जीवन का उद्देश्य

दुःखजन्मप्रवृत्तिदोषमिथ्याज्ञानानामुत्तरोत्तरापाये तदनन्तरापायादपवर्गः II1/1/2 न्यायदर्शन अर्थ : तत्वज्ञान से मिथ्या ज्ञान का नाश हो जाता है और मिथ्या ज्ञान के नाश से राग द्वेषादि दोषों का नाश हो जाता है, दोषों के नाश से प्रवृत्ति का नाश हो जाता है। प्रवृत्ति के नाश होने से कर्म बन्द हो जाते हैं। कर्म के न होने से प्रारम्भ का बनना बन्द हो जाता है, प्रारम्भ के न होने से जन्म-मरण नहीं होते और जन्म मरण ही न हुए तो दुःख-सुख किस प्रकार हो सकता है। क्योंकि दुःख तब ही तक रह सकता है जब तक मन है। और मन में जब तक राग-द्वेष रहते हैं तब तक ही सम्पूर्ण काम चलते रहते हैं। क्योंकि जिन अवस्थाओं में मन हीन विद्यमान हो उनमें दुःख सुख हो ही नहीं सकते । क्योंकि दुःख के रहने का स्थान मन है। मन जिस वस्तु को आत्मा के अनुकूल समझता है उसके प्राप्त करने की इच्छा करता है। इसी का नाम राग है। यदि वह जिस वस्तु से प्यार करता है यदि मिल जाती है तो वह सुख मानता है। यदि नहीं मिलती तो दुःख मानता है। जिस वस्तु की मन इच्छा करता है उसके प्राप्त करने के लिए दो प्रकार के कर्म होते हैं। या तो हिंसा व चोरी करता है या दूसरों का उपकार व दान आदि सुकर्म करता है। सुकर्म का फल सुख और दुष्कर्मों का फल दुःख होता है परन्तु जब तक दुःख सुख दोनों का भोग न हो तब तक मनुष्य शरीर नहीं मिल सकता !

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चरकसंहिता खण्ड - ७ कल्पस्थान अध्याय 6 - कड़वी तोरई की औषधि (कृतवेधना-कल्प)

 


चरकसंहिता खण्ड -  ७ कल्पस्थान 

अध्याय 6 - कड़वी तोरई की औषधि (कृतवेधना-कल्प)


1. अब हम 'कड़वी तोरई [ कृतवेधन - कल्प ] की औषधियाँ' नामक अध्याय का विस्तारपूर्वक वर्णन करेंगे ।

2. इस प्रकार पूज्य आत्रेय ने घोषणा की ।

समानार्थी शब्द और गुण

3-4. कड़वी तोरई [ कृतवेधना ] के नाम और औषधि विज्ञान जानें । इसे क्ष्वेद [ kṣveḍa ], कोशातकी [ kosātakī ] और मृदंगफला [ मृदंगफला ] भी कहा जाता है। यह अत्यंत तीखा, तीखा और गर्म है, और त्वचा रोग, एनीमिया, प्लीहा विकार, एडिमा, गुल्मा और विषाक्तता की गहरी जड़ों वाली स्थितियों में इसकी सिफारिश की जाती है।

4½. कड़वे तोरई के फूलों आदि से दूध आदि तथा शराब आदि का निर्माण किया जा सकता है, जैसा कि पहले वर्णित औषधियों के मामले में किया गया है।

विभिन्न तैयारियाँ

5-7. रोगी की शक्ति के अनुसार कड़वी तोरई के सूखे या कुचले हुए फलों में से एक या दो को, मुलेठी और उसके समूह की अन्य औषधियों के नौ प्रकार के काढ़ों में से किसी एक में लेना चाहिए, जैसा कि उबकाई वाले अखरोट के मामले में होता है। कड़वी तोरई के फलों का काढ़ा बनाकर और काढ़े को छानकर, उसमें कड़वी तोरई के बीजों के पेस्ट का एक भाग और उबकाई वाले अखरोट और अन्य औषधियों का आधा भाग मिलाकर एक लिक्टस बनाया जा सकता है। कड़वी तोरई को शुद्ध करने वाले कैसिया और उसके समूह की अन्य औषधियों के प्रत्येक काढ़े में भिगोकर तेरह काढ़े बनाए जा सकते हैं।

7½. रेशमी कपास वृक्ष समूह के दस दूध देने वाले वृक्षों में से प्रत्येक की जड़ों के चूर्ण के साथ कड़वी तोरई [ कृतवेधन ] को मिलाकर दस पायस बनाए जा सकते हैं ।

8. वमनकारक मेवे की तरह इसकी छः गोलियां बनाई जा सकती हैं। इसके फल आदि का घी भी इसी प्रकार बनाया जा सकता है।

9-10. कड़वी तोरई के पचास फलों को विभिन्न प्रकार के पहाड़ी आबनूस के रस में पकाया जाना चाहिए । उस काढ़े को कड़वी तोरई के पेस्ट के एक भाग और अन्य औषधियों के आधे भाग के अनुपात में वमनकारी अखरोट समूह की औषधियों के पेस्ट के साथ एक लिंक्टस में पकाया जाना चाहिए। इसे विभिन्न प्रकार के पहाड़ी आबनूस समूह की प्रत्येक औषधि के काढ़े के साथ अलग से भी तैयार किया जा सकता है।

11. गीली भूमि पर रहने वाले जीवों के मांस को कड़वी तोरई के बराबर भाग के साथ, वमनकारी मेवा समूह की प्रत्येक औषधि के काढ़े में पकाकर, इस मांस के रस में सेंधानमक मिलाकर पीना चाहिए।

11.1. कड़वी तोरई का रस, जो गीली भूमि के प्राणियों के मांस के साथ पकाया गया हो, वमनकारी सुपारी, अन्य औषधियों और पिप्पली के रस के बराबर मात्रा में, औषधि के रूप में लिया जा सकता है।

12. खांसी से पीड़ित व्यक्ति को गन्ने के रस में कड़वी तोरई मिलाकर सेवन करना चाहिए।

सारांश

यहां दो पुनरावर्ती छंद हैं-

13-14. दूध में चार, शराब में एक, काढ़ा के बाईस, पायस के दस, घी का एक, गोलियों के छः उत्तम प्रकार, लिन्क्टस के आठ, मांस के रस के सात और गन्ने के रस में एक - इस प्रकार कुल मिलाकर कड़वे तोरई [ कृतवेधन ] के साठ पदार्थों का वर्णन यहाँ किया गया है।

6. इस प्रकार अग्निवेश द्वारा संकलित और चरक द्वारा संशोधित ग्रंथ के भेषज-विज्ञान अनुभाग में , 'कड़वी तोरई [ कृतवेधन-कल्प ] की भेषज-विज्ञान' नामक छठा अध्याय उपलब्ध न होने के कारण, जिसे दृढबल द्वारा पुनर्स्थापित किया गया , पूरा किया गया है।



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