कणाद - वैशेषिक दर्शन 7.2
कणाद - वैशेषिक दर्शन 7.2 (31 सूत्र)
रूपरसगन्धस्पर्शव्यतिरेकादर्थान्तरं एकत्वं तथा पृथक्त्वम्
अर्थ : रूप, रस, गन्ध, स्पर्श के भेद से अर्थान्तर में एकत्व और पृथक्त्व का ज्ञान।
तयोर्नित्यत्वानित्यत्वे तेजसो रूपस्पर्शाभ्यां व्याख्याते
अर्थ : तेज और रूप- स्पर्श के माध्यम से नित्य और अनित्य का ज्ञान।
निष्पत्तिश्च
अर्थ : निष्पत्ति (उत्पत्ति) का ज्ञान।
एकत्वपृथक्त्वयोरेकत्वपृथक्त्वाभावो
अर्थ : एकत्व और पृथक्त्व का अभाव।
कर्मभिः कर्माणि गुणैर्गुणाः
अर्थ : कर्मों द्वारा कर्म, गुणों द्वारा गुण।
निःसंख्यत्वात्कर्मगुणानां सर्वैकत्वं न विद्यते
अर्थ : कर्म और गुणों का सर्वैकत्व नहीं होता।
एकत्वस्याभावाद्भाक्तं न विद्यते
अर्थ : एकत्व के अभाव से भक्ति नहीं होती।
कार्यकारणैकत्वपृथक्त्वाभावादेकत्वपृथक्त्वे न विद्येते
अर्थ : कार्य और कारण के एकत्व और पृथक्त्व अभाव में ज्ञान नहीं।
एतदनित्यनितयोर्व्याख्यातम्
अर्थ : नित्य और अनित्य का व्याख्यान।
अन्यतरकर्मज उभयकर्मजः संयोगजश्च संयोगः
अर्थ : अन्यतरकर्म, उभयकर्म और संयोग का वर्णन।
एतेन विभागो व्याख्यातः
अर्थ : विभाग का ज्ञान इसी से।
संयोगविभागयोः संयोगविभागाभावोऽणुत्वमहत्त्वाभ्यां व्याख्यातः
अर्थ : संयोग और विभाग का अभाव अणु और महत्त्व से व्याख्यायित।
कर्मभिः कर्माणि गुणैर्गुणाः
अर्थ : कर्मों द्वारा कर्म और गुणों द्वारा गुण।
युतसिद्ध्यभावातार्क्यकारणयोः संयोगविभागौ न विद्येते
अर्थ : युतसिद्ध्यभाव और कारण/कार्य से संयोग और विभाग का ज्ञान नहीं।
गुणत्वात्
अर्थ : गुणत्व के कारण।
गुणे च भाष्यते
अर्थ : गुण का वर्णन।
निष्क्रियत्वात्
अर्थ : निष्क्रिय होने के कारण।
असति नास्तीति च प्रयोगात्
अर्थ : असत और नास्ति के प्रयोग से।
शब्दार्थावसंबद्धौ
अर्थ : शब्द और अर्थ के संबंध में।
संयोगिनो दण्डात्समवायिनो विषाणाच्च
अर्थ : संयोग और समवाय के उदाहरण।
दृष्टत्वादहेतुः प्रत्ययः
अर्थ : दृष्ट होने के कारण प्रत्यय।
तथा प्रत्ययाभावः
अर्थ : प्रत्यय का अभाव।
संबद्धसंबन्धादिति चेत्सन्देहः
अर्थ : संबंध और संबद्धता में संदेह।
सामयिकः शब्दादर्थप्रत्ययः
अर्थ : शब्द और अर्थ प्रत्यय का सामयिक ज्ञान।
एकदिक्कालाभ्यां सन्निकृष्टविप्रकृष्टाभ्यां परं अपरम्
अर्थ : एक-दिक-कालाभ्यां सन्निकृष्ट और विप्रकृष्ट ज्ञान।
कारणपरत्वात्कारणापरत्वाच्च
अर्थ : कारण के परत्व और अपरत्व से।
परत्वापरत्वयोः परत्वापरत्वाभावोऽणुत्वमहत्त्वाभ्यां व्याख्यातः
अर्थ : परत्व और अपरत्व अभाव का अणु और महत्त्व से ज्ञान।
कर्मभिः कर्माणि गुणैर्गुणाः
अर्थ : कर्म और गुण का ज्ञान।
इहेति यतः कार्यकारणयोः स समवायः
अर्थ : कार्य और कारण का समवाय।
द्रव्यत्वगुणत्वकर्मत्वप्रतिषेधो भावेन व्याख्यातः
अर्थ : द्रव्य, गुण और कर्म का प्रतिषेध भाव से।
तत्त्वं च
अर्थ : तत्त्व का ज्ञान।
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