मीमांसा दर्शन सूत्र 3.4.1 हिन्दी-अंग्रेज़ी व्याख्या
मीमांसा दर्शन – अध्याय 3.4.1
हिन्दी एवं English Explanation
३.४.१ — निवीताम् इति मनुष्यधर्मः शब्दस्य तत्प्रधानत्वात्
हिन्दी: मनुष्य के धर्म और कर्तव्य का निर्णय शब्द की प्रधानता के आधार पर किया जाता है।
English: Human duties are determined based on the primacy of verbal injunctions.
३.४.२ — अपदेशो वार्थस्य विद्यमानतत्त्वात्
हिन्दी: किसी वचन या नियम के विरोध का विचार केवल तब किया जाता है जब अर्थ वास्तविक रूप में उपस्थित हो।
English: Contradictions are considered only if the meaning is actually present.
३.४.३ — विधिस्तवर्पूर्वत्वात् स्यात्
हिन्दी: नियम और विधान का प्राथमिकता क्रम उसके पूर्वत्व से निर्धारित होती है।
English: The priority of injunctions is established based on their precedence.
३.४.४ — स प्रायात् कर्मधर्मः स्यात्
हिन्दी: यह कार्य और धर्म के अनुसार प्रायोगिक रूप में होता है।
English: It applies practically in accordance with action and duty.
३.४.५ — वाक्यशेषत्वात्
हिन्दी: वाक्य का शेषत्व, यानी अंतिम अर्थ का महत्व, निर्णय में शामिल होता है।
English: The completeness of the sentence, i.e., the final meaning, is considered in the determination.
३.४.६ — तत्प्रकरणे यत् तत् संयुक्तम् अविप्रतिषेधात्
हिन्दी: जिस प्रकरण में यह संयुक्त है, उसमें प्रतिरोध न होने के कारण लागू होता है।
English: In the context where it is combined, it applies due to absence of opposition.
३.४.७ — तत्प्रधाने वा तुल्यवत् प्रसंख्यानाद् इतरस्य तदर्थत्वात्
हिन्दी: प्रमुख वचन के समान अन्य वाक्यों के अर्थ भी उसकी प्रधानता से समान रूप में माना जाता है।
English: Other sentences are considered equivalent in meaning, similar to the primary injunction.
३.४.८ — अर्थवादो वा प्रकरणात्
हिन्दी: प्रकरण में अर्थवाद या निष्कर्ष का विचार किया जाता है।
English: The interpretation or conclusion is derived from the context.
३.४.९ — विधिना चैकवाक्यत्वात्
हिन्दी: नियम के अनुसार एक ही वाक्य का महत्व सर्वोपरि होता है।
English: By the rule, the singular sentence is considered supreme.
३.४.१० — दिग्विभागश् च तद्वत् सम्बन्धस्यार्थहेतुत्वात्
हिन्दी: दिशाओं और विभाजनों में संबंध और अर्थ का कारण समान रूप में देखा जाता है।
English: In directions and divisions, the connection and purpose are considered uniform.
३.४.११ — परुषि दितपूर्णघृतविदग्धं च तद्वत्
हिन्दी: कठिन और परिष्कृत कर्मों के लिए भी यही नियम लागू होता है।
English: The same rule applies to difficult and refined actions.
३.४.१२ — अकर्म क्रतुसंयुक्तं संयोगान् नित्यानुवादः स्यात्
हिन्दी: अकर्म और क्रतु के संयुक्त कर्मों में भी नित्य अनुवाद (लगातार पालन) होता है।
English: In combined actions of inaction and rites, continuous application is considered.
३.४.१३ — विधिर् वा संयोगान्तरात्
हिन्दी: नियम संयुक्त कर्मों के अंतर्गत ही आता है।
English: The rule applies within the context of combined actions.
३.४.१४ — अहीनवत् पुरुषस् तदर्थत्वात्
हिन्दी: पुरुष के लिए भी नियम उसी अर्थ में लागू होता है।
English: For humans as well, the injunction applies in the same sense.
३.४.१५ — प्रकरणविशेषाद् वा तद्युक्तस्य संस्कारो द्रव्यवत्
हिन्दी: किसी प्रकरण विशेष में लागू संस्कार का प्रभाव उसी वस्तु के समान माना जाता है।
English: In a particular context, the effect of the prescribed rite is considered like the object itself.
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