्वर शरीर धारण नहीं करता, वह सर्वव्यापक है, अत: ईश्वर का शरीर धारण करना असम्भव है। वह सदैव निर्मल है वह अविधादि जन्म-मरण , हर्ष-शोक, क्षुधा-तृषादि दोषों से रहित है। सुख-दु:ख का यह विकार ईश्वर में नही घट सकता।
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🚩‼️आज का वेद मंत्र ‼️🚩
🌷 ओ३म् स्वस्ति न: पथ्यासु धन्वसु स्वस्त्यप्सु वृजने स्वर्वति।
स्वस्ति न: पुत्रकथेषु योनिषु स्वस्ति राये मरूतो दधातन ( ऋग्वेद। १०। ६३।१५।)
💐 अर्थ:- हे जगदीश! हमें ऐसे सन्मार्ग पर चलाओ कि आपकी कृपा से हम जल वाले स्थानों वा मरुस्थलों में, लाभदायक संग्रामो में, पुत्रों के कर्मों से युक्त घरों में, भोज्य, धनादि की प्राप्ति में सफलता-सुख प्राप्त करे।
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🔥विश्व के एकमात्र वैदिक पञ्चाङ्ग के अनुसार👇
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🙏 🕉🚩आज का संकल्प पाठ 🕉🚩🙏
(सृष्ट्यादिसंवत्-संवत्सर-अयन-ऋतु-मास-तिथि -नक्षत्र-लग्न-मुहूर्त) 🔮🚨💧🚨 🔮
ओ३म् तत्सत् श्रीब्रह्मणो द्वितीये प्रहरार्धे श्रीश्वेतवाराहकल्पे वैवस्वतमन्वन्तरे अष्टाविंशतितमे कलियुगे कलिप्रथमचरणे 【एकवृन्द-षण्णवतिकोटि-अष्टलक्ष-त्रिपञ्चाशत्सहस्र- पञ्चर्विंशत्युत्तरशततमे ( १,९६,०८,५३,१२५ ) सृष्ट्यब्दे】【 एकाशीत्युत्तर-द्विसहस्रतमे ( २०८१) वैक्रमाब्दे 】 【 द्विशतीतमे ( २००) दयानन्दाब्दे, काल -संवत्सरे, रवि- उत्तरायणे , हेमन्त -ऋतौ, पौष - मासे, शुक्ल पक्षे, पञ्चम्यां
तिथौ,
शतभिषा नक्षत्रे, शनिवासरे
, शिव -मुहूर्ते, भूर्लोके जम्बूद्वीपे, आर्यावर्तान्तर गते, भारतवर्षे ढनभरतखंडे...प्रदेशे.... जनपदे...नगरे... गोत्रोत्पन्न....श्रीमान .( पितामह)... (पिता)...पुत्रोऽहम् ( स्वयं का नाम)...अद्य प्रातः कालीन वेलायाम् सुख शांति समृद्धि हितार्थ, आत्मकल्याणार्थ,रोग,शोक,निवारणार्थ च यज्ञ कर्मकरणाय भवन्तम् वृणे
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