नीचे मंत्र 8 —
“आ ते वत्सो मनो यमत्
परमाचित्सदस्थत्।
अग्ने त्वां कामये गिरा॥ (8)”
की अत्यन्त गहन, सार-गर्भित, दार्शनिक, आध्यात्मिक, मनोवैज्ञानिक तथा आधुनिक जीवन-संदर्भ से जुड़ी व्याख्या प्रस्तुत है। यह मंत्र पुत्र-भाव, आकर्षण-शक्ति और आत्मीय संबंध के रहस्य को प्रकट करता है।
आ ते वत्सो मनो यमत्
परमाचित्सदस्थत्।
अग्ने त्वां कामये गिरा॥
हे अग्नि!
जिस प्रकार पुत्र का मन
श्रेष्ठ स्थान की ओर खिंचता है,
उसी प्रकार मेरा मन
आपकी ओर आकर्षित हो।
मैं वाणी (मंत्र) द्वारा
आपकी कामना करता हूँ।
यह मंत्र बताता है—
ईश्वर को बुलाने का सबसे शक्तिशाली साधन
भय नहीं,
बल्कि पुत्र-भाव और आत्मीय आकर्षण है।
यहाँ साधक स्वयं को—
बल्कि—
वत्स (पुत्र) मानता है।
यह वैदिक भक्ति की सर्वोच्च अवस्था है।
“मनो यमत्”
अर्थात—
मन जहाँ जाता है,
चेतना वहीं बहती है।
यह मंत्र सिखाता है—
साधना = मन का सही दिशा में खिंचना।
अग्नि—
साधक कहता है—
“चाहे आप परम स्थिति में हों,
फिर भी मेरी ओर आइए।”
यह आत्मीय साहस है।
यह मंत्र कहता है—
मंत्र = आदेश नहीं,
मंत्र = प्रेमपूर्ण आमंत्रण।
शुद्ध वाणी में—
आज की भाषा में—
यह मंत्र—
यह मंत्र सिखाता है—
ईश्वर को पाना संघर्ष नहीं,
स्मरण है।
जब मन सच्चे प्रेम से पुकारता है—
चेतना स्वयं उतर आती है।
ब्रह्मज्ञान कहता है—
ब्रह्म दूर नहीं,
मन की दिशा से निकट या दूर प्रतीत होता है।
यह मंत्र—
मन को ब्रह्म की ओर मोड़ने का सूत्र है।
जिसे प्रेम से पुकारा जाए,
वही सबसे शीघ्र आता है।
मंत्र 8—
यह मंत्र सिखाता है—
मन जहाँ खिंचता है,
वही देवता प्रकट होता है।
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