दुःखजन्मप्रवृत्तिदोषमिथ्याज्ञानानामुत्तरोत्तरापाये तदनन्तरापायादपवर्गः II1/1/2 न्यायदर्शन
अर्थ : तत्वज्ञान से मिथ्या ज्ञान का नाश हो जाता है और मिथ्या ज्ञान के नाश से राग द्वेषादि दोषों का नाश हो जाता है, दोषों के नाश से प्रवृत्ति का नाश हो जाता है। प्रवृत्ति के नाश होने से कर्म बन्द हो जाते हैं। कर्म के न होने से प्रारम्भ का बनना बन्द हो जाता है, प्रारम्भ के न होने से जन्म-मरण नहीं होते और जन्म मरण ही न हुए तो दुःख-सुख किस प्रकार हो सकता है। क्योंकि दुःख तब ही तक रह सकता है जब तक मन है। और मन में जब तक राग-द्वेष रहते हैं तब तक ही सम्पूर्ण काम चलते रहते हैं।
क्योंकि जिन अवस्थाओं में मन हीन विद्यमान हो उनमें दुःख सुख हो ही नहीं सकते । क्योंकि दुःख के रहने का स्थान मन है। मन जिस वस्तु को आत्मा के अनुकूल समझता है उसके प्राप्त करने की इच्छा करता है। इसी का नाम राग है। यदि वह जिस वस्तु से प्यार करता है यदि मिल जाती है तो वह सुख मानता है। यदि नहीं मिलती तो दुःख मानता है। जिस वस्तु की मन इच्छा करता है उसके प्राप्त करने के लिए दो प्रकार के कर्म होते हैं। या तो हिंसा व चोरी करता है या दूसरों का उपकार व दान आदि सुकर्म करता है। सुकर्म का फल सुख और दुष्कर्मों का फल दुःख होता है परन्तु जब तक दुःख सुख दोनों का भोग न हो तब तक मनुष्य शरीर नहीं मिल सकता !
ये = जो
अस्याम् = इस (दिशा) में
स्थ = स्थित हैं
प्राच्याम् दिशि = पूर्व दिशा में
हेतयः नाम = ‘हेतय’ नामक
देवाः = देवता
तेषाम् = उन (देवताओं) के
वः = तुम
अग्निः = अग्नि
इषवः = बाण हैं
ते = वे
नः = हमें
मृडत = कृपा करें, अनुकूल हों
ते = वे
नः अधि ब्रूत = हमारे पक्ष में बोलें, हमारा समर्थन करें
तेभ्यः = उन देवताओं को
वः नमः = तुम्हें नमस्कार
तेभ्यः वः स्वाहा = उन सबको स्वाहा (आहुति अर्पित है)
हिन्दी व्याख्या (लगभग 500 शब्द)
यह मन्त्र दिशाओं में स्थित देवशक्तियों को संबोधित करता है। यहाँ विशेष रूप से “प्राची दिशा”—पूर्व दिशा—का उल्लेख है। वैदिक परंपरा में पूर्व दिशा ज्ञान, प्रकाश और आरंभ का प्रतीक है, क्योंकि सूर्य का उदय वहीं से होता है।
“हेतयः नाम देवाः”—हेतय नामक देवता। ‘हेत’ का अर्थ शस्त्र या बाण भी होता है। यह संकेत है कि ये देवशक्तियाँ रक्षक हैं, जो आवश्यकता पड़ने पर दंडात्मक शक्ति का प्रयोग भी कर सकती हैं।
“तेषां वो अग्निरिषवः”—उनके बाण अग्नि हैं। अग्नि वैदिक धर्म में शुद्धि, ऊर्जा और रूपांतरण का प्रतीक है। अग्नि यहाँ दैवी न्याय और शक्ति का प्रतिनिधित्व करती है।
मन्त्र में प्रार्थना की गई है—“ते नो मृडत”—वे हमारे प्रति कृपालु हों। “ते नो अधि ब्रूत”—वे हमारे पक्ष में बोलें। यह अत्यंत सुंदर भाव है—दैवी शक्तियाँ केवल दंड देने वाली नहीं, बल्कि संरक्षण और समर्थन देने वाली भी हैं।
“तेभ्यो वः नमः, तेभ्यो वः स्वाहा”—उन सबको नमस्कार और आहुति अर्पित है। यहाँ नमस्कार श्रद्धा का और स्वाहा यज्ञीय समर्पण का प्रतीक है।
दार्शनिक दृष्टि से यह मन्त्र हमें सिखाता है कि प्रकृति और ब्रह्मांड की शक्तियों के प्रति आदर और समर्पण आवश्यक है। जब मनुष्य प्रकृति के नियमों के अनुसार चलता है, तो वे शक्तियाँ उसके अनुकूल हो जाती हैं।
पूर्व दिशा ज्ञान और आरंभ का प्रतीक है, इसलिए यह मन्त्र जीवन के नए आरंभ में दैवी अनुकूलता की प्रार्थना भी हो सकता है।
आध्यात्मिक अर्थ में “अग्नि के बाण” अंतःकरण की शुद्धि का संकेत हैं। यदि मनुष्य अधर्म से हटकर धर्म के मार्ग पर चले, तो वही अग्नि उसे शुद्ध और समर्थ बनाती है।
इस प्रकार यह मन्त्र दैवी शक्तियों के प्रति विनम्रता, समर्पण और संरक्षण की कामना का सुंदर उदाहरण है।
ज्ञान–विज्ञान–ब्रह्मज्ञान:
ज्ञान: प्रकृति और दैवी शक्तियों के प्रति सम्मान जीवन में संतुलन लाता है।
विज्ञान: प्राकृतिक नियमों के अनुरूप जीवन जीने से सुरक्षा और स्थिरता मिलती है।
ब्रह्मज्ञान: जब मनुष्य श्रद्धा और समर्पण से जुड़ता है, तब दैवी शक्तियाँ उसके पक्ष में कार्य करती हैं।
English Explanation
This mantra invokes the deities stationed in the eastern direction, whose arrows are said to be fire. It prays for their grace and support rather than harm. Fire symbolizes purification and divine justice.
By offering salutations and oblations, the worshipper aligns with cosmic forces and seeks their favor. The east, symbolizing dawn and knowledge, represents new beginnings under divine protection.
Knowledge–Science–Brahma-Gyan:
Science: Living in alignment with natural laws ensures stability.
Brahma-Gyan: Through surrender and awareness, divine energies become protective and supportive.
Word by Word
ये = जो
अस्याम् = इस
स्थ = स्थित हैं
दक्षिणायाम् दिशि = दक्षिण दिशा में
अविष्यवः नाम = ‘अविष्यव’ नामक
देवाः = देवता
तेषाम् = उनके
वः = तुम
कामः = काम (इच्छा, प्रेरक शक्ति)
इषवः = बाण हैं
ते = वे
नः = हम पर
मृडत = कृपा करें
ते = वे
नः अधि ब्रूत = हमारे पक्ष में बोलें
तेभ्यः = उन देवताओं को
वः नमः = नमस्कार
तेभ्यः वः स्वाहा = उन सबको स्वाहा (आहुति अर्पित है)
हिन्दी व्याख्या (लगभग 500 शब्द)
यह मन्त्र दक्षिण दिशा में स्थित देवशक्तियों का आह्वान करता है। वैदिक परंपरा में दक्षिण दिशा को विशेष महत्व प्राप्त है। इसे पितृदिशा भी कहा जाता है और यह कर्मफल, अनुशासन तथा उत्तरदायित्व से जुड़ी मानी जाती है।
यहाँ कहा गया है—“अविष्यवो नाम देवाः”—अविष्यव नामक देवता इस दिशा में स्थित हैं। “तेषां वः काम इषवः”—उनके बाण काम हैं। यह अत्यंत सूक्ष्म प्रतीक है। पूर्व दिशा में अग्नि को बाण कहा गया था, यहाँ दक्षिण दिशा में “काम” को बाण कहा गया है।
“काम” का अर्थ केवल इंद्रिय-इच्छा नहीं, बल्कि प्रेरक शक्ति, संकल्प और सृजन की मूल आकांक्षा है। दक्षिण दिशा कर्म और उत्तरदायित्व से संबंधित है, इसलिए यहाँ इच्छा को बाण कहा गया है—अर्थात् इच्छा ही कर्म का आरंभ करती है।
मन्त्र में पुनः प्रार्थना की गई है—“ते नो मृडत”—वे हमारे प्रति कृपालु हों। “ते नो अधि ब्रूत”—वे हमारे पक्ष में बोलें। इसका भाव यह है कि हमारी इच्छाएँ और कर्म धर्मसम्मत हों, जिससे दैवी शक्तियाँ हमारे अनुकूल हों।
“तेभ्यो वः नमः, तेभ्यो वः स्वाहा”—उन देवताओं को नमस्कार और आहुति अर्पित है। यह समर्पण का भाव है।
दार्शनिक दृष्टि से देखें तो यह मन्त्र सिखाता है कि इच्छा (काम) यदि धर्म और विवेक से नियंत्रित हो, तो वह रचनात्मक बनती है। परंतु यदि इच्छा अनियंत्रित हो, तो वही विनाशकारी हो सकती है।
दक्षिण दिशा कर्मफल और न्याय से जुड़ी है। इसलिए यहाँ काम को बाण कहा गया है—अर्थात् इच्छा ही वह शक्ति है जो हमारे जीवन की दिशा निर्धारित करती है। यदि इच्छा शुद्ध हो, तो परिणाम भी शुभ होंगे।
आध्यात्मिक स्तर पर यह मन्त्र साधक को स्मरण कराता है कि अपनी इच्छाओं को उच्चतर लक्ष्य की ओर मोड़ें। जब काम (इच्छा) दिव्यता की ओर उन्मुख होता है, तो वही भक्ति और साधना का रूप ले लेता है।
इस प्रकार यह मन्त्र इच्छा, कर्म और दैवी अनुकूलता के बीच संबंध को स्पष्ट करता है।
ज्ञान–विज्ञान–ब्रह्मज्ञान:
ज्ञान: इच्छा ही कर्म की प्रेरक शक्ति है; इसे धर्मानुकूल होना चाहिए।
विज्ञान: मानव व्यवहार इच्छाओं और प्रेरणाओं से संचालित होता है।
ब्रह्मज्ञान: जब इच्छा दिव्य लक्ष्य से जुड़ती है, तब वह मुक्ति का मार्ग बनती है।
English Explanation
This mantra addresses the deities stationed in the southern direction, whose arrows are said to be Kāma (desire). Here, desire symbolizes the motivating force behind action. The prayer seeks their grace so that desires may align with righteousness.
In a deeper sense, it teaches that desire shapes destiny. When guided by higher wisdom, it becomes a constructive and spiritual force.
Knowledge–Science–Brahma-Gyan:
Knowledge: Desire initiates action and must be guided by dharma.
Science: Human motivation drives behavior and outcomes.
Brahma-Gyan: When desire turns toward the Divine, it becomes a path to liberation.
Word by Word
ये = जो
अस्याम् = इस
स्थ = स्थित हैं
प्रतीच्याम् दिशि = पश्चिम दिशा में
वैराजा नाम = ‘वैराज’ नामक
देवाः = देवता
तेषाम् = उनके
वः = तुम
आपः = जल
इषवः = बाण हैं
ते = वे
नः = हमें
मृडत = कृपा करें
ते = वे
नः अधि ब्रूत = हमारे पक्ष में बोलें
तेभ्यः = उन देवताओं को
वः नमः = नमस्कार
तेभ्यः वः स्वाहा = उन सबको स्वाहा (आहुति अर्पित है)
हिन्दी व्याख्या (लगभग 500 शब्द)
यह मन्त्र पश्चिम दिशा में स्थित देवशक्तियों का आह्वान करता है। पश्चिम दिशा सूर्यास्त की दिशा है, जो संध्या, विश्राम और आत्मचिंतन का प्रतीक मानी जाती है। यहाँ “वैराजा” नामक देवताओं का उल्लेख है। “वैराज” शब्द का संबंध “विराट” या “विशालता” से जोड़ा जाता है, जो व्यापकता और समग्रता का संकेत देता है।
मन्त्र में कहा गया है—“तेषां व आप इषवः”—उनके बाण जल हैं। यह अत्यंत अर्थपूर्ण प्रतीक है। जल जीवन, शांति, शुद्धि और पोषण का प्रतीक है। यदि पूर्व दिशा में अग्नि और दक्षिण में काम (इच्छा) को बाण कहा गया, तो पश्चिम दिशा में जल को बाण कहा गया है।
जल का बाण होना यह दर्शाता है कि यहाँ दंड या उग्रता नहीं, बल्कि शीतलता और शुद्धि की शक्ति कार्य करती है। जल भी बाण की तरह प्रभावी है—वह धीरे-धीरे भूमि को काट सकता है, पत्थर को घिस सकता है, और जीवन को पोषित कर सकता है।
“ते नो मृडत”—वे हमारे प्रति कृपालु हों। “ते नो अधि ब्रूत”—वे हमारे पक्ष में बोलें। यह वही प्रार्थना है जो अन्य दिशाओं में भी दोहराई गई है। इससे स्पष्ट होता है कि साधक चारों दिशाओं से दैवी संरक्षण चाहता है।
“तेभ्यो वः नमः, तेभ्यो वः स्वाहा”—उन सबको नमस्कार और आहुति अर्पित है। यह समर्पण और श्रद्धा का भाव है।
दार्शनिक दृष्टि से पश्चिम दिशा आत्ममंथन और समापन का प्रतीक है। दिन के अंत में व्यक्ति अपने कर्मों का मूल्यांकन करता है। जल यहाँ शुद्धि और क्षमा का प्रतीक है।
मनोवैज्ञानिक रूप से जल शांति और भावनात्मक संतुलन का प्रतीक है। जीवन में संतुलन बनाए रखने के लिए अग्नि (ऊर्जा), काम (प्रेरणा) और जल (शांति) तीनों आवश्यक हैं।
आध्यात्मिक अर्थ में यह मन्त्र बताता है कि आत्मा को शुद्ध करने के लिए करुणा और शीतलता आवश्यक है। जैसे जल बाह्य मलिनता को धो देता है, वैसे ही आंतरिक करुणा मन को निर्मल करती है।
इस प्रकार यह मन्त्र पश्चिम दिशा की शीतल, शुद्ध और व्यापक दैवी शक्ति की स्तुति है, जो जीवन में संतुलन और शांति प्रदान करती है।
ज्ञान–विज्ञान–ब्रह्मज्ञान:
ज्ञान: शांति और शुद्धि जीवन में संतुलन लाती है।
विज्ञान: जल जीवन का आधार है और प्रकृति के चक्र का महत्वपूर्ण अंग है।
ब्रह्मज्ञान: आंतरिक शुद्धि और करुणा से आत्मा व्यापक चेतना से जुड़ती है।
English Explanation
This mantra invokes the deities of the western direction, whose arrows are waters. Water symbolizes purification, nourishment, and calm strength. Unlike fire or desire, water works through cooling and cleansing.
The prayer seeks grace and protection from these expansive forces. Symbolically, it represents emotional purification and inner reflection, bringing balance and peace to life.
Knowledge–Science–Brahma-Gyan:
Knowledge: Purity and calmness sustain harmony.
Science: Water is essential for life and ecological balance.
Brahma-Gyan: Inner purification connects the soul with universal consciousness.
Word by Word
ये = जो
अस्याम् = इस
स्थ = स्थित हैं
उदीच्याम् दिशि = उत्तर दिशा में
प्रविध्यन्तः नाम = ‘प्रविध्यन्त’ नामक
देवाः = देवता
तेषाम् = उनके
वः = तुम
वातः = वायु
इषवः = बाण हैं
ते = वे
नः = हमें
मृडत = कृपा करें
ते = वे
नः अधि ब्रूत = हमारे पक्ष में बोलें
तेभ्यः = उन देवताओं को
वः नमः = नमस्कार
तेभ्यः वः स्वाहा = उन सबको स्वाहा (आहुति अर्पित है)
हिन्दी व्याख्या (लगभग 500 शब्द)
यह मन्त्र उत्तर दिशा में स्थित देवशक्तियों का आह्वान करता है। वैदिक परंपरा में उत्तर दिशा को उच्चता, स्थिरता और आध्यात्मिक उन्नति की दिशा माना गया है। हिमालय और तपस्थलों का संबंध भी उत्तर दिशा से जोड़ा जाता है।
यहाँ “प्रविध्यन्तो नाम देवाः” का उल्लेख है। ‘प्रविध्यन्त’ शब्द का अर्थ है वे जो तीव्रता से भेदने या प्रवेश करने वाले हैं। “तेषां वः वात इषवः”—उनके बाण वायु हैं।
वायु का बाण होना अत्यंत गूढ़ प्रतीक है। वायु अदृश्य है, परंतु अत्यंत शक्तिशाली है। वह जीवन का आधार है—प्राण के रूप में। वह सूक्ष्म है, परंतु सर्वव्यापी है। वायु का बाण होना दर्शाता है कि दैवी शक्ति सूक्ष्म स्तर पर कार्य करती है।
पूर्व दिशा में अग्नि, दक्षिण में काम, पश्चिम में जल और यहाँ उत्तर में वायु—यह क्रम प्रकृति के चार मूल तत्वों को दर्शाता है। यह सम्पूर्ण सृष्टि की संतुलित संरचना का संकेत है।
मन्त्र में वही प्रार्थना दोहराई गई है—“ते नो मृडत”—वे हमारे प्रति कृपालु हों। “ते नो अधि ब्रूत”—वे हमारे पक्ष में बोलें। यह दैवी शक्तियों के साथ सामंजस्य की प्रार्थना है।
“तेभ्यो वः नमः, तेभ्यो वः स्वाहा”—यह श्रद्धा और समर्पण का भाव है।
दार्शनिक दृष्टि से वायु चेतना और प्राण का प्रतीक है। यदि प्राण संतुलित है, तो शरीर और मन स्वस्थ रहते हैं। उत्तर दिशा की ओर उन्नति का अर्थ है चेतना की ऊँचाई।
मनोवैज्ञानिक रूप से वायु विचारों की गति का प्रतीक है। यदि विचार अनियंत्रित हों, तो अशांति होती है; यदि नियंत्रित और शुद्ध हों, तो प्रेरणा और सृजनशीलता उत्पन्न होती है।
आध्यात्मिक अर्थ में यह मन्त्र प्राणशक्ति को संतुलित करने की प्रार्थना है। जब साधक अपने प्राणों को नियंत्रित करता है, तब वह उच्चतर चेतना की ओर अग्रसर होता है।
इस प्रकार यह मन्त्र उत्तर दिशा की सूक्ष्म, प्राणमय और उन्नतिकारी शक्ति का आह्वान है, जो जीवन में संतुलन और आध्यात्मिक उत्कर्ष प्रदान करती है।
ज्ञान–विज्ञान–ब्रह्मज्ञान:
ज्ञान: जीवन में संतुलन हेतु सूक्ष्म शक्तियों का सम्मान आवश्यक है।
विज्ञान: वायु और प्राण ऊर्जा जीवन के लिए अनिवार्य हैं।
ब्रह्मज्ञान: प्राण के संतुलन से चेतना उच्चतर स्तर पर पहुँचती है।
English Explanation
This mantra invokes the deities of the northern direction, whose arrows are winds. Wind symbolizes prāṇa (life force), subtle power, and upward movement.
The prayer seeks harmony with these subtle forces so that they may be gracious and supportive. Spiritually, it represents the regulation of life energy and ascent toward higher consciousness.
Knowledge–Science–Brahma-Gyan:
Knowledge: Subtle forces sustain life and growth.
Science: Air and vital energy are essential for survival.
Brahma-Gyan: Mastery of prāṇa leads to spiritual elevation.
Word by Word
ये = जो
अस्याम् = इस
स्थ = स्थित हैं
ध्रुवायाम् दिशि = ध्रुव (ऊर्ध्व/स्थिर) दिशा में
निलिम्पाः नाम = ‘निलिम्प’ नामक
देवाः = देवता
तेषाम् = उनके
वः = तुम
ओषधयः = औषधियाँ, वनस्पतियाँ
इषवः = बाण हैं
ते = वे
नः = हमें
मृडत = कृपा करें
ते = वे
नः अधि ब्रूत = हमारे पक्ष में बोलें
तेभ्यः = उन देवताओं को
वः नमः = नमस्कार
तेभ्यः वः स्वाहा = उन सबको स्वाहा (आहुति अर्पित है)
हिन्दी व्याख्या (लगभग 500 शब्द)
यह मन्त्र “ध्रुव दिशा” में स्थित देवशक्तियों का आह्वान करता है। “ध्रुव” का अर्थ है स्थिर, अचल, अक्षय। वैदिक दृष्टि में यह ऊर्ध्व दिशा या आकाश की स्थिर धुरी (ध्रुव तारा) का प्रतीक है। यह स्थिरता, नित्यत्व और दिव्यता का संकेत है।
यहाँ “निलिम्पा नाम देवाः” का उल्लेख है। ‘निलिम्प’ शब्द आकाशीय या दिव्य लोक में स्थित देवशक्तियों के लिए प्रयुक्त होता है। ये सूक्ष्म और उच्चतर स्तर की शक्तियाँ हैं।
“तेषां व ओषधीरिषवः”—उनके बाण ओषधियाँ (वनस्पतियाँ, औषधियाँ) हैं। यह अत्यंत सुंदर और जीवनदायी प्रतीक है। औषधियाँ रोग का नाश करती हैं, शरीर और मन को संतुलित करती हैं। यहाँ बाण का अर्थ दंडात्मक नहीं, बल्कि उपचारात्मक शक्ति से है।
यदि हम पूर्व से उत्तर तक के मन्त्रों को देखें—अग्नि, काम, जल, वायु—अब यहाँ औषधि का उल्लेख है। यह पंचमहाभूत और जीवन-चक्र की पूर्णता को दर्शाता है।
मन्त्र में वही प्रार्थना है—“ते नो मृडत”—वे हमारे प्रति कृपालु हों। “ते नो अधि ब्रूत”—वे हमारे पक्ष में बोलें। यह दैवी अनुकूलता की कामना है।
“तेभ्यो वः नमः, तेभ्यो वः स्वाहा”—यह समर्पण और श्रद्धा का भाव है।
दार्शनिक रूप से ध्रुव दिशा स्थिरता और आध्यात्मिक केंद्र का प्रतीक है। जीवन में परिवर्तन होते रहते हैं, परंतु भीतर एक ध्रुव सत्य है—आत्मा।
औषधियाँ यहाँ उपचार और संतुलन का प्रतीक हैं। जैसे औषधि रोग का निवारण करती है, वैसे ही दिव्य ज्ञान अज्ञान का नाश करता है।
मनोवैज्ञानिक रूप से यह मन्त्र संकेत देता है कि जीवन में स्थिरता और संतुलन के लिए आत्म-चिंतन और उपचार आवश्यक है।
आध्यात्मिक अर्थ में औषधियाँ कृपा और अनुग्रह का प्रतीक हैं। जब मनुष्य दैवी शक्ति के साथ जुड़ता है, तो उसे आंतरिक शांति और उपचार प्राप्त होता है।
इस प्रकार यह मन्त्र ध्रुव, स्थिर और दिव्य दिशा की उपचारात्मक शक्ति का आह्वान है, जो जीवन में संतुलन, स्वास्थ्य और आध्यात्मिक स्थिरता प्रदान करती है।
ज्ञान–विज्ञान–ब्रह्मज्ञान:
ज्ञान: स्थिरता और संतुलन जीवन का आधार हैं।
विज्ञान: औषधियाँ स्वास्थ्य और जीवन-रक्षा का साधन हैं।
ब्रह्मज्ञान: आत्मा ध्रुव है; उससे जुड़ने पर जीवन में आंतरिक उपचार होता है।
English Explanation
This mantra invokes the deities of the fixed (dhruva) direction, associated with celestial stability. Their arrows are herbs—symbols of healing and restoration.
Unlike destructive force, these arrows represent therapeutic power. Spiritually, the mantra suggests that connection with the eternal center brings healing, balance, and inner steadiness.
Knowledge–Science–Brahma-Gyan:
Knowledge: Stability sustains life.
Science: Herbs are natural sources of healing.
Brahma-Gyan: Realization of the eternal Self brings inner restoration.
Word by Word
ये = जो
अस्याम् = इस
स्थ = स्थित हैं
ऊर्ध्वायाम् दिशि = ऊपर (ऊर्ध्व) दिशा में
वस्वन्तः नाम = ‘वस्वन्त’ नामक
देवाः = देवता
तेषाम् = उनके
वः = तुम
बृहस्पतिः = बृहस्पति (देवगुरु, दिव्य ज्ञान)
इषवः = बाण हैं
ते = वे
नः = हमें
मृडत = कृपा करें
ते = वे
नः अधि ब्रूत = हमारे पक्ष में बोलें
तेभ्यः = उन देवताओं को
वः नमः = नमस्कार
तेभ्यः वः स्वाहा = उन सबको स्वाहा (आहुति अर्पित है)
हिन्दी व्याख्या (लगभग 500 शब्द)
यह मन्त्र ऊर्ध्व दिशा में स्थित देवशक्तियों का आह्वान करता है। “ऊर्ध्व” का अर्थ है ऊपर, उच्च, उन्नत। यह दिशा आध्यात्मिक उत्कर्ष, दिव्य ज्ञान और परम सत्य की ओर संकेत करती है।
यहाँ “वस्वन्तो नाम देवाः” का उल्लेख है। ‘वस्वन्त’ का अर्थ है तेजस्वी, संपन्न या प्रकाशयुक्त। ये देवशक्तियाँ दिव्य ऐश्वर्य और आध्यात्मिक प्रकाश की प्रतीक हैं।
“तेषां वः बृहस्पतिरिषवः”—उनके बाण बृहस्पति हैं। बृहस्पति देवताओं के गुरु माने जाते हैं, जो ज्ञान, वाणी, मंत्रशक्ति और बुद्धि के अधिष्ठाता हैं। यहाँ बृहस्पति को “इषु” अर्थात बाण कहा गया है।
बाण सामान्यतः भेदन और लक्ष्य तक पहुँचने का प्रतीक है। जब ज्ञान बाण बनता है, तो वह अज्ञान को भेदता है। जैसे बाण लक्ष्य को सीधा भेदता है, वैसे ही दिव्य ज्ञान भ्रम और अंधकार को दूर करता है।
यदि हम इस सूक्त के क्रम को देखें—अग्नि, काम, जल, वायु, औषधि—और अब बृहस्पति—तो यह स्थूल से सूक्ष्म और अंततः ज्ञान तक की यात्रा है। यह सम्पूर्ण सृष्टि और चेतना के विकास का प्रतीकात्मक क्रम है।
“ते नो मृडत”—वे हमारे प्रति कृपालु हों। “ते नो अधि ब्रूत”—वे हमारे पक्ष में बोलें। यह प्रार्थना दर्शाती है कि साधक केवल बाह्य सुरक्षा नहीं, बल्कि ज्ञान का संरक्षण चाहता है।
“तेभ्यो वः नमः, तेभ्यो वः स्वाहा”—यह पूर्ण समर्पण का भाव है।
दार्शनिक दृष्टि से ऊर्ध्व दिशा चेतना की ऊँचाई है। जब मनुष्य ज्ञान के मार्ग पर चलता है, तो उसका चित्त ऊर्ध्वगामी होता है।
मनोवैज्ञानिक रूप से बृहस्पति विवेक और बुद्धि का प्रतीक हैं। जब बुद्धि स्पष्ट होती है, तो निर्णय सही होते हैं और जीवन संतुलित रहता है।
आध्यात्मिक अर्थ में यह मन्त्र कहता है कि परम रक्षा ज्ञान से होती है। धन, बल या संसाधन अस्थायी हैं, परंतु ज्ञान स्थायी है।
इस प्रकार यह मन्त्र ऊर्ध्व दिशा की ज्ञानमय, प्रकाशपूर्ण और गुरु-तत्त्व की शक्ति का आह्वान है, जो अज्ञान को भेदकर साधक को उच्च चेतना तक ले जाती है।
ज्ञान–विज्ञान–ब्रह्मज्ञान:
ज्ञान: सच्चा संरक्षण विवेक और बुद्धि से मिलता है।
विज्ञान: ज्ञान अंधकार और भ्रम को दूर करता है।
ब्रह्मज्ञान: गुरु-तत्त्व (बृहस्पति) आत्मा को परम सत्य की ओर उन्नत करता है।
English Explanation
This mantra invokes the deities of the upward (zenith) direction. Their arrow is Brihaspati—the divine teacher and lord of wisdom.
Here knowledge itself is described as a piercing arrow that destroys ignorance. Spiritually, the mantra signifies ascent toward higher consciousness through divine wisdom.
Knowledge–Science–Brahma-Gyan:
Knowledge: True protection comes from wisdom.
Science: Knowledge dispels ignorance and confusion.
Brahma-Gyan: The Guru principle elevates the soul toward ultimate truth.
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