अध्याय III, खंड III, अधिकरण XXXV
अधिकरण सारांश: विशेष कामनाओं को उत्पन्न करने वाले ध्यानों को रुचि के अनुसार संयोजित किया जा सकता है या नहीं भी किया जा सकता है
ब्रह्म सूत्र 3,3.60
काम्यास्तु यथाकामं समुच्च्येरन्न वा, पूर्वहेत्वभावात् ॥ 60 ॥
काम्याः –विशेष कामनाओं के लिए विद्याएँ ; तु – परन्तु; यथाकामन् – अपनी इच्छा के अनुसार; समुच्चीयेरण – संयोजित कर सकते हैं; न वा – अथवा नहीं; पूर्व -हेतु -अभावात् – पूर्व कारण के अभाव के कारण।
60. किन्तु विशेष कामनाओं के लिए विद्याओं का संयोजन किया जा सकता है अथवा नहीं, यह सब पूर्व सूत्र में वर्णित कारण के अभाव के कारण होता है।
पिछले सूत्र में कहा गया है कि ब्रह्म विषयक किसी भी विद्या को ग्रहण करना चाहिए, तथा एक समय में एक से अधिक विद्याओं को ग्रहण नहीं करना चाहिए, क्योंकि प्रत्येक विद्या पर्याप्त है तथा एक से अधिक विद्याओं से मन विचलित हो सकता है। अब अनेक विद्याएँ हैं, जिनका अभ्यास ब्रह्म की प्राप्ति के लिए नहीं, बल्कि किसी विशेष कामना की पूर्ति के लिए किया जाता है। जैसे, उदाहरण के लिए, छांदोग्य 3. 15. 2; 7. 1. 5. प्रश्न यह है कि क्या व्यक्ति को इन विद्याओं में से केवल एक तक ही सीमित रहना चाहिए, या एक समय में एक से अधिक विद्याओं का अभ्यास करना चाहिए। यह सूत्र कहता है कि चूँकि इनके परिणाम ब्रह्म विद्याओं से भिन्न हैं, अतः व्यक्ति अपनी इच्छानुसार एक से अधिक विद्याएँ ग्रहण कर सकता है अथवा नहीं ग्रहण कर सकता है।
100 Questions based on Rigveda Samhita
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