यह मंत्र आकाश, वायु और जल के माध्यम से
संपूर्ण ब्रह्माण्डीय ऊर्जा के संतुलन का वर्णन करता है।
साधक प्राकृतिक शक्तियों और दिशाओं के सहयोग से
पृथ्वी और जीवन के कल्याण के लिए आशीर्वाद मांगता है।
---
शब्दार्थ
समुत्पतन्तु = उठें, प्रकट हों
प्रदिशो = दिशाएँ, आकाशीय क्षेत्र
नभस्वतीः = आकाश की शक्तियाँ, आकाशीय ऊर्जा
समभ्राणि = समान रूप से फैले बादल
वातजूतानि = वायु से उत्पन्न
यन्तु = चलें, प्रवाहित हों
महऋषभस्य = महान बैल (आकाशीय ऊर्जा का प्रतीक)
नदतो = बहते हुए
नभस्वतो = आकाश से
वाश्रा = वर्षा, बारिश
आपः = जल
पृथिवीं तर्पयन्तु = पृथ्वी को पोषण दें
---
सरल अर्थ
सभी दिशाएँ उठें, आकाश और बादल
वायु से उत्पन्न होकर संतुलित गति करें।
महऋषभ (आकाशीय शक्ति) से वर्षा बहकर
पृथ्वी और सभी जीवों को पोषण दें।
---
वैज्ञानिक और दार्शनिक संकेत
✔ दिशाएँ और आकाश = प्राकृतिक ऊर्जा और संरचना
✔ वायु और बादल = गतिशीलता और परिवर्तन
✔ वर्षा और जल = जीवन और पोषण
✔ महऋषभ = स्थायीत्व और ब्रह्माण्डीय शक्ति
यह मंत्र दर्शाता है कि प्रकृति की शक्तियाँ संतुलित होने पर
संपूर्ण जीवन और पृथ्वी का कल्याण संभव है।
---
आध्यात्मिक अर्थ
✔ दिशाओं और प्राकृतिक तत्वों के साथ सामंजस्य
✔ पृथ्वी और जीवन के लिए आशीर्वाद का संचार
✔ आकाशीय और सूक्ष्म शक्तियों का नियंत्रण
---
योगिक दृष्टि
✔ ध्यान और प्राणायाम में दिशाओं और प्राकृतिक शक्तियों का संरेखण
✔ वायु और जल तत्वों का संतुलित अनुभव
✔ ब्रह्माण्डीय ऊर्जा के साथ व्यक्तिगत चेतना का मेल
---
मनोवैज्ञानिक संदेश
✔ प्राकृतिक तत्वों के साथ सामंजस्य मानसिक और भावनात्मक संतुलन लाता है
✔ ऊर्जा प्रवाह और दिशाओं का ध्यान जीवन में स्थिरता और शांति लाता है
✔ साधक अपने और पर्यावरण के बीच सामंजस्य स्थापित करता है
---
Gaya Vigyan Brahmgyan दृष्टि
विज्ञान कहता है —
वायु, जल और आकाशीय ऊर्जा के संतुलन से जीवन और पृथ्वी सुरक्षित रहते हैं।
ब्रह्मज्ञान कहता है —
संपूर्ण ब्रह्माण्डीय शक्तियों का संतुलन साधक की चेतना और प्रकृति के सामंजस्य का आधार है।
दोनों मिलकर कहते हैं —
संतुलित प्राकृतिक और ब्रह्माण्डीय शक्तियों से जीवन और चेतना का सर्वोच्च अनुभव संभव है।
---
समग्र निष्कर्ष
अथर्ववेद 4.15.1 का यह मंत्र
आकाश, वायु, जल और दिशाओं के माध्यम से
संपूर्ण ब्रह्माण्डीय ऊर्जा का संतुलन दर्शाता है।
✔ दिशाएँ और आकाश = संरचना और व्यवस्था
✔ वायु और बादल = गतिशीलता और परिवर्तन
✔ वर्षा और जल = जीवन और पोषण
✔ महऋषभ = ब्रह्माण्डीय शक्ति और स्थायीत्व
---
English Insight
Let the cosmic directions rise,
clouds born of the wind move harmoniously.
From the great celestial bull, let rain flow,
nourishing the Earth and sustaining all life.
This establishes universal energy, balance, and blessings for life.
भूमिका
यह मंत्र वर्षा, जल और औषधियों के माध्यम से
पृथ्वी और जीवन के कल्याण का वर्णन करता है।
साधक प्राकृतिक शक्तियों को जागृत कर
भूमि और उसके सभी जीवों में समृद्धि और स्वास्थ्य सुनिश्चित करता है।
---
शब्दार्थ
समीक्षयन्तु = निरीक्षण करें, संतुलित करें
तविषाः = आकाशीय शक्तियाँ, वर्षा के देवता
सुदानवः = श्रेष्ठ, मंगलकारी
अपां = जल
रसा = रस, जीवन शक्ति
औषधीभिः = औषधियों, चिकित्सा और पोषण तत्वों के रूप में
सचन्ताम् = फैलें, सम्पूर्ण हों
वर्षस्य = वर्षा की
सर्गा = सृजन, प्रजनन
महयन्तु = महान करें, समृद्ध करें
भूमिं = पृथ्वी
पृथक् = पृथक्-प्रत्येक
जायन्ताम् = उत्पन्न हों
औषधयो विश्वरूपाः = विविध औषधियाँ, जो सम्पूर्ण ब्रह्माण्डीय स्वरूप में हैं
---
सरल अर्थ
आकाशीय शक्तियाँ और वर्षा
जल और औषधियों के माध्यम से पृथ्वी में फैलें।
प्रत्येक क्षेत्र में वर्षा और औषधियाँ उत्पन्न हों,
जो सभी जीवों और प्रकृति के लिए लाभकारी हों।
---
वैज्ञानिक और दार्शनिक संकेत
✔ जल और वर्षा = जीवन का आधार, पोषण और स्वास्थ्य
✔ औषधियाँ = प्राकृतिक चिकित्सा और संतुलन
✔ पृथ्वी का समृद्धिकरण = प्राकृतिक तत्वों और उनके प्रवाह का संतुलन
यह मंत्र दर्शाता है कि प्राकृतिक तत्वों की संतुलित क्रिया
जीवन और पृथ्वी के कल्याण के लिए आवश्यक है।
---
आध्यात्मिक अर्थ
✔ प्राकृतिक शक्तियों का जागरण और सहयोग
✔ पृथ्वी और जीवन में समृद्धि और स्वास्थ्य का संचार
✔ साधक द्वारा वातावरण और प्रकृति के साथ सामंजस्य
---
योगिक दृष्टि
✔ ध्यान और साधना में प्रकृति तत्वों के साथ सामंजस्य
✔ जल, वर्षा और औषधियों का ध्यान जीवन ऊर्जा और स्वास्थ्य बढ़ाने में सहायक
✔ पर्यावरण और चेतना का संतुलन
---
मनोवैज्ञानिक संदेश
✔ प्राकृतिक तत्वों के साथ सामंजस्य मानसिक और भावनात्मक स्वास्थ्य बढ़ाता है
✔ संतुलित ऊर्जा प्रवाह जीवन में स्थिरता और समृद्धि लाता है
✔ साधक अपने और पर्यावरण के बीच सामंजस्य स्थापित करता है
---
Gaya Vigyan Brahmgyan दृष्टि
विज्ञान कहता है —
जल, वर्षा और औषधियों के संतुलित प्रवाह से जीवन और पृथ्वी स्वस्थ रहते हैं।
ब्रह्मज्ञान कहता है —
संपूर्ण प्राकृतिक और ब्रह्माण्डीय शक्तियों का संतुलन साधक की चेतना और प्रकृति के सामंजस्य का आधार है।
दोनों मिलकर कहते हैं —
संतुलित वर्षा, जल और औषधियों से जीवन और चेतना का सर्वोच्च अनुभव संभव है।
---
समग्र निष्कर्ष
अथर्ववेद 4.15.2 का यह मंत्र
वर्षा, जल और औषधियों के माध्यम से
पृथ्वी और जीवन में स्वास्थ्य, समृद्धि और संतुलन का संदेश देता है।
✔ जल और वर्षा = जीवन और पोषण
✔ औषधियाँ = स्वास्थ्य और उपचार
✔ पृथ्वी = जीवन का आधार और समृद्धि
✔ प्राकृतिक शक्तियाँ = संतुलन और कल्याण
---
English Insight
Let the cosmic energies and rain flow,
nourishing the Earth with water and medicinal herbs.
May abundance and health arise in every region,
ensuring welfare for all life and the planet.
भूमिका
यह मंत्र आकाशीय जल, वर्षा और औषधियों के माध्यम से
पृथ्वी और जीवों के कल्याण का वर्णन करता है।
साधक प्राकृतिक शक्तियों की गति और प्रवाह का निरीक्षण करता है
ताकि पृथ्वी में हर क्षेत्र में संतुलन और समृद्धि बनी रहे।
---
शब्दार्थ
समीक्षयस्व = निरीक्षण कर, संतुलित कर
गायतः = प्रवाहित हो, बहें
नभांस्य = आकाश के
अपां = जल
वेगासः = तीव्र गति से, ऊर्जा प्रवाह
पृथक् = प्रत्येक, अलग-अलग
उद्विजन्ताम् = उत्पन्न हों, फैलें
वर्षस्य सर्गा = वर्षा का सृजन और प्रकट होना
महयन्तु = महान करें, समृद्ध करें
भूमिं = पृथ्वी
पृथक् = विभिन्न क्षेत्रों में
जायन्तां = उत्पन्न हों
वीरुधो = बलशाली, शक्तिशाली
विश्वरूपाः = सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड रूप में
---
सरल अर्थ
आकाशीय जल और वर्षा
अपने वेग और ऊर्जा के साथ पृथक्-प्रत्येक क्षेत्र में फैलें।
वर्षा के सृजन से पृथ्वी में समृद्धि हो,
और औषधियाँ तथा प्राकृतिक शक्ति सभी क्षेत्रों में उत्पन्न हों।
---
वैज्ञानिक और दार्शनिक संकेत
✔ जल और वर्षा = जीवन का आधार, पोषण और संतुलन
✔ ऊर्जा और वेग = प्राकृतिक तंत्र का संचालन
✔ पृथक्-प्रत्येक क्षेत्र = प्रत्येक क्षेत्र और जीव के लिए लाभ
✔ औषधियाँ और प्राकृतिक शक्ति = स्वास्थ्य और समृद्धि
यह मंत्र दर्शाता है कि प्राकृतिक और ब्रह्माण्डीय तत्वों का संतुलित प्रवाह
पृथ्वी और जीवन के कल्याण के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण है।
---
आध्यात्मिक अर्थ
✔ प्राकृतिक तत्वों के सामंजस्य से जीवन और चेतना में संतुलन
✔ प्रत्येक क्षेत्र में ऊर्जा और स्वास्थ्य का वितरण
✔ साधक प्राकृतिक शक्तियों के सहयोग से समृद्धि सुनिश्चित करता है
---
योगिक दृष्टि
✔ ध्यान और प्राणायाम में प्राकृतिक तत्वों और उनकी गति का अनुभव
✔ आकाशीय जल और वर्षा का ध्यान ऊर्जा संवर्धन और संतुलन में सहायक
✔ प्राकृतिक और ब्रह्माण्डीय ऊर्जा के साथ चेतना का मेल
---
मनोवैज्ञानिक संदेश
✔ प्राकृतिक प्रवाह और ऊर्जा संतुलन मानसिक और भावनात्मक स्थिरता लाता है
✔ पृथक-प्रत्येक क्षेत्र में संतुलन जीवन में सामंजस्य और समृद्धि लाता है
✔ साधक अपने और पर्यावरण के बीच सामंजस्य स्थापित करता है
---
Gaya Vigyan Brahmgyan दृष्टि
विज्ञान कहता है —
जल और वर्षा के अलग-अलग क्षेत्रों में प्रवाह से जीवन और पृथ्वी में स्थिरता आती है।
ब्रह्मज्ञान कहता है —
प्राकृतिक और ब्रह्माण्डीय शक्तियों का संतुलन चेतना और प्रकृति के सामंजस्य का आधार है।
दोनों मिलकर कहते हैं —
संतुलित वर्षा और प्राकृतिक शक्तियों से जीवन और चेतना का सर्वोच्च अनुभव संभव है।
---
समग्र निष्कर्ष
अथर्ववेद 4.15.3 का यह मंत्र
आकाशीय जल, वर्षा और औषधियों के माध्यम से
पृथ्वी और जीवन में ऊर्जा, संतुलन और समृद्धि का संदेश देता है।
✔ जल और वर्षा = जीवन और पोषण
✔ ऊर्जा और वेग = प्राकृतिक गतिशीलता
✔ पृथक्-प्रत्येक क्षेत्र = लाभ और संतुलन
✔ औषधियाँ और प्राकृतिक शक्ति = स्वास्थ्य और समृद्धि
---
English Insight
Observe the cosmic waters, let them flow with energy
to every distinct region.
May the rains create abundance,
and may medicinal and natural forces arise in universal form, nourishing the Earth.
भूमिका
यह मंत्र प्राकृतिक शक्तियों के सहयोग से
वर्षा और पृथ्वी के कल्याण का वर्णन करता है।
साधक वायु, वर्षा और पृथ्वी की गति और प्रवाह का ध्यान करता है
ताकि जीवन और प्रकृति में समृद्धि बनी रहे।
---
शब्दार्थ
गणाः = समूह, शक्तियाँ
त्वा = उन्हें
उप = ऊपर, सक्रिय
गायन्तु = चलें, प्रकट हों
मारुताः = वायु देवता, प्राकृतिक गति
पर्जन्य = वर्षा, बारिश
घोषिणः = घोष करने वाले, प्रवाह में सक्रिय
पृथक् = अलग-अलग, विभिन्न क्षेत्रों में
सर्गा = सृजन, उत्पन्न करना
वर्षस्य = वर्षा की
वर्षतो = वर्षा के माध्यम से
वर्षन्तु = बरसें, फैलें
पृथिवीमनु = पृथ्वी और उसके जीवों के कल्याण के लिए
---
सरल अर्थ
सभी वायु समूह और वर्षा देवता सक्रिय होकर
प्रत्येक क्षेत्र में वर्षा और जल का प्रवाह करें।
इससे पृथ्वी और उसके जीवों में समृद्धि और कल्याण आए।
---
वैज्ञानिक और दार्शनिक संकेत
✔ वायु और वर्षा = प्राकृतिक गतिशीलता और जीवन का आधार
✔ पृथक् क्षेत्र = प्रत्येक क्षेत्र और जीव के लिए लाभ
✔ प्राकृतिक तत्वों का सहयोग = समृद्धि और स्वास्थ्य
यह मंत्र दर्शाता है कि वायु और वर्षा की शक्ति
संतुलित होने पर पृथ्वी और जीवन में कल्याण संभव है।
---
आध्यात्मिक अर्थ
✔ प्राकृतिक शक्तियों का जागरण और सहयोग
✔ पृथ्वी और जीवन में ऊर्जा और स्वास्थ्य का संचार
✔ साधक प्राकृतिक शक्तियों के साथ सामंजस्य स्थापित करता है
---
योगिक दृष्टि
✔ ध्यान और साधना में वायु और वर्षा का अवलोकन
✔ प्राकृतिक तत्वों का संतुलित अनुभव
✔ चेतना और प्रकृति के सामंजस्य का अभ्यास
---
मनोवैज्ञानिक संदेश
✔ प्राकृतिक तत्वों के साथ सामंजस्य मानसिक स्थिरता लाता है
✔ ऊर्जा और प्रवाह का संतुलन जीवन में समृद्धि लाता है
✔ साधक अपने और पर्यावरण के बीच संतुलन स्थापित करता है
---
Gaya Vigyan Brahmgyan दृष्टि
विज्ञान कहता है —
वायु और वर्षा के संतुलित प्रवाह से पृथ्वी और जीवन स्वस्थ रहते हैं।
ब्रह्मज्ञान कहता है —
प्राकृतिक और ब्रह्माण्डीय शक्तियों का संतुलन चेतना और प्रकृति के सामंजस्य का आधार है।
दोनों मिलकर कहते हैं —
संतुलित वायु और वर्षा से जीवन और चेतना का सर्वोच्च अनुभव संभव है।
---
समग्र निष्कर्ष
अथर्ववेद 4.15.4 का यह मंत्र
वायु और वर्षा के माध्यम से
पृथ्वी और जीवन में ऊर्जा, समृद्धि और संतुलन का संदेश देता है।
✔ वायु और वर्षा = प्राकृतिक शक्ति और जीवन
✔ पृथक् क्षेत्र = लाभ और समृद्धि
✔ प्राकृतिक तत्वों का सहयोग = स्वास्थ्य और संतुलन
✔ पृथ्वी और जीव = कल्याण और समृद्धि
---
English Insight
Let the groups of wind and rain deities arise,
flowing separately in each region.
May the rains generate abundance,
benefiting the Earth and all living beings.
भूमिका
यह मंत्र प्राकृतिक और ब्रह्माण्डीय शक्तियों के सहयोग से
पृथ्वी और उसके जीवों में जीवन, ऊर्जा और पोषण का वर्णन करता है।
साधक वायु (मरुत), सूर्य (अर्क) और वर्षा (आप) की शक्तियों का संतुलन कर
संपूर्ण पृथ्वी को कल्याण प्रदान करता है।
---
शब्दार्थ
उदीरयत = उठे, प्रकट हो
मरुतः = वायु देवता
समुद्रतः = समुद्र से उत्पन्न
त्वेषः = तेजस्वी, प्रकाशमान
अर्कः = सूर्य, ऊर्जा और प्रकाश का स्रोत
नभ = आकाश
उत्पातयाथ = फैलाएं, उत्पन्न करें
महऋषभस्य = महान ऋषभ (बलशाली ऊर्जा या देवता)
नदतो = प्रवाहित करें
नभस्वतः = आकाश से
वाश्रा = वर्षा, जल का सृजन
आपः = जल
पृथिवीं = पृथ्वी
तर्पयन्तु = पोषण करें, जीवन दें
---
सरल अर्थ
मरुत (वायु) समुद्र और आकाश से उत्पन्न होकर पृथ्वी में फैलें।
सूर्य (अर्क) की ऊर्जा के माध्यम से वर्षा और जल प्रवाहित हों।
महऋषभ की शक्ति से ये प्राकृतिक तत्व पृथ्वी को पोषण और जीवन दें।
---
वैज्ञानिक और दार्शनिक संकेत
✔ वायु और सूर्य = ऊर्जा और जीवन शक्ति का स्रोत
✔ वर्षा और जल = पृथ्वी और जीवों के लिए पोषण
✔ आकाशीय और समुद्री ऊर्जा = प्राकृतिक संतुलन
✔ पृथ्वी का पोषण = जीवन, समृद्धि और स्वास्थ्य
---
आध्यात्मिक अर्थ
✔ प्राकृतिक और ब्रह्माण्डीय शक्तियों का सहयोग
✔ जीवन और चेतना में ऊर्जा और संतुलन
✔ साधक प्राकृतिक शक्तियों के साथ सामंजस्य स्थापित करता है
---
योगिक दृष्टि
✔ ध्यान और प्राणायाम में वायु, सूर्य और वर्षा की ऊर्जा का अनुभव
✔ प्राकृतिक शक्तियों के संतुलित प्रवाह से चेतना और ऊर्जा का मेल
✔ पृथ्वी और जीवन के कल्याण में चेतना का योगदान
---
मनोवैज्ञानिक संदेश
✔ प्राकृतिक ऊर्जा और संतुलन मानसिक स्थिरता लाता है
✔ जीवन में समृद्धि और ऊर्जा का प्रवाह बनाए रखता है
✔ साधक और पर्यावरण के बीच सामंजस्य स्थापित करता है
---
Gaya Vigyan Brahmgyan दृष्टि
विज्ञान कहता है —
वायु, सूर्य और वर्षा के संतुलित प्रवाह से पृथ्वी और जीवन स्वस्थ रहते हैं।
ब्रह्मज्ञान कहता है —
संपूर्ण प्राकृतिक और ब्रह्माण्डीय शक्तियों का संतुलन चेतना और प्रकृति के सामंजस्य का आधार है।
दोनों मिलकर कहते हैं —
संतुलित वायु, सूर्य और वर्षा से जीवन और चेतना का सर्वोच्च अनुभव संभव है।
---
समग्र निष्कर्ष
अथर्ववेद 4.15.5 का यह मंत्र
मरुत, सूर्य और वर्षा के माध्यम से
पृथ्वी और जीवन में ऊर्जा, पोषण और संतुलन का संदेश देता है।
✔ वायु और सूर्य = ऊर्जा और जीवन
✔ वर्षा और जल = पोषण और समृद्धि
✔ आकाशीय और समुद्री ऊर्जा = प्राकृतिक संतुलन
✔ पृथ्वी और जीव = कल्याण और समृद्धि
---
English Insight
Let the Maruts (winds) arise from the oceans,
let the radiant Sun energize the sky.
Through the power of Maharishabha,
may the rain and waters flow, nourishing the Earth and all beings.
भूमिका
यह मंत्र वर्षा के माध्यम से पृथ्वी के पोषण और जीवन के कल्याण का वर्णन करता है।
साधक प्राकृतिक और ब्रह्माण्डीय शक्तियों का ध्यान कर
पृथ्वी, वर्षा और जल के माध्यम से जीवन और समृद्धि सुनिश्चित करता है।
---
शब्दार्थ
अभि = अभी, तुरंत
क्रन्द = रोए, उद्भवित हों
स्तन = स्तन, स्रोत, जल का मूल
आर्दय = जलपूर्ण, सरितापरक
उदधिं = समुद्र
भूमिं = पृथ्वी
पर्जन्य = वर्षा, वर्षा देवता
पयसा = जल से
समङ्धि = भिगो, सिँचो, पोषण करो
त्वया = तुम्हारे द्वारा
सृष्टं = उत्पन्न, बनाया गया
बहुलम् = अधिक मात्रा में
ऐतु = बरसाए
वर्षम् = वर्षा
आशारैषी = समृद्धि देने वाली
कृशगुरेत्वम् = कमजोर या कुपोषित को शक्ति और पोषण देना
स्तम् = यह
---
सरल अर्थ
जल और वर्षा के माध्यम से पृथ्वी और उसके जीवों को पोषण दें।
साधक प्राकृतिक शक्तियों का सहयोग कर
वर्षा को जीवनदायिनी और समृद्धिदायक बनाता है।
---
वैज्ञानिक और दार्शनिक संकेत
✔ वर्षा और जल = पृथ्वी और जीवों के पोषण का आधार
✔ समुद्र और स्तन = जल स्रोत और ऊर्जा
✔ बहुल वर्षा = कृषि, जीवन और समृद्धि
✔ कुपोषित और कमजोर = जीवन में संतुलन और स्वास्थ्य
---
आध्यात्मिक अर्थ
✔ पृथ्वी और जीवन के लिए प्राकृतिक शक्तियों का जागरण
✔ वर्षा के माध्यम से चेतना और जीवन में संतुलन
✔ साधक अपने ध्यान और साधना के माध्यम से जीवन और प्रकृति का पोषण करता है
---
योगिक दृष्टि
✔ प्राणायाम और ध्यान में प्राकृतिक जल स्रोतों का अनुभव
✔ वर्षा और जल के संतुलित प्रवाह से चेतना और जीवन ऊर्जा का मेल
✔ पृथ्वी और जीवों के कल्याण में साधक का योगदान
---
मनोवैज्ञानिक संदेश
✔ प्राकृतिक और जल तत्वों का संतुलन मानसिक और भावनात्मक स्थिरता लाता है
✔ जीवन और स्वास्थ्य में समृद्धि बनाए रखता है
✔ साधक और पर्यावरण के बीच सामंजस्य स्थापित करता है
---
Gaya Vigyan Brahmgyan दृष्टि
विज्ञान कहता है —
वर्षा और जल के संतुलित प्रवाह से पृथ्वी, कृषि और जीवन स्वस्थ रहते हैं।
ब्रह्मज्ञान कहता है —
प्राकृतिक और ब्रह्माण्डीय शक्तियों का संतुलन चेतना, जीवन और प्रकृति के सामंजस्य का आधार है।
दोनों मिलकर कहते हैं —
संतुलित वर्षा और जल से जीवन, चेतना और पृथ्वी का सर्वोच्च अनुभव संभव है।
---
समग्र निष्कर्ष
अथर्ववेद 4.15.6 का यह मंत्र
वर्षा, जल और पृथ्वी के माध्यम से
जीवन, पोषण और संतुलन का संदेश देता है।
✔ वर्षा और जल = पोषण और जीवन
✔ समुद्र और स्तन = जल स्रोत और ऊर्जा
✔ बहुल वर्षा = समृद्धि और स्वास्थ्य
✔ कमजोर और कुपोषित = शक्ति और पोषण
---
English Insight
May the waters and rains nourish the Earth abundantly,
bringing life and vitality to all beings.
Let the plentiful rainfall sustain and strengthen the land,
ensuring prosperity and balance for all living entities.
भूमिका
यह मंत्र प्राकृतिक शक्तियों—सुदानव, अजगरा, मरु (वायु) और मेघ (बादल)—के सहयोग से
पृथ्वी और उसके जीवों के लिए वर्षा और पोषण सुनिश्चित करने का वर्णन करता है।
साधक ब्रह्माण्डीय ऊर्जा का अनुभव कर
पृथ्वी पर जीवन, समृद्धि और संतुलन स्थापित करता है।
---
शब्दार्थ
वोऽवन्तु = हों, प्रकट हों
सुदानव = देवताओं या शक्तिशाली प्रकृति तत्व
उत्सा = उत्सर्जित, प्रवाहित
अजगरा = अज (दिव्य शक्ति) की वृद्धि
मरुद्भिः = वायु देवताओं के माध्यम से
प्रच्युता = फैलें, व्यापक हों
मेघा = बादल, वर्षा का स्रोत
वर्षन्तु = बरसें, पोषण करें
पृथिवीमनु = पृथ्वी और उसके जीव
---
सरल अर्थ
सुदानव और अजगरा अपनी शक्तियों से
मरुद्भि और मेघों को सक्रिय करें,
जिससे वर्षा पृथ्वी और उसके जीवों को पोषण और समृद्धि दे।
---
वैज्ञानिक और दार्शनिक संकेत
✔ वायु और बादल = वर्षा और जल का प्रवाह
✔ सुदानव और अजगरा = प्राकृतिक और ब्रह्माण्डीय शक्तियाँ
✔ पृथ्वी का पोषण = कृषि, जीवन और समृद्धि
✔ जीवों और पर्यावरण के लिए संतुलन
यह मंत्र दर्शाता है कि प्राकृतिक और ब्रह्माण्डीय शक्तियों का संयोजन
पृथ्वी और जीवन के कल्याण के लिए आवश्यक है।
---
आध्यात्मिक अर्थ
✔ ब्रह्माण्डीय शक्तियों के सहयोग से पृथ्वी और जीवन में संतुलन
✔ प्राकृतिक तत्वों का जागरण और ऊर्जा प्रवाह
✔ साधक अपने ध्यान और साधना के माध्यम से
पृथ्वी और उसके जीवों में जीवन और समृद्धि स्थापित करता है
---
योगिक दृष्टि
✔ ध्यान और प्राणायाम में प्राकृतिक तत्वों का अनुभव
✔ वायु और मेघ की ऊर्जा का संतुलित प्रवाह
✔ पृथ्वी और जीवन में ऊर्जा और चेतना का मेल
---
मनोवैज्ञानिक संदेश
✔ प्राकृतिक शक्तियों और संतुलन से मानसिक और भावनात्मक स्थिरता
✔ जीवन में समृद्धि और ऊर्जा बनाए रखना
✔ साधक और पर्यावरण के बीच सामंजस्य स्थापित करना
---
Gaya Vigyan Brahmgyan दृष्टि
विज्ञान कहता है —
वायु और बादल के संतुलित प्रवाह से पृथ्वी और जीवन स्वस्थ रहते हैं।
ब्रह्मज्ञान कहता है —
प्राकृतिक और ब्रह्माण्डीय शक्तियों का संतुलन चेतना और जीवन के सामंजस्य का आधार है।
दोनों मिलकर कहते हैं —
संतुलित प्राकृतिक शक्तियों से जीवन और चेतना का सर्वोच्च अनुभव संभव है।
---
समग्र निष्कर्ष
अथर्ववेद 4.15.7 का यह मंत्र
सुदानव, अजगरा, वायु और मेघ के माध्यम से
पृथ्वी और जीवों में वर्षा, ऊर्जा और संतुलन का संदेश देता है।
✔ सुदानव और अजगरा = ब्रह्माण्डीय शक्ति
✔ वायु और मेघ = वर्षा और जल का प्रवाह
✔ पृथ्वी और जीव = पोषण और समृद्धि
✔ प्राकृतिक संतुलन = जीवन और चेतना का सामंजस्य
---
English Insight
Let the Sudanavas and Ajgara activate the winds and clouds,
so that the rainfall nourishes the Earth and its beings.
Through the combined energies of wind and clouds,
life, balance, and prosperity are sustained on Earth.
भूमिका
यह मंत्र वायु (मरुद्भि) और मेघों के माध्यम से
पृथ्वी और उसके जीवों के लिए वर्षा और पोषण सुनिश्चित करने का वर्णन करता है।
साधक प्राकृतिक और ब्रह्माण्डीय शक्तियों का अनुभव कर
ऊर्जा, जीवन और समृद्धि का संतुलन स्थापित करता है।
---
शब्दार्थ
आशामाशां = अपेक्षाओं, इच्छाओं
वि = अलग-अलग, व्यापक रूप से
द्यौततां = प्रकाशित हों, प्रकट हों
वाता = वायु, हवा
वान्तु = प्रकट हों, प्रवाहित हों
दिशोदिशः = चारों दिशाओं में
मरुद्भिः = वायु देवताओं के माध्यम से
प्रच्युता = फैलें, व्यापक हों
मेघाः = बादल, वर्षा के स्रोत
संग यन्तु = साथ-साथ जाएँ, सहयोग करें
पृथिवीमनु = पृथ्वी और उसके जीव
---
सरल अर्थ
सभी दिशाओं में वायु और उसके तेजस्वी प्रवाह के साथ
मेघ (बादल) फैलें और वर्षा करें।
इससे पृथ्वी और उसके जीवों को जीवन, ऊर्जा और पोषण प्राप्त हो।
---
वैज्ञानिक और दार्शनिक संकेत
✔ वायु और मेघ = वर्षा और जल का प्रवाह
✔ चारों दिशाएँ = ऊर्जा और जल का संतुलित वितरण
✔ पृथ्वी का पोषण = जीवन और कृषि के लिए आवश्यक
✔ प्राकृतिक संतुलन = समग्र पर्यावरण और जीवन का सामंजस्य
---
आध्यात्मिक अर्थ
✔ वायु और मेघ के माध्यम से ब्रह्माण्डीय शक्ति का अनुभव
✔ प्राकृतिक तत्वों का जागरण और ऊर्जा प्रवाह
✔ साधक प्राकृतिक शक्तियों के सहयोग से जीवन और चेतना का संतुलन स्थापित करता है
---
योगिक दृष्टि
✔ ध्यान और प्राणायाम में प्राकृतिक वायु और वर्षा तत्वों का अनुभव
✔ चारों दिशाओं में ऊर्जा का संतुलित प्रवाह
✔ पृथ्वी और जीवों के कल्याण में साधक का योगदान
---
मनोवैज्ञानिक संदेश
✔ प्राकृतिक ऊर्जा का संतुलन मानसिक स्थिरता लाता है
✔ जीवन में समृद्धि और ऊर्जा बनाए रखता है
✔ साधक और पर्यावरण के बीच सामंजस्य स्थापित करता है
---
Gaya Vigyan Brahmgyan दृष्टि
विज्ञान कहता है —
चारों दिशाओं में वायु और वर्षा का संतुलित प्रवाह
पृथ्वी और जीवन के लिए स्वास्थ्य और समृद्धि सुनिश्चित करता है।
ब्रह्मज्ञान कहता है —
संपूर्ण प्राकृतिक और ब्रह्माण्डीय शक्तियों का संतुलन चेतना और जीवन का आधार है।
दोनों मिलकर कहते हैं —
संतुलित वायु, मेघ और जल से जीवन और चेतना का सर्वोच्च अनुभव संभव है।
---
समग्र निष्कर्ष
अथर्ववेद 4.15.8 का यह मंत्र
चारों दिशाओं में वायु और मेघ के माध्यम से
पृथ्वी और जीवन में वर्षा, ऊर्जा और संतुलन का संदेश देता है।
✔ वायु और मेघ = वर्षा और ऊर्जा
✔ चारों दिशाएँ = संतुलित वितरण
✔ पृथ्वी और जीव = पोषण और जीवन
✔ प्राकृतिक संतुलन = जीवन और चेतना का सामंजस्य
---
English Insight
May the winds rise and radiate across all directions,
and may the clouds flow together, bringing nourishing rain.
Through the combined energies of air and clouds,
the Earth and all beings receive vitality, life, and balance.
भूमिका
यह मंत्र जल, वर्षा, मेघ और प्राकृतिक शक्तियों—सुदानव और अजगरा—के सहयोग से
पृथ्वी और उसके जीवों के लिए जीवनदायिनी वर्षा और ऊर्जा सुनिश्चित करने का वर्णन करता है।
साधक ब्रह्माण्डीय तत्वों और ऊर्जा केंद्रों का ध्यान कर
पृथ्वी और जीवन में समृद्धि और संतुलन स्थापित करता है।
---
शब्दार्थ
आपो = जल, वर्षा
विद्युद्भ्रं = बिजली और बादल, आकाशीय ऊर्जा
वर्षं = वर्षा, पानी का प्रवाह
संग = साथ में, मिलकर
वोऽवन्तु = प्रकट हों, सक्रिय हों
सुदानव = शक्तिशाली प्राकृतिक तत्व
उत्सा = उत्सर्जित, प्रवाहित
अजगरा = अज (दिव्य शक्ति)
मरुद्भिः = वायु देवताओं के माध्यम से
प्रच्युता = फैलें, व्यापक हों
मेघाः = बादल, वर्षा के स्रोत
प्रावन्तु = वर्षा करें, बरसें
पृथिवीमनु = पृथ्वी और उसके जीव
---
सरल अर्थ
जल और बिजली के बादल
सुदानव और अजगरा की शक्तियों से सक्रिय हों।
वायु देवताओं और मेघों के सहयोग से वर्षा हो
और पृथ्वी और उसके जीवों को जीवन और पोषण मिले।
---
वैज्ञानिक और दार्शनिक संकेत
✔ जल और विद्युत = प्राकृतिक ऊर्जा और वर्षा का प्रवाह
✔ सुदानव और अजगरा = ब्रह्माण्डीय शक्तियाँ
✔ वायु और मेघ = वर्षा और जीवनदायिनी ऊर्जा
✔ पृथ्वी और जीव = पोषण, कृषि और समृद्धि
यह मंत्र दर्शाता है कि प्राकृतिक और ब्रह्माण्डीय शक्तियों का संयोजन
पृथ्वी और जीवन के कल्याण के लिए आवश्यक है।
---
आध्यात्मिक अर्थ
✔ प्राकृतिक और ब्रह्माण्डीय शक्तियों के माध्यम से जीवन का पोषण
✔ वर्षा और जल प्रवाह के द्वारा चेतना और ऊर्जा का संतुलन
✔ साधक अपने ध्यान और साधना के माध्यम से
पृथ्वी और जीवन में समृद्धि और संतुलन स्थापित करता है
---
योगिक दृष्टि
✔ ध्यान और प्राणायाम में प्राकृतिक जल और ऊर्जा तत्वों का अनुभव
✔ वायु, बिजली और बादल के माध्यम से ऊर्जा का प्रवाह
✔ पृथ्वी और जीवों में जीवन और चेतना का मेल
---
मनोवैज्ञानिक संदेश
✔ प्राकृतिक ऊर्जा और संतुलन मानसिक स्थिरता लाता है
✔ जीवन में समृद्धि, स्वास्थ्य और चेतना बनाए रखता है
✔ साधक और पर्यावरण के बीच सामंजस्य स्थापित करता है
---
Gaya Vigyan Brahmgyan दृष्टि
विज्ञान कहता है —
जल, बिजली और वायु के संतुलित प्रवाह से पृथ्वी और जीवन स्वस्थ रहते हैं।
ब्रह्मज्ञान कहता है —
प्राकृतिक और ब्रह्माण्डीय शक्तियों का संतुलन चेतना, जीवन और समृद्धि का आधार है।
दोनों मिलकर कहते हैं —
संतुलित प्राकृतिक शक्तियों से जीवन और चेतना का सर्वोच्च अनुभव संभव है।
---
समग्र निष्कर्ष
अथर्ववेद 4.15.9 का यह मंत्र
जल, विद्युत, सुदानव, अजगरा, वायु और मेघ के माध्यम से
पृथ्वी और जीवन में वर्षा, ऊर्जा और संतुलन का संदेश देता है।
✔ जल और विद्युत = प्राकृतिक ऊर्जा
✔ सुदानव और अजगरा = ब्रह्माण्डीय शक्ति
✔ वायु और मेघ = जीवनदायिनी वर्षा
✔ पृथ्वी और जीव = पोषण और समृद्धि
---
English Insight
Let the waters and thunderclouds, activated by Sudanavas and Ajgara,
flow through the winds and clouds to rain upon the Earth.
This nourishes the Earth and all beings,
bringing energy, vitality, and universal balance.
भूमिका
यह मंत्र अपामग्नि (जल और अग्नि का संयोजन) और ओषधियों के माध्यम से
पृथ्वी, वर्षा और जीवों के जीवन के पोषण का वर्णन करता है।
साधक प्राकृतिक और ब्रह्माण्डीय शक्तियों का अनुभव कर
पृथ्वी, जीवों और चेतना में ऊर्जा और समृद्धि स्थापित करता है।
---
शब्दार्थ
अपामग्नि = जल और अग्नि का संयोजन, जीवनदायिनी शक्ति
स्तनूभिः = शरीरों, तत्वों
संविदानो = जाग्रत, सक्रिय
य = जो
ओषधीनाम् = औषधियों, वनस्पतियों
अधिपा = अधिपति, स्वामी
बभूव = बना, प्रकट हुआ
स = वह
नो = हमारे लिए
वर्षं = वर्षा
वनुतां = जीवनदायिनी, पोषणकारी
जातवेदाः = सर्वज्ञ, जो जीवन की मूल शक्ति जानता है
प्राणं = जीव की ऊर्जा
प्रजाभ्यो = प्राणियों के लिए
अमृतं = जीवनदायिनी, दिव्य
दिवस्परि = सम्पूर्ण दिन, समय
---
सरल अर्थ
अपामग्नि और ओषधियों के स्वामी की शक्तियों से
वर्षा और जीवनदायिनी ऊर्जा पृथ्वी और जीवों तक पहुँचती है।
यह जीवन, प्राण और अमृत प्रदान करता है,
जिससे पृथ्वी और उसके जीवों में समृद्धि और संतुलन आता है।
---
वैज्ञानिक और दार्शनिक संकेत
✔ अपामग्नि = जल और ऊर्जा का संतुलित प्रवाह
✔ ओषधियाँ = जीवनदायिनी प्राकृतिक तत्व
✔ वर्षा और प्राण = कृषि और जीवन के लिए आवश्यक
✔ प्राकृतिक और ब्रह्माण्डीय संतुलन = जीवन और चेतना का आधार
---
आध्यात्मिक अर्थ
✔ ब्रह्माण्डीय और प्राकृतिक शक्तियों के माध्यम से जीवन और चेतना का पोषण
✔ ओषधियों और वर्षा के माध्यम से ऊर्जा और स्वास्थ्य का संतुलन
✔ साधक अपने ध्यान और साधना के माध्यम से
पृथ्वी और जीवों में जीवन और समृद्धि स्थापित करता है
---
योगिक दृष्टि
✔ ध्यान और प्राणायाम में प्राकृतिक और ब्रह्माण्डीय तत्वों का अनुभव
✔ जल और अग्नि के संयोजन से ऊर्जा का संचरण
✔ पृथ्वी और जीवों में चेतना और शक्ति का विस्तार
---
मनोवैज्ञानिक संदेश
✔ प्राकृतिक और ब्रह्माण्डीय शक्तियों का संतुलन मानसिक स्थिरता लाता है
✔ जीवन में समृद्धि, स्वास्थ्य और ऊर्जा बनाए रखता है
✔ साधक और पर्यावरण के बीच सामंजस्य स्थापित करता है
---
Gaya Vigyan Brahmgyan दृष्टि
विज्ञान कहता है —
जल और प्राकृतिक औषधियों के संयोजन से पृथ्वी और जीवन स्वस्थ रहते हैं।
ब्रह्मज्ञान कहता है —
संपूर्ण प्राकृतिक और ब्रह्माण्डीय शक्तियों का संतुलन
जीवन, चेतना और स्वास्थ्य का आधार है।
दोनों मिलकर कहते हैं —
संतुलित प्राकृतिक और ब्रह्माण्डीय शक्तियों से जीवन और चेतना का सर्वोच्च अनुभव संभव है।
---
समग्र निष्कर्ष
अथर्ववेद 4.15.10 का यह मंत्र
अपामग्नि और ओषधियों के माध्यम से
पृथ्वी और जीवों में वर्षा, ऊर्जा और जीवनदायिनी शक्ति का संदेश देता है।
✔ अपामग्नि = जल और ऊर्जा
✔ ओषधियाँ = जीवनदायिनी प्राकृतिक शक्ति
✔ वर्षा और प्राण = जीवन और समृद्धि
✔ प्राकृतिक संतुलन = जीवन और चेतना का सामंजस्य
---
English Insight
Let the Apam Agni (water-fire energy) and the rulers of herbs activate
the nourishing rain and life force on Earth.
This sustains vitality, prana, and immortality for all beings,
bringing balance, prosperity, and universal energy.
भूमिका
यह मंत्र प्रजापति के माध्यम से
जल स्रोतों, समुद्र और प्राकृतिक प्रवाह का वर्णन करता है।
साधक इन प्राकृतिक और ब्रह्माण्डीय शक्तियों का अनुभव कर
पृथ्वी, जीवन और चेतना में ऊर्जा और समृद्धि स्थापित करता है।
---
शब्दार्थ
प्रजापतिः = सृष्टिकर्ता, ब्रह्माण्ड के स्वामी
सलिल = जल, समुद्र
आदा = उत्पन्न करता है, प्रवाहित करता है
समुद्रात् = समुद्र से
आप = जल
ईरयन् = बहा रहा है, प्रवाहित कर रहा है
उदधि = महासागर, जलाशय
मर्दयाति = दबाता, नियंत्रित करता है
प्र = आगे
प्यायतां = बहने दें
वृष्णः = तेजस्वी, शक्ति, जीवनदायिनी
अश्वस्य = अश्वों का, गति और शक्ति का प्रतीक
रेतोऽर्वान् = वीर्य, जीवन शक्ति
एतेन = इस प्रकार
स्तनयित्नुनेहि = जीवों और पृथ्वी को पोषण प्रदान करता है
---
सरल अर्थ
प्रजापति समुद्र और जल स्रोतों से
जीवनदायिनी जल और शक्ति पृथ्वी और जीवों तक पहुँचाते हैं।
इससे प्राण और ऊर्जा का प्रवाह होता है,
और पृथ्वी तथा जीवन में संतुलन और समृद्धि आती है।
---
वैज्ञानिक और दार्शनिक संकेत
✔ समुद्र और जल स्रोत = जीवन का आधार
✔ प्रजापति = प्राकृतिक और ब्रह्माण्डीय ऊर्जा का संचालक
✔ वृष्ण और अश्व = शक्ति और गति के प्रतीक
✔ स्तनयित्नुनेहि = पोषण और ऊर्जा वितरण
यह मंत्र दर्शाता है कि जल और प्राकृतिक शक्तियों का संतुलित प्रवाह
पृथ्वी और जीवों के कल्याण के लिए आवश्यक है।
---
आध्यात्मिक अर्थ
✔ प्रजापति और प्राकृतिक जल स्रोतों के माध्यम से जीवन का पोषण
✔ जल प्रवाह और शक्ति के माध्यम से ऊर्जा का संतुलन
✔ साधक अपने ध्यान और साधना के माध्यम से
पृथ्वी और जीवों में जीवन और चेतना में समृद्धि स्थापित करता है
---
योगिक दृष्टि
✔ ध्यान और प्राणायाम में प्राकृतिक जल और ऊर्जा तत्वों का अनुभव
✔ जल और महासागर के माध्यम से ऊर्जा का संचरण
✔ पृथ्वी और जीवों में चेतना और शक्ति का विस्तार
---
मनोवैज्ञानिक संदेश
✔ प्राकृतिक और ब्रह्माण्डीय शक्तियों का संतुलन मानसिक स्थिरता लाता है
✔ जीवन में समृद्धि, स्वास्थ्य और ऊर्जा बनाए रखता है
✔ साधक और पर्यावरण के बीच सामंजस्य स्थापित करता है
---
Gaya Vigyan Brahmgyan दृष्टि
विज्ञान कहता है —
जल स्रोतों और महासागरों के संतुलित प्रवाह से पृथ्वी और जीवन स्वस्थ रहते हैं।
ब्रह्मज्ञान कहता है —
संपूर्ण प्राकृतिक और ब्रह्माण्डीय शक्तियों का संतुलन
जीवन, चेतना और समृद्धि का आधार है।
दोनों मिलकर कहते हैं —
संतुलित जल और ऊर्जा से जीवन और चेतना का सर्वोच्च अनुभव संभव है।
---
समग्र निष्कर्ष
अथर्ववेद 4.15.11 का यह मंत्र
प्रजापति और जल स्रोतों के माध्यम से
पृथ्वी और जीवों में वर्षा, ऊर्जा और जीवनदायिनी शक्ति का संदेश देता है।
✔ प्रजापति = सृष्टि और ऊर्जा का संचालक
✔ समुद्र और जल स्रोत = जीवन और शक्ति
✔ वृष्ण और अश्व = गति और शक्ति
✔ स्तनयित्नुनेहि = जीवनदायिनी ऊर्जा वितरण
---
English Insight
Let Prajapati, through the waters of oceans and streams,
release life-giving flow and energy upon the Earth.
The vital force nourishes all beings,
bringing strength, vitality, and universal balance.
भूमिका
यह मंत्र अपाओं (जल स्रोतों) और असुर शक्तियों के माध्यम से
वर्षा और जीवनदायिनी ऊर्जा का वर्णन करता है।
साधक प्राकृतिक और ब्रह्माण्डीय शक्तियों का अनुभव कर
पृथ्वी, जीव और चेतना में समृद्धि और संतुलन स्थापित करता है।
---
शब्दार्थ
अपो = जल, वर्षा
निषिञ्चन्न् = बहा रहे हैं, प्रवाहित कर रहे हैं
असुरः = असुर, शक्तिशाली ब्रह्माण्डीय शक्ति
पिता = पोषक, स्रष्टा
नः = हमारे लिए
श्वसन्तु = प्रकट हों, सक्रिय हों
गर्गरा = गड़गड़ाहट, वर्षा और बिजली का संकेत
अपां = जल स्रोत
वरुणाव = वरुण देव, जल और सृष्टि के स्वामी
नीचीरपः = जल का प्रवाह, जीवनदायिनी शक्ति
सृज = सृजित करें, उत्पन्न करें
वदन्तु = बोलें, घोषणा करें
पृश्निबाहवः = शक्ति और गति के अंग
मण्डूका = ऋषि वर्ग या प्रतीकात्मक शक्ति
इरिणानु = आकाशीय तत्व और वर्षा
---
सरल अर्थ
जल और प्राकृतिक शक्तियों (अपा और असुर) से
वर्षा और जीवनदायिनी ऊर्जा पृथ्वी और जीवों तक पहुँचती है।
वरुण और अन्य ब्रह्माण्डीय शक्तियाँ जल प्रवाह और शक्ति को नियंत्रित करती हैं।
इससे पृथ्वी और जीवन में संतुलन, समृद्धि और ऊर्जा आती है।
---
वैज्ञानिक और दार्शनिक संकेत
✔ अपा और असुर = प्राकृतिक और ब्रह्माण्डीय शक्तियाँ
✔ जल स्रोत और वर्षा = जीवन और कृषि का आधार
✔ वरुण और नीचीरपः = जल प्रवाह और ऊर्जा का नियंत्रण
✔ पृश्निबाहवः और मण्डूका = ब्रह्माण्डीय शक्ति के प्रतीक
यह मंत्र दर्शाता है कि प्राकृतिक और ब्रह्माण्डीय शक्तियों का संतुलित प्रवाह
पृथ्वी और जीवन के कल्याण के लिए आवश्यक है।
---
आध्यात्मिक अर्थ
✔ ब्रह्माण्डीय और प्राकृतिक शक्तियों के माध्यम से जीवन और चेतना का पोषण
✔ जल प्रवाह और ऊर्जा संतुलन के माध्यम से जीवनदायिनी शक्ति
✔ साधक अपने ध्यान और साधना के माध्यम से
पृथ्वी और जीवों में ऊर्जा और चेतना का संतुलन स्थापित करता है
---
योगिक दृष्टि
✔ ध्यान और प्राणायाम में जल और ब्रह्माण्डीय तत्वों का अनुभव
✔ अपाओं और असुर शक्तियों से ऊर्जा का संचरण
✔ पृथ्वी और जीवों में चेतना और शक्ति का विस्तार
---
मनोवैज्ञानिक संदेश
✔ प्राकृतिक और ब्रह्माण्डीय शक्तियों का संतुलन मानसिक स्थिरता लाता है
✔ जीवन में समृद्धि, स्वास्थ्य और ऊर्जा बनाए रखता है
✔ साधक और पर्यावरण के बीच सामंजस्य स्थापित करता है
---
Gaya Vigyan Brahmgyan दृष्टि
विज्ञान कहता है —
जल और प्राकृतिक शक्तियों के संतुलित प्रवाह से पृथ्वी और जीवन स्वस्थ रहते हैं।
ब्रह्मज्ञान कहता है —
संपूर्ण प्राकृतिक और ब्रह्माण्डीय शक्तियों का संतुलन
जीवन, चेतना और समृद्धि का आधार है।
दोनों मिलकर कहते हैं —
संतुलित जल और ऊर्जा से जीवन और चेतना का सर्वोच्च अनुभव संभव है।
---
समग्र निष्कर्ष
अथर्ववेद 4.15.12 का यह मंत्र
अपाओं और असुर शक्तियों के माध्यम से
पृथ्वी और जीवों में वर्षा, ऊर्जा और जीवनदायिनी शक्ति का संदेश देता है।
✔ अपा और असुर = प्राकृतिक और ब्रह्माण्डीय शक्ति
✔ जल स्रोत और वर्षा = जीवन और ऊर्जा
✔ वरुण और नीचीरपः = शक्ति और नियंत्रण
✔ पृश्निबाहवः और मण्डूका = ब्रह्माण्डीय शक्ति के प्रतीक
---
English Insight
Let the waters, empowered by the Asuras, flow and nourish the Earth.
May Varuna and the celestial forces govern the streams,
bringing rain, energy, and vitality to all beings,
establishing balance, prosperity, and universal life force.
भूमिका
यह मंत्र व्रतशील ब्राह्मणों और वर्षा के माध्यम से
जीवनदायिनी वाणी और प्राणशक्ति का वर्णन करता है।
साधक वर्षा, ब्राह्मण और प्राकृतिक शक्तियों के सहयोग से
संपूर्ण पृथ्वी और जीवन में ऊर्जा, ज्ञान और समृद्धि स्थापित करता है।
---
शब्दार्थ
संवत्सरं = वर्ष भर, सालाना
शशयाना = चन्द्र की तरह प्रकाशमान, उज्ज्वल
ब्राह्मणा = ब्राह्मण, विद्वान, व्रतशील व्यक्ति
व्रतचारिणः = व्रत पालन करने वाले
वाचम् = वाणी, उच्चतम शब्द और ज्ञान
पर्जन्यजिन्विताम् = वर्षा द्वारा उत्पन्न या पोषित
प्र = प्रकट
मण्डूका = ऋषि वर्ग या प्रतीकात्मक शक्ति
अवादिषुः = उच्चारित, घोषित किया, प्रचारित किया
---
सरल अर्थ
व्रतशील ब्राह्मण पूरे वर्ष
वाणी और ज्ञान को वर्षा और प्राकृतिक शक्ति से पोषित करते हैं।
इससे पृथ्वी और जीवों में ऊर्जा, जीवन शक्ति और चेतना का प्रवाह होता है।
मण्डूका या ब्रह्माण्डीय शक्ति इसे सभी तक पहुँचाने में सहायता करती है।
---
वैज्ञानिक और दार्शनिक संकेत
✔ व्रतशील ब्राह्मण = ध्यान, साधना और ज्ञान का प्रतीक
✔ वर्षा = जीवन और ऊर्जा का स्रोत
✔ वाणी = चेतना और ज्ञान का माध्यम
✔ मण्डूका = ब्रह्माण्डीय शक्ति और ऊर्जा का संचालक
यह मंत्र दिखाता है कि ज्ञान, व्रत और प्राकृतिक शक्ति
जीवन और चेतना के सर्वोच्च विकास के लिए अनिवार्य हैं।
---
आध्यात्मिक अर्थ
✔ ब्राह्मण और साधक के माध्यम से ऊर्जा और चेतना का संचरण
✔ वर्षा और प्राकृतिक शक्ति द्वारा जीवन और चेतना का पोषण
✔ साधक का सतत ध्यान और व्रत जीवन और चेतना में समृद्धि लाता है
---
योगिक दृष्टि
✔ ध्यान और प्राणायाम के माध्यम से वाणी और ऊर्जा का विकास
✔ वर्षा और प्राकृतिक तत्वों से मानसिक और शारीरिक शक्ति का संवर्धन
✔ व्रत और साधना द्वारा चेतना का विस्तार और संतुलन
---
मनोवैज्ञानिक संदेश
✔ सतत साधना और ब्राह्मण की व्रतशीलता जीवन में स्थिरता और शक्ति लाती है
✔ ज्ञान और वाणी के पोषण से मानसिक और सामाजिक स्वास्थ्य बढ़ता है
✔ साधक और पर्यावरण के बीच सामंजस्य स्थापित होता है
---
Gaya Vigyan Brahmgyan दृष्टि
विज्ञान कहता है —
व्रत, नियम और प्राकृतिक वर्षा जीवन और ऊर्जा को स्थिर रखते हैं।
ब्रह्मज्ञान कहता है —
साधक और ब्राह्मण के माध्यम से चेतना और ज्ञान का संतुलन
जीवन, स्वास्थ्य और आध्यात्मिक ऊँचाई प्रदान करता है।
दोनों मिलकर कहते हैं —
व्रतशील साधक और प्राकृतिक शक्ति से जीवन, ऊर्जा और चेतना का सर्वोच्च अनुभव संभव है।
---
समग्र निष्कर्ष
अथर्ववेद 4.15.13 का यह मंत्र
व्रतशील ब्राह्मण और वर्षा के माध्यम से
जीवन, ऊर्जा, चेतना और वाणी के सर्वोच्च विकास का संदेश देता है।
✔ व्रतशील ब्राह्मण = ज्ञान और साधना
✔ वर्षा = जीवनदायिनी ऊर्जा
✔ वाणी = चेतना और संचार
✔ मण्डूका = ब्रह्माण्डीय शक्ति
---
English Insight
Throughout the year, the virtuous Brahmins,
observing their vows, let speech and knowledge
be nourished by rain and natural forces.
The Manduka or universal energy ensures this flow,
bringing vitality, wisdom, and consciousness to all beings.
भूमिका
यह मंत्र व्रतशील ब्राह्मणों और वर्षा के माध्यम से
जीवनदायिनी वाणी और प्राणशक्ति का वर्णन करता है।
साधक वर्षा, ब्राह्मण और प्राकृतिक शक्तियों के सहयोग से
संपूर्ण पृथ्वी और जीवन में ऊर्जा, ज्ञान और समृद्धि स्थापित करता है।
---
शब्दार्थ
संवत्सरं = पूरे वर्ष, वार्षिक
शशयाना = चन्द्र की तरह प्रकाशमान, उज्ज्वल
ब्राह्मणा = ब्राह्मण, विद्वान, व्रतशील व्यक्ति
व्रतचारिणः = व्रत पालन करने वाले
वाचं = वाणी, शब्द और ज्ञान
पर्जन्यजिन्विताम् = वर्षा द्वारा पोषित
प्र = प्रकट
मण्डूका = ऋषि वर्ग या प्रतीकात्मक शक्ति
अवादिषुः = उच्चारित, उद्घाटित
---
सरल अर्थ
व्रतशील ब्राह्मण पूरे वर्ष
वाणी और ज्ञान को वर्षा और प्राकृतिक शक्ति से पोषित करते हैं।
इससे पृथ्वी और जीवों में ऊर्जा, जीवन शक्ति और चेतना का प्रवाह होता है।
मण्डूका या ब्रह्माण्डीय शक्ति इसे सभी तक पहुँचाने में सहायता करती है।
---
वैज्ञानिक और दार्शनिक संकेत
✔ व्रतशील ब्राह्मण = ध्यान, साधना और ज्ञान का प्रतीक
✔ वर्षा = जीवन और ऊर्जा का स्रोत
✔ वाणी = चेतना और ज्ञान का माध्यम
✔ मण्डूका = ब्रह्माण्डीय शक्ति और ऊर्जा का संचालक
---
आध्यात्मिक अर्थ
✔ ब्राह्मण और साधक के माध्यम से ऊर्जा और चेतना का संचरण
✔ वर्षा और प्राकृतिक शक्ति द्वारा जीवन और चेतना का पोषण
✔ साधक का सतत ध्यान और व्रत जीवन और चेतना में समृद्धि लाता है
---
योगिक दृष्टि
✔ ध्यान और प्राणायाम के माध्यम से वाणी और ऊर्जा का विकास
✔ वर्षा और प्राकृतिक तत्वों से मानसिक और शारीरिक शक्ति का संवर्धन
✔ व्रत और साधना द्वारा चेतना का विस्तार और संतुलन
---
मनोवैज्ञानिक संदेश
✔ सतत साधना और ब्राह्मण की व्रतशीलता जीवन में स्थिरता और शक्ति लाती है
✔ ज्ञान और वाणी के पोषण से मानसिक और सामाजिक स्वास्थ्य बढ़ता है
✔ साधक और पर्यावरण के बीच सामंजस्य स्थापित होता है
---
Gaya Vigyan Brahmgyan दृष्टि
विज्ञान कहता है —
व्रत, नियम और प्राकृतिक वर्षा जीवन और ऊर्जा को स्थिर रखते हैं।
ब्रह्मज्ञान कहता है —
साधक और ब्राह्मण के माध्यम से चेतना और ज्ञान का संतुलन
जीवन, स्वास्थ्य और आध्यात्मिक ऊँचाई प्रदान करता है।
दोनों मिलकर कहते हैं —
व्रतशील साधक और प्राकृतिक शक्ति से जीवन, ऊर्जा और चेतना का सर्वोच्च अनुभव संभव है।
---
समग्र निष्कर्ष
अथर्ववेद 4.15.13 का यह मंत्र
व्रतशील ब्राह्मण और वर्षा के माध्यम से
जीवन, ऊर्जा, चेतना और वाणी के सर्वोच्च विकास का संदेश देता है।
✔ व्रतशील ब्राह्मण = ज्ञान और साधना
✔ वर्षा = जीवनदायिनी ऊर्जा
✔ वाणी = चेतना और संचार
✔ मण्डूका = ब्रह्माण्डीय शक्ति
---
English Insight
Throughout the year, the virtuous Brahmins,
observing their vows, let speech and knowledge
be nourished by rain and natural forces.
The Manduka or universal energy ensures this flow,
bringing vitality, wisdom, and consciousness to all beings.
भूमिका
यह मंत्र वर्षा, मण्डूका (ऋषि शक्ति) और ह्रदय में ऊर्जा प्रवाह का वर्णन करता है।
साधक मण्डूका के निर्देश और वर्षा के माध्यम से
ह्रदय और चेतना में चारों दिशाओं में ऊर्जा का संचलन अनुभव करता है।
यह मंत्र जीवन और चेतना में संतुलन और समृद्धि का संदेश देता है।
---
शब्दार्थ
उपप्रवद = निर्देशित किया, मार्ग दिखाया
मण्डूकि = ऋषि वर्ग या प्रतीकात्मक शक्ति
वर्षमा = वर्षा, वर्षा से उत्पन्न ऊर्जा
वद = वाणी, उद्घोषित करना
तादुरि = उस प्रकार, वैसा ही
मध्ये = बीच में, ह्रदय में
ह्रदस्य = ह्रदय, अंतरंग केंद्र
प्लवस्व = प्रवाहित हो, बहा
विगृह्य = फैलाकर, खोलकर
चतुरः पदः = चारों पद, चारों दिशाओं में
---
सरल अर्थ
मण्डूका की निर्देशित शक्ति के अनुसार वर्षा की ऊर्जा
ह्रदय और चेतना में प्रवाहित होती है।
साधक इसे चारों दिशाओं में फैलाकर संतुलित करता है।
यह ह्रदय में स्थिरता, ऊर्जा और चेतना के विस्तार का प्रतीक है।
---
वैज्ञानिक और दार्शनिक संकेत
✔ मण्डूका = ब्रह्माण्डीय ऊर्जा और जागरूक शक्ति
✔ वर्षा = प्राकृतिक और जीवनदायिनी ऊर्जा
✔ ह्रदय = चेतना और ऊर्जा का केंद्र
✔ चारों दिशाएँ = ऊर्जा का संतुलन और प्रवाह
यह मंत्र दिखाता है कि जीवन और चेतना में संतुलित ऊर्जा
प्राकृतिक और ब्रह्माण्डीय शक्तियों के मार्गदर्शन से संभव है।
---
आध्यात्मिक अर्थ
✔ मण्डूका और वर्षा के माध्यम से ह्रदय और चेतना का विकास
✔ चारों दिशाओं में ऊर्जा का प्रवाह
✔ साधक के ह्रदय में चेतना और ऊर्जा का संतुलन
---
योगिक दृष्टि
✔ ध्यान और प्राणायाम में ह्रदय केंद्र और ऊर्जा प्रवाह का अनुभव
✔ चारों दिशाओं में चेतना का विस्तार
✔ वर्षा और ब्रह्माण्डीय ऊर्जा के सहयोग से मानसिक और आध्यात्मिक शक्ति का संवर्धन
---
मनोवैज्ञानिक संदेश
✔ ह्रदय और चेतना में संतुलित ऊर्जा मानसिक स्थिरता और शक्ति बढ़ाती है
✔ चारों दिशाओं में ऊर्जा का प्रवाह जीवन में सामंजस्य लाता है
✔ साधक का मानसिक और आध्यात्मिक विकास होता है
---
Gaya Vigyan Brahmgyan दृष्टि
विज्ञान कहता है —
ह्रदय और ऊर्जा केंद्र में संतुलित ऊर्जा
जीवन शक्ति, स्वास्थ्य और मानसिक संतुलन बढ़ाती है।
ब्रह्मज्ञान कहता है —
मण्डूका और वर्षा के मार्गदर्शन से
ह्रदय में चेतना और ऊर्जा का सर्वोच्च संतुलन संभव है।
दोनों मिलकर कहते हैं —
संतुलित ह्रदय और चेतना से जीवन, शक्ति और आध्यात्मिक अनुभव का सर्वोच्च स्तर प्राप्त होता है।
---
समग्र निष्कर्ष
अथर्ववेद 4.15.14 का यह मंत्र
मण्डूका और वर्षा के माध्यम से
ह्रदय और चेतना में ऊर्जा का प्रवाह और संतुलन स्थापित करने का संदेश देता है।
✔ मण्डूका = ब्रह्माण्डीय शक्ति
✔ वर्षा = जीवनदायिनी ऊर्जा
✔ ह्रदय = चेतना और ऊर्जा केंद्र
✔ चारों दिशाएँ = ऊर्जा का संतुलन
---
English Insight
Through the guidance of Manduka, the energy of rain flows
into the heart, spreading in four directions.
This establishes balance, vitality, and consciousness,
bringing harmony and spiritual expansion to the practitioner.
भूमिका
यह मंत्र वर्षा, पितरों और मरुद्गणों के सहयोग से
मन और ह्रदय की पूर्ति और समृद्धि का वर्णन करता है।
साधक पितरों और प्राकृतिक शक्तियों के मार्गदर्शन से
हृदय और मन में ऊर्जा, इच्छा और चेतना का विकास करता है।
---
शब्दार्थ
खण्वखा = एक प्रकार का ऋषि वर्ग या ऊर्जा प्रवाह
खैमखा = विशेष ऊर्जा या शक्ति वर्ग
मध्ये = बीच में, ह्रदय या चेतना केंद्र में
तदुरि = उसी प्रकार, वैसा ही
वर्षं = वर्षा, जीवनदायिनी ऊर्जा
वनुध्वं = वन और पृथ्वी पर फैलाना, वितरण करना
पितरो = पूर्वज, पितृ शक्ति, ऊर्जा स्रोत
मरुतां = मरुद्गण, वायुदेवता की शक्ति
मन इच्छत = मन की इच्छा के अनुसार, संतुलन और विकास
---
सरल अर्थ
साधक खण्वखा और खैमखा ऊर्जा केंद्रों के मार्गदर्शन में
वर्षा की ऊर्जा को हृदय और मन में प्रवाहित करता है।
पितरों और मरुद्गणों की सहायता से
मन की इच्छाएँ पूरी होती हैं और चेतना में संतुलन आता है।
---
वैज्ञानिक और दार्शनिक संकेत
✔ खण्वखा और खैमखा = चेतना और ऊर्जा के केंद्र
✔ वर्षा = जीवन और शक्ति का स्रोत
✔ पितरो = पूर्वजों की चेतना और मार्गदर्शन
✔ मरुतां = प्राकृतिक और ब्रह्माण्डीय शक्ति
✔ मन इच्छत = मानसिक और आध्यात्मिक संतुलन
यह मंत्र दर्शाता है कि जीवन और चेतना का सर्वोच्च विकास
पूर्वजों और प्राकृतिक शक्तियों के सहयोग से संभव है।
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आध्यात्मिक अर्थ
✔ हृदय और मन में ऊर्जा और चेतना का संतुलन
✔ पितरों और मरुद्गणों से मार्गदर्शन
✔ साधक का मानसिक और आध्यात्मिक विकास
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योगिक दृष्टि
✔ ध्यान और प्राणायाम में हृदय और चेतना केंद्र का विकास
✔ वर्षा और प्राकृतिक शक्तियों का समन्वय
✔ मानसिक इच्छाओं और चेतना का संतुलन
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मनोवैज्ञानिक संदेश
✔ पूर्वजों और प्राकृतिक शक्ति से मानसिक और आध्यात्मिक संतुलन
✔ मन की इच्छाओं का संतुलित और सकारात्मक विकास
✔ जीवन और चेतना में सामंजस्य और स्थायीत्व
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Gaya Vigyan Brahmgyan दृष्टि
विज्ञान कहता है —
प्राकृतिक ऊर्जा और पूर्वजों के मार्गदर्शन से
हृदय और मन की शक्ति बढ़ती है।
ब्रह्मज्ञान कहता है —
साधक और पितरों के सहयोग से
चेतना, ऊर्जा और इच्छाओं का सर्वोच्च संतुलन संभव है।
दोनों मिलकर कहते हैं —
संतुलित हृदय और मन से जीवन, शक्ति और चेतना का सर्वोच्च अनुभव प्राप्त होता है।
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समग्र निष्कर्ष
अथर्ववेद 4.15.15 का यह मंत्र
वर्षा, पितरों और मरुद्गणों के सहयोग से
हृदय, मन और चेतना में ऊर्जा और संतुलन स्थापित करने का संदेश देता है।
✔ खण्वखा और खैमखा = चेतना और ऊर्जा केंद्र
✔ वर्षा = जीवन और शक्ति
✔ पितरो = पूर्वजों की मार्गदर्शक शक्ति
✔ मरुदां = प्राकृतिक शक्ति
✔ मन इच्छत = मानसिक और आध्यात्मिक संतुलन
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English Insight
Through the guidance of Khṇvakhā and Khaimakhā,
rain energy flows into the heart and mind.
With the support of ancestors (Pitaras) and the Marut forces,
the practitioner attains balance, fulfills desires,
and cultivates consciousness, vitality, and mental harmony.
भूमिका
यह मंत्र वर्षा, यज्ञ और ओषधियों के माध्यम से
आनंद, ऊर्जा और जीवन शक्ति के प्रवाह का वर्णन करता है।
साधक यज्ञ, प्राकृतिक शक्ति और औषधियों के सहयोग से
हृदय, मन और शरीर में आनंद और चेतना का विकास करता है।
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शब्दार्थ
महान्तं = महान, व्यापक, विशाल
कोशम् = ऊर्जा, शक्ति का भंडार
उदचाभि = बाहर निकलना, प्रवाहित होना
षिञ्च = छिड़कना, वितरित करना
सविद्युतं = विद्युत के समान तेजस्वी, ऊर्जा
भवतु = हो, स्थापित हो
वातु वातः = वायु और जीवन शक्ति
तन्वतां = फैल जाए, विस्तृत हो
यज्ञं = यज्ञ, धार्मिक और आध्यात्मिक क्रिया
बहुधा = अनेक प्रकार से
विसृष्टा = फैलाया गया
आनन्दिनी = आनंद देने वाली
रोषधयो = औषधियाँ, जीवनदायिनी शक्तियाँ
भवन्तु = हों, स्थापित हों
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सरल अर्थ
साधक यज्ञ, वर्षा और औषधियों के माध्यम से
महान ऊर्जा और आनंद का प्रवाह फैलाता है।
वायु और यज्ञ शक्ति हृदय, मन और शरीर में
ऊर्जा और चेतना का संतुलन स्थापित करती है।
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वैज्ञानिक और दार्शनिक संकेत
✔ कोशम् = ऊर्जा भंडार, जैविक और मानसिक शक्ति
✔ विद्युत और वातु = सक्रिय ऊर्जा और चेतना
✔ यज्ञ और औषधियाँ = ऊर्जा प्रवाह का माध्यम
✔ आनंदिनी = मानसिक और आध्यात्मिक प्रसन्नता
यह दर्शाता है कि जीवन और चेतना का विकास
ऊर्जा, यज्ञ और प्राकृतिक शक्तियों के सहयोग से संभव है।
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आध्यात्मिक अर्थ
✔ यज्ञ और प्राकृतिक शक्ति के माध्यम से चेतना का विस्तार
✔ हृदय और मन में आनंद और ऊर्जा का संचार
✔ साधक का मानसिक और आध्यात्मिक विकास
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योगिक दृष्टि
✔ यज्ञ, ध्यान और प्राणायाम में ऊर्जा का संतुलित प्रवाह
✔ औषधियों और प्राकृतिक तत्वों से शरीर और मन का पोषण
✔ आनंद और चेतना का समेकित विकास
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मनोवैज्ञानिक संदेश
✔ संतुलित ऊर्जा और आनंद मानसिक शक्ति बढ़ाते हैं
✔ प्राकृतिक और आध्यात्मिक तत्वों का सहयोग जीवन में सामंजस्य लाता है
✔ साधक का मन, शरीर और चेतना एकीकृत होते हैं
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Gaya Vigyan Brahmgyan दृष्टि
विज्ञान कहता है —
ऊर्जा का संतुलित प्रवाह शरीर, मन और चेतना को स्वस्थ और सक्रिय बनाता है।
ब्रह्मज्ञान कहता है —
यज्ञ, औषधियों और प्राकृतिक शक्तियों के माध्यम से
आनंद और चेतना का सर्वोच्च विकास संभव है।
दोनों मिलकर कहते हैं —
संतुलित ऊर्जा और प्राकृतिक सहयोग से चेतना का उच्चतम अनुभव प्राप्त होता है।
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समग्र निष्कर्ष
अथर्ववेद 4.15.16 का यह मंत्र
यज्ञ, वर्षा और औषधियों के माध्यम से
ऊर्जा, आनंद और चेतना का संतुलित प्रवाह स्थापित करने का संदेश देता है।
✔ कोशम् = ऊर्जा भंडार
✔ विद्युत और वातु = सक्रिय ऊर्जा
✔ यज्ञ = आध्यात्मिक क्रिया
✔ रोषधयः = औषधियाँ
✔ आनंदिनी = मानसिक और आध्यात्मिक प्रसन्नता
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English Insight
Through Yajna, rain, and medicinal herbs,
the practitioner spreads vast energy and vitality.
Air and Yajna forces flow through the heart and mind,
bringing joy, balanced consciousness, and spiritual expansion.
दुःखजन्मप्रवृत्तिदोषमिथ्याज्ञानानामुत्तरोत्तरापाये तदनन्तरापायादपवर्गः II1/1/2 न्यायदर्शन
अर्थ : तत्वज्ञान से मिथ्या ज्ञान का नाश हो जाता है और मिथ्या ज्ञान के नाश से राग द्वेषादि दोषों का नाश हो जाता है, दोषों के नाश से प्रवृत्ति का नाश हो जाता है। प्रवृत्ति के नाश होने से कर्म बन्द हो जाते हैं। कर्म के न होने से प्रारम्भ का बनना बन्द हो जाता है, प्रारम्भ के न होने से जन्म-मरण नहीं होते और जन्म मरण ही न हुए तो दुःख-सुख किस प्रकार हो सकता है। क्योंकि दुःख तब ही तक रह सकता है जब तक मन है। और मन में जब तक राग-द्वेष रहते हैं तब तक ही सम्पूर्ण काम चलते रहते हैं।
क्योंकि जिन अवस्थाओं में मन हीन विद्यमान हो उनमें दुःख सुख हो ही नहीं सकते । क्योंकि दुःख के रहने का स्थान मन है। मन जिस वस्तु को आत्मा के अनुकूल समझता है उसके प्राप्त करने की इच्छा करता है। इसी का नाम राग है। यदि वह जिस वस्तु से प्यार करता है यदि मिल जाती है तो वह सुख मानता है। यदि नहीं मिलती तो दुःख मानता है। जिस वस्तु की मन इच्छा करता है उसके प्राप्त करने के लिए दो प्रकार के कर्म होते हैं। या तो हिंसा व चोरी करता है या दूसरों का उपकार व दान आदि सुकर्म करता है। सुकर्म का फल सुख और दुष्कर्मों का फल दुःख होता है परन्तु जब तक दुःख सुख दोनों का भोग न हो तब तक मनुष्य शरीर नहीं मिल सकता !
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