नीचे मंत्र 9 —
“त्वामग्ने पादयाथर्वा
निर्मन्थात्।
मूर्ध्नो विश्वस्य वाघतः॥ (9)”
की अत्यन्त गहन, सार-गर्भित, दार्शनिक, आध्यात्मिक, मनोवैज्ञानिक तथा आधुनिक जीवन-संदर्भ से जुड़ी व्याख्या प्रस्तुत है। यह मंत्र उत्पत्ति-तत्त्व, तपस्या और चेतना-जागरण के गूढ़ रहस्य को प्रकट करता है।
त्वामग्ने पादयाथर्वा
निर्मन्थात्।
मूर्ध्नो विश्वस्य वाघतः॥
हे अग्नि!
ऋषि अथर्वा ने
मन्थन द्वारा
तुम्हें उत्पन्न किया।
तुम सम्पूर्ण विश्व के
शिखर स्वरूप साधक हो।
यह मंत्र बताता है—
दिव्यता अचानक नहीं प्रकट होती,
वह तप, मन्थन और साधना से उत्पन्न होती है।
अग्नि = तपस्या का परिणाम
मन्थन केवल लकड़ी रगड़ना नहीं।
दार्शनिक रूप में—
बिना मन्थन—
अग्नि नहीं,
चेतना नहीं।
अथर्वा—
यह बताता है—
ज्ञान विरासत में नहीं,
तप से मिलता है।
अग्नि केवल नीचे नहीं।
यह मंत्र कहता है—
अग्नि चेतना के शिखर पर प्रकट होती है।
आधुनिक अर्थ—
ब्रह्मज्ञान में—
ब्रह्म सुप्त है,
तप से जाग्रत होता है।
अग्नि यहाँ—
ब्रह्मचेतना की ज्वाला है।
आज की भाषा में—
सफलता—
मानसिक मन्थन से निकलती है।
यह मंत्र सिखाता है—
साधना में आलस्य नहीं,
निरंतरता चाहिए।
अग्नि—
प्रयत्न से प्रकट होती है।
जो तप से नहीं डरता,
उसी में दिव्यता प्रकट होती है।
मंत्र 9—
यह मंत्र सिखाता है—
अग्नि बाहर नहीं,
भीतर उत्पन्न करनी होती है।
100 Questions based on Rigveda Samhita
0 टिप्पणियाँ