कणाद - वैशेषिक दर्शन 6.1
कणाद - वैशेषिक दर्शन 6.1 (18 सूत्र)
बुद्धिपूर्वा वाक्यकृतिर्वेदे
अर्थ : बुद्धि द्वारा पूर्वक वाक्य की रचना वेद में की जाती है।
न चास्मद्बुद्धिभ्यो लिङ्गं ऋषेः
अर्थ : ऋषि का लक्षण किसी की बुद्धि से नहीं ज्ञात होता।
तथा ब्राह्मणे संज्ञाकर्मसिद्धिर्लिङ्गम्
अर्थ : ब्राह्मण में संज्ञाकर्म सिद्धि ही लक्षण कहलाती है।
बुद्धिपूर्वो ददातिः
अर्थ : बुद्धि पूर्वक दिया हुआ ही कर्म कहलाता है।
तथा प्रतिग्रहः
अर्थ : इसी प्रकार प्रतिग्रह (संग्रह) भी लक्षण है।
तयोः क्रमो यथानितरेतराङ्गभूतानाम्
अर्थ : दोनों का क्रम यथानितर अंगभूतों के अनुसार होता है।
आत्मगुणेष्वात्मान्तरगुणानां अकारणत्वात्
अर्थ : आत्म गुण और आत्मांतर गुणों में अकारणत्व पाया जाता है।
अदुष्टभोजनात्समभिव्याहारतोऽभ्युदयः
अर्थ : अधर्मपूर्ण भोजन के कारण समभिव्याहार से अभ्युदय होता है।
तद्दुष्टभोजने न विद्यते
अर्थ : दुष्ट भोजन से यह प्रभाव नहीं होता।
दुष्टं हिंसायाम्
अर्थ : दुष्टता हिंसा में प्रकट होती है।
समभिव्याहारतो दोषः
अर्थ : समभिव्याहार से दोष उत्पन्न होता है।
तददुष्टे न विद्यते
अर्थ : दुष्ट होने पर यह दोष नहीं पाया जाता।
विशिष्टे प्रवृत्तिः
अर्थ : विशिष्ट में प्रवृत्ति का होना लक्षण है।
समे हीने चाप्रवृत्तिः
अर्थ : समान और हीन में प्रवृत्ति नहीं होती।
एतेन हीनसमविशिष्टधार्मिकेभ्यः परादानं व्याख्यातम्
अर्थ : हीन, सम और विशिष्ट धार्मिकों के परदान से यह व्याख्यात होता है।
तथा विरुद्धानां त्यागः
अर्थ : इसके विपरीत वालों का त्याग भी लक्षण है।
सम आत्मत्यागः परत्यागो वा
अर्थ : सम आत्मत्याग या परत्याग भी व्याख्यात होता है।
विशिष्टे आत्मत्यागः
अर्थ : विशिष्ट में आत्मत्याग ही लक्षण है।
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