तवं तान सं च परति चासि मज्मनाग्ने सुजात पर च देवरिच्यसे | पर्क्षो यदत्र महिना वि ते भुवदनु दयावाप्र्थिवी रोदसी उभे ||
तवं तान् सं च प्रति चासि मज्मना
अग्ने सुजात प्र च देवरिच्यसे |
पर्क्षो यदत्र महिना वि ते भुवद्
अनु द्यावापृथिवी रोदसी उभे ||
तवं – तुम
तान् – उन्हें (सभी को)
सं च प्रति च – भीतर भी और बाहर भी, आगे-पीछे
असि मज्मना – अपने सामर्थ्य/तेज से व्याप्त हो
अग्ने – हे अग्नि!
सुजात – उत्तम रूप से उत्पन्न, पवित्र
प्र च – और आगे भी
देवरिच्यसे – देवताओं में महिमावान होते हो
पर्क्षः – वृद्धि / विस्तार
यद् अत्र – जब यहाँ
महिना – अपने महान तेज से
वि ते भुवत् – तुम्हारा विस्तार होता है
अनु – उसके अनुसार
द्यावापृथिवी – आकाश और पृथ्वी
रोदसी उभे – दोनों लोक
हे उत्तम जन्म वाले अग्नि!
तुम अपने तेज से
सबके भीतर भी और बाहर भी
सर्वत्र व्याप्त हो।
जब तुम अपने महान सामर्थ्य से
यहाँ विस्तार करते हो,
तो आकाश और पृथ्वी—
दोनों लोक तुम्हारे अनुसार
व्यवस्थित और प्रकाशित हो जाते हैं।
सं च प्रति च असि
अग्नि केवल बाहरी आग नहीं—
वह भीतर की चेतना भी है।
👉 जो भीतर प्रज्वलित नहीं,
वह बाहर स्थिर नहीं रह सकता।
अग्ने सुजात
यह संकेत है कि
हर शक्ति का जन्म शुद्ध स्रोत से होना चाहिए।
देवरिच्यसे
अग्नि देवों के बीच भी
अधिक प्रभावशाली है, क्योंकि—
👉 वही देवों को देव बनाता है
(यज्ञ, कर्म, समर्पण के द्वारा)
अनु द्यावापृथिवी रोदसी उभे
जब अग्नि संतुलित होती है—
दोनों संतुलन में आ जाते हैं।
👉 भीतर का संतुलन = ब्रह्मांडीय संतुलन
यह मंत्र कहता है:
👉 Agni = Core Engine of Reality
इस मंत्र का जप/चिंतन उपयोगी है जब:
अग्नि जब भीतर जागती है,
तो आकाश और पृथ्वी भी
उसके अनुसार चलने लगते हैं।
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