ये सतोत्र्भ्यो गोग्रामश्वपेशसमग्ने रातिमुपस्र्जन्ति सूरयः ।
अस्माञ्च तांश्च पर हि नेषि वस्य आ बर्हद वदेम विदथे सुवीराः |यह ऋग्वैदिक अग्नि-स्तुति का वह भाग है जहाँ यज्ञ, दान, वाणी और सामाजिक कल्याण एक साथ आते हैं।
ये स्तोत्र्भ्यो गोग्रामश्वपेशसम्
अग्ने रातिमुपसृजन्ति सूरयः |
अस्माञ्च तांश्च प्र हि नेषि वस्य
आ बृहद् वदेम विदथे सुवीराः ||
ये – जो
स्तोत्र्भ्यः – स्तुति करने वालों को
गो-ग्राम-अश्व-पेशसम् – गायों, समूहों, घोड़ों और समृद्धि से युक्त
अग्ने – हे अग्नि
रातिम् – दान, कृपा, संपत्ति
उपसृजन्ति – प्रदान करते हैं
सूरयः – ज्ञानी, दानी, उदार पुरुष
अस्मान् च – हमें भी
तान् च – उन्हें भी
प्र हि नेषि – निश्चय ही आगे ले जाते हो
वस्य – श्रेष्ठ पथ की ओर
आ बृहद् वदेम – हम महान वाणी बोलें
विदथे – सभा/यज्ञ/लोककल्याण के अवसर पर
सुवीराः – श्रेष्ठ वीरों से युक्त होकर
हे अग्नि!
जो उदार और ज्ञानी लोग
स्तुति करने वालों को
गाय, अश्व और समृद्धि का दान देते हैं—
उन सबको और हमें भी
तुम श्रेष्ठ मार्ग पर आगे ले जाते हो।
ऐसी कृपा से युक्त होकर
हम समाज के मध्य
महान वाणी बोलें
और श्रेष्ठ, तेजस्वी संतानों से युक्त हों।
रातिम् उपसृजन्ति सूरयः
वेद में दान कोई सामाजिक मजबूरी नहीं— यह चेतना की गति है।
गो–ग्राम–अश्व–पेशसम्
यह केवल पशु नहीं:
👉 यानी पूर्ण जीवन-संपदा
प्र हि नेषि वस्य
अग्नि यहाँ मार्गदर्शक है— वह बताती है:
आ बृहद् वदेम विदथे
वेद में—
👉 समाज वही बनता है
जो उसकी वाणी होती है।
सुवीराः
सुवीर का अर्थ:
यह मंत्र कहता है:
यह मंत्र जप योग्य है जब:
जो देता है, वही बढ़ता है;
और जिसे अग्नि आगे ले जाए—
वही समाज का मार्गदर्शक बनता है।
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