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जीवन का उद्देश्य

दुःखजन्मप्रवृत्तिदोषमिथ्याज्ञानानामुत्तरोत्तरापाये तदनन्तरापायादपवर्गः II1/1/2 न्यायदर्शन अर्थ : तत्वज्ञान से मिथ्या ज्ञान का नाश हो जाता है और मिथ्या ज्ञान के नाश से राग द्वेषादि दोषों का नाश हो जाता है, दोषों के नाश से प्रवृत्ति का नाश हो जाता है। प्रवृत्ति के नाश होने से कर्म बन्द हो जाते हैं। कर्म के न होने से प्रारम्भ का बनना बन्द हो जाता है, प्रारम्भ के न होने से जन्म-मरण नहीं होते और जन्म मरण ही न हुए तो दुःख-सुख किस प्रकार हो सकता है। क्योंकि दुःख तब ही तक रह सकता है जब तक मन है। और मन में जब तक राग-द्वेष रहते हैं तब तक ही सम्पूर्ण काम चलते रहते हैं। क्योंकि जिन अवस्थाओं में मन हीन विद्यमान हो उनमें दुःख सुख हो ही नहीं सकते । क्योंकि दुःख के रहने का स्थान मन है। मन जिस वस्तु को आत्मा के अनुकूल समझता है उसके प्राप्त करने की इच्छा करता है। इसी का नाम राग है। यदि वह जिस वस्तु से प्यार करता है यदि मिल जाती है तो वह सुख मानता है। यदि नहीं मिलती तो दुःख मानता है। जिस वस्तु की मन इच्छा करता है उसके प्राप्त करने के लिए दो प्रकार के कर्म होते हैं। या तो हिंसा व चोरी करता है या दूसरों का उपकार व दान आदि सुकर्म करता है। सुकर्म का फल सुख और दुष्कर्मों का फल दुःख होता है परन्तु जब तक दुःख सुख दोनों का भोग न हो तब तक मनुष्य शरीर नहीं मिल सकता !

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Gyan Vigyan Brhamgyan (GVB the university of veda)

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AtharvaVeda kand 3 Sukta 24

 

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पयस्वतीः = दुग्धयुक्त, पोषण देने वाली ओषधयः = औषधियाँ, वनस्पतियाँ पयस्वन् = पोषणयुक्त, दुग्ध से परिपूर्ण मामकं = मेरा वचः = वचन, प्रार्थना अथो = और भी, इसके अतिरिक्त पयस्वतीनाम् = पोषण देने वाली (औषधियों) का आ भरे = मैं धारण करूँ, ग्रहण करूँ अहं = मैं सहस्रशः = हजारों प्रकार से, विपुल मात्रा में

हिन्दी व्याख्या

इस मन्त्र में यज्ञकर्ता पोषण देने वाली औषधियों से प्रार्थना करता है कि वे उसके वचनों को भी पोषणयुक्त और प्रभावशाली बना दें। यहाँ “पयस्वतीः ओषधयः” का अर्थ है ऐसी वनस्पतियाँ जो दुग्ध के समान जीवनदायिनी और पुष्टिकारक हों। वे केवल शरीर को ही नहीं, बल्कि वाणी, विचार और संकल्प को भी शक्ति प्रदान करें। “पयस्वन् मामकं वचः” का आशय है कि मेरी वाणी मधुर, प्रभावी, सत्य और जीवनदायी हो। वैदिक दृष्टि में वाणी को सृजनात्मक शक्ति माना गया है। जिस प्रकार दूध शरीर का पोषण करता है, उसी प्रकार सत्यमय और शुभ वाणी समाज और आत्मा का पोषण करती है। “अथो पयस्वतीनाम् आ भरेऽहं सहस्रशः” का अर्थ है कि मैं इन पोषण देने वाली शक्तियों को हजारों प्रकार से अपने जीवन में धारण करूँ। यह केवल भौतिक आहार की बात नहीं है, बल्कि मानसिक, आध्यात्मिक और सामाजिक पोषण की भी कामना है। ज्ञान–विज्ञान–ब्रह्मज्ञान:
  • ज्ञान: यह मन्त्र सिखाता है कि जीवन में पोषण केवल भोजन से नहीं, बल्कि विचार और वाणी से भी मिलता है।
  • विज्ञान: औषधियाँ और वनस्पतियाँ शरीर को आवश्यक पोषक तत्व देती हैं। संतुलित आहार स्वास्थ्य और संतति दोनों के लिए आवश्यक है।
  • ब्रह्मज्ञान: वाणी को ब्रह्म की अभिव्यक्ति माना गया है। जब वाणी शुद्ध और पोषक होती है, तब वह सृष्टि में सकारात्मक ऊर्जा का संचार करती है।

English Explanation

In this mantra, the practitioner invokes the nourishing herbs to make his speech equally nourishing and powerful. “Payasvatī Oṣadhayaḥ” refers to life-sustaining, milk-like nourishing plants. They are requested not only to strengthen the body but also to enrich speech, thoughts, and intentions. “Payasvan Māmakaṁ Vacaḥ” implies: may my words be filled with nourishment—truthful, sweet, and life-supporting. In Vedic thought, speech is a creative force. Just as milk nourishes the body, truthful and benevolent speech nourishes society and the soul. “Atho Payasvatīnām ā Bhare’ham Sahasraśaḥ” expresses the desire to imbibe these nourishing energies in thousands of ways—physically, mentally, spiritually, and socially. Knowledge–Science–Brahma-Gyan:
  • Knowledge: True nourishment comes not only from food but also from positive thoughts and speech.
  • Science: Herbs and plants provide essential nutrients for health and vitality.
  • Brahma-Gyan: Speech is considered an expression of divine consciousness. When purified, it becomes a channel of creative and spiritual energy.

Word by Word

वेद अहम् = मैं जानता हूँ पयस्वन्तम् = पोषणयुक्त, समृद्ध चकार = बनाया, उत्पन्न किया धान्यम् = अन्न, अनाज बहु = बहुत, प्रचुर मात्रा में संभृत्वा = संग्रहित, संचित करके नाम = नाम से, पहचान से यः = जो देवः = देवता तम् = उस (देव को) वयम् = हम हवामहे = आह्वान करते हैं, पुकारते हैं योयो = जो भी अयज्वनः = यज्ञ न करने वाला, अर्पण न करने वाला गृहे = घर में

हिन्दी व्याख्या (लगभग 500 शब्द)

इस मन्त्र में ऋषि कहते हैं—“मैं जानता हूँ उस देवता को जिसने पोषणयुक्त और प्रचुर धान्य उत्पन्न किया है।” यहाँ “पयस्वन्तं धान्यम्” का अर्थ है ऐसा अन्न जो केवल मात्रा में अधिक न हो, बल्कि पोषण, ऊर्जा और जीवनशक्ति से परिपूर्ण हो। वैदिक संस्कृति में अन्न को ‘अन्नं ब्रह्म’ कहा गया है, क्योंकि अन्न ही प्राणियों के जीवन का आधार है। “संभृत्वा नाम यो देवः”—अर्थात् वह देवता जो संचित शक्ति और पोषण का अधिष्ठाता है, जिसका नाम और स्वरूप समृद्धि से जुड़ा है। यज्ञकर्ता कहता है कि हम उस देवता का आह्वान करते हैं। यहाँ आह्वान का तात्पर्य केवल धार्मिक अनुष्ठान नहीं, बल्कि कृतज्ञता, श्रम, और प्राकृतिक नियमों के सम्मान से है। “योयो अयज्वनो गृहे”—यह वाक्य विशेष ध्यान देने योग्य है। इसका आशय यह है कि जहाँ यज्ञभाव (अर्थात् त्याग, समर्पण, कृतज्ञता और श्रम) नहीं होता, वहाँ समृद्धि स्थायी नहीं रहती। अयज्वन वह है जो केवल उपभोग करता है परन्तु अर्पण नहीं करता। वैदिक दृष्टि में समृद्धि का आधार संतुलन है—प्राप्ति और दान दोनों का। यह मन्त्र हमें सिखाता है कि अन्न और धन केवल भौतिक वस्तुएँ नहीं हैं, बल्कि दिव्य अनुग्रह और मानव श्रम के सम्मिलित फल हैं। यदि घर में यज्ञभाव—अर्थात् कर्तव्य, परिश्रम, नैतिकता और कृतज्ञता—हो, तो वहाँ धान्य और पोषण की वृद्धि होती है। इस प्रकार मन्त्र केवल अन्न की कामना नहीं करता, बल्कि उस चेतना का आह्वान करता है जो समृद्धि का स्रोत है। यह हमें स्मरण कराता है कि जीवन में वास्तविक पोषण तभी संभव है जब हम प्रकृति, देवत्व और समाज के प्रति संतुलित दृष्टि रखें। ज्ञान–विज्ञान–ब्रह्मज्ञान:
  • ज्ञान: समृद्धि का मूल कर्तव्य और कृतज्ञता में है। अन्न केवल उपभोग की वस्तु नहीं, बल्कि जीवन का आधार है।
  • विज्ञान: धान्य उत्पादन कृषि, जल, सूर्य और श्रम के समन्वय से होता है। संतुलित पारिस्थितिकी और श्रम से ही भरपूर फसल संभव है।
  • ब्रह्मज्ञान: अन्न और समृद्धि ब्रह्म की अभिव्यक्ति हैं। जब मनुष्य यज्ञभाव से कार्य करता है, तो वह ब्रह्मीय नियमों के अनुरूप चलता है और समृद्धि प्राप्त करता है।

English Explanation

In this mantra, the seer declares: “I know the deity who has produced abundant and nourishing grain.” “Payasvantam Dhānyam” signifies grain that is not merely plentiful but rich in vitality and sustenance. In Vedic thought, food is sacred—“Annam Brahma”—for it sustains life itself. The mantra invokes the deity associated with nourishment and abundance. The phrase “yo yo ayajvano gṛhe” highlights that prosperity does not remain where there is no spirit of sacrifice, gratitude, and offering. True wealth arises where effort, balance, and reverence for natural law exist. Knowledge–Science–Brahma-Gyan:
  • Knowledge: Prosperity is rooted in responsibility and gratitude.
  • Science: Agriculture depends on ecological balance—sunlight, water, soil, and human effort.
  • Brahma-Gyan: Food and abundance are manifestations of divine order. Acting in harmony with cosmic law ensures lasting prosperity.

Word by Word

इमाः = ये याः = जो पञ्च = पाँच प्रदिशः = दिशाएँ मानवीः = मानवों से संबंधित, मानव समाज पञ्च = पाँच कृष्टयः = जातियाँ, समुदाय, कृषक वर्ग वृष्टे = वर्षा होने पर शापम् = अभाव, विपत्ति, कष्ट (यहाँ सूखा या संकट भाव में) नदीः इव = नदियों के समान इह = यहाँ स्फातिम् = वृद्धि, समृद्धि, विस्तार सम् आवहान् = एकत्र लाएँ, बुलाएँ

हिन्दी व्याख्या (लगभग 500 शब्द)

इस मन्त्र में ऋषि समस्त दिशाओं और मानव समुदायों को संबोधित करते हुए समृद्धि की प्रार्थना करते हैं। “इमा याः पञ्च प्रदिशः” से अभिप्राय है पूर्व, पश्चिम, उत्तर, दक्षिण और ऊर्ध्व—ये पाँच दिशाएँ। “पञ्च कृष्टयः” का अर्थ है मानव समाज के विविध वर्ग या समुदाय। वैदिक काल में ‘कृष्टि’ शब्द कृषक समुदाय या जनसमूह के लिए प्रयुक्त होता था। मन्त्र का भाव है कि जैसे वर्षा होने पर नदियाँ भरकर एकत्र होती हैं और भूमि को उर्वर बनाती हैं, वैसे ही समस्त दिशाओं और मानव समाजों से समृद्धि यहाँ एकत्र हो। “वृष्टे शापं नदीरिव” का तात्पर्य यह है कि सूखा, अभाव या संकट वर्षा के आने से समाप्त हो जाता है। वर्षा केवल जल नहीं, बल्कि जीवन, आशा और उत्पादन का प्रतीक है। यह मन्त्र सामूहिक समृद्धि की भावना को व्यक्त करता है। केवल एक व्यक्ति या एक क्षेत्र की उन्नति नहीं, बल्कि सभी दिशाओं और सभी समुदायों की समृद्धि यहाँ लक्ष्य है। जब प्रकृति संतुलित होती है—वर्षा समय पर होती है—तो नदियाँ बहती हैं, खेत लहलहाते हैं, और समाज समृद्ध होता है। यहाँ वर्षा और नदी का रूपक अत्यंत महत्वपूर्ण है। वर्षा आकाश से आती है, नदियाँ पृथ्वी पर बहती हैं, और दोनों मिलकर जीवन चक्र को पूर्ण करती हैं। इसी प्रकार, जब समाज में सहयोग, संतुलन और धर्म होता है, तो आर्थिक और सामाजिक समृद्धि स्वाभाविक रूप से प्रवाहित होती है। मन्त्र यह भी सिखाता है कि समृद्धि का स्रोत सामूहिकता में है। पाँच दिशाएँ और पाँच समुदाय मिलकर एकता का प्रतीक हैं। जब सभी मिलकर श्रम, सहयोग और धर्म का पालन करते हैं, तब स्फाति—अर्थात् विस्तार और उन्नति—स्वतः आती है। ज्ञान–विज्ञान–ब्रह्मज्ञान:
  • ज्ञान: समृद्धि व्यक्तिगत नहीं, सामूहिक प्रयास और संतुलन से आती है। सभी दिशाओं और समुदायों की उन्नति ही वास्तविक प्रगति है।
  • विज्ञान: वर्षा चक्र, नदियों का प्रवाह और कृषि का विकास प्राकृतिक विज्ञान के नियमों पर आधारित है। पारिस्थितिकी संतुलन से ही उत्पादन और वृद्धि संभव है।
  • ब्रह्मज्ञान: पाँच दिशाएँ और पाँच समुदाय ब्रह्म की व्यापकता और एकत्व का प्रतीक हैं। जब मनुष्य ब्रह्मीय व्यवस्था के अनुरूप जीवन जीता है, तो समृद्धि स्वाभाविक रूप से प्रवाहित होती है।

English Explanation

This mantra invokes the five directions and the five human communities, praying that prosperity may gather here as rivers swell during rainfall. Just as rain removes drought and brings abundance, so may growth and expansion arise collectively from all quarters. The imagery of rain and rivers signifies natural harmony and collective flourishing. Prosperity is not isolated but shared among all regions and peoples. When ecological balance and social cooperation prevail, abundance flows naturally. Knowledge–Science–Brahma-Gyan:
  • Knowledge: True progress is collective and arises from unity and balance.
  • Science: Rainfall, river systems, and agriculture depend on ecological harmony.
  • Brahma-Gyan: The five directions symbolize the all-pervading Brahman; aligning with cosmic order brings natural prosperity.

Word by Word

एव = इसी प्रकार, ऐसे ही अस्माकम् = हमारा इदम् = यह धान्यम् = अन्न, अनाज सहस्रधारम् = हजारों धाराओं से युक्त, निरंतर प्रवाह वाला अक्षितम् = अक्षय, नष्ट न होने वाला शतहस्त = सौ हाथों वाला (रूपक रूप में) समाहर = एकत्र करो, संग्रह करो सहस्रहस्त = हजार हाथों वाला सं किर = चारों ओर फैलाओ, वितरित करो

हिन्दी व्याख्या (लगभग 500 शब्द)

इस मन्त्र में समृद्धि और अन्न की अक्षय वृद्धि की कामना की गई है। “एवास्माकेदं धान्यं सहस्रधारमक्षितम्”—अर्थात् हमारा यह धान्य हजारों धाराओं से प्रवाहित होने वाला और कभी नष्ट न होने वाला हो। “सहस्रधारम्” का अर्थ है अनेक स्रोतों से आने वाली निरंतर समृद्धि। यह केवल भौतिक अनाज की मात्रा नहीं, बल्कि जीवन में निरंतर प्रवाहमान संपन्नता, ऊर्जा और पोषण का प्रतीक है। “अक्षितम्” शब्द अत्यंत महत्वपूर्ण है—अर्थात् जो क्षय न हो। वैदिक दृष्टि में वास्तविक समृद्धि वही है जो धर्म और संतुलन पर आधारित हो, क्योंकि अधर्म से प्राप्त संपत्ति टिकाऊ नहीं होती। यहाँ यज्ञकर्ता ऐसी संपन्नता चाहता है जो स्थायी, सतत और कल्याणकारी हो। दूसरी पंक्ति—“शतहस्त समाहर सहस्रहस्त सं किर”—बहुत प्रसिद्ध वैदिक वाक्य है। इसका भाव है: “सौ हाथों से एकत्र करो और हजार हाथों से बाँटो।” यहाँ ‘हाथ’ प्रतीक है कर्म और क्षमता का। पहले श्रम और परिश्रम से धन अर्जित करो (शतहस्त समाहर), फिर उदारता और दानशीलता से उसे समाज में बाँटो (सहस्रहस्त सं किर)। यह मन्त्र समृद्धि के संतुलित सिद्धांत को स्थापित करता है—अर्जन और वितरण। केवल संग्रह करने से समाज में असंतुलन उत्पन्न होता है, और केवल बाँटने से स्वयं की क्षमता समाप्त हो सकती है। इसलिए पहले परिश्रमपूर्वक संग्रह और फिर उदारतापूर्वक वितरण—यही वैदिक आर्थिक और नैतिक नीति है। यह मन्त्र हमें यह भी सिखाता है कि अन्न और धन केवल व्यक्तिगत उपभोग के लिए नहीं, बल्कि सामाजिक कल्याण के लिए हैं। जब समाज में दान, सेवा और सहयोग की भावना होती है, तब समृद्धि ‘सहस्रधार’ बन जाती है—हजारों धाराओं में प्रवाहित होकर सबको पोषित करती है। इस प्रकार यह मन्त्र केवल कृषि या धन की वृद्धि की कामना नहीं करता, बल्कि एक उच्च नैतिक और आध्यात्मिक अर्थव्यवस्था का आदर्श प्रस्तुत करता है—जहाँ श्रम, धर्म, दान और संतुलन साथ-साथ चलते हैं। ज्ञान–विज्ञान–ब्रह्मज्ञान:
  • ज्ञान: स्थायी समृद्धि अर्जन और दान के संतुलन से आती है। संग्रह और वितरण दोनों आवश्यक हैं।
  • विज्ञान: उत्पादन (कृषि, श्रम) और वितरण (संसाधन प्रबंधन) के संतुलन से ही आर्थिक स्थिरता संभव है।
  • ब्रह्मज्ञान: ‘सहस्रधार’ ब्रह्म की अनंत शक्ति का प्रतीक है। जब मनुष्य ब्रह्मीय नियम—धर्म, दान और संतुलन—का पालन करता है, तब उसकी संपत्ति अक्षय बनती है।

English Explanation

This mantra prays that our grain be inexhaustible and flow in a thousand streams. “Sahasradhāram Akṣitam” symbolizes abundance from many sources—sustained, continuous, and imperishable prosperity. The second line—“Śatahasta Samāhara Sahasrahasta Saṁkira”—means: “Gather with a hundred hands; distribute with a thousand.” It teaches a profound economic and moral principle: earn diligently, but give generously. Wealth must circulate for collective welfare. Knowledge–Science–Brahma-Gyan:
  • Knowledge: True prosperity lies in balanced earning and generous sharing.
  • Science: Sustainable production and fair distribution ensure economic stability.
  • Brahma-Gyan: The thousand streams symbolize infinite divine abundance; aligning with cosmic law makes prosperity enduring.

Word by Word

शतहस्त = सौ हाथों से (रूपक रूप में) समाहर = एकत्र करो, संग्रह करो सहस्रहस्त = हजार हाथों से सं किर = बिखेरो, वितरित करो कृतस्य = किए हुए, संपन्न कार्य का कार्यस्य = कर्म का, उद्देश्य का च = और इह = यहाँ, इस जीवन में स्फातिम् = वृद्धि, उन्नति, समृद्धि समावह = साथ लाओ, प्राप्त कराओ

हिन्दी व्याख्या (लगभग 500 शब्द)

यह मन्त्र वैदिक जीवन-दर्शन के अत्यंत महत्वपूर्ण सिद्धांत को प्रस्तुत करता है। “शतहस्त समाहर सहस्रहस्त सं किर”—अर्थात् सौ हाथों से एकत्र करो और हजार हाथों से बाँटो। यह केवल काव्यात्मक वाक्य नहीं, बल्कि एक संपूर्ण आर्थिक, सामाजिक और आध्यात्मिक नीति का सूत्र है। “शतहस्त” श्रम, परिश्रम और पुरुषार्थ का प्रतीक है। मनुष्य को परिश्रमपूर्वक धन, अन्न और संसाधनों का अर्जन करना चाहिए। वैदिक परंपरा में आलस्य को दोष और कर्म को धर्म माना गया है। इसलिए पहले परिश्रम से अर्जन—यह आवश्यक है। “सहस्रहस्त सं किर”—हजार हाथों से बाँटो। यहाँ दान, उदारता और सामाजिक उत्तरदायित्व का सिद्धांत है। धन का संग्रह केवल व्यक्तिगत उपभोग के लिए नहीं, बल्कि समाज की उन्नति के लिए होना चाहिए। जब संसाधन समाज में वितरित होते हैं, तब वे पुनः सृजन और विकास के साधन बनते हैं। मन्त्र की दूसरी पंक्ति—“कृतस्य कार्यस्य चेह स्फातिं समावह”—कहती है कि किए हुए कार्यों में यहाँ उन्नति और विस्तार लाओ। अर्थात् जो भी कर्म किया जाए, वह फलदायी और प्रगतिशील हो। केवल कर्म करना पर्याप्त नहीं, बल्कि ऐसा कर्म करना आवश्यक है जिससे समाज और व्यक्ति दोनों की उन्नति हो। यह मन्त्र कर्मयोग का व्यावहारिक रूप है। कर्म करो, श्रम करो, अर्जन करो; परंतु उस अर्जन को समाज के हित में उपयोग करो। इससे न केवल व्यक्तिगत समृद्धि, बल्कि सामूहिक उन्नति भी होती है। आर्थिक दृष्टि से देखें तो यह संसाधनों के सतत उत्पादन और न्यायपूर्ण वितरण का सिद्धांत है। नैतिक दृष्टि से देखें तो यह दान, सेवा और सहयोग का आदर्श है। आध्यात्मिक दृष्टि से देखें तो यह कर्म और यज्ञ का मिलन है—जहाँ हर अर्जन अंततः अर्पण बन जाता है। इस प्रकार यह मन्त्र हमें सिखाता है कि जीवन में सच्ची स्फाति (वृद्धि) तभी आती है जब अर्जन और वितरण दोनों संतुलित हों, और कर्म धर्म के अनुरूप हो। ज्ञान–विज्ञान–ब्रह्मज्ञान:
  • ज्ञान: अर्जन और दान का संतुलन ही स्थायी समृद्धि का आधार है।
  • विज्ञान: संसाधनों का उत्पादन और न्यायपूर्ण वितरण सामाजिक स्थिरता और आर्थिक विकास सुनिश्चित करता है।
  • ब्रह्मज्ञान: जब कर्म यज्ञभाव से किया जाता है, तब वह ब्रह्मीय नियमों के अनुरूप होता है और सच्ची उन्नति प्रदान करता है।

English Explanation

This mantra presents a profound Vedic principle: “Gather with a hundred hands; distribute with a thousand.” It symbolizes diligent effort in earning and even greater generosity in giving. Wealth is to be created through hard work and shared widely for collective welfare. The second line prays: “Bring prosperity and expansion to the work accomplished here.” It teaches that actions should not only be performed but should lead to growth and positive impact. Economically, this reflects sustainable production and fair distribution. Ethically, it upholds generosity and responsibility. Spiritually, it represents Karma-Yoga—where earning becomes an offering and action aligns with cosmic order. Knowledge–Science–Brahma-Gyan:
  • Knowledge: Lasting prosperity comes from balanced earning and sharing.
  • Science: Sustainable production and equitable distribution ensure growth.
  • Brahma-Gyan: When action is performed in the spirit of sacrifice, it aligns with divine law and brings true expansion.

Word by Word

तिस्रः = तीन मात्राः = मात्राएँ, रूप, शक्तियाँ गन्धर्वाणाम् = गन्धर्वों की (संगीत, सौन्दर्य और सूक्ष्म शक्तियों के देवता) चतस्रः = चार गृहपत्न्याः = गृहपत्नी की, गृहिणी की शक्तियाँ तासाम् = उन सब में से या = जो स्फातिमत्तमा = सबसे अधिक उन्नति देने वाली, समृद्धिपूर्ण तया = उसी से त्वा = तुम्हें अभि मृशामसि = स्पर्श करते हैं, आशीर्वाद देते हैं, अभिषेक करते हैं

हिन्दी व्याख्या (लगभग 500 शब्द)

यह मन्त्र अत्यंत प्रतीकात्मक और गूढ़ है। इसमें “तिस्रो मात्रा गन्धर्वाणाम्” और “चतस्रो गृहपत्न्याः” का उल्लेख है। गन्धर्व वैदिक साहित्य में सौन्दर्य, संगीत, सूक्ष्म ज्ञान और मधुरता के प्रतीक हैं। उनकी “तीन मात्राएँ” जीवन के तीन आयामों—शरीर, मन और आत्मा—या भूत, वर्तमान और भविष्य—का संकेत कर सकती हैं। “चतस्रो गृहपत्न्याः” गृहिणी की चार शक्तियों की ओर संकेत करता है—धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष की व्यवस्था; अथवा पालन, पोषण, व्यवस्था और सृजन। गृहिणी वैदिक समाज में केवल घर की संरक्षक नहीं, बल्कि समृद्धि और संतुलन की आधारशिला मानी गई है। मन्त्र का भाव है कि इन सभी शक्तियों में जो सबसे अधिक “स्फातिमत्ता”—अर्थात् उन्नति और समृद्धि देने वाली है—उसी से हम तुम्हारा स्पर्श करते हैं, तुम्हें अभिषिक्त करते हैं। यहाँ “अभि मृशामसि” का अर्थ है शुभ स्पर्श, आशीर्वाद या शक्ति-संचार। यह मन्त्र समृद्धि को केवल भौतिक नहीं मानता। गन्धर्वों की सूक्ष्म और कलात्मक शक्तियाँ तथा गृहिणी की व्यावहारिक और पोषणकारी शक्तियाँ—दोनों मिलकर जीवन को पूर्ण बनाती हैं। जब सौन्दर्य, संगीत, ज्ञान और सद्भाव (गन्धर्व) तथा व्यवस्था, श्रम, प्रेम और पोषण (गृहपत्नी) एक साथ होते हैं, तब सच्ची स्फाति—समग्र उन्नति—प्राप्त होती है। इस मन्त्र का एक गहरा सामाजिक संदेश भी है। परिवार और समाज की उन्नति के लिए पुरुष और स्त्री दोनों की शक्तियों का संतुलन आवश्यक है। केवल बाहरी संपत्ति पर्याप्त नहीं; घर की शांति, प्रेम, संस्कृति और कला भी उतनी ही महत्वपूर्ण हैं। आध्यात्मिक दृष्टि से यह मन्त्र सूक्ष्म और स्थूल शक्तियों के संतुलन का प्रतीक है। गन्धर्व सूक्ष्म, प्रेरणात्मक और कलात्मक ऊर्जा का प्रतिनिधित्व करते हैं; गृहपत्नी स्थूल, व्यावहारिक और पोषणकारी ऊर्जा का। इन दोनों के मेल से जीवन में सच्ची समृद्धि आती है। ज्ञान–विज्ञान–ब्रह्मज्ञान:
  • ज्ञान: समृद्धि केवल धन नहीं, बल्कि सौन्दर्य, संस्कृति, प्रेम और संतुलन का परिणाम है।
  • विज्ञान: सामाजिक और पारिवारिक स्थिरता के लिए मानसिक, भावनात्मक और भौतिक संतुलन आवश्यक है।
  • ब्रह्मज्ञान: सूक्ष्म (आध्यात्मिक) और स्थूल (भौतिक) शक्तियों का संतुलन ही ब्रह्मीय पूर्णता है। जब दोनों का समन्वय होता है, तब सच्ची स्फाति प्राप्त होती है।

English Explanation

This mantra symbolically refers to the “three measures of the Gandharvas” and the “four powers of the housewife.” The Gandharvas represent beauty, music, subtle wisdom, and harmony. The housewife symbolizes nurturing, order, prosperity, and domestic stability. Among these powers, the one that brings the greatest prosperity is invoked to bless and touch the individual. The mantra teaches that true growth arises from the harmony of subtle inspiration and practical nurturing forces. Knowledge–Science–Brahma-Gyan:
  • Knowledge: Prosperity includes culture, harmony, and emotional balance—not merely wealth.
  • Science: Family and social stability depend on psychological and material balance.
  • Brahma-Gyan: True fullness arises from the union of subtle spiritual energy and practical material order.

Word by Word

उपोहः = निकट लाने वाला, संकलन करने वाला च = और समूहः = एकत्र करने वाला, संगठित करने वाला च = और क्षत्तारौ = संरक्षक, व्यवस्थापक, संचालक (दो अधिकारी) ते = तेरे, आपके प्रजापते = हे प्रजापति (सृष्टिकर्ता, पालनकर्ता) तौ = वे दोनों इह = यहाँ वहताम् = लाएँ, पहुँचाएँ स्फातिम् = वृद्धि, उन्नति, समृद्धि बहुम् = बहुत, विपुल भूमानम् = व्यापकता, महान विस्तार अक्षितम् = अक्षय, अविनाशी

हिन्दी व्याख्या (लगभग 500 शब्द)

यह मन्त्र “प्रजापति” को संबोधित है, जो सृष्टि के नियंता और पालनकर्ता माने जाते हैं। यहाँ “उपोह” और “समूह” दो शक्तियों या व्यवस्थाओं के रूप में वर्णित हैं। “उपोह” का अर्थ है निकट लाना, संग्रह करना, अवसरों और संसाधनों को अपने पास लाना। “समूह” का अर्थ है उन संसाधनों को संगठित करना, सुव्यवस्थित करना और सामूहिक शक्ति में बदलना। मन्त्र कहता है—हे प्रजापति! ये दोनों व्यवस्थापक (क्षत्तारौ) यहाँ हमारे लिए विपुल, व्यापक और अक्षय समृद्धि लाएँ। “क्षत्तारौ” शब्द प्रशासन, संरक्षण और संचालन की शक्ति का प्रतीक है। केवल संसाधन प्राप्त करना पर्याप्त नहीं; उनका संरक्षण, संगठन और उचित प्रबंधन भी आवश्यक है। “बहुं भूमानम् अक्षितम्”—अर्थात् ऐसी समृद्धि जो केवल अधिक मात्रा में न हो, बल्कि व्यापक, स्थायी और अविनाशी हो। यह वैदिक अर्थशास्त्र का गहरा सिद्धांत है—संसाधनों का सतत विकास और उनका संतुलित उपयोग। यह मन्त्र बताता है कि समृद्धि के लिए दो मुख्य तत्व आवश्यक हैं: (1) संसाधनों का अर्जन (उपोह), (2) उनका संगठन और प्रबंधन (समूह)। यदि अर्जन हो पर संगठन न हो, तो अव्यवस्था उत्पन्न होती है। यदि संगठन हो पर अर्जन न हो, तो ठहराव आता है। इसलिए दोनों का संतुलन ही स्फाति (वृद्धि) का कारण है। आध्यात्मिक दृष्टि से “उपोह” का अर्थ शुभ विचारों और सद्गुणों को अपने निकट लाना, और “समूह” का अर्थ उन गुणों को जीवन में स्थिर करना है। जब मनुष्य अपने भीतर सकारात्मक शक्तियों को एकत्र और व्यवस्थित करता है, तब उसके जीवन में स्थायी उन्नति आती है। सामाजिक दृष्टि से यह मन्त्र शासन, परिवार और समाज—तीनों के लिए नीति प्रस्तुत करता है। संसाधनों का सही संग्रह और सुचारु प्रबंधन ही दीर्घकालीन समृद्धि का आधार है। इस प्रकार मन्त्र केवल भौतिक धन की नहीं, बल्कि सुव्यवस्थित, संतुलित और अक्षय समृद्धि की कामना करता है। ज्ञान–विज्ञान–ब्रह्मज्ञान:
  • ज्ञान: अर्जन और संगठन—दोनों समृद्धि के लिए आवश्यक हैं।
  • विज्ञान: संसाधन प्रबंधन, संरक्षण और सुव्यवस्थित वितरण से सतत विकास संभव है।
  • ब्रह्मज्ञान: जब मनुष्य अपनी आंतरिक और बाहरी शक्तियों को संतुलित करता है, तब वह ब्रह्मीय व्यवस्था के अनुरूप होकर अक्षय उन्नति प्राप्त करता है।

English Explanation

This mantra addresses Prajāpati, invoking the powers of “Upoh” (bringing near, acquiring resources) and “Samūh” (organizing and consolidating them). These two administrators are requested to bring abundant, expansive, and imperishable prosperity here. It teaches that prosperity requires both acquisition and organization. Without proper management, resources are wasted; without acquisition, there is stagnation. Balanced integration of both leads to lasting growth. Knowledge–Science–Brahma-Gyan:
  • Knowledge: Prosperity depends on both earning and organizing resources.
  • Science: Sustainable development requires effective resource management.
  • Brahma-Gyan: Harmonizing inner and outer forces aligns one with cosmic order, bringing enduring abundance.

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