(बुद्ध की करुणा और कर्म के न्याय की कथा)
एक समय की बात है। एक नगर में एक रत्न तराशने वाला कारीगर रहता था। वह और उसका परिवार प्रतिदिन श्रद्धापूर्वक एक भिक्षु को भोजन दान दिया करते थे। वह भिक्षु संयमी, शांत और पूर्णतः निर्दोष था।
एक सुबह, जब भिक्षु भिक्षा ग्रहण करने कारीगर के घर आया, उसी समय राजमहल से एक दूत आया। वह राजा की ओर से एक बहुमूल्य माणिक (रूबी) लेकर आया था, जिसे तराशने का कार्य कारीगर को सौंपा गया।
कारीगर उस समय रसोई में था और मांस काट रहा था। उसके हाथों पर खून लगा हुआ था। उसी अवस्था में उसने माणिक को मेज़ पर रख दिया और भोजन लाने रसोई में चला गया।
उसी बीच, घर में पाला हुआ एक पालतू पक्षी उस रक्तरंजित माणिक को भोजन समझ बैठा और उसे उठाकर निगल गया। भिक्षु कुछ कह पाते, उससे पहले ही यह घटना घट चुकी थी।
जब कारीगर लौटा, तो उसने देखा कि माणिक गायब है। उसने अपनी पत्नी, पुत्र और अंत में भिक्षु से पूछा —
“क्या तुम में से किसी ने माणिक उठाया है?”
सबने इंकार किया।
लेकिन कारीगर का मन संदेह और क्रोध से भर गया। उसने सोचा —
“यहाँ आख़िरी बार भिक्षु ही था, वही चोर होगा।”
उसकी पत्नी ने उसे बहुत समझाया—
“निर्दोष और साधु व्यक्ति को कष्ट देने का फल राजा के दंड से भी भयानक होता है।”
परंतु क्रोध में अंधा हुआ कारीगर नहीं माना।
उसने भिक्षु को रस्सियों से बाँध दिया और बुरी तरह पीटना शुरू कर दिया। भिक्षु मौन रहा, एक शब्द भी नहीं बोला। उसके सिर से रक्त बहने लगा।
रक्त देखकर वही पक्षी उड़ता हुआ आया, और दुर्भाग्यवश एक प्रहार उसे भी लगा। पक्षी वहीं मर गया।
तभी भिक्षु ने शांत स्वर में कहा—
“भाई, माणिक मैंने नहीं लिया… उसे उस पक्षी ने निगला था।”
कारीगर ने काँपते हाथों से पक्षी का पेट चीरकर देखा —
वास्तव में माणिक उसी के भीतर था।
सत्य सामने आते ही कारीगर भय से काँप उठा। उसने भिक्षु के चरणों में गिरकर क्षमा माँगी।
भिक्षु ने करुणा से कहा—
“मुझे तुमसे कोई द्वेष नहीं है। यह सब मेरे पूर्व जन्मों के कर्मों का फल था।”
इतना कहकर, वह गंभीर चोटों के कारण वहीं परिनिर्वाण को प्राप्त हुआ, क्योंकि वह पहले से ही अरहंत था।
कालांतर में—
Hindi stories of buddha“पापी नरक को जाता है, धर्मात्मा स्वर्ग को,
और जो राग-द्वेष से मुक्त है — वह निर्वाण को।”
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