जीवन का उद्देश्य

दुःखजन्मप्रवृत्तिदोषमिथ्याज्ञानानामुत्तरोत्तरापाये तदनन्तरापायादपवर्गः II1/1/2 न्यायदर्शन अर्थ : तत्वज्ञान से मिथ्या ज्ञान का नाश हो जाता है और मिथ्या ज्ञान के नाश से राग द्वेषादि दोषों का नाश हो जाता है, दोषों के नाश से प्रवृत्ति का नाश हो जाता है। प्रवृत्ति के नाश होने से कर्म बन्द हो जाते हैं। कर्म के न होने से प्रारम्भ का बनना बन्द हो जाता है, प्रारम्भ के न होने से जन्म-मरण नहीं होते और जन्म मरण ही न हुए तो दुःख-सुख किस प्रकार हो सकता है। क्योंकि दुःख तब ही तक रह सकता है जब तक मन है। और मन में जब तक राग-द्वेष रहते हैं तब तक ही सम्पूर्ण काम चलते रहते हैं। क्योंकि जिन अवस्थाओं में मन हीन विद्यमान हो उनमें दुःख सुख हो ही नहीं सकते । क्योंकि दुःख के रहने का स्थान मन है। मन जिस वस्तु को आत्मा के अनुकूल समझता है उसके प्राप्त करने की इच्छा करता है। इसी का नाम राग है। यदि वह जिस वस्तु से प्यार करता है यदि मिल जाती है तो वह सुख मानता है। यदि नहीं मिलती तो दुःख मानता है। जिस वस्तु की मन इच्छा करता है उसके प्राप्त करने के लिए दो प्रकार के कर्म होते हैं। या तो हिंसा व चोरी करता है या दूसरों का उपकार व दान आदि सुकर्म करता है। सुकर्म का फल सुख और दुष्कर्मों का फल दुःख होता है परन्तु जब तक दुःख सुख दोनों का भोग न हो तब तक मनुष्य शरीर नहीं मिल सकता !

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MK PANDEY PRESIDNT OF GVB

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Nirvanastakam by Shankracharya



यह कहानी बहुत ही प्रेरणादायक है और यह दिखाती है कि कैसे एक छोटा बालक अपने समय का सबसे बड़ा दार्शनिक बना।

वह ऐतिहासिक मिलन

यह बात तब की है जब आदि शंकराचार्य केवल 8 वर्ष के थे। वे अपने गुरु की खोज में नर्मदा नदी के तट पर पहुँचे। वहाँ एक गुफा में महर्षि गोविंद भगवत्पाद समाधि में लीन थे।

जब बालक शंकर गुफा के द्वार पर पहुँचे, तो गुरु ने समाधि से जागने के बाद उनसे एक सीधा सा सवाल पूछा:

> "कोऽसि त्वम्?" (तुम कौन हो?)
उत्तर में 'निर्वाणषट्कम्' का जन्म

एक साधारण बच्चा अपना नाम, अपने पिता का नाम या अपने गाँव का पता बताता। लेकिन शंकर एक साधारण बालक नहीं थे। उन्होंने अपना परिचय किसी भौतिक पहचान से नहीं दिया, बल्कि तुरंत वहीं इन छह श्लोकों की रचना कर दी, जिन्हें आज हम 'निर्वाणषट्कम्' के नाम से जानते हैं।

उन्होंने कहा:

 * "न मैं मन हूँ, न बुद्धि, न अहंकार।"
 * "न मैं शरीर हूँ, न इंद्रियाँ।"
 * "मैं केवल शिव (परम चेतना) हूँ।"

गुरु का प्रभाव

यह उत्तर सुनकर गोविंद भगवत्पाद समझ गए कि यह कोई साधारण बालक नहीं, बल्कि साक्षात ईश्वर का अंश है। उन्होंने शंकर को स्वीकार किया और उन्हें अद्वैत वेदांत की शिक्षा दी। यही बालक आगे चलकर जगतगुरु आदि शंकराचार्य कहलाए, जिन्होंने पूरे भारत में सनातन धर्म का पुनरुत्थान किया।

इस कहानी का सार

यह स्तोत्र हमें सिखाता है कि जब हम दुनिया के शोर और अपनी 'पहचान' (Identity) के बोझ से थक जाएँ, तो हमें बस इतना याद रखना चाहिए कि हम इन सब से बड़े हैं।

"शिवोऽहम्" का अर्थ यह नहीं है कि हम भगवान होने का दावा कर रहे हैं, बल्कि यह कि हमारे भीतर का 'आत्म-तत्व' उतना ही शुद्ध और अनंत है जितना कि शिव।


न में द्वेषरागौ न लोभो न मोहो मदो नैव मात्सर्य्यमान्। न धर्मो न चार्थे न कामो न मोक्षश्चिदानन्दरूपः शिवऽहं शिवऽहम्।।1।।
न पुण्यं न पापं न सौख्यं न दुःखं न मंत्रो न तीर्थो नवेदा न यज्ञाः। अहं भोजनंनैव भोज्यं न भोक्ता श्चिदानन्दरूपः शिवऽहं शिवऽहम्।।2।। 
न में मृत्युशंङका न में जातिभेदः पिता नैव माता न जन्म। न बन्धुर्न मित्रं गुरुनैंव शिष्य श्चिदानन्दरूपः शिवऽहं शिवऽहम्।।3।।

    यह मंत्र आदि शंकराचार्य द्वारा रचित 'निर्वाणषट्कम्' (Nirvana Shatakam) के शुरुआती अंश हैं। इसमें वे आत्मा के वास्तविक स्वरूप का वर्णन करते हुए बताते हैं कि आत्मा भौतिक और सांसारिक बंधनों से पूरी तरह परे है।

यहाँ इसका हिंदी अनुवाद और भावार्थ दिया गया है:
निर्वाणषट्कम्: हिंदी अनुवाद

श्लोक 1

न मे द्वेषरागौ न लोभो न मोहो मदो नैव मात्सर्यभावः। न धर्मो न चार्थो न कामो न मोक्षश्चिदानन्दरूपः शिवोऽहं शिवोऽहम्।।

अनुवाद:

न मुझे किसी से द्वेष (घृणा) है, न किसी के प्रति अनुराग (लगाव) है। न मुझे लोभ है और न ही मोह। मुझमें न मद (अहंकार) है और न ही ईर्ष्या (मात्सर्य) का भाव है। यहाँ तक कि मैं धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष (चार पुरुषार्थ) के बंधनों से भी मुक्त हूँ। मैं केवल चैतन्य, आनंदमय स्वरूप हूँ, मैं शिव हूँ, मैं शिव हूँ।

श्लोक 2

न पुण्यं न पापं न सौख्यं न दुःखं न मन्त्रो न तीर्थं न वेदा न यज्ञाः। अहं भोजनं नैव भोज्यं न भोक्ता चिदानन्दरूपः शिवोऽहं शिवोऽहम्।।
अनुवाद:

मैं पुण्य और पाप से परे हूँ; मुझे न सुख स्पर्श करता है और न दुःख। मुझे न मंत्रों की आवश्यकता है, न तीर्थों की, न वेदों की और न ही यज्ञों की। मैं न 'भोजन' (अनुभव) हूँ, न 'भोज्य' (उपभोग की वस्तु) हूँ और न ही 'भोक्ता' (उपभोग करने वाला) हूँ। मैं शुद्ध चेतना और आनंद का स्वरूप हूँ, मैं शिव हूँ, मैं शिव हूँ।

श्लोक 3

न मृत्युर्न शङ्का न मे जातिभेदः पिता नैव मे नैव माता न जन्म। न बन्धुर्न मित्रं गुरुर्नैव शिष्यश्चिदानन्दरूपः शिवोऽहं शिवोऽहम्।।

अनुवाद:

मुझे न मृत्यु का भय है और न ही अपनी पहचान को लेकर कोई शंका। मुझमें जाति का कोई भेद नहीं है। मेरा न कोई पिता है, न माता है और न ही मेरा कोई जन्म हुआ है। न मेरा कोई भाई-बंधु है, न मित्र है, न ही मेरा कोई गुरु है और न ही कोई शिष्य। मैं केवल ज्ञान और आनंद का स्वरूप हूँ, मैं शिव हूँ, मैं शिव हूँ।

संक्षेप में भावार्थ

इन पंक्तियों के माध्यम से शंकराचार्य यह समझाना चाहते हैं कि मनुष्य का वास्तविक स्वरूप शरीर, मन या रिश्तों में नहीं है। हम अक्सर खुद को अपनी भावनाओं (क्रोध, लोभ) या अपनी सामाजिक भूमिकाओं (बेटा, दोस्त) से पहचानते हैं, लेकिन आत्मा इन सब से "असंग" (अछूती) है। वह केवल सच्चिदानंद (सत्य, चित्त और आनंद) है।

 शेष तीन श्लोक निर्वाणषट्कम् को पूर्ण करते हैं और अद्वैत वेदांत की गहराई को और स्पष्ट करते हैं। यहाँ उनका हिंदी अनुवाद और भावार्थ दिया गया है:

निर्वाणषट्कम्: शेष श्लोक

श्लोक 4

न मृत्युर्न शंका न मे जातिभेदः पिता नैव मे नैव माता न जन्म। न बन्धुर्न मित्रं गुरुर्नैव शिष्यश्चिदानन्दरूपः शिवोऽहं शिवोऽहम्।।

 (नोट: यह वही श्लोक है ऊपर तीसरे नंबर पर लिखा था, यह शरीर और संबंधों के अभाव को दर्शाता है।)

श्लोक 5

न प्राणसंज्ञो न वै पञ्चवायुः न वा सप्तधातुः न वा पञ्चकोशः। न वाक्पाणिपादौ न चोपस्थपायू चिदानन्दरूपः शिवोऽहं शिवोऽहम्।।

अनुवाद:

मैं न प्राण हूँ और न ही पाँच प्रकार की वायु (प्राण, अपान, व्यान, उदान, समान) हूँ। मैं न शरीर की सात धातुएँ (रस, रक्त, मांस, मेद, अस्थि, मज्जा, शुक्र) हूँ और न ही पाँच कोश (अन्नमय, प्राणमय, मनोमय, विज्ञानमय, आनंदमय) हूँ। मैं न वाणी हूँ, न हाथ, न पैर और न ही उत्सर्जन की इंद्रियाँ हूँ। मैं केवल चैतन्य और आनंद का स्वरूप हूँ, मैं शिव हूँ।

श्लोक 6

अहं निर्विकल्पो निराकाररूपो विभुत्वाच्च सर्वत्र सर्वेन्द्रियाणाम्। न चासङ्गतं नैव मुक्तिर्न मेयः चिदानन्दरूपः शिवोऽहं शिवोऽहम्।।

अनुवाद:

मैं निर्विकल्प (बिना किसी बदलाव के) और निराकार हूँ। मैं सर्वव्यापी हूँ और समस्त इंद्रियों के पीछे व्याप्त चेतना हूँ। मैं न किसी बंधन में हूँ और न ही मुझे मुक्ति की लालसा है क्योंकि मैं मुक्त ही हूँ। मेरा कोई माप (अंत) नहीं है। मैं केवल ज्ञान और आनंद का स्वरूप हूँ, मैं शिव हूँ, मैं शिव हूँ।

निष्कर्ष

अंतिम श्लोक में शंकराचार्य जी स्पष्ट करते हैं कि हम वह 'चेतना' हैं जो हर जगह मौजूद है। जब वे कहते हैं "शिवोऽहम्", तो उनका अर्थ भगवान शिव (मूर्ति रूप) से नहीं, बल्कि उस कल्याणकारी परम तत्व से है जो शांत और शाश्वत है।

 आदि शंकराचार्य ने यहाँ मनुष्य के स्थूल (Physical) और सूक्ष्म (Subtle) शरीर की संरचना को नकारते हुए आत्मा की सर्वोच्चता बताई है।

आइए, इन कठिन शब्दों को सरल भाषा में समझते हैं:

1. पञ्चवायु (Five Vital Airs)

हमारे शरीर के भीतर प्राण शक्ति पाँच रूपों में कार्य करती है, जिन्हें 'पञ्चप्राण' भी कहते हैं:

 * प्राण: श्वसन क्रिया (साँस लेना)।
 * अपान: शरीर से अपशिष्ट (Waste) बाहर निकालना।
 * समान: पाचन और भोजन से ऊर्जा बनाना।
 * व्यान: पूरे शरीर में रक्त और ऊर्जा का संचार।
 * उदान: विचार, वाणी और मृत्यु के समय सूक्ष्म शरीर का निकलना।
> अर्थ: शंकराचार्य कहते हैं कि मैं यह 'प्राण शक्ति' भी नहीं हूँ, मैं इससे परे की चेतना हूँ।

2. सप्तधातु (Seven Body Tissues)

आयुर्वेद के अनुसार हमारा भौतिक शरीर सात तत्वों से बना है:

 * रस (Plasma/Chyle)
 * रक्त (Blood)
 * मांस (Muscle)
 * मेद (Fat)
 * अस्थि (Bone)
 * मज्जा (Bone Marrow)
 * शुक्र (Reproductive fluid)

> अर्थ: मैं यह हाड़-माँस का शरीर (Physical body) भी नहीं हूँ।

3. पञ्चकोश (Five Sheaths/Layers)
वेदांत के अनुसार, आत्मा पाँच परतों या 'कोशों' के भीतर ढकी होती है:

 * अन्नमय कोश: भोजन से बना भौतिक शरीर।
 * प्राणमय कोश: प्राण और ऊर्जा का स्तर।
 * मनोमय कोश: मन, विचार और भावनाएँ।
 * विज्ञानमय कोश: बुद्धि और विवेक।
 * आनन्दमय कोश: सूक्ष्म आनंद की अवस्था (अज्ञानता की अंतिम परत)।

> अर्थ: आत्मा इन पाँचों परतों से अलग और स्वतंत्र है।
4. निर्विकल्प और निराकार

 * निर्विकल्प (Devoid of Change/Duality): जिसे बदला न जा सके, जिसमें कोई दूसरा विकल्प या द्वैत न हो। जो स्थिर है।

 * निराकार (Formless): जिसका कोई आकार, रंग या सीमा नहीं है। जैसे आकाश का कोई आकार नहीं होता, वैसे ही आत्मा अनंत है।

एक दिलचस्प बात:

जब हम कहते हैं "चिदानन्दरूपः", तो यह तीन शब्दों से बना है: चित् (चेतना) + आनन्द (परम सुख) + रूप (स्वरूप)। यानी "मैं वह हूँ जिसका स्वरूप ही ज्ञान और आनंद है।"



 

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