ऋग्वेद मंडल १ सूक्त १०६ संस्कृत व्याकरण हिन्दी भावार्थ

ऋग्वेद मंडल २ सूक्त १०६ संस्कृत व्याकरण हिन्दी भावार्थ


अथ षडुत्तरस्य शततमस्य सप्तर्च्चस्य सूक्तस्याङ्गिरसः कुत्स ऋषिः। विश्वे देवा देवताः। 1-6 जगतीच्छन्दः। निषादः स्वरः। 7 निचृत् त्रिष्टुप् छन्दः। धैवतः स्वरः॥

 अथ विश्वस्थानां देवानां गुणकर्माण्युपदिश्यन्ते॥ 

अब एकसौ छः वें सूक्त का प्रारम्भ है। उसके प्रथम मन्त्र में संसार में ठहरनेवाले विद्वानों के गुण और कामों को वर्णन किया है॥ 

इन्द्रं॑ मि॒त्रं वरु॑णम॒ग्निमू॒तये॒ मारु॑तं॒ शर्धो॒ अदि॑तिं हवामहे। रथं॒ न दु॒र्गाद्व॑सवः सुदानवो॒ विश्व॑स्मान्नो॒ अंह॑सो॒ निष्पि॑पर्तन॥1॥ 

इन्द्र॑म्। मि॒त्रम्। वरु॑णम्। अ॒ग्निम्। ऊ॒तये॑। मारु॑तम्। शर्धः॑। अदि॑तिम्। ह॒वा॒म॒हे॒। रथ॑म्। न। दुः॒ऽगात्। व॒स॒वः॒। सु॒ऽदा॒न॒वः॒। विश्व॑स्मात्। नः॒। अंह॑सः। निः। पि॒प॒तर्॒न॒॥1॥ 

पदार्थः—(इन्द्रम्) विद्युतं परमैश्वर्यवन्तं सभाध्यक्षं वा (मित्रम्) सर्वप्राणं सर्वसुहृदं वा (वरुणम्) क्रियाहेतुमुदानं वरगुणयुक्तं विद्वांसं वा (अग्निम्) सूर्यादिरूपं ज्ञानवन्तं वा (ऊतये) रक्षणाद्यर्थाय (मारुतम्) मरुतां वायूनां मनुष्याणामिदं वा (शर्द्धः) बलम् (अदितिम्) मातरं पितरं पुत्रं जातं सकलं जगत् तत्कारणं जनित्वं वा (हवामहे) कार्यसिद्ध्यर्थं गृह्णीमः स्वीकुर्मः (रथम्) विमानादिकं यानम् (न) इव (दुर्गात्) कठिनाद् भूजलान्तरिक्षस्थमार्गात् (वसवः) विद्यादिशुभगुणेषु ये वसन्ति तत्सम्बुद्धौ (सुदानवः) शोभना दानवो दानानि येषां तत्सम्बुद्धौ (विश्वस्मात्) अखिलात् (नः) अस्मान् (अंहसः) पापाचरणात् तत्फलाद् दुःखाद्वा (निः) नितराम् (पिपर्तन) पालयन्तु॥1॥

 अन्वयः—हे सुदानवो वसवो विद्वांसो! यूयं रथं न दुर्गान्नोऽस्मान् विश्वस्मादंहसो निष्पिपर्तन वयमूतय इन्द्रं मित्रं वरुणमग्निमदितिं मारुतं शर्द्धश्च हवामहे॥1॥ 

भावार्थः—अत्रोपमालङ्कारः। यथा मनुष्याः सम्यङ् निष्पादितेन विमानादियानेनातिकठिनेषु मार्गेष्वपि सुखेन गमनागमने कृत्वा कार्याणि संसाध्य सर्वस्माद् दारिद्र्यादिदुःखान्मुक्त्वा जीवन्ति तथैवेश्वरसृष्टिस्थान् पृथिव्यादि- पदार्थान् विदुषो वा विदित्वोपकृत्य संसेव्यातुलं सुखं प्राप्तुं शक्नुवन्ति॥1॥

 पदार्थः—(सुदानवः) जिनके उत्तम-उत्तम दान आदि काम वा (वसवः) जो विद्यादि शुभ गुणों में वस रहे हों वे हे विद्वानो! तुम लोग (रथम्) विमान आदि यान को (न) जैसे (दुर्गात्) भूमि, जल वा अन्तरिक्ष के कठिन मार्ग से बचा लाते हो वैसे (नः) हम लोगों को (विश्वस्मात्) समस्त (अंहसः) पाप के आचरण से (निष्पिपर्तन) बचाओ, हम लोग (ऊतये) रक्षा आदि प्रयोजन के लिये (इन्द्रम्) बिजुली वा परम ऐश्वर्य्यवाले सभाध्यक्ष (मित्रम्) सब के प्राणरूपीवन वा सर्वमित्र (वरुणम्) काम करानेवाले उदान वायु वा श्रेष्ठगुणयुक्त विद्वान् (अग्निम्) सूर्य्य आदि रूप अग्नि वा ज्ञानवान् जन (अदितिम्) माता, पिता, पुत्र उत्पन्न हुए समस्त जगत् के कारण वा जगत् की उत्पत्ति (मारुतम्) पवनों वा मनुष्यों के समूह और (शर्द्धः) बल को (हवामहे) अपने कार्य की सिद्धि के लिये स्वीकार करते हैं॥1॥

 भावार्थः—इस मन्त्र में उपमालङ्कार है। जैसे मनुष्य अच्छी प्रकार सिद्ध किये हुए विमान आदि यान से अति कठिन मार्गों में भी सुख से जाना-आना करके कामों को सिद्ध कर समस्त दरिद्रता आदि दुःख से छूटते हैं, वैसे ही ईश्वर की सृष्टि के पृथिवी आदि पदार्थों वा विद्वानों को जान उपकार में लाकर उनका अच्छे प्रकार सेवन कर बहुत सुख को प्राप्त हो सकते हैं॥1॥

 पुनस्ते कीदृशा इत्युपदिश्यते॥ 

फिर वे कैसे हैं, यह विषय अगले मन्त्र में कहा है॥

 त आ॑दित्या॒ आ ग॑ता स॒र्वता॑तये भू॒त दे॑वा वृत्र॒तूर्ये॑षु शं॒भुवः॑। रथं॒ न दु॒र्गाद्व॑सवः सुदानवो॒ विश्व॑स्मान्नो॒ अंह॑सो॒ निष्पि॑पर्तन॥2॥

 ते। आ॒दि॒त्याः॒। आ। ग॒त॒। स॒र्वऽता॑तये। भू॒त। दे॒वाः॒। वृ॒त्र॒तूर्ये॑षु। श॒म्ऽभुवः॑। रथ॑म्। न। दुः॒ऽगात्। व॒स॒वः॒। सु॒ऽदा॒न॒वः॒। विश्व॑स्मात्। नः॒। अंह॑सः। निः। पि॒प॒तर्॒न॒॥2॥ 

पदार्थः—(ते) (आदित्याः) कारणरूपेण नित्याः सूर्यादयः पदार्थाः (आ) क्रियायोगे (गत) गच्छत। अत्र द्व्यचोऽतस्तिङ इति दीर्घः। (सर्वतातये) सर्वस्मै सुखाय (भूत) भवत। अत्र गत भूतेत्युभयत्र लोटि मध्यमबहुवचने बहुलं छन्दसीति शपो लुक्। (देवाः) दिव्यगुणवन्तस्तत्संबुद्धौ दिव्यगुणा वा (वृत्रतूर्येषु) वृत्राणां शत्रूणां मेघावयवानां वा तूर्येषु हिंसनकर्मसु संग्रामेषु (शंभुवः) ये शं सुखं भावयन्ति ते। (रथं, न, दुर्गात्) इति पूर्ववत्॥2॥

 अन्वयः—हे देवा विद्वांसो! यथा ये आदित्या देवाः सूर्यादयः पदार्थास्ते वृत्रतूर्येषु शंभुवो भवन्ति, तथैव यूयमस्माकं सनीडमागतागत्य वृत्रतूर्येषु सर्वतातये शंभुवो भूत। अन्यत् पूर्ववत्॥2॥

 भावार्थः—अत्र वाचकलुप्तोपमालङ्कारः। यथेश्वरेण सृष्टाः पृथिव्यादयः पदार्थाः सर्वेषां प्राणिनामुपकाराय वर्त्तन्ते, तथैव सर्वेषामुपकाराय विद्वद्भिर्नित्यं वर्त्तितव्यम्। यथा सुदृढस्य यानस्योपरि स्थित्वा देशान्तरं गत्वा व्यापारेण विजयेन वा धनप्रतिष्ठे प्राप्य दारिद्र्याप्रतिष्ठाभ्यां विमुच्य सुखिनो भवन्ति, तथैव विद्वांस उपदेशेन विद्यां प्रापय्य सर्वान् सुखिनः सम्पादयन्तु॥2॥

 पदार्थः—हे (देवाः) दिव्यगुणवाले विद्वान् जनो! जैसे (आदित्याः) कारणरूप से नित्य दिव्यगुण वाले जो सूर्य्य आदि पदार्थ हैं (ते)वे (वृत्रतूर्य्येषु) मेघावयवों अर्थात् बादलों का हिंसन विनाश करना जिनमें होता है, उन संग्रामों में (शंभुवः) सुख की भावना करानेवाले होते हैं, वैसे ही आप लोग हमारे समीप को (आ, गत) आओ और आकर शत्रुओं का हिंसन जिनमें हो उन संग्रामों में (सर्वतातये) समस्त सुख के लिये (शंभुवः) सुख की भावना करानेवाले (भूत) होओ। शेष मन्त्रार्थ प्रथम मन्त्र के समान जानना चाहिये॥2॥

 भावार्थः—इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। जैसे ईश्वर के बनाये हुए पृथिवी आदि पदार्थ सब प्राणियों के उपकार के लिये हैं, वैसे ही सबके उपकार के लिये विद्वानों को नित्य अपना वर्त्ताव रखना चाहिये। जैसे अच्छे दृढ़ विमान आदि यान पर बैठ देश-देशान्तर को जा-आकर व्यापार वा विजय से धन और प्रतिष्ठा को प्राप्त हो, दरिद्रता और अयश से छूट कर सुखी होते हैं, वैसे ही विद्वान् जन अपने उपदेश से विद्या को प्राप्त कराकर सबको सुखी करें॥2॥

 पुनस्ते कीदृशा इत्युपदिश्यते॥ 

फिर वे कैसे हों, यह विषय अगले मन्त्र में उपदेश किया है॥ 

अव॑न्तु नः पि॒तरः॑ सुप्रवाच॒ना उ॒त दे॒वी दे॒वपु॑त्रे ऋता॒वृधा॑। रथं॒ न दु॒र्गाद्व॑सवः सुदानवो॒ विश्व॑स्मान्नो॒ अंह॑सो॒ निष्पि॑पर्तन॥3॥ 

अव॑न्तु। नः॒। पि॒तरः॑। सु॒ऽप्र॒वा॒च॒नाः। उ॒त। दे॒वी इति॑। दे॒वपु॑त्रे॒ इति॑ दे॒वऽपु॑त्रे। ऋ॒त॒ऽवृधा॑। रथ॑म्। न। दुः॒ऽगात्। व॒स॒वः॒। सु॒ऽदा॒न॒वः॒। विश्व॑स्मात्। नः॒। अंह॑सः। निः। पि॒प॒तर्॒न॒॥3॥

 पदार्थः—(अवन्तु) रक्षणादिभिः पालयन्तु (नः) अस्मान् (पितरः) विज्ञानवन्तो मनुष्याः (सुप्रवाचनाः) सुष्ठु प्रवाचनमध्यापनमुपदेशनं च येषां ते (उत) अपि (देवी) दिव्यगुणयुक्ते द्यावापृथिव्यौ भूमिसूर्यप्रकाशौ (देवपुत्रे) देवा दिव्या विद्वांसो दिव्यरत्नादियुक्ताः पर्वतादयो वा पुत्रा पालयितारो ययोस्ते (ऋतावृधा) ये ऋतेन कारणेन वर्धेतां ते (रथं, न॰) इति पूर्ववत्॥3॥

 अन्वयः—देवपुत्रे ऋतावृधा देवी यथा नोऽस्मान्नवतस्तथैव सुप्रवाचनाः पितरोऽस्मानुतावन्तु। अन्यत् पूर्ववत्॥3॥ 

भावार्थः—अत्र वाचकलुप्तोपमालङ्कारः। यथा दिव्यौषध्यादिभिः प्रकाशादिभिश्च भूमिसवितारौ सर्वान् सुखेन वर्धयतः तथैवाप्ता विद्वांसः सर्वान् मनुष्यान् सुशिक्षाध्यापनाभ्यां विद्यादिसद्गुणेषु वर्धयित्वा सुखिनः कुर्वन्ति। यथा चोत्तमस्य यानस्योपरि स्थित्वा दुःखेन गम्यानां मार्गाणां सुखेन पारं गत्वा समग्रात् क्लेशाद्विमुच्य सुखिनो भवन्ति, तथैव ते दुष्टगुणकर्मस्वभावात् पृथक्कृत्याऽस्मान् धर्माचरणे वर्धयन्तु॥3॥ 

पदार्थः—(देवपुत्रे) जिनके दिव्य गुण अर्थात् अच्छे-अच्छे विद्वान् जन वा अच्छे रत्नों से युक्त पर्वत आदि पदार्थ पालनेवाले हैं वा जो (ऋतावृधा) सत्य कारण से बढ़ते हैं वे (देवी) अच्छे गुणोंवाले भूमि और सूर्य्य का प्रकाश जैसे (नः) हम लोगों की रक्षा करते हैं, वैसे ही (सुप्रवाचनाः) जिनका अच्छा पढ़ाना वा उपदेश है, वे (पितरः) विशेष ज्ञानवाले मनुष्य हम लोगों को (उत) निश्चय से (अवन्तु) रक्षादि व्यवहारों से पालें। शेष मन्त्रार्थ प्रथम मन्त्रार्थ के तुल्य समझना चाहिये॥3॥

 भावार्थः—इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। जैसे दिव्य औषधियों और प्रकाश आदि गुणों से भूमि और सूर्य्यमण्डल सबको सुख के साथ बढ़ाते हैं, वैसे ही आप्त विद्वान् जन सब मनुष्यों को अच्छी शिक्षा और पढ़ाने से विद्या आदि अच्छे गुणों में उन्नति देकर सुखी करते हैं और जैसे उत्तम रथ आदि पर बैठ के दुःख से जाने योग्य मार्ग के पार सुखपूर्वक जाकर समग्र क्लेश से छूट के सुखी होते हैं, वैसे ही वे उक्त विद्वान् दुष्ट गुण, कर्म और स्वभाव से अलग कर हम लोगों को धर्म के आचरण में उन्नति देवें॥3॥ 

पुनस्तान् कथं भूतानुपयुञ्जीरन्नित्युपदिश्यते॥ 

फिर उनको कैसे उपयोग में लावें, यह विषय अगले मन्त्र में कहा है॥

 नरा॒शंसं॑ वा॒जिनं॑ वा॒जय॑न्नि॒ह क्ष॒यद्वी॑रं पू॒षणं॑ सु॒म्नैरी॑महे। रथं॒ न दु॒र्गाद्व॑सवः सुदानवो॒ विश्व॑स्मान्नो॒ अंह॑सो॒ निष्पि॑पर्तन॥4॥

 नरा॒शंस॑म्। वा॒जिन॑म्। वा॒जय॑न्। इ॒ह। क्ष॒यत्ऽवी॑रम्। पू॒षण॑म्। सु॒म्नैः। ई॒म॒हे॒। रथ॑म्। न। दुः॒ऽगात्। व॒स॒वः॒। सु॒ऽदा॒न॒वः॒। विश्व॑स्मात्। नः॒। अंह॑सः। निः। पि॒प॒तर्॒न॒॥4॥ 

पदार्थः—(नराशंसम्) नृभिराशंसितुं योग्यं विद्वांसम् (वाजिनम्) विज्ञानयुद्धविद्याकुशलम् (वाजयन्) विज्ञापयन्तो योधयन्तो वा। अत्र सुपां सुलुगिति जसः स्थाने सुः। (इह) अस्यां सृष्टौ (क्षयद्वीरम्) क्षयन्तः शत्रूणां नाशकर्त्तारो वीरा यस्य सेनाध्यक्षस्य तम् (पूषणम्) शरीरात्मनोः पोषयितारम् (सुम्नैः) सुखैर्युक्तम् (ईमहे) प्राप्नुयाम्। अत्र बहुलं छन्दसीति श्यनो लुक्। (रथं, न॰) इति पूर्ववत्॥4॥

 अन्वयः—हे विद्वन्! यथा वाजयन् वयमिह सुम्नैर्युक्तं नराशंसं वाजिनं क्षयद्वीरं पूषणं चेमहे तथा त्वं याचस्व। अन्यत् पूर्ववत्॥4॥ भावार्थः—वयं शुभगुणयुक्तान् सुखिनो मनुष्यान् मित्रतया प्राप्य श्रेष्ठयानयुक्ताः शिल्पिन इव दुःखात्पारं गच्छेम॥4॥

 पदार्थः—हे विद्वान्! जैसे (वाजयन्) उत्तमोत्तम पदार्थों के विशेष ज्ञान कराने वा युद्ध करानेहारे हम लोग (इह) इस सृष्टि में (सुम्नैः) सुखों से युक्त (नराशंसम्) मनुष्यों के प्रार्थना कराने योग्य विद्वान् को तथा (वाजिनम्) विशेष ज्ञान और युद्धविद्या में कुशल (क्षयद्वीरम्) जिसके शत्रुओं को काट करनेहारे वीर और जो (पूषणम्) शरीर वा आत्मा की पुष्टि करानेहारा है, उस सभाध्यक्ष को (ईमहे) प्राप्त होवें, वैसे तू शुभ गुणों की याचना कर। शेष मन्त्रार्थ प्रथम मन्त्र के तुल्य जानना चाहिये॥4॥ 

भावार्थः—हम लोग शुभ गुणों से युक्त सुखी मनुष्यों की मित्रता को प्राप्त होकर श्रेष्ठ यानयुक्त हुए शिल्पियों के समान दुःख से पार हों॥4॥

 पुनस्ते कीदृशा इत्युपदिश्यते॥ 

फिर वे कैसे हैं, यह विषय अगले मन्त्र में कहा है॥ बृह॑स्पते॒ सद॒मिन्नः॑ सु॒गं कृ॑धि॒ शं योर्यत्ते॒ मनु॑र्हितं॒ तदी॑महे। रथं॒ न दु॒र्गाद्व॑सवः सुदानवो॒ विश्व॑स्मान्नो॒ अंह॑सो॒ निष्पि॑पर्तन॥5॥

 बृह॑स्पते। सद॑म्। इत्। नः॒। सु॒ऽगम्। कृ॒धि॒। शम्। योः। यत्। ते॒। मनुः॑ऽहितम्। तत्। ई॒म॒हे॒। रथ॑म्। न। दुः॒ऽगात्। व॒स॒वः॒। सु॒ऽदा॒न॒वः॒। विश्व॑स्मात्। नः॒। अंह॑सः। निः। पि॒प॒तर्॒न॒॥5॥

 पदार्थः—(बृहस्पते) परमाध्यापक (सदम्) (इत्) एव (नः) अस्मभ्यम् (सुगम्) सुष्ठु गच्छन्ति यस्मिन् (कृधि) कुरु निष्पादय (शम्) सुखम् (योः) धर्मार्थमोक्षप्रापणम् (यत्) (ते) (मनुर्हितम्) मनुषो मनसो हितकारिणम् (तत्) (ईमहे) याचामहे (रथं न॰) इति पूर्ववत्॥5॥

 अन्वयः—हे बृहस्पते! ते तव यन्मनुर्हितं शं योश्चास्ति यत्सदमित्वं नोऽस्मभ्यं सुगं कृधि तद्वयमीमहे। अन्यत्पूर्ववत्॥5॥ भावार्थः—मनुष्यैर्यथाऽध्यापकाद्विद्या सङ्गृह्यते तथैव सर्वेभ्यो विद्वद्भ्यश्च स्वीकृत्य दुःखानि विनाशनीयानि॥5॥

 पदार्थः—हे (बृहस्पते) परम अध्यापक अर्थात् उत्तम रीति से पढ़ानेवाले! (ते) आपका जो (मनुर्हितम्) मन का हित करनेवाला (शम्) सुख वा (योः) धर्म, अर्थ और मोक्ष की प्राप्ति कराना है तथा (यत्) जो (सदम् इत्) सदैव तुम (नः) हमारे लिये (सुगम्) सुख (कृधि) करो अर्थात् सिद्ध करो (तत्) उस उक्त समस्त सुख को हम लोग (ईमहे) मांगते हैं। शेष मन्त्रार्थ प्रथम मन्त्र के तुल्य समझना चाहिये॥5॥

 भावार्थः—मनुष्यों को चाहिये कि जैसे गुरुजन से विद्या ली जाती है, वैसे ही सब विद्वानों से विद्या लेकर दुःखों का विनाश करें॥5॥

 पुनरध्यापकोऽध्येता च किं कुर्य्यादित्युपदिश्यते॥

 फिर पढ़ने और पढ़ानेवाले क्या करें, यह विषय अगले मन्त्र में कहा है॥

 इन्द्रं॒ कुत्सो॑ वृत्र॒हणं॒ शची॒पतिं॑ का॒टे निवा॑ढ॒ ऋषि॑रह्वदू॒तये॑। रथं॒ न दु॒र्गाद्व॑सवः सुदानवो॒ विश्व॑स्मान्नो॒ अंह॑सो॒ निष्पि॑पर्तन॥6॥ 

इन्द्र॑म्। कुत्सः॑। वृ॒त्र॒ऽहन॑म्। शची॑ऽपति॑म्। का॒टे। निऽवा॑ढः। ऋषिः॑। अ॒ह्व॒त्। ऊ॒तये॑। रथ॑म्। न। दुः॒ऽगात्। व॒स॒वः॒। सु॒ऽदा॒न॒वः॒। विश्व॑स्मात्। नः॒। अंह॑सः। निः। पि॒प॒तर्॒न॒॥6॥

 पदार्थः—(इन्द्रम्) परमैश्वर्यवन्तं शालाद्यध्यक्षम् (कुत्सः) विद्यावज्रयुक्तश्छेत्ता पदार्थानां भेत्ता वा। कुत्स इति वज्रनामसु पठितम्। (निघं॰2.20) कुत्स इत्येतत्कृन्ततेर्ऋषिः कुत्सो भवति कर्ता स्तोमानामित्यौपमन्यवोऽत्राप्यस्य वधकर्मैव भवति। (निरु॰3.11) (वृत्रहणम्) शत्रूणां हन्तारम्। अत्र हन्तेरत्पूर्वस्य। (अष्टा॰8.4.22) इति णत्वम्। (शचीपतिम्) वेदवाचः पालकम् (काटे) कटन्ति वर्षन्ति सकला विद्या यस्मिन्नध्यापने व्यवहारे तस्मिन् (निवाढः) नित्यं सुखानां प्रापयिता (ऋषिः) अध्यापकोऽध्येता वा (अह्वत्) अह्वयेत् (ऊतये) रक्षणाद्याय (रथं, न, दुर्गात्॰) इति पूर्ववत्॥6॥

 अन्वयः—कुत्सो निवाढ ऋषिः काट ऊतये यं वृत्रहणं शचीपतिमिन्द्रमह्वत्, तं वयमप्याह्वयेम। अन्यत्पूर्ववत्॥6॥ भावार्थः—नहि विद्यार्थिना कपटिनोऽध्यापकस्य समीपे स्थातव्यं किन्तु विदुषां समीपे स्थित्वा विद्वान् भूत्वर्षिस्वभावेन भवितव्यम्। स्वात्मरक्षणायाधर्माद्भीत्वा धर्मे सदा स्थातव्यम्॥6॥

 पदार्थः—(कुत्सः) विद्यारूपी वज्र लिये वा पदार्थों को छिन्न-भिन्न करने (निवाढः) निरन्तर सुखों को प्राप्त करानेवाला (ऋषिः) गुरु और विद्यार्थी (काटे) जिसमें समस्त विद्याओं की वर्षा होती है, उस अध्यापन व्यवहार में (ऊतये) रक्षा आदि के लिये जिस (वृत्रहणम्) शत्रुओं को विनाश करने वा (शचीपतिम्) वेदवाणी के पालनेहारे (इन्द्रम्) परमैश्वर्य्यवान् शाला आदि के अधीश को (अह्वत्) बुलावे, हम लोग भी उसी को बुलावें। शेष मन्त्रार्थ प्रथम मन्त्र के तुल्य जानना चाहिये॥6॥

 भावार्थः—विद्यार्थी को कपटी पढ़ानेवाले के समीप ठहरना नहीं चाहिये, किन्तु आप्त विद्वानों के समीप ठहर और विद्वान् होकर ऋषिजनों के स्वभाव से युक्त होना चाहिये और अपने आत्मा की रक्षा के लिये अधर्म से डर कर धर्म में सदा रहना चाहिये॥6॥

 पुनस्ते कीदृशा इत्युपदिश्यते॥ 

फिर वे कैसे हों, यह विषय अगले मन्त्र में कहा है॥

 दे॒वैर्नो॑ दे॒व्यदि॑ति॒र्नि पा॑तु दे॒वस्त्रा॒ता त्रा॑यता॒मप्र॑युच्छन्। तन्नो॑ मि॒त्रो वरु॑णो मामहन्ता॒मदि॑तिः॒ सिन्धुः॑ पृथि॒वी उ॒त द्यौः॥7॥24॥ 

दे॒वैः। नः॒। दे॒वी। अदि॑तिः। नि। पा॒तु। दे॒वः। त्रा॒ता। त्रा॒य॒ता॒म्। अप्र॑ऽयुच्छन्। तत्। नः॒। मि॒त्रः। वरु॑णः। म॒म॒ह॒न्ता॒म्। अदि॑तिः। सिन्धुः॑। पृ॒थि॒वी। उ॒त। द्यौः॥7॥ 

पदार्थः—(देवैः) विद्वद्भिर्दिव्यगुणैर्वा सह वर्त्तमानः (नः) अस्मान् (देवी) दिव्यगुणयुक्ता (अदितिः) प्रकाशमयी विद्या (नि) (पातु) (देवः) विद्वान् (त्राता) सर्वाभिरक्षकः (त्रायताम्) (अप्रयुच्छन्) अप्रमाद्यन् (तन्नो मित्रो॰) इति पूर्ववत्॥7॥

 अन्वयः—यो देवैः सह वर्त्तमानोऽप्रयुच्छँस्त्राता देवो विद्वानस्ति स नो निपातु, या देव्यदितिः सर्वांस्त्रायताम्। तन्नो मित्रो वरुणोऽदितिः सिन्धुः पृथिवी उत द्यौर्मामहन्ताम्॥7॥

 भावार्थः—मनुष्यैर्योऽप्रमादी विद्वत्सु विद्वान् विद्यारक्षको विद्यादानेन सर्वेषां सुखवर्द्धकोऽस्ति तं सत्कृत्य विद्याधर्मौ जगति प्रसारणीयौ॥7॥

 अत्र विश्वेषां देवानां गुणवर्णनादेतदर्थस्य पूर्वसूक्तार्थेन सह सङ्गतिरस्तीति वेद्यम्॥ इति षडुत्तरशततमं 106 सूक्तं चतुर्विंशो 24 वर्गश्च समाप्तः॥

 पदार्थः—जो (देवैः) विद्वानों वा दिव्य गुणों के साथ वर्त्तमान (अप्रयुच्छन्) प्रमाद न करता हुआ (त्राता) सबकी रक्षा करनेवाला (देवः) विद्वान् है, वह (नः) हम लोगों की (नि, पातु) निरन्तर रक्षा करे तथा (देवी) दिव्य गुण भरी सब गुण अगरी (अदितिः) प्रकाशयुक्त विद्या सबकी (त्रायताम्) रक्षा करे (तत्) उस पूर्वोक्त समस्त कर्म को (नः) और हम लोगों को (मित्रः) मित्रजन (वरुणः) श्रेष्ठ विद्वान् (अदितिः) अखण्डित नीति (सिन्धुः) समुद्र (पृथिवी) भूमि (उत) और (द्यौः) सूर्य्य का प्रकाश (मामहन्ताम्) बढ़ावें अर्थात् उन्नति देवें॥7॥

 भावार्थः—मनुष्यों को चाहिये कि जो अप्रमादी, विद्वानों में विद्वान्, विद्या की रक्षा करनेवाला विद्यादान से सबके सुख को बढ़ाता है, उसका सत्कार करके विद्या और धर्म का प्रचार संसार में करें॥7॥ इस सूक्त में समस्त विद्वानों के गुणों का वर्णन है। इससे इस सूक्त के अर्थ की पिछले सूक्त के अर्थ के साथ संगति है, यह जानना चाहिये॥ 

यह एक सौ छः वाँ 106 सूक्त और चौबीसवाँ 24 वर्ग पूरा हुआ॥



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