(राजा सुप्पबुद्ध की कथा)
राजा सुप्पबुद्ध भगवान बुद्ध के प्रति सद्भाव नहीं रखता था। उसके मन में एक पुराना दुःख और क्रोध था। वह यह कभी नहीं भूल पाया कि सिद्धार्थ गौतम ने राजकुमार रहते हुए उसकी प्रिय पुत्री यशोधरा को त्याग कर संन्यास का मार्ग अपनाया था।
एक दिन राजा को पता चला कि भगवान बुद्ध अपने शिष्यों के साथ नगर में भिक्षा के लिए प्रवेश करने वाले हैं। उसी दिन राजा ने अत्यधिक मदिरा का सेवन कर लिया। मदिरा के नशे में उसका अहंकार और भी बढ़ गया।
राजा स्वयं सड़क पर गया और बुद्ध का मार्ग रोक लिया। उसने कहा—
“मैं इस नगर का राजा हूँ। मैं अपने से छोटे व्यक्ति को रास्ता कैसे दे सकता हूँ?”
भगवान बुद्ध ने कोई विरोध नहीं किया। वे अपने शिष्यों सहित शांत भाव से लौट गए।
लेकिन राजा यहीं नहीं रुका। उसने अपने एक सेवक को आदेश दिया—
“बुद्ध पर नज़र रखो और देखो, वे मेरे बारे में क्या कहते हैं।”
जब बुद्ध विहार पहुँचे, तो उन्होंने आनंद से कहा—
“राजा ने बुद्ध का मार्ग रोककर दुष्कर्म (अकुशल कर्म) किया है। शीघ्र ही उसे उसका फल भोगना पड़ेगा।”
यह बात राजा तक पहुँची। राजा क्रोधित हो उठा और बोला—
“मैं सिद्ध कर दूँगा कि बुद्ध गलत हैं।”
उसने अपने चारों ओर कड़े पहरे लगवा दिए। अंगरक्षक बढ़ा दिए गए। स्वयं भी वह अत्यंत सावधानी बरतने लगा।
जब यह समाचार बुद्ध तक पहुँचा, तो उन्होंने कहा—
“चाहे वह राजा आकाश में रहे, समुद्र में छिपे, पर्वत की गुफा में चला जाए या किसी ऊँचे महल में—
कर्म के फल से कोई नहीं बच सकता।”
कुछ दिनों बाद राजा अपने कक्ष में बैठा था। तभी उसने अपने प्रिय घोड़े को ज़ोर-ज़ोर से हिनहिनाते और उछलते देखा। वह घबरा गया और बुद्ध की चेतावनी भूलकर तेज़ी से बाहर दौड़ा।
सीढ़ियों से उतरते समय उसका पैर फिसला।
वह नीचे गिर पड़ा और उसी क्षण उसकी मृत्यु हो गई।
मृत्यु के बाद राजा का नरक में पुनर्जन्म हुआ।
इस प्रकार, चाहे राजा ने कितनी ही सावधानियाँ क्यों न बरती हों, वह अपने कर्म के फल से बच नहीं सका।
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“न आकाश में, न समुद्र में,
न पर्वत की गुफा में—
ऐसा कोई स्थान नहीं जहाँ
मृत्यु और कर्म का फल न पहुँच सके।”
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