दुःखजन्मप्रवृत्तिदोषमिथ्याज्ञानानामुत्तरोत्तरापाये तदनन्तरापायादपवर्गः II1/1/2 न्यायदर्शन
अर्थ : तत्वज्ञान से मिथ्या ज्ञान का नाश हो जाता है और मिथ्या ज्ञान के नाश से राग द्वेषादि दोषों का नाश हो जाता है, दोषों के नाश से प्रवृत्ति का नाश हो जाता है। प्रवृत्ति के नाश होने से कर्म बन्द हो जाते हैं। कर्म के न होने से प्रारम्भ का बनना बन्द हो जाता है, प्रारम्भ के न होने से जन्म-मरण नहीं होते और जन्म मरण ही न हुए तो दुःख-सुख किस प्रकार हो सकता है। क्योंकि दुःख तब ही तक रह सकता है जब तक मन है। और मन में जब तक राग-द्वेष रहते हैं तब तक ही सम्पूर्ण काम चलते रहते हैं।
क्योंकि जिन अवस्थाओं में मन हीन विद्यमान हो उनमें दुःख सुख हो ही नहीं सकते । क्योंकि दुःख के रहने का स्थान मन है। मन जिस वस्तु को आत्मा के अनुकूल समझता है उसके प्राप्त करने की इच्छा करता है। इसी का नाम राग है। यदि वह जिस वस्तु से प्यार करता है यदि मिल जाती है तो वह सुख मानता है। यदि नहीं मिलती तो दुःख मानता है। जिस वस्तु की मन इच्छा करता है उसके प्राप्त करने के लिए दो प्रकार के कर्म होते हैं। या तो हिंसा व चोरी करता है या दूसरों का उपकार व दान आदि सुकर्म करता है। सुकर्म का फल सुख और दुष्कर्मों का फल दुःख होता है परन्तु जब तक दुःख सुख दोनों का भोग न हो तब तक मनुष्य शरीर नहीं मिल सकता !
ब्रह्म = परम ज्ञान, सृष्टि का मूल चेतन तत्व
जज्ञानम् = उत्पन्न हुआ / प्रकट हुआ
प्रथमम् = सबसे पहले
पुरस्तात् = प्रारम्भ में
वि = व्यापक रूप से
सीमतः = सीमाओं में / दिशाओं में
सुरुचः = दिव्य प्रकाशयुक्त
वेनः = प्रकाशमान चेतना
स = वह
बुध्न्या = आधारभूत, मूल में स्थित
उपमा = तुलनीय / उदाहरण
अस्य = इसका
विष्ठाः = विस्तार, स्थितियाँ
सतः = सत्य, अस्तित्व
च = और
असतः = अनस्तित्व, अप्रकट अवस्था
योनिम् = मूल कारण, गर्भ
वि वः = प्रकाशित किया / प्रकट किया
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हिन्दी व्याख्या (लगभग 700 शब्द)
यह मन्त्र सृष्टि के आदिम रहस्य का उद्घाटन करता है।
यह बताता है कि “ब्रह्म”—अर्थात् परम चेतना और ज्ञान—सृष्टि के प्रारम्भ में प्रकट हुआ।
“ब्रह्म जज्ञानं प्रथमं पुरस्तात्”—
सृष्टि के पहले चरण में ब्रह्म का उदय हुआ।
यह ब्रह्म कोई भौतिक वस्तु नहीं,
बल्कि वह चेतना है जिससे समस्त ज्ञान, नियम और व्यवस्था उत्पन्न हुई।
“वि सीमतः सुरुचो वेन आवः”—
उस दिव्य प्रकाश ने दिशाओं और सीमाओं को प्रकाशित किया।
यह प्रकाश केवल भौतिक प्रकाश नहीं,
बल्कि ज्ञान और व्यवस्था का प्रकाश है।
यह संकेत करता है कि ब्रह्मांड अराजकता से नहीं,
बल्कि चेतन नियम और ज्ञान से संचालित है।
“स बुध्न्या उपमा अस्य विष्ठाः”—
वह चेतना सृष्टि के मूल आधार में स्थित है।
सभी स्तर—स्थूल, सूक्ष्म और कारण—उसी में स्थापित हैं।
“सतश्च योनिमसतश्च”—
वह अस्तित्व (सत्) और अनस्तित्व (असत्) दोनों का मूल कारण है।
अर्थात् जो प्रकट है और जो अप्रकट है,
दोनों का आधार ब्रह्म ही है।
यह मन्त्र अत्यंत दार्शनिक है।
यह सृष्टि के पहले सिद्धांत को स्पष्ट करता है—
चेतना पहले है, पदार्थ बाद में।
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दार्शनिक अर्थ
1. ब्रह्म सृष्टि का प्रथम तत्व है।
2. अस्तित्व और अनस्तित्व दोनों उसी से उत्पन्न होते हैं।
3. ज्ञान और व्यवस्था सृष्टि का मूल आधार हैं।
यहाँ “सत्” और “असत्” का उल्लेख वेदांत के गहन सिद्धांत की ओर संकेत करता है।
जो दिखाई देता है वह “सत्” है,
जो अप्रकट संभावना है वह “असत्” है—
दोनों का मूल एक ही चेतन तत्व है।
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वैज्ञानिक दृष्टिकोण
आधुनिक विज्ञान भी मानता है कि ब्रह्मांड की उत्पत्ति एक मूल ऊर्जा और नियम से हुई।
यह मन्त्र संकेत करता है कि सृष्टि की शुरुआत एक “कॉस्मिक इंटेलिजेंस” या चेतन व्यवस्था से हुई।
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आध्यात्मिक संदेश
1. चेतना ही सृष्टि का आधार है।
2. ज्ञान और प्रकाश जीवन के मूल तत्व हैं।
3. अस्तित्व और अनस्तित्व दोनों एक ही परम स्रोत से आते हैं।
यह मन्त्र हमें बताता है कि
यदि हम उस मूल चेतना से जुड़ जाएँ,
तो जीवन में ज्ञान, संतुलन और दिव्यता का प्रकाश प्राप्त होगा।
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English Explanation
This profound mantra declares that Brahman — the supreme consciousness — manifested first at the beginning of creation.
It is the source of both existence (sat) and non-existence (asat).
It illuminates the universe with divine intelligence and establishes cosmic order.
It suggests that consciousness precedes matter, and both the visible and invisible realms originate from the same supreme principle.
Knowledge – Science – Spiritual Insight:
- Consciousness is the foundation of creation.
- Cosmic intelligence governs the universe.
- Both existence and non-existence arise from one ultimate reality.
शब्दार्थ
इयम् = यह
पित्र्या = पितरों की / पूर्वजों से प्राप्त
राष्ट्र्य = राष्ट्र से संबंधित / सामाजिक व्यवस्था
एतु = आए / स्थापित हो
अग्रे = प्रारंभ में
प्रथमाय = प्रथम हेतु
जनुषे = जन्म के लिए
भुवनेष्ठाः = लोकों में स्थित / संसार में प्रतिष्ठित
तस्मै = उस (परम हेतु) के लिए
एतं = इस
सुरुचम् = शुभ प्रकाशयुक्त
ह्वारम् = आह्वान / अर्पण
अह्यम् = हम
घर्मम् = उष्ण अर्पण / यज्ञीय तत्त्व
श्रीणन्तु = परिपूर्ण करें / मिलाएँ
प्रथमाय = प्रथम हेतु
धास्यवे = धारण करने योग्य / स्थापन हेतु
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हिन्दी व्याख्या (लगभग 700 शब्द)
यह मन्त्र राष्ट्र, परंपरा और सृष्टि की प्रथम स्थापना के सिद्धांत को प्रकट करता है।
“इयं पित्र्या राष्ट्र्येतु”—
यह पितरों से प्राप्त राष्ट्र व्यवस्था हमारे जीवन में स्थापित हो।
यहाँ ‘पित्र्या’ का अर्थ केवल पूर्वज नहीं,
बल्कि वह ज्ञान-परंपरा है जो पीढ़ियों से चली आ रही है।
“अग्रे प्रथमाय जनुषे”—
सृष्टि के प्रारंभ में, जन्म की व्यवस्था के लिए यह व्यवस्था स्थापित हो।
अर्थात समाज, धर्म और राष्ट्र का मूल आधार ज्ञान और परंपरा है।
“भुवनेष्ठाः”—
जो समस्त लोकों में प्रतिष्ठित है।
यह संकेत करता है कि राष्ट्र और व्यवस्था केवल भौतिक सीमा नहीं,
बल्कि एक दैवी और सार्वभौमिक सिद्धांत है।
फिर प्रार्थना—
“तस्मा एतं सुरुचं ह्वारमह्यं”—
हम उस प्रथम कारण के लिए शुभ और प्रकाशमय अर्पण करते हैं।
‘सुरुच’ का अर्थ है दिव्य तेज, ज्ञान और शुभ संकल्प।
“घर्मं श्रीणन्तु प्रथमाय धास्यवे”—
यह यज्ञीय उष्णता (तप, प्रयास, ऊर्जा)
प्रथम स्थापना हेतु धारण की जाए।
इसका तात्पर्य है—
राष्ट्र, समाज और जीवन की व्यवस्था
ज्ञान, तप और परंपरा के आधार पर स्थापित होनी चाहिए।
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दार्शनिक अर्थ
1. राष्ट्र और समाज की नींव पूर्वजों की ज्ञान-परंपरा है।
2. सृष्टि और समाज की स्थापना दैवी नियमों के अनुरूप होनी चाहिए।
3. तप, यज्ञ और शुभ संकल्प से व्यवस्था स्थिर रहती है।
यह मन्त्र सामाजिक और आध्यात्मिक राष्ट्रवाद का आदर्श प्रस्तुत करता है—
जहाँ राष्ट्र केवल भूमि नहीं,
बल्कि धर्म, ज्ञान और संस्कृति की जीवित चेतना है।
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आधुनिक संदर्भ
आज के युग में राष्ट्र का निर्माण केवल राजनीति से नहीं,
बल्कि सांस्कृतिक, नैतिक और आध्यात्मिक आधार से होता है।
यदि समाज अपनी परंपरा, ज्ञान और मूल्यों को भूल जाता है,
तो उसकी जड़ें कमजोर हो जाती हैं।
यह मन्त्र हमें सिखाता है—
1. परंपरा और ज्ञान को संरक्षित रखें।
2. राष्ट्र निर्माण में नैतिकता और तप का महत्व समझें।
3. जीवन और समाज की व्यवस्था दिव्य नियमों पर आधारित हो।
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आध्यात्मिक संदेश
यह मन्त्र बताता है कि
सृष्टि की प्रथम स्थापना ज्ञान, तप और शुभ संकल्प से हुई।
यदि हम उसी मूल चेतना से जुड़ें,
तो समाज और जीवन दोनों में संतुलन, समृद्धि और स्थिरता आएगी।
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English Explanation
This mantra invokes the ancestral (paternal) order of society and nation to be established at the beginning of creation and human life.
It emphasizes that social order must be rooted in sacred tradition, divine light, and disciplined effort (tapas).
The offering (gharma) symbolizes energy, dedication, and spiritual heat required to sustain civilization.
Key Insight:
A nation is not merely territory — it is a living expression of inherited wisdom, sacred order, and conscious effort aligned with divine principles.
शब्दार्थ
प्र = प्रकट होकर / आगे
यः = जो
जज्ञे = उत्पन्न हुआ / प्रकट हुआ
विद्वान् = ज्ञानी, सर्वज्ञ
अस्य = इसका
बन्धुः = संबंधी / मूल कारण
विश्वा = समस्त
देवानाम् = देवों के
जनिमा = उत्पत्ति, जन्म
विवक्ति = प्रकट करता है / वर्णन करता है
ब्रह्म = परम ज्ञान
ब्रह्मणः = ब्रह्म से / वेद से
उज्जभार = ऊपर उठाया / प्रकट किया
मध्यान् = मध्य लोकों में
नीचैः = नीचे
उच्चैः = ऊपर
स्वधा = स्वशक्ति, आंतरिक शक्ति
अभि = सर्वत्र
प्र तस्थौ = स्थापित हुआ / फैल गया
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हिन्दी व्याख्या (लगभग 800 शब्द)
यह मन्त्र उस दिव्य चेतना का वर्णन करता है जो सृष्टि के रहस्यों को जानती और प्रकट करती है।
“प्र यो जज्ञे विद्वान्”—
जो प्रारंभ में उत्पन्न हुआ और पूर्ण ज्ञानी है।
यह संकेत है उस ब्रह्मचेतना की ओर,
जो सृष्टि के प्रारंभ से ही विद्यमान है।
“अस्य बन्धुः विश्वा देवानां जनिमा विवक्ति”—
वह समस्त देवशक्तियों की उत्पत्ति को जानता और प्रकट करता है।
यहाँ ‘देव’ का अर्थ प्राकृतिक और दैवी शक्तियाँ हैं—
अग्नि, वायु, सूर्य, चन्द्र आदि।
अर्थात् वह मूल चेतना ही सभी शक्तियों का आधार है।
“ब्रह्म ब्रह्मण उज्जभार”—
उसने ब्रह्म (ज्ञान) को ब्रह्म से ही प्रकट किया।
अर्थात् ज्ञान स्वयं ज्ञान से उत्पन्न हुआ—
यह आत्मप्रकाशी सत्य है।
“मध्यान् नीचैरुच्चैः स्वधा अभि प्र तस्थौ”—
वह शक्ति ऊपर, नीचे और मध्य सभी लोकों में स्थापित हो गई।
यह संकेत करता है कि ब्रह्मचेतना सर्वव्यापी है।
यह मन्त्र स्पष्ट करता है—
सृष्टि का मूल कारण चेतना और ज्ञान है।
सभी देवशक्तियाँ उसी मूल से उत्पन्न हैं।
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दार्शनिक अर्थ
1. सृष्टि का प्रथम तत्व सर्वज्ञ चेतना है।
2. देव शक्तियाँ उसी मूल ज्ञान से उत्पन्न हैं।
3. ब्रह्म सर्वत्र व्याप्त है—ऊपर, नीचे और मध्य में।
यहाँ ज्ञान का आत्मप्रकाशी होना एक गहन वेदांत सिद्धांत है।
सत्य को किसी बाहरी प्रमाण की आवश्यकता नहीं—
वह स्वयं प्रकाशित है।
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वैज्ञानिक संकेत
आधुनिक विज्ञान कहता है कि ब्रह्मांड में एक मूल नियम और ऊर्जा है
जिससे समस्त शक्तियाँ और तत्व उत्पन्न हुए।
यह मन्त्र उसी “कॉस्मिक इंटेलिजेंस” का काव्यात्मक वर्णन है—
एक ऐसा सार्वभौमिक नियम
जो ब्रह्मांड के हर स्तर पर कार्य करता है।
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आध्यात्मिक संदेश
1. ज्ञान ही सृष्टि का मूल है।
2. चेतना सर्वव्यापी है।
3. जीवन में सत्य का अनुभव भीतर से होता है।
यदि हम उस आत्मप्रकाशी ब्रह्म से जुड़ें,
तो हमें भी सत्य का ज्ञान प्राप्त हो सकता है।
यह मन्त्र हमें बाहरी अंधकार से नहीं,
भीतरी अज्ञान से मुक्त होने की प्रेरणा देता है।
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English Explanation
This mantra describes the primordial conscious being who knows and reveals the origin of all divine forces.
He manifests Brahman from Brahman itself — knowledge arising from self-luminous truth.
That supreme consciousness establishes itself in all realms — above, below, and in between — indicating omnipresence.
Core Insight:
Consciousness is the foundation of creation.
All divine powers arise from one self-revealing intelligence.
शब्दार्थ
सः = वही (परम चेतना / अग्नि)
हि = निश्चय ही
विदः = जानने वाला / सर्वज्ञ
सः = वही
पृथिव्या = पृथ्वी का
ऋतस्था = ऋत (सत्य नियम) में स्थित
मही = महान
क्षेमम् = कल्याण, स्थिरता
रोदसी = द्युलोक और पृथ्वी
अस्कभायत् = धारण किया / संभाला
महान् = महान
मही = विशाल
अस्कभायत् = स्थिर किया
वि जातः = प्रकट होकर
द्याम् = आकाश
सद्म = स्थान
पार्थिवम् = पृथ्वी संबंधी
रजः = मध्य आकाश / अंतरिक्ष
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हिन्दी व्याख्या (लगभग 800 शब्द)
यह मन्त्र सृष्टि के स्थापन और संतुलन का वर्णन करता है।
यह बताता है कि वही परम चेतना (अग्नि/ब्रह्म)
सत्य (ऋत) में स्थित होकर पृथ्वी और आकाश को धारण करती है।
“स हि विदः”—
वह सर्वज्ञ है, सब कुछ जानने वाला।
यह संकेत है कि ब्रह्मांड अंधी शक्तियों से नहीं,
बल्कि एक सुव्यवस्थित चेतन नियम से संचालित है।
“स पृथिव्या ऋतस्था”—
वह पृथ्वी को ऋत (कॉस्मिक ऑर्डर) में स्थापित करता है।
ऋत का अर्थ है—
सत्य, नियम और ब्रह्मांडीय संतुलन।
“मही क्षेमं रोदसी अस्कभायत्”—
उसने द्युलोक (आकाश) और पृथ्वी दोनों को स्थिर किया।
क्षेम का अर्थ है सुरक्षा और स्थायित्व।
अर्थात् ब्रह्मांड की संरचना संयोग से नहीं,
बल्कि संतुलित व्यवस्था से बनी है।
“महान् मही अस्कभायद्वि जातः”—
वह महान होकर प्रकट हुआ और विशाल लोकों को स्थिर किया।
“द्यां सद्म पार्थिवं च रजः”—
उसने आकाश, पृथ्वी और अंतरिक्ष (मध्य लोक) को स्थापित किया।
यह त्रिस्तरीय ब्रह्मांड (द्युलोक–अंतरिक्ष–पृथ्वी)
वैदिक विश्वदृष्टि का मूल ढाँचा है।
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दार्शनिक अर्थ
1. ब्रह्मांड सत्य और नियम (ऋत) पर आधारित है।
2. चेतना ही सृष्टि को स्थिर और संतुलित रखती है।
3. आकाश, पृथ्वी और अंतरिक्ष एक ही मूल शक्ति से संचालित हैं।
यह मन्त्र बताता है कि
संतुलन ही सृष्टि का आधार है।
जब ऋत का पालन होता है,
तब जीवन में भी स्थिरता और क्षेम प्राप्त होता है।
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वैज्ञानिक दृष्टिकोण
आधुनिक विज्ञान कहता है कि
ब्रह्मांड गुरुत्वाकर्षण, ऊर्जा और भौतिक नियमों से संतुलित है।
यह मन्त्र उसी संतुलन को “ऋत” कहता है—
एक ऐसा सार्वभौमिक नियम
जो समस्त सृष्टि को व्यवस्थित रखता है।
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आध्यात्मिक संदेश
1. जीवन में सत्य और नियम का पालन आवश्यक है।
2. संतुलन ही सुरक्षा और स्थिरता देता है।
3. ब्रह्मांडीय व्यवस्था से जुड़कर मनुष्य भी संतुलित जीवन जी सकता है।
यदि हम अपने जीवन में ऋत (सत्य, नैतिकता, अनुशासन) स्थापित करें,
तो आंतरिक और बाहरी दोनों स्तरों पर क्षेम प्राप्त होगा।
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English Explanation
This mantra declares that the supreme conscious principle, established in Ṛta (cosmic order), upholds Earth and Heaven.
It stabilizes the three realms — heaven, atmosphere, and earth — ensuring cosmic balance and welfare.
The hymn emphasizes that the universe is governed by divine order, not chaos.
Core Message:
Cosmic order (Ṛta) sustains creation.
Balance and truth are the foundation of stability and well-being.
शब्दार्थ
सः = वही (परम अग्नि / ब्रह्म)
बुध्न्यात् = मूल आधार से
राष्ट्र = व्यवस्था / दिव्य शासन
जनुषः = जन्म से / सृष्टि के प्रारंभ से
अभि अग्रं = आगे प्रकट हुआ
बृहस्पतिः = देवगुरु, ज्ञान का अधिपति
देवता = दैवी शक्ति
तस्य = उसका
सम्राट् = सार्वभौम अधिपति
अहर्यत् = प्रकट हुआ / प्रकाशित हुआ
शुक्रम् = उज्ज्वल, शुद्ध प्रकाश
ज्योतिषः = ज्योति से
जनिष्ट = उत्पन्न हुआ
अथ = तब
द्युमन्तः = तेजस्वी
वि वसन्तु = निवास करें / फैलें
विप्राः = ज्ञानी, ऋषि
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हिन्दी व्याख्या (लगभग 800 शब्द)
यह मन्त्र सृष्टि के मूल शासन और दिव्य ज्ञान के प्राकट्य का वर्णन करता है।
“स बुध्न्यादाष्ट्र जनुषोऽभ्यग्रं”—
वह मूल आधार से राष्ट्र (व्यवस्था) के रूप में प्रकट हुआ।
यह संकेत है कि सृष्टि के जन्म के साथ ही
एक दैवी शासन और नियम स्थापित हुआ।
यहाँ ‘राष्ट्र’ केवल राजनीतिक अर्थ में नहीं,
बल्कि ब्रह्मांडीय व्यवस्था (Cosmic Order) के अर्थ में है।
“बृहस्पतिर्देवता तस्य सम्राट्”—
उस व्यवस्था का अधिपति बृहस्पति है।
बृहस्पति ज्ञान, वाणी और बुद्धि के देवता माने जाते हैं।
अर्थात् सृष्टि का शासन ज्ञान पर आधारित है।
“अहर्यच्छुक्रं ज्योतिषो जनिष्ट”—
उससे उज्ज्वल प्रकाश उत्पन्न हुआ।
यह प्रकाश केवल भौतिक नहीं,
बल्कि चेतना और विवेक का प्रकाश है।
“अथ द्युमन्तो वि वसन्तु विप्राः”—
तब तेजस्वी ज्ञानी (विप्र) सर्वत्र निवास करें।
अर्थात् जब ज्ञान का प्रकाश फैलता है,
तो समाज में बुद्धिमान और प्रकाशमान लोग उत्पन्न होते हैं।
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दार्शनिक अर्थ
1. सृष्टि का शासन ज्ञान पर आधारित है।
2. ब्रह्मांडीय व्यवस्था का अधिपति विवेक और बुद्धि है।
3. प्रकाश (ज्ञान) से ही सभ्यता और संस्कृति का विकास होता है।
यह मन्त्र बताता है कि
जहाँ ज्ञान का शासन है,
वहीं स्थिरता और प्रगति है।
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आधुनिक संदर्भ
आज भी किसी राष्ट्र या समाज की उन्नति
उसकी शिक्षा, ज्ञान और विवेक पर निर्भर है।
यदि शासन ज्ञानहीन हो,
तो अराजकता उत्पन्न होती है।
यह मन्त्र स्पष्ट करता है—
1. ज्ञान सर्वोच्च शक्ति है।
2. विवेक ही वास्तविक नेतृत्व है।
3. प्रकाशमय बुद्धि से ही समाज समृद्ध होता है।
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आध्यात्मिक संदेश
1. अपने जीवन में ज्ञान को सर्वोच्च स्थान दें।
2. विवेकपूर्ण निर्णय ही स्थिरता देते हैं।
3. आंतरिक प्रकाश से ही बाहरी प्रगति संभव है।
जब मनुष्य अपने भीतर के “बृहस्पति”
अर्थात् विवेक और बुद्धि को जागृत करता है,
तभी जीवन में वास्तविक नेतृत्व और सफलता प्राप्त होती है।
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English Explanation
This mantra describes the emergence of cosmic order from the primordial foundation.
Bṛhaspati — the lord of wisdom — is declared the sovereign of this divine order.
From that order arises radiant light (knowledge), and enlightened sages spread throughout the world.
Core Insight:
True sovereignty belongs to wisdom.
Where knowledge shines, enlightened beings flourish.
शब्दार्थ
नूनम् = निश्चय ही / अब
तत् = वह
अस्य = उसका
काव्यः = ऋषि, ज्ञानी, द्रष्टा
हिनोति = प्रेरित करता है / आगे बढ़ाता है
महो = महान
देवस्य = दैवी शक्ति का
पूर्व्यस्य = प्राचीन / आदिम
धाम = प्रकाश, तेज, धाम
एषः = यह
जज्ञे = उत्पन्न हुआ / प्रकट हुआ
बहुभिः = अनेक रूपों में
साकम् = साथ-साथ
इत्था = इस प्रकार
पूर्वे = पहले
अर्धे = भाग में / प्रारंभिक अवस्था में
विषिते = विभक्त / प्रसारित
ससन् = स्थापित हुआ / स्थित हुआ
नु = निश्चय ही
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हिन्दी व्याख्या (लगभग 800 शब्द)
यह मन्त्र आदिम देवचेतना के प्रकाश और उसके बहुरूपी प्राकट्य का वर्णन करता है।
“नूनं तदस्य काव्यो हिनोति”—
निश्चय ही वह प्राचीन दैवी प्रकाश ऋषियों को प्रेरित करता है।
यहाँ ‘काव्य’ शब्द ऋषि या द्रष्टा के लिए है—
जो सत्य को देखता और व्यक्त करता है।
अर्थात् दिव्य चेतना का प्रकाश ही
ऋषियों की वाणी और ज्ञान को प्रेरित करता है।
“महो देवस्य पूर्व्यस्य धाम”—
वह महान और प्राचीन देव का धाम (प्रकाश) है।
यह संकेत करता है कि सृष्टि के प्रारंभ में
एक आदिम ज्योति विद्यमान थी।
“एष जज्ञे बहुभिः साकम्”—
वह एक ही तत्व अनेक रूपों में प्रकट हुआ।
यह वेदांत का गूढ़ सिद्धांत है—
एक से अनेक का विस्तार।
“पूर्वे अर्धे विषिते ससन् नु”—
सृष्टि के प्रारंभिक विभाजन में
वह तत्व स्थापित हुआ।
अर्थात् जब सृष्टि ने विविध रूप धारण किए,
तब भी मूल तत्व वही एक दिव्य चेतना रही।
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दार्शनिक अर्थ
1. एक ही परम तत्व अनेक रूपों में प्रकट होता है।
2. ऋषि उसी दिव्य प्रकाश से प्रेरित होते हैं।
3. सृष्टि का विस्तार एकता से बहुलता की ओर है।
यह मन्त्र अद्वैत की ओर संकेत करता है—
अनेकता के पीछे एक ही मूल चेतना है।
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आध्यात्मिक संदेश
1. हम सभी उसी एक स्रोत से उत्पन्न हैं।
2. विविधता के भीतर एकता को पहचानना ही ज्ञान है।
3. दिव्य प्रेरणा से ही सच्चा ज्ञान जन्म लेता है।
यदि मनुष्य उस आदिम प्रकाश से जुड़ जाए,
तो उसके विचार, वाणी और कर्म भी प्रकाशमय हो जाते हैं।
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वैज्ञानिक संकेत
आधुनिक ब्रह्मांड विज्ञान कहता है कि
संपूर्ण ब्रह्मांड एक ही मूल ऊर्जा से विकसित हुआ।
यह मन्त्र उसी सत्य का आध्यात्मिक रूपक है—
एक मूल तत्व, अनेक अभिव्यक्तियाँ।
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English Explanation
This mantra declares that the ancient divine radiance inspires the sages.
The one primordial reality manifested in many forms during the early stages of creation.
It expresses the principle of unity behind diversity — one source, many expressions.
Core Insight:
All multiplicity arises from one eternal light.
True wisdom comes from alignment with that primordial radiance.
शब्दार्थ
यः = जो
अथर्वाणम् = अथर्व ऋषि / अग्नि के प्रथम उपासक
पितरम् = पिता, मूल स्रोत
देवबन्धुम् = देवताओं का मित्र / संबंधी
बृहस्पतिम् = बृहस्पति, ज्ञान के अधिपति
नमसा = नम्रता से
अव गच्छात् = प्राप्त करता है / शरण लेता है
त्वम् = तुम
विश्वेषाम् = सबका
जनिता = जन्मदाता
यथासः = यथार्थ रूप से
कविः = द्रष्टा, सर्वज्ञ
देवः = दैवी सत्ता
न = नहीं
दभायत् = पराजित होता है
स्वधावान् = स्वशक्ति से संपन्न
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हिन्दी व्याख्या (लगभग 800 शब्द)
यह मन्त्र उस दिव्य अग्नि/ब्रह्म की स्तुति है
जो अथर्व ऋषि के रूप में प्रथम प्रकट हुई चेतना से जुड़ा है।
“योऽथर्वाणं पितरं देवबन्धुं”—
जो अथर्व ऋषि को पिता और देवताओं का मित्र मानकर
नम्रता से उनकी शरण जाता है।
यहाँ अथर्वाण को अग्नि का प्रथम उपासक और
ज्ञान-परंपरा का आदिपुरुष माना गया है।
अर्थात् जो व्यक्ति ज्ञान और परंपरा का सम्मान करता है,
वह दिव्य सत्ता से जुड़ता है।
“बृहस्पतिं नमसाव च गछात्”—
जो बृहस्पति (ज्ञान के अधिपति) को नम्रता से ग्रहण करता है।
यह संकेत है कि ज्ञान का मार्ग विनम्रता से खुलता है।
“त्वं विश्वेषां जनिता”—
हे दिव्य अग्नि!
तुम समस्त सृष्टि के जनक हो।
“कविर्देवो न दभायत्स्वधावान्”—
तुम सर्वज्ञ कवि हो,
स्वशक्ति से संपन्न हो,
और कोई तुम्हें पराजित नहीं कर सकता।
यह मन्त्र स्पष्ट करता है कि
दिव्य चेतना अजेय है और
ज्ञान ही उसकी पहचान है।
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दार्शनिक अर्थ
1. ज्ञान की परंपरा का सम्मान करना आवश्यक है।
2. विनम्रता से ही दिव्य ज्ञान प्राप्त होता है।
3. परम चेतना सर्वज्ञ और अजेय है।
यह मन्त्र गुरु-परंपरा और ज्ञान की महिमा को स्थापित करता है।
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आध्यात्मिक संदेश
1. गुरु और ज्ञान का आदर करें।
2. विनम्रता से ही सत्य का द्वार खुलता है।
3. अपने भीतर की अग्नि (चेतना) को जागृत करें।
जब मनुष्य ज्ञान को पिता समान माने
और नम्रता से उसे स्वीकार करे,
तभी वह जीवन में अजेय और प्रकाशमान बनता है।
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आधुनिक संदर्भ
आज के युग में भी
जो व्यक्ति शिक्षा, गुरु और परंपरा का सम्मान करता है,
वही स्थिर और सफल होता है।
ज्ञान के बिना शक्ति अंधी है,
और विनम्रता के बिना ज्ञान अधूरा है।
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English Explanation
This mantra praises the divine principle connected with Atharvan — the primordial seer — and Bṛhaspati, the lord of wisdom.
It states that one who approaches knowledge with humility connects with the divine source.
The supreme being is the creator of all, self-powered, and unconquerable.
Core Insight:
Humility opens the path to wisdom.
Divine knowledge is self-sustaining and undefeatable.
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